December 31, 2008

'गीत गाता आ रहा हूँ '

[दुबई फेस्टिवल सिटी [दिसम्बर १० ,२००८]]

वर्ष २००८ अब विदा लेने को है,नव-वर्ष के आगमन में कुछ ही घंटे शेष हैं.
नयी सोच,नए विचार,नयी योजनायें,नए वादे,नए संकल्प लिए नए वर्ष का स्वागत करें.
बीतते हुए इस वर्ष में रह गए अधूरे कार्य नए वर्ष में पूरे हों,
हर ओर खुशियाँ हों,देश खूब प्रगति करे.
विश्व में शान्ति बहाल हो.
आप और आपके समस्त परिवार को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं.
आता हुआ नया वर्ष 2009 कुछ कह रहा है---
आईये सुनते है...
'गीत गाता आ रहा हूँ '

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गीत गाता आ रहा हूँ,
तुम नए विश्वास भरना,
गर्व से मैं सर उठाऊं ,

तुम नया इतिहास रचना

देश की गरिमा को खातिर ,
कर गए क़ुर्बान जीवन,

भूल न जाना तुम उनको,
कर नमन तुम आगे बढ़ना


देखना तुम फिर कहीं भी,

कोई भी भूखा न साये,

हर दिशा में हो उजाला,
ज्ञान दीपक बन के जलना


पाट दो अन्तर हृदय के ,
संदेस सब में बाँट दो,

विश्व में चैनो-अमन हो,
प्रार्थना ईश्वर से करना

एक क़दम जो तुम उठाओ,
और भी संग आयेंगे,

हौसला टूटे न कोई ,
तुम यही संकल्प धरना

'गीत गाता आ रहा हूँ......

-[अल्पना वर्मा ,३१ दिसम्बर २००८]

December 24, 2008

राजस्थान पत्रिका में हुई चर्चा

पढने हेतु फोटो पर क्लिक करें.

हिन्दी ब्लागिंग में महिला ब्लागरों की चर्चा हुई और हम भी छपे यहाँ - तस्वीर देखीये- .....आज के राजस्थान पत्रिका समूह के भोपाल से प्रकाशित समाचारपत्र ''पत्रिका''की साप्ताहिक पत्रिका 'परिवार'' मे श्री आशीष खंडेलवाल जी ने 'ब्लॉग वुमन ' के नाम से आलेख लिखा है ।



आशीष जी को इस सुंदर आलेख के लिए धन्यवाद.


इस लेख के प्रकाशित होते ही सुबह से मेरे पास कई ईमेल भी आ रही हैं, जिन से मुझे बहुत ही प्रोत्साहन मिल रहा है.हिन्दी ब्लॉग जगत में मेरी अब तक जो भी पहचान बन पायी है उस के लिए सभी ब्लॉगर साथियों ,पाठकों और शुभचिंतकों की आभारी हूँ.आशा है भविष्य में भी ऐसे ही अपना प्यार और सहयोग आप मुझे देते रहेंगे

December 18, 2008

विदाई


विदाई
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देख रही हूँ ,
'उस को 'सीढियां उतरते हुए,
गले में लटकते सुनहरी तमगे,
हाथों में चन्द्र -विजय पताका भी है ,
मगर ,
कदम भारी ,
नज़रें ग़मगीन हैं उस की,
बेगुनाहों की लाशों का वज़न उठाये
चला जाता नहीं उस से,
सर झुक गया इतना कि
रास्ता भी दिखता नहीं ।
हाँ ,
जा रहा है जो ,
वह साल२००८ है,
आईये ,
कर देते हैं उस को विदा- रोशनी दे कर,
घावों पर उस के मरहम रख कर।
और प्रार्थना करते हैं कि
नव वर्ष उजाले नए ले कर आए।

-अल्पना -

दिसम्बर से मार्च तक हर साल लगने वाले 'ग्लोबल-विल्लेज ,दुबई 'में भारत का पंडाल सब से बड़ा और सब से अधिक लोकप्रिय होता है.इस साल भी आयोजित इस मेले में भारत का पंडाल बहुत ही सुंदर सजाया गया है.देखिये भारत के पवेलियन की कुछ ताजा तस्वीरें-



