स्वदेश वापसी /दुबई से दिल्ली-'वन्दे भारत मिशन' Repatriation Flight from UAE to India

'वन्दे भारत मिशन' के तहत  स्वदेश  वापसी   Covid 19 के कारण असामान्य परिस्थितियाँ/दुबई से दिल्ली-Evacuation Flight Air India मई ,...

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July 1, 2017

पैरों के पर !

कविवर ब्लॉगर राजेंद्र स्वर्णकार जी का सन्देश मिला कि आज ब्लॉग दिवस है तो सभी ब्लॉगर अपनी एक पोस्ट अवश्य पोस्ट करें .पोस्ट लिखने का मन नहीं था लेकिन 'ब्लॉग जगत के पुराने दिन लाने के जो प्रयास किये जा रहे हैं ,उसमें अपना योगदान दिए बिना न रह सकती थी  इसलिए यही आत्मालाप पोस्ट के रूप में प्रस्तुत है -

जून १६ से १७ 

--------२०१६ ,जून महीने से २०१७ का जून महीना ...
इस पिछले एक साल में इतना कुछ अनुभव किया जिसपर आराम से एक किताब लिखी जा सकती है!
बहुत बार ग्रहों -नक्षत्रों की चाल पर यूँ ही विश्वास नहीं जागने लगता ,क्योंकि इतना अनापेक्षित घटने लगता है कि अचानक एक दिन आप
अपने दिमाग की सभी खिड़कियाँ बंद करके यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं अब मैं सिर्फ अपने काम करता जाऊँगा ..क्या होगा  क्या नहीं ,ऊपर वाला जाने ! और यही तो गीता  का भी उपदेश है कि कर्म किये जाओ फल की इच्छा न करो ...

लेकिन इस स्थिति पर पहुँचने के लिए या इस स्थिति को समझ कर ग्रहण करने के लिए आपको कई ऐसे अनुभवों से गुज़रना पड़ता है जिनसे आप सीखते भी जाते हैं और उन सीखों को साथ -साथ जीवन में उतारते चले जाते हैं.हाँ पहली बार भगवद गीता का पूरा पाठ और पुनर्पाठ भी किया ताकि अपने प्रश्नों के उत्तर पा सकूँ लेकिन लगता है इस पुस्तक को फिर से पढ़ना होगा .कई अनुत्तरित प्रश्न अब भी हैं.

  इस एक साल  में मैंने यात्राएँ  भी इतनी की कि लगने लगा है कि मेरे पाँव में पहिये बाँध दिए गए हैं.
एक हफ्ते बाद फिर से यात्रा की तैयारी है ! आशा है इस बार यह कुछ अच्छी खबर और अच्छे अनुभव दे कर जाएगी.
यात्राओं के अनुभव चित्र सहित अगली बार ...
तो अब ब्लॉग जगत को पुराने रूप में वापस लाने के 'ताऊ रामपुरिया जी ' के इस प्रशंसनीय प्रयास में सहयोग देते हुए  'हिंदी  ब्लॉग दिवस' पर  ब्लॉग -यात्रा पर निकला जाए ...राम-राम !
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

September 12, 2015

छाया-माया

प्रिय माया ,

बहुत दिनों से तुमने मुझे खुद से दूर रखा है पर यह तुम भी जानती हो कि छाया के बिना तुम भी अकेली हो.
छाया तुम्हारी अनुकृति ही तो है..तुम्हारी भावनाओं से अछूती नहीं है फिर भी तुम अँधेरे जा बैठी हो.


