Search This Blog

December 31, 2012

फास्ट ट्रैक न्यायपीठों की स्थापना हेतु अपील

from google image

महिलाओं की सामाजिक  स्थिति भारत में ही नहीं पूरी  दुनिया में लगभग एक सी है .
भारत में जहाँ देवी की पूजा होती है वहाँ इस स्थिति  को बेहतर होना चाहिए लेकिन नहीं  है.
देश  के संविधान में भी यूँ तो महिला और पुरुष को बराबर का हक़ दिए जाने की बात कही है .

महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा और अपराधों के आंकड़ों की बात  करें  तो ये थाने   के दफ्तरों में दर्ज केसों के आधार पर बनाए जाते हैं . हमारे आस-पास ही शहर में /गाँव में न जाने कितने ऐसे मामले होते हैं जो दर्ज़ ही नहीं होते या पीड़िता पुलिस स्टेशन या किसी स्वयंसेवी संस्था तक पहुँच ही नहीं  पाती .
जो पहुँच सकती हैं या पहुँचती हैं , उन में  से कई के मामले दर्ज़ नहीं किये जाते ,मामूली सलाह दे कर रफा -दफा कर दिए जाते हैं ,उस के कई कारण हैं /दवाब हैं जिनके कारण पुलिस ऐसा करती होगी.
इसलिए हम यहाँ आंकड़ों की बात नहीं करेंगे.यकीनन ये उस संख्या से कहीं  अधिक ही होंगे.

December 27, 2012

'शशि'-एक आम स्त्री का प्रतिबिम्ब


शुक्रवार की शाम को  मेरी सहेली हेमा  का फोन आता है-

भाभी जी ,आप ने 'इग्लिश- विन्ग्लिश' देखी?

नहीं ,पता नहीं क्यों हेमा  ,मुझे पुरानी  श्रीदेवी पसंद है उनका नया लुक टोलरेट नहीं हो रहा,
इसलिए देखने नहीं गई। 

अरे नहीं ,भाभी जी ज़रूर देखना ,देख लो अब तो ई-लाईफ  [यहाँ का सरकारी टी वी चेनल ]पर भी खरीद कर देख सकते हैं। 
कल देखी हम सब ने ,बिना पलकें झपकाए पूरी फिल्म देख कर ही उठे!
क्या फिल्म है!

अरे! ऐसा क्या है उस में ?

देखोगे, तब मालूम चलेगा ,न!

अच्छा,ठीक है देखूंगी। 

December 25, 2012

'मैं' ने 'तुम' से कहा मगर क्या और क्यों ?

"आज तक मेरी तरफ आँख उठाकर देखने की हिम्मत भी किसी दुश्मन की नही हुई .. लेकिन आज मुझे अपनों ने ही लाठियों से पीटा" !! ------- पूर्व जनरल वी के सिंह 

बीते कुछ दिनों में जो कुछ भारत की राजधानी दिल्ली में हुआ, 
परदेस में हम तक भी खबरें पहुँची...  बहुत दुःख हुआ !!


मैथिलीशरण 'गुप्त 'जी की लिखी ये पंक्तियाँ याद आ रही  हैं --

हम कौन थे, क्या हो गए हैं, और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिल कर, ये समस्याएँ सभी

संसार के उपकार हित, जब जन्म लेते थे सभी
निश्चेष्ट होकर किस तरह से बैठ सकते थे कभी

December 21, 2012

आप कहाँ हैं ?यूँ मौन क्यूँ हैं?


पिछले कई सालों से शायद २००७ के बाद से उस   नामी-गिरामी हस्ती के बारे में कहीं कोई खबर सुनायी नहीं दी तो लगा कि एक आवाज़ मैं भी दे कर देखूं , शायद कोई जवाब मिले .

