अभिशप्त माया

ग़लती से क्लिक हुई छाया एक साए की  आज सागर का किनारा ,गीली रेत,बहती हवा कुछ भी तो रूमानी नहीं था. बल्कि उमस ही अधिक उलझा रही थी माया...

July 2, 2021

चक्रव्यूह

 


चक्रव्यूह

 बाह्य रुदन ,भीतर पीड़ा, अव्यवस्था की शमशीर सर
आज,वक़्त डराता  है ,गिराता है ,बिखेर देने की धमकियाँ देता है !
 

सोचती हूँ , हम संभले ही कब थे जो लड़खड़ाने का डर  हो ,
बँधे  ही कब थे जो बिखर जाने का डर हो !
फिर भी मुस्कुराहटें ओढ़े रहते हैं जैसे  कुछ हुआ ही नहीं
इन   खुशफहमियों में यूँ  ही दिन और निकल जाएँगे
 

कराहने  की मनाही
चुप्पी ओढ़े रहना की विवशता है
टूटती साँसों में इतना सामर्थ्य कहाँ
जो चीख बन सके  !
जलती चिताओं में इतनी आग कहाँ जो मशाल बन सके!
भय ,नीरवता और कठिनाई का दौर

कई चराग़ बुझे और कई  बुझने  को हैं
देखना है कितने इस तूफान से लड़ पाएँगे
मंज़िल बहुत है दूर , रास्ता मिलेगा कभी ?
 और कितने इस चक्रव्यूह से निकल पाएँगे ?

छूट रहे साथ ,टूट रही आस
भटक रहा मन ,चटका विश्वास
ओढ़ लीजिए मुखौटे अपने ,असलियत देखी  नहीं जाती
 

आत्मा पर वक़्त के  अनदेखे  घाव
रिसने लगते हैं यथार्थ की कटुता जान
समय की  वधशाला में कब किस की बारी !
मगर इतना तय है
मौत का फ्रेम लिए नियति खड़ी है
 

निर्मम कालखंड लेगा बलि  बारी -बारी
इससे भागकर ठौर कहाँ पाएँगे
हम आज हैं ,कल खबर बन जाएँगे
=========================
(कवयित्री : अल्पना वर्मा , 20 मई 2021 )

May 28, 2021

शेफाली ... स्मृति शेष : गिरिजेश राव जी

 


कोई दीप


कोई दीप जलाओ, बहुत अँधेरा है।

चलते रहे जिन वीथियों पर
भटकती पहुँचीं उन संगीतियों पर
न अर्थ जिनका, न कोई डेरा है।

सहेजते रहे ताड़पत्र गठरियाँ भर
कि रचेंगे छन्द कभी ठठरियाँ कर
जिस देह न वसन, न बसेरा है।

कर दिया सब अर्पण जिस वेदी पर
रखे कुम्भ जिस पर अक्षत भर भर
सगुन टूटा व जाना - कुछ न मेरा है।
---------------------

[शनिवार फरवरी 2021 को प्रकाशित  उनकी अंतिम कविता ]
इस कविता के बाद कोई अन्य कविता प्रकाशित नहीं हुई ।  

तो  क्या...  कवि को अपनी मृत्यु का पूर्वानुमान हो गया था ?
 

अपने कवि होने की बात पर वे लिखते हैं : :
'जो दूसरों की हैं, कवितायें हैं। जो मेरी हैं, -वितायें हैं, '-' रिक्ति में 'स' लगे, 'क' लगे, कुछ और लगे या रिक्त ही रहे; चिन्ता नहीं। ... प्रवाह को शब्द भर दे देता हूँ। '
-------------
कोविड महामारी ने एक और प्रिय  रचनाकार  छीन लिया । 

  गिरिजेश जी का आपका यूँ  असमय चले जाना अत्यंत दुखद और अविश्वसनीय है  । 

 हिन्दी भाषा जगत  और सनातनधर्मियों के लिए अपूरणीय क्षति है।अभी तो आपको  बहुत काम करने थे।
ईश्वर आपको अपने श्रीचरणों में स्थान दे ऐसी मेरी प्रार्थना है ।
अश्रूपूरित विनम्र श्रद्धांजलि ।