कृत्रिम नहर के एक तरफ़ भारत और दूसरी तरफ़ मिस्र का पवेलियन



भारत का पवेलियन और आकाश में देखें आतिशबाजी



निकासी द्वार


स्वागत द्वार-

December 15, 2008

' हरे कांच की किरचें'-कविता का मर्म


'हरे कांच की किरचें ' इस कविता का मर्म समझाने से पहले बता दूँ कि मैंने यह तय किया है कि भविष्य में कविता के साथ ही उस का प्रसंग भी प्रस्तुत किया करुँगी या फिर सरल कविता ही पोस्ट करुँगी.
ब्रिज मोहन श्रीवास्तव जी ने इस बार इस कविता की व्याख्या स्वयं इस प्रकार की है और मेरी राय मांगी है.
मन को पीड़ा से भर देने वाली रचना/मेडम आपका जो भी द्रष्टिकोण रहा हो लिखने का/पाठक को भी अपना अनुमान लगाने का अधिकार है/यह व्यथा एक सैनिक की पत्नी की भी हो सकती है और शहीद की पत्नी की भी या ऐसे ही किसी एनी की भी/क्योंकि चूडियाँ उतार फेंकना और सुर्ख चिन्ह मिटा कर आंसू भर आना लेकिन मन में'हरे कांच की चूडियों की इच्छा दवी होना मेरे मनमे आए विचार की पुष्टि करता है /जहाँ तक बुद्ध हो गई है तो इसको पत्थर हो गई है कहने में भी कोई हर्ज न था मगर वह निर्जीब होता और इस नारी में अभी जीवन शेष है/लगता है अहिल्या भी वास्तव में पत्थर की शिला न हो कर शिलावत हो गई होगी/यदि मेरा द्रष्टिकोण जरा भी सत्य है तो इतनी मार्मिक रचना मेरी नजरों से आज तक नहीं गुज़री /पुन पुन धन्यवाद और वधाई


मैं यही कहना चाहूंगी कि आप सही समझे हैं.
अच्छा लगता है जब अपनी रचना में किसी पाठक की इतनी रूची पाते हैं.
लेकिन कविता में इस बार मैं ने कोशिश की कि कम से कम सांकेतिक भाषा का प्रयोग हो जिस से ज्यादा सेज्यादा पाठक समझ सकें.विज्ञान विषय की स्नातक होने के कारण मैंने हिन्दी [बी-कोर्स ]बारहवीं तक ही पढ़ी है और हिन्दी साहित्य के नाम पर प्रेमचंद और शिवानी के अलावा ज्यादा किसी को नहीं पढ़ा.इस लिए हिन्दी के अपने सीमित ज्ञान के आधार पर जो थोड़ा लिख लेती हूँ उसे ऐसे ही समझा सकती हूँ वह यह है-कि इस कविता 'हरे कांच की किरचें 'में मैं ने एक स्त्री की उन भावनाओं को दर्शाने की कोशिश की है जो स्त्री के लिए ही ख़ास सुरक्षित हैं.
कविता में 'अगन''--
यह परिस्थिति के अनुसार अपना कारण बदलती है-




१-जैसा की आप ने समझा-एक विधवा की मनोव्यथा है--तो यह अगन प्रियतम की चिता की अग्नि हो सकती है.
२-या समझिये-एक हारी हुई स्त्री के रोष/क्रोध या उपेक्षित होने पर मन में उपजी हो.
३-या फिर यह विरह /बिछोह में तड़प से लगी हो?
४-या फिर अपने ही भावों के ज्वर से उपजी हो जिसे वह नियंत्रित न कर पा रही हो.
५-या संबंधों की परिभाषा समझ पाने में असहाय होने की कुंठा से जन्मी ज्वाला.

कोई भी कारण हो इन परिस्थितियों में मजबूर हो कर या प्रतिरोध कर न पाने की स्थिति में इस संबंधों को तोड़ देना चाहती है.-'चूडियाँ उतार फेंकना -सुर्ख चिन्हों[बिंदिया और सिन्दूर] सुहाग की निशानियों को मिटा देना--स्थाई [एक विधवा] या अस्थायी[एक विरहिणी ]करती है तो अपने अन्दर की सभी चाहतों को खतम कर देने का प्रयास करती है.निराशा -हताशा उसे पत्थर बना देती है--आप ने सही कहा -अहिल्या भी ऐसी हो गयी थी.नायिका का दुःख चरम पर है.

मनोविज्ञान में दुःख[grief]की पाँच अवस्थाएं होती हैं-denial, anger, bargaining,depression, acceptance; death -डिप्रेशन के बाद acceptance है-और यही अवस्था यहाँ इस नायिका की भी है-

- जिस को देख कर लोग कहने लगते हैं वो बुद्ध हो गयी है!

इस के बाद मृत्यु[मुक्ति] की स्टेज है .

अब बुद्ध क्या है???यह आप सभी जानते हैं.संक्षेप में 'बुद्ध' संसार से निर्मोह की एक स्थिति है.

-मगर नहीं...वो जानती है वो बुद्ध नहीं हुई!....

डॉ.अनुराग जी सही कहते हैं-'बुद्ध हो जाना इतना आसान भी नही है ओर इसे स्वीकार करना भी !'

राज भाटिया जी के इस कथन से कविता के भाव और साफ़ हो जाते हैं ' बहुत दर्द लिये है यह हरे कांच की
किरचे ! मन चाहता है इन्हे निकालन फ़ेकना.... लेकिन यादे भी तो साथ मे लगी है इन किर्चो के.. बहुत
कुछ बंधा है इन किर्चो से... बहुत वेदना छुपी है.

ज्ञान दत्त जी ने ने भी सही जाना -यह तो आपने आत्मपरीक्षण का तरीका बता दिया, कि बुद्ध हुये या नहीं,

कैसे जाना जाये।
सुशील कुमार छोक्कर जी -कांच की किरचें कांच के महीन टुकड़ों को कहते हैं .हर कांच की चूडियाँ सुहाग का
प्रतीक हैं -

और आगे कविता का भाव आप समझ ही गए हैं.