''जीवन की ढलने लगी सांझ
उमर घट गई
डगर कट गई
जीवन की ढलने लगी सांझ।

बदले हैं अर्थ
शब्द हुए व्यर्थ
शान्ति बिना खुशियाँ हैं बांझ।

सपनों में मीत
बिखरा संगीत
ठिठक रहे पांव और झिझक रही झांझ।
जीवन की ढलने लगी सांझ।'

December 1, 2012

बरसे मेघ...अहा!



बरसात..अहा...यह शब्द ज़हन में आते ही याद आते हैं ...'काले मेघ और बरसती बूंदें'!..अरसा हुए था इन्हें देखे हुए..बस ,कल ये मुराद भी कोई डेढ़ साल बाद पूरी हुई....आसमान काले बादलों से ढका ..दिन के ३ बजे हल्का अँधेरा देख कर मन किया बाहर निकलूँ और खूब भीगूँ!और तभी रिमझिम बरसात भी  शुरू हो गई ...बस भीगना तो लाज़मी था ही ...घर के आस -पास देखा ...कई बच्चे और बड़े भी जानबूझ कर बरसात में भीगने को बाहर खड़े थे ..छाता हाथ में मेरे था लेकिन मैं ने तो  खोला ही नहीं ..ऐसे हलकी बूंदों में भीगना कितना अच्छा लगता है!

November 25, 2012

हाइकु


प्रस्तुत हैं सात हाइकु  .. --; 
१- 

गुम है मीता 


मौन हुई निगाहें

मन भी रीता 

[मीता--सखा /friend]


-

तस्वीर मौन 


अंतहीन प्रतीक्षा 


खुद को भूले !




३-

चलते रहे 

रुकावट राह की 

फिरी नज़र 


४- 

नयन भीगे

सलवटें माथे पे 

कलाई सूनी.



५ -
पाषाण मन 

अंतर बहे लावा 

आँखों का   नीर !



६-
दोराहा आया 

धुंध हुई गहरी 

नहीं हैं ' हम' !



७-

ठहरा पानी 

उनका प्रतिबिम्ब 

घुलता   चाँद 


~~-अल्पना वर्मा ~~

हाइकु कविता  के संबंध में संक्षिप्त जानकारी-:

  • हाइकु/हायकू  हिन्दी में १७ अक्षरों में लिखी जानेवाली सब से छोटी कविता है.

  • तीन पंक्तियों में पहली और तीसरी पंक्ति में ५ अक्षर और दूसरी पंक्ति में ७ अक्षर होने चाहिये.

  • संयुक्त अक्षर ex:-प्र. क्र , क्त ,द्ध आदि को एक अक्षर/वर्ण गिना जाता है.

  • शर्त यह भी है कि तीनो पंक्तियाँ अपने आप में पूर्ण हों.[न की एक ही पंक्ति को तीन वाक्यों में तोड़ कर लिख दिया.]

  • हाइकु कविता ' क्षणिका' नहीं कहलाती क्यूंकि क्षणिका लिखने में ये शर्तें नहीं होतीं



November 22, 2012

छोटी-छोटी बातें



जीवन में घटने वाली छोटी -छोटी घटनाएँ भी कितना कुछ सिखा जाती हैं ,यह पिछले  तीन  दिनों में अनुभव किया। 
बीमार पड़ना या मरीज दिखना/कहलाना  मुझे कतई पसंद नहीं ,बहुत खराब लगता है। 
मंगलवार को खेल के मैदान में  एक खेल के दौरान एक छोटी- सी दुर्घटना  में  मुझे भी थोडा चोट लगी। 
हाल-चाल पूछने वालों का तांता लग गया ! शुभचिंतकों द्वारा हाल-चाल पूछने पर कैसे  लगता है इसका  अनभव हुआ।
[मुझे  याद नहीं कि इस से पहले बीमार ऐसी कभी पड़ी थी कि  इतने लोग हाल-चाल पूछें !]

November 12, 2012

बुरा न मानो ...दीवाली है !




