March 23, 2008

कुछ भटके हुए शब्द आप की नज़र!

१-तेरी चाहत ने
रिहा किया न मुझे,
यूं,
अपनी पहचान
खो रही हूँ मैं.
--------------------
२-संकरी हो गयी
कुछ इस क़दर,

पगडंडियाँ जीवन की ,

हर मोड़ पर,
ख़ुद से
टकरा जाती हूँ मैं!
-----------------------
३-वरक दर वरक ,
लिखती रही दास्ताँ मैं रात भर,
सुबह,
हर पन्ने पर तेरा ही नाम था!!
--------------------
4-यूं तो -
परत दर परत
खुलने लगी थी मैं,
ये उसकी कमनसीबी
जो बेखबर रहा!
[अल्पना वर्मा द्वारा लिखित.]

19 comments:

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर!

मीत said...

न ! ये शब्द भटके हुए कहाँ हैं ?
ये तो अपनी मंजिल की ओर रवां हैं

लेकिन .... भटकन मंजिल से जुदा कहाँ है ??

कुन्नू सिंह said...
This comment has been removed by a blog administrator.
DR.ANURAG ARYA said...

वरक दर वरक ,
लिखती रही दास्ताँ मैं रात भर,
सुबह,
हर पन्ने पर तेरा ही नाम था!!

vah alpna ji....bahut khoob.

neeraj tripathi said...

वरक दर वरक ,
लिखती रही दास्ताँ मैं रात भर,
सुबह,
हर पन्ने पर तेरा ही नाम था!!

bahut barhiya

neeraj tripathi said...

वरक दर वरक ,
लिखती रही दास्ताँ मैं रात भर,
सुबह,
हर पन्ने पर तेरा ही नाम था!!

bahut barhiya

neeraj tripathi said...

वरक दर वरक ,
लिखती रही दास्ताँ मैं रात भर,
सुबह,
हर पन्ने पर तेरा ही नाम था!!

bahut barhiya

Ila said...

bahut khoob, lekhnee mein dum hai.

rkumar said...

charo kavita bemisal hai, saalon bad itni kubsoorat rachna parhi hai.

Mera pas shab nahi hai... aschrya hai log abhi bhi aiesa likh paate hain

mehek said...

वरक दर वरक ,
लिखती रही दास्ताँ मैं रात भर,
सुबह,
हर पन्ने पर तेरा ही नाम था!!
bahut hi sundar hai,jaise man ki aaj ho,awesome.

Dr. RAMJI GIRI said...

"संकरी हो गयी
कुछ इस क़दर,
पगडंडियाँ जीवन की ,

हर मोड़ पर,
ख़ुद से
टकरा जाती हूँ मैं!"

बहुत ही सुन्दर , अपनी -सी लगी ये पंक्तियाँ ....

Aadi said...

shabd ...

डॉ. राम चन्द्र मिश्र said...

अच्छी क्षणिकायें हैं।

shubhashish said...

वरक दर वरक ,
लिखती रही दास्ताँ मैं रात भर,
सुबह,
हर पन्ने पर तेरा ही नाम था!!
sach me bahut sunder

Kavi Kulwant said...

बधाई..
kavi.kulwant@gmail.com

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

वरक दर वरक ,
लिखती रही दास्ताँ मैं रात भर,
सुबह,
हर पन्ने पर तेरा ही नाम था!!

वाह ! बहुत ही सुंदर अभिबयक्ति क्या बात है..

अनुराग अन्वेषी said...

'संकरी हो गयीं कुछ इस कदर पगडंडियां जीवन की
हर मोड़ पर खुद से टकरा जाती हूं मैं।'
इससे बेहतर भला और क्या बात होगी,
पलायन का ख्याल जो आया दिल में
खुद से ही मुलाकात होगी।
जीवन में जब तक आदमी खुद से मिलता रहता है वह आदमी बना रहता है। बहुत प्यारी लगीं आपकी ये क्षणिकाएं।

अनुराग अन्वेषी said...

'संकरी हो गयीं कुछ इस कदर पगडंडियां जीवन की
हर मोड़ पर खुद से टकरा जाती हूं मैं।'
इससे बेहतर भला और क्या बात होगी,
पलायन का ख्याल जो आया दिल में
खुद से ही मुलाकात होगी।
जीवन में जब तक आदमी खुद से मिलता रहता है वह आदमी बना रहता है। बहुत प्यारी लगीं आपकी ये क्षणिकाएं।

दीपक said...

बहुत ही सुन्दर कवितायें हैं.
बधाई!