September 14, 2013

हिंदी दिवस और हिंदी

१४ सितम्बर ' हिंदी दिवस वर्ष बिता  कर लौट आया है.
'हिंदी दिवस की शुभकामनाएँ '
भारत में ८५० भाषाएँ हैं लेकिन जिस भाषा को हम देश की जीवन रेखा कहते हैं ,राष्ट्र को एकता में बाँधने वाला कहते हैं ,उसे एक दिन का सम्मान मिलता है फिर अंग्रेजी के मानस पुत्रों द्वारा होता है  वही रोज़ का अपमान ,इस में संदेह नहीं कि अपने ही देश में पराई होती जा रही है।
अंग्रेजी  भाषा को केवल ५ % भारतीय समझ  पाते हैं उसे ही सबसे अधिक मान हिंदी की कीमत पर  दिया जा रहा है.
कहने को राजभाषा है ,परन्तु राजकाज में इसे कितना अपनाया  गया ?मंत्रालयों में ही नहीं ,अन्य  कुछ क्षेत्रों में भी देखें तो जैसे कि  शेयर मार्किट,सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक और बीमा   कम्पनियाँ आदि । हिंदी का प्रयोग न के बराबर ही पाएँगे मानो वहाँ सभी अँगरेज़ हैं !हम अंग्रेजी के विरोधी नहीं हैं,यह चाहते हैं कि इन स्थानों पर अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी काम हो।

भारत सरकार के कानून के अनुसार हिन्दी में वेबसाइट बनाना और उसे समय-समय पर अंग्रेजी वेबसाइट के साथ अद्यतन करना कानूनन अनिवार्य है परकई राज्यों की वेबसाइट मात्र अंग्रेजी में हैं  उनकी अपनी क्षेत्रीय भाषा में भी नहीं हैं हिंदी तो दूर की बात है।
ये राज्य अपनी वेबसाइट पर जानकारी अंग्रेजी में ही बता  कर गर्व का अनुभव कर रहे हैं।
कौन सुध लेगा?
आप हिंदी भाषी राज्य की ही बात करें तो उत्तर प्रदेश की साईट देखें ,यह साईट अंग्रेजी में ही खुलती है ,मैंने उन्हें २  महीने पहले इस विषय में लिखा था तब यहाँ हिंदी का टेब  भी नहीं  था ,अब हिंदी पेज है लेकिन अधूरा !आप 'प्राकृतिक संपदा 'पर ही चटका लगायें तो जिस पेज  पर पहुंचेंगे वह अंग्रेजी का होगा।

आशा है हिंदी पेज पर पूरी जानकारी कम से कम हिंदी भाषी राज्य तो अपनी  वेबसाइट पर दें!
मध्य प्रदेश सरकार की सराहना करनी चाहिये जहाँ साईट का पता डालते ही हिंदी में साईट खुलती है.
केरल की पर्यटन साईट भी हिंदी ,अंग्रेजी दोनों में है.
भाषा प्रेम का एक अच्छा उदाहरण एमिरात   से ही लीजिये जो कि  भारत की तुलना में एक छोटा देश है यहाँ बाज़ार में मिलने वाला सभी सामान चाहे वह  आयातित  हो या घरेलू ,हर वस्तु  पर अंग्रेजी /या जिस देश  से उत्पाद आया है वहाँ  की भाषा के साथ अरबिक में भी उत्पाद की पूरी जानकारी उसकी पैकिंग पर  होती है. मगर हमारे भारत देश में मिलने वाले सामान /मॉल/वास्तु पर क्षेत्रीय या हिंदी भाषा में जानकारी का होना अनिवार्य नहीं है ,अधिकतर उत्पादों पर अंग्रेजी में जानकारी छपी होती है। ग्राहक  उत्पाद की जानकारी कैसे जाने? ढेरों सरकारी  रूपये खर्च कर ग्राहक जागो का अभियान चलाती है मगर इस पक्ष पर सरकार ने आँखें मूंद रखी हैं.
हम चाहते हैं कि  सरकार जल्दी ही कोई कड़ा कानून बनाए ताकि हर कम्पनी अपने  उत्पाद की जानकारी उसकी पैकिंग पर  राजभाषा हिंदी  में या क्षेत्रीय भाषा में जानकारी  दे और ९५% ग्राहकों के अधिकारों का हनन न हो. मोती लाल गुप्ता जी ने एक मुहीम इसी विषय पर चलाई हुई है परन्तु सरकार की तरफ से अभी तक कोई सकारात्मक कार्यवाही नहीं  हुई.
ऐसे कई हिंदी  प्रेमी हैं जो इस भाषा की सेवा में जी जान से लगे हुए हैं ,इसे प्रयाप्त सम्मान मिले ऐसे प्रयास कर रहे हैं । इनमें कई  उल्लेखनीय नाम हैं जैसे मोती लाल गुप्ता , मुम्बई के प्रवीण कुमार  जैन और  मोहन गुप्ता जी। और कई नाम होंगे मगर मेरी जानकारी में नहीं हैं ,आप जानते हों तो अवश्य ही हमें भी बताएँ। 
प्रवीण जैन जी ने हाल ही में अपने प्रयासों से एक बड़ी सफलता हासिल की - 'अब पसूका  वेबसाइट की सभी सेवाओं में हिन्दी को प्राथमिकता मिलेगी '… जिसे आप उनके ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं।