[P.S.व्याख्या करते हुए ऐसा लगता है जैसे किसी परीक्षा में बैठी लिख रही हूँ]

December 14, 2008

'हरे कांच की किरचें'

[chitr google se sabhaar]
विरहिणी की अन्तर वेदना को बताती हुई यह कविता प्रस्तुत है-
हरे कांच की किरचें
-----------------------
अगन -
तपा जाती है तन उसका,
मन भी सुलगने लगता है,

गर्म होती कांच की चूडियाँ
उतार फेंकती है वो.
पोंछ देती है सुर्ख चिन्हों को.
भिगोती रहती है आंसुओं में ख़ुद को
और बन जाती है एक बुत !

लोग कहते हैं कि 'वो 'बुद्ध 'हो गयी है!!

मगर नहीं...वो जानती है वो बुद्ध नहीं हुई!
क्योंकि अब भी ,
उस के मन में पीर देती हैं
व्याकुल करती हैं उस को ,
मन में दबी -
हरे कांच की किरचें!

- अल्पना वर्मा द्वारा लिखित[२००८]

Kavita Ka marm jaaniye -yahan :-
http://alpana-verma.blogspot.com/2008/12/blog-post_15.html

December 1, 2008

'नया संग्राम'


'नया संग्राम'[एक आह्वान]
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आज एक नया संग्राम लाना चाहिए,हो गया पुराना संसार नया चाहिए,

आईनों के धुंधले अक्स नहीं चाहिए,लेबलों से लदे इंसान नहीं चाहिए,
आज एक नया संग्राम लाना चाहिए,हो गया पुराना संसार नया चाहिए.

झूटे करें वादे और लूटे भोलेपन को,सत्ता के ऐसे गुलाम नहीं चाहिए,
बहता हो जिससे लहू मासूमों का, ऐसे खूनी फरमान नहीं चाहिए,

पैसों के कांटे छीले प्यार की कली को,आज हमें ऐसे धनवान नहीं चाहिए,
रिश्तों में बहता हो सिर्फ़ खारा पानी, ऐसे रिश्तों की पहचान नहीं चाहिए,

आज एक नया संग्राम लाना चाहिये,हो गया पुराना संसार नया चाहिए.

इंसानियत के खूनी इंसान आज हमें ऐसे हैवान नहीं चाहिए,
जो न मिलने दे इन्साफ के खुदा से हमें,आज हमें ऐसे दरबान नहीं चाहिए,

जिस से बरसता हो सिर्फ़ काला पानी,आज हमें ऐसा आसमान नहीं चाहिए,
जिस घर में सन्नाटे और चीखें हों, आज हमें ऐसे मकान नहीं चाहिए,

आज हमें नया संग्राम लाना चाहिये,हो गया पुराना संसार नया चाहिए.

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कविता सुनिये
Play Or Download Here[mp3]
-written[2002] and recited by Alpana Verma


November 21, 2008

'परिवर्तन आएगा'[श्री प्रदीप शिशौदिया] '


मंजिलें दूर सही ,पाना तो है..
[chitra-google images se sabhaar]
हर तरफ़ आज कल जैसा देश में माहौल है ,लेखों में कविताओं में भारत में वर्तमान स्थिति पर चिंताएँ जताई जा रही हैं.
इसी विषय पर मैं अपने भाई श्री प्रदीप शिशौदिया जी की कविता जो दिल्ली से प्रकाशित
एक पत्रिका में छपी थी और इस कविता पर उन्हें हिन्दी दिवस पर पुरस्कार भी मिला था..
उन से अनुमति ले कर यहाँ अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर रही हूँ.
आशा है, आप भी सकारात्मक सोच की इस कविता को पसंद करेंगे .

'परिवर्तन आएगा '
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वह कहते हैं परिवर्तन आएगा,
हाँ,शायद परिवर्तन आएगा,
टूटी कड़ियों को फिर से जोड़ा जाएगा,
उन्हें उम्मीद है परिवर्तन आयेगा .

अब परिवर्तन आवश्यक है
विचारों की आवश्यकता से,
अनुशासन की आवश्यकता से ,
स्वच्छ मानसिकता की आवश्यकता से ,
हाँ ,इन सब की आवश्यकता से ,एक भौतिक बदलाव आएगा.

हाँ ,जब वह कहते हैं कि बदलाव आयेगा,
तो आशा होती है कि बदलाव आएगा.
सरकारी दफ्तरों में सही आचरण से जो परिवर्तन की लहर उठेगी.
भ्रष्टाचारियों के मरण से जो परिवर्तित हवा चलेगी .
तो ,चौराहों के मुख बदलेंगे ,
कर्मचारी रिश्वत नहीं लेंगे,
शहीदों का फिर होगा सम्मान,
नेता जनहित कार्य करेंगे.

स्पष्टवादिता का युग आएगा ,
फाईलें भारी नहीं होंगी,
दूध में निरमा नहीं होगा,
आदमी तब निकम्मा नहीं होगा,
नियत खोटी नहीं होगी,
संसाधनों की कमी नहीं होगी,
हँसी खुशी की हर और होगी.
लगता है ना..रामराज्य आयेगा?