October 14, 2013

मुक्त - उन्मुक्त

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छाया : सुनो माया, तुम्हारे पंख कहाँ हैं?
माया :पंख तो जब उतारे तभी से न जाने कहीं खो गए हैं।

छाया : तो अब क्या करोगी?
माया : नए पंख बना रही हूँ।

छाया : कब तक बन जायेंगे?
माया : मालूम नहीं।

छाया : तब तक ?
माया : तब तक धरती पर हूँ यहीं रहूंगी।

छाया : माया, तुम्हारे हाथ इतने ठंडे कैसे? तुम्हारा जिस्म भी ठंडा? सारी उष्णता कहाँ है?
माया : उष्णता सब भावों में समेट दी है।

छाया : भाव कहाँ हैं?
माया : ये देखो इस डिब्बे में हैं।

छाया : अरे, इस में तो सब दम तोड़ देंगे।
माया : नहीं, देखो मैंने कुछ सुराख बनाये हैं ...  सांस लेते रहेंगे।

छाया : तुम इनका क्या करोगी?
माया : जब पंख बन जायेंगे तब इनसे रंग भरुंगी।

छाया : जब तक ये पूरे होंगे, तुम उड़ना भूल जाओगी माया तब तक।
माया : पता नहीं, लेकिन आखिरी सांस तक प्रयास रहेगा कि पंखों को पा सकूँ, चाहे उड़ना संभव हो या नहीं।

छाया : ये कैसी चाहत है माया?
माया : बिलकुल वैसी ही जैसी चातक को बरखा की पहली बूंदों की होती है।


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April 2, 2013

खबर की खबर .....



इस खबर के प्रकाशित होने की सूचना श्री महेंद्र शर्मा जी ने दी है।उन्होंने लघुकथा पोस्ट पर एक टिप्पणी  में बताया था कि   9 मार्च , Saturday,२०१३  को राजस्‍थान पत्रिका के Entrepreneurship पेपर पर  'सोच और जीवनदृष्टि' के अन्‍तगर्त इस  blog  का परिचय दिया गया था।वहीँ से लिंक ले कर वे मेरे ब्लॉग तक पहुंचे ......मेरे अनुरोध पर उन्होंने उस पेपर की कटिंग भेजी। उनको विशेष धन्यवाद। 

मैं इस पोस्ट  के माध्यम से पत्रिका  के संपादक एवं इस लेख के लेखक को  धन्यवाद देना चाहती हूँ
और आभार प्रकट करना चाहती हूँ कि उन्होंने मेरे कार्य को सराहा और प्रोत्साहन दिया। 

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March 30, 2013

छूटते हाथ...


मैं ढूँढती हूँ तुम्हारे भेजे  पन्नों पर उन शब्दों को जिनसे तुमने मुझे खरीदा था।
हाँ,खरीदा ही तो था तुमने मुझे  उन शब्दों से  ,
किश्त दर किश्त मेरा मन उन शब्दों के बदले बिकता चला  गया था 
हार गयी थी मैं खुद को तुम्हारी  बिछायी शब्दों की बिसात पर

March 20, 2013

अच्छा लगता है....


'व्योम के पार' ब्लॉग के अतिरिक्त मेरे अन्य दो ब्लॉग भी हैं जिनमें से एक है - 'भारत दर्शन' ।  भारत के विभिन्न दर्शनीय स्थलों की जानकारी जितना संभव हो विस्तार से देने का प्रयास करती हूँ। उद्देश्य यही होता है कि अंतरजाल पर हिंदी भाषियों को भारत के महत्पूर्ण स्थलों, स्मारकों, धार्मिक व पर्यटन से जुडी जगहों के बारे में जानकारियाँ उपलब्ध करा सकूँ !     

सम्बन्धित तस्वीरें अगर नेट से लेती  हूँ तो जिनकी साईट से तस्वीरें ले रही हूँ उन से बकायदा अनुमति लेती हूँ, ... अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद कर विश्वसनीय स्रोत से जानकारी एकत्र करके एक जगह क्रमबद्ध करना इतना भी आसान नहीं जितना लगता होगा ... लेकिन ब्लॉग-जगत ने शायद ही इस ब्लॉग को संज्ञान में लिया हो !

