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August 16, 2018

स्मृति शेष :प्रिय राजनेता और कवि अटल जी को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

एक बेहद प्रभावशाली व्यक्तित्व के राजनेता और मेरे प्रिय कवि अटल जी का निधन अपूर्णीय क्षति है। कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूँ,सिर्फ मौन शेष है ।

   श्रद्धांजलि :
 
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February 16, 2018

बहुत प्रभावी ! सभी छात्रों को सुनना चाहिए!

मोदी जी ऐसे ही लोगों को पसंद नहीं हैं.कुछ विशेषताएँ उन्हें औरों से अलग करती हैं , आज उन्होंने 'परीक्षा पर चर्चा ' में छात्रों के प्रश्नों के उत्तर इतने प्रभावी दिए हैं ,
मैं मंत्रमुग्ध होकर सुनती रही और सोचती थी कि ज्ञान तो कई लोगों के पास होता हैलेकिन लोगों से जुड़कर कैसे उस ज्ञान को उन तक पहुँचाया जाए, यह नमो बहुत अच्छी तरह से जानते हैं.
  २ घंटे तक मंच पर खड़े होकर छात्रों के प्रश्नों के उत्तर देना वह भी पूरे आत्मविश्वास और तर्कपूर्ण ढंग से !
 ऐसे हर किसी से कर पाना संभव नहीं है.
आज मैं यह कहने में संकोच नहीं कर रही कि पहली बार देश को ऐसा प्रधानमंत्री मिला है जो छात्रों के मन को उनकी समस्याओं को भी समझता है और मार्गदर्शन करने में समर्थ है.
दुर्भाग्यवश ,मोदी जी से नफरत करने वाले शायद कभी उनका यह सकारात्मक पक्ष देखना ही नहीं चाहते!

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July 25, 2017

कित गए बदरा पानी वारे ?



अखबार में ,टी वी में खबरें सुन रहे थे कि इस बार बारिश बहुत हो रही है ,दिल्ली में बारिश हो रही होगी,नहीं हुई तो हो जाएगी ,यही मन में लिए अमीरात की भयंकर गर्मी से निकल कर भारत की ओर चले .

भारत भूमि पर क़दम रखते ही सोचा इस बार सावन के महीने में बरखा रानी का आनंद मिलेगा.
गर्मी के मौसम से राहत  मिलेगी,परन्तु इतनी उमस भरी गरमी से दो चार होना पड़ रहा है ,जिसे देखकर लगता है कि अगर यही हाल रहा तो आगे 'सावन का महीना, पवन करे सोर' गीत सब झूठ ही लगने लगेंगे.
न पवन न बादल किसी का शोर नहीं .

आसपास कहीं से कोयल ज़रूर कूकती सुनायी देती है ,मैंने पूछा कि जब सावन में बरखा की झड़ी नहीं तो ये क्यूँ कूक रही है ,तब पता चल कि कूक कर यह अपने बच्चे को बुलाती है.
वहीँ कहीं गीत बज रहा है 'सावन के दिन आए ,सजनवा आन मिलो'..रेडिओ वालों के लिए ये गीत अवसर के अनुसार बजते हैं ,अब सच में  इस सजनी से पूछें कि क्या साजन इस उमस भरे मौसम में मिलने के लिए बुलाये जा सकते हैं?

सावन का महीना झूलों के लिए जाना जाता था ,लेकिन अब झूले दीखते नहीं ,गाँव देहात में भी नहीं.उत्तर प्रदेश में घेवर खाने का महीना भी यही है ,अब यह मिठाई भी गिनी -चुनी दुकानों में मिलती है.
मौसम में परिवर्तन के लिए पर्यावरण प्रदूषण और न जाने कितने अन्य कारणों को गिनवाया जा सकता है लेकिन जो  सांस्कृतिक परिवर्तन भी हो रहे हैं उसका क्या ?
बादल छाकर चले जाते हैं ,हल्का-फुल्का  कभी बरस भी गए तो उसके बाद इतनी उमस कर जाते हैं कि पूछो न!

देखें राखी बाद , भादों लगते मौसम बदलेगा या नहीं  ?