हाँ, शायद लगता है की परिवर्तन अवश्य आएगा.
घुमड़ घुमड़ कर फिर प्रश्न यही है
मित्र!परिवर्तन कौन लायेगा?
मैं फिर यही कहता हूँ ,
जो लाया है यह स्थिति,बदलाव भी वोही लाएगा.

हाँ ,हमें ही बदलना होगा,
उतरना होगा खरा
उनकी,अपनी,सब की आशा पर,
संस्कार.संस्कृतमय भारतवर्ष को फिर से ,
ज्ञानमय ,विज्ञानमय विकसित करेंगे.

भ्रष्टाचार मिटा कर, सदैव सत्यमेव जयते कहेंगे.
तब सब वास्तव में यही कहेंगे...
जी हाँ,बदल रहा है भारत !
सच ही तो है...आएगा परिवर्तन आएगा!
[--श्री प्रदीप शिशौदिया द्वारा लिखित ]

November 16, 2008

'शब्दों का गणित--शंका और समाधान '


कल मैंने एक कविता पोस्ट की थी'शब्दों का गणित' उस पर ब्रिज मोहन श्रीवास्तव जी की टिप्पणी में किए प्रश्न ने मुझे विवश किया कि उस की व्याख्या टिप्पणी में न दे कर एक पोस्ट में दूँ.
आप ने कहा--'बहुत दिमाग लगाया माफ़ करना में सोच नहीं पारहा हूँ की इस कविता की गहराई क्या है जरा सा भी लिकं मिल जाता तो सोचता''
इस का उत्तर दे रही हूँ-आशा है आप की शंका का समाधान हो जाएगा-

-इन चंद पंक्तियों की व्याख्या इस प्रकार है--

यह उन शब्दों के गणित की बात हो रही है--जिनसे हम रोज़ आपस में संवाद करते हैं -सुनते हैं या कहते हैं -
उन में वे शब्द जो अर्थपूर्ण होते हैं--जिनसे हमें कुछ सीखने को मिलता है--जो हमें आत्म विश्वास देते हैं.
वे शब्द जो हमारा महत्व बताते हैं दूसरे के लिए ही नहीं हमारे अपने लिए भी..
ये वो शब्द हैं जिनसे उर्जा मिलती है--सकारात्मक सोचने में मदद करते हैं..
वे शब्द जो हमें कुछ नयी सीख देते हैं--दिशा देते हैं--
पहले जब बहुत बोल कर- व्याख्यान दे कर 'एक स्थिति में दिमाग सोचना भी बंद कर देता था-
तो लगता था शायद मौन रह कर यह उर्जा वापस मिल सकती है-
लेकिन अब जब मौन की अवधि कुछ ऐसी हो गयी है--जो यह समझा गयी--
कि शब्दों की क्या महत्ता है- इस लिए इन शब्दों का जमा करते हैं--
हर दिन में आप को कितने ऐसे शब्द मिल पाते हैं ?
अगर कभी मिले तो yah उन्हीं चुने हुए शब्दों की
जमा पूंजी है.--इस के अलावा इस बात की दूसरी व्याख्या इस तरह से से भी की जा सकती है -
आधुनिक जीवन की भाग दौड़ में हम संबंधों में आपसी संवाद की भूमिका को भूल गए हैं-
मशीनी जीवन में ऐसा अक्सर होता है की पति पत्नी दोनों में पूरे दिन एक शब्द बात भी न हुई हो--या फिर
एक दूसरे को देखा भी न हो--[जैसा अक्सर शिफ्ट duties वाले दम्पतियों में होता है--]
यहाँ भी देश से दूर --रहने वालों कई परिवारों में देखा है--कि सारा दिन आपस में कोई बात-चीत नहीं होती-
लेकिन फिर भी दिन अपने नियम से गुजरता रहता है
अजीब लगा सुन कर??नहीं कुछ अजीब नहीं है--
मैं ने देखा है --सारे दिन में बात होती है--
उदहारण :-
सुबह--
नाश्ता??

शाम--
चाय?
रात--
खाना क्या बनेगा?
इतनी बात --इस से ज्यादा नहीं--
किसी के पास फुर्सत नहीं है--'संवाद' शब्द बन कर रह गए हैं--उँगलियों पर गिने जा सकतेहैं!
ये तो हाल है जहाँ नौकर नहीं हैं--जहाँ नौकर हैं वहां तो शायद इतनी भी बात न होती हो?
ऐसे में इन चंद शब्दों की कितनी अहमियत होगी ये तो भुक्तभोगी ही बता सकतेहैं-क्यूँ की इन्हीं शब्दों के उत्तर
अगले दिन की वार्तालाप का आधार होते हैं--जीने की कुछ उर्जा देते हैं-
>यह स्थिति है आधुनिकता की देन -- जो बढ़ा जाती है जीवन में शब्दों की अहमियत!

इसीलिये करना पड़ता है शब्दों का गणित और रखना पड़ता है हिसाब!

अब सोचिये आज के दिन के खाते में आप कितने शब्द जमा कर पाए?


November 15, 2008

एक कविता-एक गीत-' शब्दों का गणित'

पहले जब स्कूल में नौकरी करती थी तो ८ periods कक्षा लेने के बाद ऐसा लगता था कि
बस अब बोलने का क्रेडिट सब ख़तम हो गया.कुछ दिन मौन व्रत रखने की इच्छा होती थी..