परन्तु मुझे दुःख नहीं है क्योंकि अक्सर इस ब्लॉग पर और लिखने के लिए मुझे अनजान लोगों से प्रोत्साहन मिलता रहता है, गूगल स्टेट के आंकड़ों के अनुसार पाठकों का आगमन निरंतर बढ़ रहा है। आज स्थिति यह है कि ब्लाग पर प्रतिदिन औसतन दो-तीन सौ पाठक आते हैं...तमाम पर्यटक...जिज्ञासु...स्कूल-कालेज के स्टूडेंट्स इस साईट पर आकर विभिन्न स्थलों, स्मारकों, जगहों इत्यादि से सम्बंधित जानकारियां पढ़ते हैं।   बेशुमार लोगों के लिए मेरे द्वारा दी गयी जानकारियाँ उपयोगी सिद्ध होती हैं। ये सब बातें मुझे उनके ई-मेल्स और कमेंट्स [फिलहाल कमेन्ट बॉक्स बंद है] से भी बराबर पता चलती रहती हैं। 

इसी तरह नवंबर में एक पोस्ट पर टिप्पणी से मालूम हुआ कि कहीं किसी अखबार में ब्लॉग का ज़िक्र है, प्रतिटिप्पणी में मैंने टिप्पणीकर्ता से जानकारी चाही तो उनका कोई उत्तर नहीं मिला और न ही उनका कोई ई-मेल आया। 

दो दिन पहले यह बात मैंने प्रकाश गोविन्द जी से बतायी कि भारत दर्शन ब्लॉग के बारे में कहीं छपा था लेकिन पता नहीं चल रहा कि कहाँ ?  तब उन्होंने पता नहीं कैसे व किस-किस तरह के प्रयास कर के आखिरकार वो अखबार और क्लिप तलाश ही ली, लेकिन उसका प्रिंट काफी खराब सा था, तब उन्होंने इसे साफ़ कर के मुझे भेजी .. उनका हार्दिक आभार।  

मेरे लिए यह बड़ी खुशी की बात थी कि ब्लोगजगत द्वारा उपेक्षित इस ब्लॉग के बारे में इतनी अच्छी बातें लिखी गयी थीं। राजस्थान पत्रिका के नवंबर 2012 के अंक में प्रकाशित स्वप्नल सोनल जी की यह रिपोर्ट --

Click to view better 
मैं पत्रिका  के संपादक एवं इस लेख के लेखक को  धन्यवाद देना चाहती हूँ
और 
आभार प्रकट करना चाहती हूँ कि उन्होंने मेरे कार्य को सराहा और प्रोत्साहन दिया। 
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March 14, 2013

मेरा खज़ाना /मेरा पुरस्कार


२०१२-१३ का शैक्षिक सत्र समाप्त होने को है,परीक्षाएँ शुरू हुई हैं या समाप्त  होने को हैं  या फिर समाप्त हो चुकी हैं।
यहाँ एमिरात में अप्रैल के दूसरे हफ्ते से नया सत्र शुरू होगा।  गर्मियों की छुट्टियाँ जुलाई- अगस्त में होती हैं।
इस समय  नए दाखिलों का आना ,पुराने छात्रों का जाना लगा रहता है .इसी तरह शिक्षकों को भी अपने नए टाईम  टेबल की प्रतीक्षा रहती ही है,वहीँ पुरानी कक्षाएँ खतम होती हैं तो जिन छात्रों को आप पूरे साल पढाते रहे हैं उनसे जुड़ाव हो जाना सामान्य सी बात है।

खासकर जब आप किसी कक्षा के कक्षा-अध्यापक हों तो उस के हरेक  छात्र  से अपनत्व हो जाता है। मैं जब कक्षा  नवीं की छात्राओं  से पहली बार मिली तो उनमें से अधिकतर मेरे लिए अपरिचित थीं,लेकिन धीरे -धीरे साल गुज़रते -गुज़रते  उन सब का इतना विश्वास मिल पाया  कि हर छोटी-बड़ी बातें मुझ से आकर बताया करती थीं। कमज़ोर छात्राओं पर भी मेरा विशेष ध्यान रहा। इस सत्र के आखिरी दिन उन सब ने मिलकर मुझे यह कार्ड दिया जिस में सब ने अपने हस्ताक्षर किये हैं । यह मेरे लिए एक खुशनुमा सरप्राईज़ था ,जिसे आप के साथ यहाँ बाँटना चाह रही हूँ ...
Card by Grade 9 Students