सच यही है कि हिंदी को  उसका पूरा मान दिलाने का प्रयास सभी देशवासियों   को मिलकर करना है।

September 5, 2013

शिक्षक दिवस पर दो बातें


भारत में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी आज के दिन ‘शिक्षक दिवस’ मनाया जा रहा है। यहाँ एमिरात में अधिकतर विद्यालय ८ सितम्बर से खुलेंगे इसलिए इस औपचारिकता तो उसी हफ्ते किसी दिन पूरा किया जाएगा। दो मास का ग्रीष्म अवकाश समाप्त होने में मात्र दो दिन रह गए हैं।

शिक्षकों को मान-सम्मान के साथ धन्यवाद देने का यह दिवस कुछ कार्यक्रमों और भाषणों के साथ संपन्न कर दिया जाता है।सभी भाषण आदर्श बातें कहते हैं, उनका अर्थ समझे जाने या ग्रहण किये बिना  बस ‘कह’ दिया जाता है,उसके बाद वही दिनचर्या वही छात्रों का शिक्षकों के प्रति और छात्रों का शिक्षकों  के प्रति व्यवहार रहता है ।

क्या शिक्षक  छात्रों के मन में इस दिवस विशेष के बाद/के कारण  अधिक सम्मान अर्जित कर पाते हैं?
शायद नहीं क्योंकि हमारी शिक्षा व्यस्वथा ही ऐसी है कि बच्चों को एक निर्धारित पाठ्यक्रम को बस पढ़ाया जाता है और छात्रों के लिए रिपोर्ट कार्ड में अच्छे ग्रेड हासिल करना शिक्षकों और अभिभावकों का मुख्य लक्ष्य रहता है। उन्हें पढ़ने नहीं दिया जाता ! स्वयं सीखने पर बल नहीं दिया जाता।

एमिरात शिक्षा बोर्ड के विभिन्न देशों के स्कूलों के एक अध्ययन में यह बताया गया था कि भारतीय अध्यापक बोलते अधिक हैं, पढ़ाते समय छात्रों को बोलने का अवसर नहीं दिया जाता! [यह  रिपोर्ट स्थानीय अखबारों में प्रकाशित हुई थी] और मुझे सबसे पहले यह खबर देने वाला पाँचवीं कक्षा का मेरा एक विद्यार्थी था।

हम शिक्षकों को यह  याद  रखना होगा कि स्कूली जीवन उम्र का ऐसा दौर होता है जिसमें छात्र हर पल कुछ न कुछ सीखता और ग्रहण करता रहता है यह अवस्था बहुत ही संवेदनशील और गीली मिट्टी की तरह होती है जिसे कुम्हार कोई भी रूप दे सकता है। अपने आसपास के वातावरण से ,अपने घर से अपने सहपाठियों से और फिर अपने अध्यापकों से सीखता है।सिखाने से अधिक उसके सीखने  पर बल देना होगा।

शिक्षक दिवस पर खानापूर्ति  के आयोजन के अतिरिक्त  हमें शिक्षा के वर्तमान स्वरूप,शिक्षा-शिक्षकों के  गिरते  स्तर पर भी बात करनी चाहिए।उन समस्याओं पर भी  विचार करना चाहिए जिनसे छात्रों और शिक्षकों के बीच दूरी उत्पन्न हो गयी है। दोनों पक्षों के बारे में कुछ बातें मैं  यहाँ कहना चाहती हूँ।