अब यह आलम है कि -

शब्दों का गणित
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आज ..

दिन के खाते में
जमा हुए सिर्फ़ चार...

कल तो छह हो पाए थे!


कोई ब्याज नहीं मिलता इस पर..


फिर भी चाहती हूँ..


ये जमापूंजी कुछ और बढे!

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पुरानी फ़िल्म का एक गीत प्रस्तुत है..[मेरी आवाज़ में ]
'मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज़ न दो '
[यह मूल गीत नहीं है]आशा है पसंद आएगा.

November 9, 2008

एक कविता-एक गीत -'डर '

कविताई की सीमाओं में न बंधते हुए..कुछ शब्दों को बाँधने की कोशिश रहती है..कई बार किन्हीं पंक्तियों को कोई रूप मिल जाता है--कई बार यूँ ही मुठ्ठी में बंधी रह जाती हैं..देखें यूँ ही चलते-चलते क्या लिखा है....

रात के आने से,

उसकी तन्हाईयों से डर लगता है..

भीगती हैं पलकें,

ख़ुद के बह जाने का डर लगता है..

जिसको देखा भी नहीं,दिल ने उसको चाहा है...

क्यूँ क़दमों के बहक जाने का डर लगता है?

वो मिले या ना मिले ,मगर--

...ख़ुद के खो जाने का डर लगता है!

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समय मिले तो एक गीत भी सुनियेगा -
-ये मूल गीत नहीं है न ही तुलना करियेगा-क्यूँ कि बस यूँ ही गुनगुना रही हूँ -आप को सुना रही हूँ...:)
'तेरा -मेरा प्यार अमर फिर क्यूँ ....'मुझे बहुत पसंद है --आशा है आप को भी पसन्द आएगा.

November 5, 2008

कहीं दूर चलें..



कहीं दूर चलें
-------------
सोचती हूँ आज ,कहीं दूर चलें,

गुनगुनाती शाम के धुंधलके में,
चाँद की रोशनी के मद्धम होने तक ,
तुम करो बातें और मैं सुनती जाऊँ .

फूलों की खुशबू और झरने के मधुर स्वर,
गिरते पानी की बूंदों को हवा -
-मेरी अलकों पर मोती सा सजाती ,
माथे पर गिरी बूंदों को तुम्हारी उँगलियों की छुअन-
सोयी आरजूएं जगा जाती लेकिन..
अधरों पर आ कर हर बात ठहर जाती.

रात की तन्हाईयों में ,सुबह ओस के गिरने तक...
दिल की हर उलझन सुलझ जाए,
रुसवा न हो चाहत ये ख्याल रहे...
रूह में उनकी मेरी रूह
यूँ समा जाए...

सोचती हूँ आज कहीं दूर चलें..

[--Alpana Verma]

October 27, 2008

दीपावली की शुभकामनाएँ[-अल्पना]


ब्लॉग जगत के सभी साथियों को मेरा प्यार भरा नमस्कार.आप सभी को दीपावली की ढेरों शुभकामनायें.इस पावन पर्व पर आप सभी की हर मनोकामना पूर्ण हो.

संभवत आप मुझे भूल गए होंगे [??] क्योंकि मैं कई दिनों से ब्लॉग पर अनुपस्थित रही हूँ.

लेकिन मुझे आप सब का प्यार- दुलार सब याद है.[शीघ्र ही अपनी रचनाएँ पोस्ट करुँगी] .




मेरी तरफ़ से ये मिठाईयां स्वीकार करें.:)


धन्यवाद.


-आभार सहित--अल्पना

June 24, 2008

ब्लॉग्गिंग में मेरा नया प्रयोग



video

[yah clip--AVI. mode[blogger] में है-जो जल्दी देखी जा सकेगी]

प्रस्तुत है-मेरा एक नया प्रयोग.......मैंने सभी तकनीकी बारीकियाँ 'गूगल सर्च इंजन 'से और विण्डो XP की हेल्प से सीखी हैं.- इस वीडियो को बनाने में मुझे ७ घंटे लगे-दो बार पूरा बनाने करने के बाद भी ठीक नहीं लगी और अब जा कर यह तैयार हुई है--मेरी कविता 'भूल जायेंगे'को इस विडियो द्वारा प्रर्दशित करने का प्रयास किया है.कृपया बताएं कैसी लगी?

भूल जाएंगे

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जब कभी यादों के दर्पण टूट जाएंगे,

भूल जाएंगे तुम्हें हम भूल जाएंगे,

जब कभी सपने भी हम से रूठ जाएंगे,

भूल जायेंगे तुम्हें हम भूल जायेंगे .

1-हमने अपनी उम्र का सौदा किया जिससे,

वो मिलेगा फ़िर कभी तो पूछूंगी उस से,

बिन तुम्हारे अपना क्या हम मोल पाएंगे,भूल जायेंगे तुम्हें हम भूल जायेंगे......