चाहे शरारती छात्र हों या मेधावी ,साल के आखिर आते-आते सभी से लगाव होना स्वाभाविक है। खासकर जब बात छोटी कक्षाओं की हो,तो आप पायेंगे कि वे बिना लाग लपेट के अपने मन की बात कह देते हैं। शायद उनका निश्चल मन ही इसका उत्तरदायी है।
हर साल के गुज़रते ही आखिरी दिन छात्रों के पत्र मिलने शुरू हो जाते हैं जिस में उनके अपने विचार होते हैं ,शुभकामनाएँ होती हैं ,सादा कागज़ पर लिखे या किसी कार्ड की शक्ल में मिले इन भावों को सहेज कर रखना मुझे बेहद पसंद है।
सब से अधिक मुखर  स्नेह मुझे पाँचवी कक्षा के छात्रों से मिलता रहा  है,जिन्हें मैंने  विज्ञान पढाया . जिनमें अधिकतर  शरारती तो बेशक बहुत  होते हैं लेकिन  उतने ही स्नेह और सम्मान  देने वाले भी उन्हें पाया है। मेरे अनुभव के अनुसार  ये १०-११ साल के बच्चे मोम की भांति होते हैं जैसे चाहो उन्हें ढाल लो ,सिर्फ सही मार्गदर्शन की ही तो इन्हें आवश्यकता होती है।

January 21, 2013

आत्मालाप

----आत्मालाप ----- 


अमर्त्य कुछ है ?
कुछ भी नहीं। 
..................
तुम और मैं ; 'हम' नहीं हैं। 

पर हम से कुछ कम नहीं हैं 
.................
ऐसी बातें किताबों में अच्छी लगती हैं 
किताबें लिखने वाले जिंदा इंसान ही होते हैं 
--..................
मैं नहीं चाहती चाहना उन  जीवन वालों की किताबी बातें। 

जानती हो इन किताबी बातों में ही अक्सर मुझे  तुम मिलती हो .
..................
नहीं मैं अक्षर नहीं हूँ जो किताबों में रहूँ। 

बताओ  काली  सफ़ेद छाया के सिवा और  क्या हो?
..........
ऐसा क्यूँ कहा ?

क्योंकि जीवन इन्हीं दो रंगों में सिमटा है। .
अब इससे मेरा क्या संबंध ?

क्योंकि तुम मेरा जीवन हो। 
आकाश  मे  विचरना  छोडो। 

ज़मीन पर रह कर क्या करूँ?
जो सब करते हैं ?

क्या ?
जीना सीखो.

किसलिए जीना सीखूं?किसके लिए ?तुम तो मृगतृष्णा हो ,एक परछाई !
मैं मृगतृष्णा नहीं कस्तूरी की गंध हूँ। 
जो इस देह के साथ ही लुप्त हो जाऊँगी। 

ओह ,अगर यही सच है तो तुम  केवल साँसों तक साथ हो । 

मुझे भी समझ आ गया ,अमर्त्य कोई नहीं !
हाँ,
सब कुछ नश्वर है मैं भी , 
तुम भी ..
और 'हम 'भी !..
.............................
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पार्श्व में 'मेरा नाम जोकर 'फिल्म का एक गीत गूंजता सुनायी देता है...
'कल खेल में हम हों न हों ,
गर्दिश मे तारे रहेंगे सदा..,
........................'
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December 25, 2012

'मैं' ने 'तुम' से कहा मगर क्या और क्यों ?

"आज तक मेरी तरफ आँख उठाकर देखने की हिम्मत भी किसी दुश्मन की नही हुई .. लेकिन आज मुझे अपनों ने ही लाठियों से पीटा" !! ------- पूर्व जनरल वी के सिंह 

बीते कुछ दिनों में जो कुछ भारत की राजधानी दिल्ली में हुआ, 
परदेस में हम तक भी खबरें पहुँची...  बहुत दुःख हुआ !!


मैथिलीशरण 'गुप्त 'जी की लिखी ये पंक्तियाँ याद आ रही  हैं --

हम कौन थे, क्या हो गए हैं, और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिल कर, ये समस्याएँ सभी

संसार के उपकार हित, जब जन्म लेते थे सभी
निश्चेष्ट होकर किस तरह से बैठ सकते थे कभी