बहुत दिन हुए कोई पोस्ट नहीं लिखी गयी।


सच कहूँ तो जब से ब्लोग्वानी और चिट्ठाजगत जैसे  अच्छे अग्रीग्रेटर चले गए हैं तब से ही  ब्लॉग्गिंग में मेरी नियमितता का अभाव हो गया है।
अब आप कहें इसे बहाना तो बहाना ही समझ लिजीये,अब  किस -किस को सफाई दूँ। 



हाँ ,कुछ उठते -उठते सवाल जो यहाँ -वहां से झांकते हैं ,सोचती हूँ कि  आज इस पावन मौके पर जवाब दे ही दिए जाएँ। 

September 14, 2012

वो भी एक दौर था ..और ये भी....है !

पिछले बीस-तीस साल में  लगभग हर क्षेत्र में  बहुत अधिक अंतर आ गया है.
 यूँ तो इस बात को बताने के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है .

September 3, 2012

दुनिया की सबसे बड़ी किताब

दुनिया की सबसे बड़ी किताब 'This is Mohammad'.

दुबई में पिछले कुछ सालों में कई गिनिस विश्व रिकॉर्ड्स बने हैं .
मार्च ,२०१२ के महीने में  इसे  एक नयी सफलता हासिल हुई थी.

गिनिस बुक ऑफ रेकॉर्ड्स में यह  दुनिया की सब से बड़ी  और भारी किताब दर्ज हो गयी है.

September 1, 2012

जोकर

'जोकर' ..'ताश की गड्डी का वो पत्ता होता है जिसका अपना कोई रंग नहीं होता '.यह है इस फिल्म का एक संवाद जिस के बाद फिल्म में जोकर का नाम बार-बार आना शुरू होता है और अंत में अक्षय 'जोकर' बेरंग  के पत्ते की  अहमियत समझाता है.

फिल्म-जोकर का एक दृश्य 

August 24, 2012

कुछ बातें बस ऐसे ही...



ईद में सजा शोपिंग मॉल 
रामादान  गया..ईद आई और अब वह भी गई..धीरे-धीरे छुट्टियाँ खतम होने को आई हैं. दिन तो यूँ ही  गुज़रते  जाते हैं कभी आहिस्ता -आहिस्ता और कभी तेज़ी से.

ब्लॉग एक डायरी है , एक खुली डायरी जिस पर लिखा हर कोई पढ़ सकता है .

August 13, 2012

बस एक त्रिवेणी !


एमिरात में  रामादान का महीना खतम होने को है, मीठी  ईद नज़दीक है और यहाँ इसकी चहल -पहल पूरे ज़ोरों पर दिखाई दे रही है .शोपिंग मॉल देर रात खुले रहते हैं .जबरदस्त खरीदारी हो रही है .हर जगह भीड़ ही भीड़ !
नज़दीक पार्किंग के लिए रात के इस समय भी दिक्कत होती है.

परसों रात  एक ऐसे ही मॉल की मोबाइल से ली गई दो तस्वीरें जो आधी रात के बाद  की हैं .

August 5, 2012

वो पहली मुलाकात!

वो पहली मुलाकात




रे ....ऐसे भाव क्यों?..शीर्षक पढ़कर चौंकिये मत!

यहाँ कोई रूमानी कहानी नहीं है .:)

अपने साथ हुई  एक घटना बताती हूँ ...कुछ सालों पहले की है .

किसी सरकारी दफ्तर में जाने और  काम के लिए खड़े होने का यह मेरा पहला अनुभव  था.

मुझे  दिल्ली शहर में अपनी शादी के कोर्ट सर्टिफिकेट  को   तीस हज़ारी कोर्ट की 'जज महोदया  से अटेस्ट करवाना था .
[ज्ञात हो कि वे एक देश विशेष  के  दूतावास द्वारा मनोनीत जज थीं ,दूतावास को वीसा जारी करने के लिए शादी के प्रमाण पत्र पर उन्हीं के दस्तखत चाहिए  थे]

इस के लिए मुझे  २० दिन   चक्कर काटने पड़े सिर्फ इसलिए कि मैंने घूस देने से मना कर दिया था,सीधे रस्ते काम करवाना चाहती थी.