2-तुमने माना था हमी को प्यार के क़ाबिल,

फ़िर बने क्यों मेरे अरमानों के तुम क़ातिल,

जब कभी आँखों से आंसू सूख जाएंगे,भूल जायेंगे तुम्हें हम भूल जायेंगे......

3-संग तुम्हारे कटते थे जो मेरे रात और दिन,

अब कटेगी कैसे कह दो ज़िंदगी तुम बिन,

जब कभी साँसों के बन्धन छूट जाएंगे,भूल जाएंगे तुम्हें हम भूल जाएंगे.

4-डूबती कश्ती ने तुमको समझा था साहिल,

लेकिन तुम ने दे दिया गैरों को अपना दिल,

जब कभी धड़कन से रिश्ते छूट जाएंगे,भूल जाएंगे तुम्हें हम भूल जाएंगे.

5-एक मुठ्ठी आसमां की चाह थी हमको ,

लेकिन तुमसे नाउम्मीदी ही मिली हमको,

जब फरिश्ते मौत के हम को सुलायेंगे,भूल जाएंगे तुम्हें हम भूल जाएंगे.

जब कभी यादों के दर्पण टूट जाएंगे,भूल जाएंगे तुम्हें हम भूल जाएंगे---

-written by Alpana Verma [in 2003]

[आज[26th june] एक बहुत ही अच्छी बात हुई.....मेरी कविता 'भूल जाएंगे' को यहाँ ब्लॉग पर सुन कर मुम्बई से एक सज्जन Mr.अरविन्द शर्मन जी [जिनका अपना संगीत स्टूडियो है-इस से ज्यादा उन के बारे में मैं नहीं जानती ] ने कविता'भूल जाएंगे' के लिए संगीत बना कर भेजा है, जिस से मेरा यह प्रिय गीत संगीत पा कर और निखर सकेगा.
मैं अरविन्द जी को अपने ब्लॉग के माध्यम से धन्यवाद कहना चाहती हूँ.[posting this message on june 26th,2008]

June 22, 2008

'खामोशी'

खामोशी
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'अंजलि भर


खामोशी समेटती हूँ,


बिखरा देती हूँ चारों और ,


क्यूँ कि -


इस भीड़ में,


जी नहीं लगता


तुम बिन...


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June 16, 2008

'ज़िंदगी'

पिछली कविता के कमेंट्स में किसी अनाम व्यक्ति ने रोमांटिक कविता लिखने का आग्रह किया मगर करूँ क्या? मेरी कलम ऐसी ही कवितायें लिखती है जो उस श्रेणी में आती नहीं.
यह कविता भी कई साल पहले की लिखी हुई है--अभी कुछ नया नहीं लिखा है सो पुरानी डायरी से यह कविता आप की नजर करती हूँ-

ज़िंदगी
-------

क़तरा क़तरा छंटती जाती है ज़िंदगी

मायूसी के धागों में बटती जाती हैज़िंदगी

जब कभी आँख से मोती टपके
दरया बनके बहती जाती है ज़िंदगी

तनहाइयों के देश में अकेली ही
खुद में सिमटती जाती है ज़िंदगी

यूँ तो पहले ना थी उदास इतनी
जाने क्यों गुमसुम रहती है ज़िंदगी

गीत उनका गाती हूँ अगर
पायलें छनकाती है ज़िंदगी

साथ बिते पल जो याद आते हैं
हँसती है खिलखिलाती है ज़िंदगी

और क्या कहूँ....

यूँ ही लम्हा लम्हा कटती जाती है जिंदगी

हाँ ,कटती जाती है जिंदगी।

-अल्पना वर्मा

June 8, 2008

'यूं हुई समन्दर मैं '


यूं हुई समन्दर मैं

------------------


सोचा था मुट्ठी में संभाल रखा है



जतन से उस को,


पर न जाने कब..


फिसल गया वो...

सूखी रेत की तरह,



और रह गयी किरकिरी हाथों में,


जो आंखों में चुभती है तो.....



बना जाती है समन्दर मुझ को !



-Alpana Verma

May 25, 2008

लघु कविताएँ

1)अपने भीतर के जानवर को

छुपाने की कोशिश करते है,

कई लोग,

अक्सर ..... दूसरो के खोल में!

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2)वो शमा हूँ ,जो जलती रही मगर रोशनी कहीं न हुई!

वो लहर हूँ उफनती रही मगर न दामन किसी का गीला किया!

वो आंसू हूँ जो ढलका नहीं अब तक किसी के गालों पर!
हाँ ,
वो सांस हूँ जो ढली आह में मगर ,घुटती है अब तक सीने में!

[written when i was a college student]

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3)अपनी रफ्तार से जा रही है ज़िंदगी यूं तो!

मगर न जाने क्यों लगता है....

अनगिनत विराम चिन्ह

हरदम साथ चलते हैं!

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-अल्पना वर्मा

April 18, 2008

सुबह



सुबह जब मेरे दरवाज़े पर दस्तक देने,
आगे बढ़ती है,

कोहरे को छांटती हुई
तो,
उसके कदमों को, दरवाजे़ से

कुछ फासले पर लगा

एक बड़ा पेड़ रोक लेता है!