बहुत से शिक्षक  पुस्तकों से बाहर आना नहीं चाहते कक्षा में पुस्तकीय ज्ञान देकर समझ लेते हैं कि उनका कार्य समाप्त हुआ जबकि ऐसा नहीं है ।घर के बाद बच्चा  सब से अधिक समय विद्यालय में ही रहता है ,ये आठ घंटे उसके जीवन के बहुमूल्य घंटे होते हैं। इस कारण भी एक विद्यालय और उसके शिक्षकों का उसके भविष्य  की नींव बनाने में बड़ा हाथ होता है।मुझे दुःख होता है जब मैं किसी को कहते सुनती हूँ कि मुझे अपना स्कूल याद नहीं करना या मुझे स्कूल पसंद नहीं है। स्कूल की छवि बच्चे के दिल में उसके संपर्क में आए उसके शिक्षकों से बनती है। कहीं न कहीं इस के लिए हमारी शिक्षा व्यस्वथा भी  दोषी है जो पुस्तक में सिमट गयी है,सी बी एस सी ने सतत सिखने की प्रक्रिया के तहत नए कार्यक्रम और पद्धतियाँ लागू की परंतु वे इस बात को अनदेखा कर रहे हैं  कि भारतीय मानसिकता पहले  अंकों में सिमटी थी और अब ग्रेडिंग या सी  जी पी ऐ  में अटकी गई  है ,बच्चे के सर्वांगीण विकास की  यह नई योजना अब भी सही मायनो में कहीं सफल होती दिखती नहीं है ।जिसके कारणों हेतु बहस के लिए यह एक अहम विषय हो सकता है।

छात्रों में अनुशासनहीनता की बातें आम हो गयी हैं जिसके कई कारण हैं मुख्य कारण उसके आसपास का वातावरण है।ऐसे घटनाएँ देखी गयी हैं जिनमें छात्र अपने शिक्षक के प्रति हिंसक हो जाते हैं ।

उनके मन में शिक्षकों के प्रति सम्मान की कमी होना भी कहीं न कहीं शिक्षकों को भी दोषी बताता है।ऐसे शिक्षक जो स्वयं अनुशासनहीन हैं ,जो  अहंकार, ईर्ष्‍या , द्वेष और पक्षपात का प्रदर्शन करते हैं जिन्होंने इसे व्यापार  बना डाला है ,जो विद्यालयों में  काम सिर्फ इसलिए करते हैं कि उन्हें अधिक से अधिक ट्यूशन मिले ,जो अभिभावकों पर दवाब डालते हैं कि उन्हीं के पास उनके बच्चों को ट्यूशन के लिए भेजा जाए तो उन्हें कौन मान देगा? आज के विद्यार्थियों में अगर संस्कारों की कमी  हैं तो उनका परिवेश ही नहीं उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षक भी कहीं न कहीं दोषी माने जाते हैं। ऐसी घटनाएँ सुनने में आती हैं ऐसे शिक्षक भी हैं जो अपने छात्रों का शारीरिक तथा मानसिक शोषण करना  अपना अधिकार समझते हैं।कितने लोग स्वीकारते हैं कि शिक्षा छात्रों का मौलिक अधिकार है,व्यापार नहीं!
कहना होगा कि वर्तमान हालात बहुत अच्छे नहीं हैं लेकिन आज भी इस पद को गरिमापूर्ण और सम्मानीय माना जाता है।

मैं स्वयं को सौभाग्यशाली समझती हूँ कि मुझे स्कूल से कॉलेज  तक अच्छे शिक्षक मिले।
कक्षा चार की मेरी अध्यापिका श्रीमती गुरुचरण कौर जी से मैं विशेष प्रभावित  हुई थी और उन्हें देख कर मैंने भी शिक्षक बनने का सोच लिया था।मेरा भी प्रयास है कि मैं भी उन्हीं की तरह सफल अध्यापक बनूँ और अपने छात्रों को हमेशा याद रहूँ।

शिक्षक दिवस पर सभी शिक्षकों को बधाई और शुभकामनाएँ!

गत वर्ष मिला  कार्ड