घर से बस टर्मिनल तक पहले रिक्शे में जाना और फिर  तीस हज़ारी तक  अकेले ही रोज़ बस से जाना -आना !लगभग एक घंटा लगता था बस में ,इसलिए जहाँ से बन कर चलती है वहाँ  से बैठो तो सीट तो मिल जाती है कम से कम !

July 9, 2012

गर्मी की छुट्टियाँ !



आखिरकार वो दिन आ ही गए जिनका सभी को बेसब्री से इंतज़ार था ..जी हाँ

इस तपती दुपहरी में स्कूल जाने वाले बच्चों और शिक्षकों के लिए सुकून के दिन !

कल रविवार जुलाई ८ से गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हो गयी ..पूरे ६० दिन की!


सितम्बर ४ से स्कूल फिर खुल जायेंगे और फिर इंतज़ार करना होगा सर्दियों के ब्रेक का क्योंकि इस बीच कोई भी अवकाश नहीं होगा.
इस साल ईद भी इन्हीं छुट्टियों में ही पड़ रही है ..पूरे ३६५ दिन में देखा जाए तो स्कूल के अवकाश गिनती  के ही हैं गर्मी और सर्दी के ब्रेक निकाल दें  तो ...साल के ५-६ बस !

July 8, 2012

अनुकरणीय व्यक्तित्व -वन्दनीय गुरु


अनुकरणीय व्यक्तित्व -वन्दनीय गुरु
बहुत दिनों से इस पोस्ट को लिखने का मन था किसी न किसी कारणवश देर हो रही थी.
आज यह अवसर आया है कि मैं एक ऐसे व्यक्तित्व के बारे में अपने विचार आप के साथ साझा करूँ जो न केवल अनुकरणीय है बल्कि वन्दनीय भी है.
गुरु कैसा हो जब कभी यह प्रश्न आता है तो मेरे दिमाग में एक नाम ज़रूर आता है वह है 'श्रीमति सरस्वती नारायणन 'का ..गुरु हो तो ऐसा हो!
आईये,उनसे आप का परिचय करा दूँ .

June 15, 2012

काश !एक दिन ऐसा भी हो….


आज फेसबुक पर एक स्टेटस लगाया..

'बेशक विवाह के बाद स्त्रियों का आधा जीवन चूल्हा चौके में बीतता है ..कई बार उनका  भी मन करता होगा न कि उन्हें भी मनुहार के साथ कोई अपना  गरम -गरम फुल्के बना कर खिलाए ! जैसे कभी माँ या दीदी खिलाया करतीं थीं.'

क्या कुछ गलत लिखा था??:)

नहीं न? बल्कि फेस्बुकिया कई सखी -सहेलियों ने इसे सराहा और कहा यह उनके मन की ही बात कही गयी है.. एक सखी स्वर्ण कांता ने अपनी वाल पर भी अनुमति के साथ लगा लिया.यह कहते हुए कि  ''अल्‍पना जी, आपका स्‍टेटस मन को इतना भा गया कि इसे अपने वॉल पर लगा रही हूं... इस विचार और इच्‍छा का जितना प्रचार प्रसार हो हम स्त्रियों को फायदा होगा.."

April 25, 2012

बहुमुखी प्रतिभासंपन्न होना एक शाप ...

चित्र-गूगल से साभार.
जब आप के किसी ख़ास गुण की तारीफ़ की जाती है तो सुन कर खुश होना स्वाभाविक है.
लेकिन जब आप बहमुखी प्रतिभासंपन्न हों तो आप के गुण ,आप की काबीलियत आप के लिए मुसीबतें खड़ी कर सकती है!
ये मुसीबतें  इस हद्द तक बढ़ जाती हैं कि ऐसा गुणवान होना आप को एक शाप लगने लगता है.
मेरे विचार में किसी संस्था में नौकरी हेतु आप जब अपना सी.वी. देते हैं तो ध्यान रखिये ..सिर्फ उतना ही बताएँ जितना ज़रुरी है.अपनी हर उपलब्धि का बखान करना भविष्य में मुश्किलें खड़ी कर सकता है.