सुबह कोशिश करती है

बढ़ती है

अपने अंगरक्षकों को भेजती है

उनमें से कुछ ही जीतकर

मेरे पास पहुंचते हैं,

उससे पूर्ण अहसास नहीं हो पाता

कि,
सुबह हो गई है।

और मैं,

दरवाजे पर हल्की दस्तक को¸

हवा का झोंका समझ बंद रहने देती हूं

अंधेरे में घुटती हुई
करती रहती हूं
अपने जीवन की सुबह की प्रतीक्षा

और टटोलती रहती हूं

अंधकार में,

सुबह का जीवन में अर्थ –

[written at the age of 18]--Alpana Verma

April 6, 2008

जाने क्यूँ


जाने क्यूँ [एक गीत ]
------ -
जाने क्यूँ मैं अनजान डगर जाती हूँ,
मिल के अनजान लम्हों से बहल जाती हूँ.

टूट कर जुड़ता नहीं ,माना के नाज़ुक दिल है,
गिरने लगती हूँ मगर ख़ुद ही संभल जाती हूँ.

ज़िंदगी से नहीं शिकवा न गिला अब कोई,
सुनसान राहों से बेखौफ गुज़र जाती हूँ.

गैर के हाथों उनके नाम की मेहँदी है रची,
जान कर ,अपनी तमन्ना में खलल पाती हूँ.

है खबर वक्त का निशाना मैं हूँ ,फ़िर भी-
उनके हाथों मिटने को मचल जाती हूँ.
--अल्पना वर्मा

March 31, 2008

आग नफ़रत की


आग नफ़रत की
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आग की लपटें उठीं,
कैसा कहर बरपा गया,
हर तरफ़ काला धुआँ
आसमां ज़मीन को खा गया ,

उड़ रहे थे चीथड़े
कंक्रीट और इंसानो के ,
लो और एक खेल हैवानीयत का ,
इंसान फिर दिखला गया !

आज के इस दौर में
इंसान की क़ीमत कुछ नहीं ,
जां की क़ीमत कुछ नहीं ,
ईमान की क़ीमत कुछ नहीं ,

हर कोई ये जानता है-
मौत सब को आनी है ,
फिर ना जाने क्यूं कोई कब,
कैसे क़ातिल हो गया ?

सरहदों के दायरे
और दायरों के ये भंवर,
जाने कुछ ,अनजाने कुछ ,
हर कोई शामिल हो गया ,

कौन कर पाएगा यक़ीन
एक शहर बसता था यहाँ!
बारूद , हथियारों का जहाँ,
एक जंगल बन गया !

सब्र का मतलब तो बस
अब कागज़ी रह जाएगा,
प्यार बस एक शब्द
किताबों में लिखा रह जाएगा.

खो रहे हैं चैन और अमन
क्यूं हम दिलो दिमाग़ से,
इस तरह तो जिस्म ये
ख़ाली मकान रह जाएगा.

आओ बुझाएँ आग नफ़रत की ,
प्यार की बरसात से...

नहीं तो ...
देखते ही देखते,
ये जहाँ,
उजड़ा चमन रह जाएगा!
----अल्पना वर्मा [यह कविता मैंने ९/११ के हादसे पर लिखी थी.]


March 23, 2008

कुछ भटके हुए शब्द आप की नज़र!

१-तेरी चाहत ने
रिहा किया न मुझे,
यूं,
अपनी पहचान
खो रही हूँ मैं.
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२-संकरी हो गयी
कुछ इस क़दर,

पगडंडियाँ जीवन की ,

हर मोड़ पर,
ख़ुद से
टकरा जाती हूँ मैं!
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३-वरक दर वरक ,
लिखती रही दास्ताँ मैं रात भर,
सुबह,
हर पन्ने पर तेरा ही नाम था!!
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4-यूं तो -
परत दर परत
खुलने लगी थी मैं,
ये उसकी कमनसीबी
जो बेखबर रहा!
[अल्पना वर्मा द्वारा लिखित.]

March 19, 2008

रंग होली के

1-रं होली के
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हर और बिखर गए होली के रंग ,
ऐसे ही संवर गए फागुन के ढंग.

भँवरे भी रंग रहे कलियों के अंग,
हो रहे बदनाम कर के हुडदंग.

भर के पिचकारी,लो हाथ में गुलाल,
गौरी तुम खेलो मनमितवा के संग.

अब के बीतेगा सखी,फागुन भी फीका,
है परेशां दिल और ख्यालों में जंग.

बिरहन के फाग ,सुन बोली चकोरी,
मिलना जल्दी चाँद ! करना न तंग.

गहरे हैं नेह रंग, झूमे हर टोली,
गाए 'अल्प' फाग,बाजे ढोल और चंग.