ब्लॉगिंग के  वे सुनहरे वर्ष थे जब कई अच्छे  रचनाकारों से परिचय हुआ ।
 

गिरिजेश राव जी का चिट्ठा 'एक आलसी का चिट्ठा ' और कविताओं का चिट्ठा 'कवितायें और कवि भी ' पढ़ा और निःसंदेह वे हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ लेखकों और कवियों में से  एक हैं।आज के समय में जब हिन्दी संक्रमित हो गई है ऐसे में उनके लेखन की भाषा की शुद्धता प्रभावी है।  

2009 में मेरे एक गीत 'तुम अपना रंजो ग़म' पर उनकी टिप्पणी और एक ईमेल  के माध्यम से उनके संगीत प्रेम से  परिचय हुआ । उनसे एक गीत गाने का सुझाव मिला जो उनको बेहद पसंद था परंतु  मैंने वह कभी गाया  नहीं क्योंकि मुझे वह कभी पसंद नहीं था ,वह है 'कभी तन्हाइयों में यूँ हमारी याद आएगी '

संगीत की समझ होते हुए भी वे कहते थे  'मेरा संगीत ज्ञान शून्य है !खगोल विषय में  उनकी रुचि और खोज प्रशंसनीय थी।  
 


ताकि सनद  रहे


2013
में दो बार उनके ब्लॉग पर [कुछ  अन्य चुनिंदा ब्लॉग्स के साथ  ] मेरे ब्लॉग्स की चर्चा भी उन्होंने की ,जो मेरे लिए गर्व की बात थी।ब्लॉगरी  के  दशकोत्सव में विभिन्न  मानकों पर कसने के बाद उन्होंने कुछ चिट्ठे  चुने जिनमें मेरा भी था । 
 वे कई  विधाओं में लिखते थे । उन्हें कई भाषाओं  का ज्ञान था ।

परिष्कृत  भाषा का प्रयोग उनके लेखन में देखने को मिलता है।   

किसी के लेखन में वर्तनी की त्रुटि उनको बहुत अखरती थी और टोकने से कतराते नहीं थे।
----------- 

प्रतिष्ठित 'मघा' पत्रिका के 2018 के कृष्ण 'जन्माष्टमी और पुराण' अंक के लिए कुछ श्लोक रिकार्ड करवाए ,उन्हें सुनने के बाद उन्होंने[सनातन  सिंह ]  कहा था कि ' समस्त पुराणों के कृष्ण जन्म वृत्तांत आप ही गायें। 

गिरिजेश  जी से इतना  सुनना ही किसी पुरस्कार पाने जैसा था लेकिन 'सब  रिकार्ड कर पाने की  मेरी असमर्थता थी इसलिए मैंने मना कर दिया  था।  'मघा' पत्रिका में  मेरे द्वारा कुछ श्लोकों के गायन को  स्थान देकर उन्होंने मेरा मान बढ़ाया।  

इन 13 वर्षों में भाषा संबंधी कोई शंका निवारण करने के लिए  मुझे कोई विश्वसनीय स्रोत समझ आता था  तो वे गिरिजेश  जी थे। वेद आदि पढ़ने हेतु संस्कृत उन्होंने स्वयं सीखी और उन्हीं से मुझे भी प्रेरणा मिली कि संस्कृत सीखूँ ।-------------
 मुझे उनकी बहुत -सी कविताएँ पसंद हैं,उनकी यह रचना देखिए :-

...और तब उसने स्वयं को काट कर आधा किया
उसे अलग किया जिसे वह प्रेम कर सके
उस दिन मृत्यु का जन्म हुआ।


यह एक छोटी सी कविता है, जिसमें  चंद पंक्तियाँ में जैसे एक कहानी कह दी है.
उसको जो वजूद का हिस्सा बन चुका हो ,वो जो खुद में समा गया है
उसे स्वयं से अलग करना ही मर जाना है। 

हिन्दी के अतिरिक्त इंग्लिश में भी कवितायेँ लिखी हैं ,मेरी पसंद -
the song tonight


…the letters of letter are flying in the room
the gloom must be there scattering now
how will you catch the destiny
Ginny, you so small
I can see the meadows green
full of joy, youth and greed
to meet you
and the reed
weeps desperately to be my pen
for the pain I’ll write to flee
from here to meet you
Let the fleet pass
and the bands march
let the sun scorch
and the winds blow
I have to flow to thee my love
some day we’ll meet
sure and pure
to the promise made long back
==========

उनके विषय में जितना लिखा जाए कम है।

सादर श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए उनकी लिखी एक  कहानी 'शेफाली' का  वाचन प्रस्तुत है -:

 

 ===========