अगर आप ने ऐसा किया तो अचानक आप को ऐसा अहसास दिलाया जाने लगेगा कि आप से अधिक योग्य और कोई नहीं ..अधिक से अधिक जिम्मेदारियाँ दी जाने लगेंगी..कहते हैं ' न' कहना भी एक कला है.अगर आप हर काम के लिए 'मैं कर लूंगा' कहते हैं तो समझिये...कि यह स्थिति अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारने से अधिक कुछ नहीं होगी!

March 22, 2012

जब मैं 'मैं' नहीं 'हम' होता है...


इसी नतीजे पे पहुँचते हैं सभी आखिर में,
  हासिल ए सैर ए जहाँ कुछ नहीं हैरानी है . ---------------------------------
जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने
----------------------------------
शाम होते ही खुली सड़कों की याद आती है
सोचता रोज़ हूं मैं घर से नहीं निकलूंगा
-------------------------------------
सबका अहवाल वही है जो हमारा है आज
ये अलग बात है शिकवा किया तन्हा हमने
---शहरयार----

इन पंक्तियों के लिखने वाले मशहूर शायर शहरयार साहब थे. इन शेरों को पढ़ कर उनकी   छवि एक संवेदनशील शायर के रूप में दिमाग में बन जाती है और इन्हीं पंक्तियों के लिखने वाले के बारे में जब कोई ऐसा बयान आता है जो इस छवि के विपरीत हो..जैसा कि उनकी पत्नी ने उनके मरणोपरांत दिया था. कोई भी यकीन नहीं कर पाता .

यह भी काफी हद तक सच है कि एक स्त्री जो कई साल अपने पति के साथ रही है वह उस के मरने के बाद उसके लिए गलत नहीं बोल सकती.

March 15, 2012

की बोर्ड वाली....

कुछ दिनों पहले हिंदी की महिला ब्लोगरों पर डॉ. ज़ाकिर का लिखा एक बहुत अच्छा लेख लखनऊ के अखबार में छपा था 'की बोर्ड वाली औरतें '..
जिस  का ज़िक्र उन्होंने अपने ब्लॉग पर भी  किया.शीर्षक पढ़ कर थोडा अटपटा सा लगा .सच  कहूँ तो बुरा लगा..क्योंकि 'औरतें' शब्द सुनना खराब लगता है.उन पर की बोर्ड वाली औरतें!...'महिलाएँ' लिखा होता तो सही लगता ..एक  ब्लोगर ने टिप्पणी भी दी..'कि तथाकथित ब्लोगरों में से किसी  ने अभी तक इस शब्द पर आपत्ति क्यूँ नहीं की!
उस के जवाब में डॉ.ज़ाकिर का कहना था कि यह संपादक का दिया शीर्षक है .
मैं ने भी पोस्ट पढ़ी ,लिखना चाह रही थी लेकिन वहाँ कुछ लिखा नहीं न जाने क्यूँ  यह बात मन में घूमती रही..'की बोर्ड वाली औरतें!'
[ज्ञात हो कि की बोर्ड का कनेक्शन अंतर्जाल से भी  है .]
पिछले साल जब मैं भारत गयी तब साथी महिला ब्लोगरों से भी मिलना हुआ था ..बातों -बातों में यह बात भी सामने आई कि पुरुषों द्वारा  अंतर्जाल पर  फेसबुक पर/आने पढ़ने या लिखने वाली महिलों को 'उपलब्ध' अंग्रेज़ी में कहें तो 'available'! समझा जाता है.

ब्लॉग लिखना जिस जोश और उत्साह  से शुरू किया था वह धीरे धीरे ब्लॉग जगत /अंतर्जाल में महिलाओं के प्रति लोगों [सामन्यतः]के विचारों
को जानते हुए कम होने लगा.