-अल्पना वर्मा 'अल्प'

2-फिर आई होली
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बरस बाद देखो, फिर होली आई,
सतरंगी घटा, घिर घिर के छाई।


छलक-छलक जाएं बदरा से रंग,
मस्ताने डोल रहे करते हुडदंग।

वो देखो मस्त हुए, पी कर के भंग,
सखियाँ भी छोडे़ नहीं, करती हैं तंग।

रंग उड़े चहुँदिशा, सूखे और गीले,
हरे,जामनी,लाल,गुलाबी,नीले,पीले।

टोलियाँ नाचें गाएं, मिल के सब संग,
खूब ज़ोर आज बजाएं, ढोलक मृदंग।

धरती ने ओढ़ लीनी, पीली चुनरिया,
पवन बसंती जाए, कौन सी डगरिया।


मीठी व प्यार भरी,गुझिया तो खाओ,
याद रहे बरसों तक,ऐसी होली मनाओ।

-अल्पना वर्मा
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March 10, 2008

इंतज़ार

उनके आने की खबर क्यों, अब नहीं आती,

बेरुखी उनकी अब-यूं तो सही नहीं जाती,

रात भर याद कर के उन्हें, रोया है कोई,

पर यह शिक़ायत भी,अब -की नहीं जाती,

एक उम्मीद पर हैं- दीयों को रोशन किये,

न जाने क्यूं रोशनी-उन से, अब नहीं आती .

-Alpana Verma

January 16, 2008

गीत- ' भूल जायेंगे तुम्हें '

यह गीत मुझ से सबसे ज्यादा सुना गया है ,दो उर्दू अखबारों में प्रकाशित भी हो चुका है.
मुझे भी बेहद प्रिय है.

भूल जाएंगे तुम्हें
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जब कभी यादों के दर्पण टूट जाएंगे,
भूल जाएंगे तुम्हें हम भूल जाएंगे,
जब कभी सपने भी हम से रूठ जाएंगे,
भूल जायेंगे तुम्हें हम भूल जायेंगे .

हमने अपनी उम्र का सौदा किया जिससे,
वो मिलेगा फ़िर कभी तो पूछूंगी उस से,
बिन तुम्हारे अपना क्या हम मोल पाएंगे,
भूल जायेंगे तुम्हें हम भूल जायेंगे......

जब कभी यादों के दर्पण टूट जाएंगे,
भूल जाएंगे तुम्हें हम भूल जाएंगे,

तुमने माना था हमी को प्यार के क़ाबिल,
फ़िर बने क्यों मेरे अरमानों के तुम क़ातिल,
जब कभी आँखों से आंसू सूख जाएंगे,
भूल जायेंगे तुम्हें हम भूल जायेंगे......

जब कभी यादों के दर्पण टूट जाएंगे,
भूल जाएंगे तुम्हें हम भूल जाएंगे,

संग तुम्हारे कटते थे जो मेरे रात और दिन,
अब कटेगी कैसे कह दो ज़िंदगी तुम बिन,
जब कभी साँसों के बन्धन छूट जाएंगे,
भूल जाएंगे तुम्हें हम भूल जाएंगे.

जब कभी यादों के दर्पण टूट जाएंगे,
भूल जाएंगे तुम्हें हम भूल जाएंगे,

डूबती कश्ती ने तुमको समझा था साहिल,
लेकिन तुम ने दे दिया गैरों को अपना दिल,
जब कभी धड़कन से रिश्ते छूट जाएंगे,
भूल जाएंगे तुम्हें हम भूल जाएंगे.

जब कभी यादों के दर्पण टूट जाएंगे,
भूल जाएंगे तुम्हें हम भूल जाएंगे,

एक मुठ्ठी आसमां की चाह थी हमको ,
लेकिन तुमसे नाउम्मीदी ही मिली हमको,
जब फरिश्ते मौत के हम को सुलायेंगे,
भूल जाएंगे तुम्हें हम भूल जाएंगे.

जब कभी यादों के दर्पण टूट जाएंगे,
भूल जाएंगे तुम्हें हम भूल जाएंगे

-written by Alpana Verma [2003]

गीत -- इक़रार



geet suniye meri awaaz mein.
इक़रार
-एक गीत
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वो कहता है मैं तन्हा हूँ, करो कुछ प्यार की बातें,
मैं कहती हूँ नहीं मुमकिन, करूँ क्या प्यार की बातें,


1]-वो कहता है, अगर कह दो तो, ला दूं चाँद तारे भी,
मैं कहती हूँ ,अरे छोडो, हैं ये बेकार की बातें,
वो कहता है..........

2]-वो कहता है, बड़ी नाज़ुक है चाहत की तबीयत भी'
मैं ये जानूं ,वो रोता है सुन के, इन्कार की बातें,
वो कहता है............

3]-कहूँ कैसे के, इस दिल में, सदा तुम थे सदा तुम हो,
रुकी लब पे, आके हरदम, तुम से इज़हार की बातें,
वो कहता है............

4]-ये वादा, उम्र भर के साथ का, जो तुम ने कर डाला,
मैं कायल हूँ , तो अब कर लें, चलो इक़रार की बातें,
वो कहता है.............
-Alpana Verma[2005]

January 15, 2008

छोटी कविता- ' अहसास '

किस कहानी का सुरीला आगाज़ हो तुम ?

उड़ चला है मन मेरा न जाने कहाँ ,

क्या कोई परवाज़ हो तुम?


भेदना चाहूँ तो भी खुलता ही नहीं ,

सदियों से दफ़न गहरा

कैसा अजब राज़ हो तुम?


छू जाता है ,बिन आहट

मेरी रूह को अक्सर,

मीठा सा अहसास हो तुम!

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अल्पना वर्मा