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December 25, 2010

वक़्त कब किस का हुआ?

गीत गाता आ रहा हूँ,तुम नए विश्वास भरना,
गर्व से मैं सर उठाऊं ,तुम नया इतिहास रचना.’
कुछ ऐसे ही गुनगुनाता हर बरस नया साल आता है और जाते जाते अनगिनत कुछ खट्टी कुछ मीठी यादें देता चला जाता है.
साल २०१० की विदाई भी अब नज़दीक है यह साल भी कुछ दिनों के बाद इतिहास का एक हिस्सा बन जायेगा.बीतते साल का हिसाब किताब देखूं तो लगता है इस साल में मैंने अपेक्षाकृत बहुत कुछ घटते देखा है शायद इसी ‘देखने ‘ को अनुभव पाना कहा जाता है.
कहते हैं कि हर किसी को ‘वक़्त'से डरना चाहिए ‘ऐसा लोग क्यों कहते हैं कुछ हद्द तक यह भी समझ में आया..और सच कहूँ तो पहले ही जब हम सब अनिश्चतता से घिरे रहते हैं और ऐसे में इस का बदलता बिगड़ता रूप आस पास देखने को मिले तब इस 'वक़्त 'से भी डर लगने लगता है.

November 3, 2010

'एक वो भी दिवाली थी… एक ये भी दिवाली है'

कार्तिक मास की अमावस क्यों खास होती है यह बताने की आवश्यकता ही नहीं..रोशनी के त्यौहार दिवाली से कौन अनजान होगा ?
कुछ सालों पहले तक दिवाली की तैयारियों में जो उत्साह उमंग दिखाई दिया करता था , क्या वह आज भी कायम है?अगर नहीं तो इसके कई कारण हो सकते हैं.इन संभावित कारणों
को हम आप बहुत कुछ जानते भी हैं..दोहराने से क्या लाभ..?मुख्य कारण तो मंहगाई ही है लेकिन बढ़ते आधुनिकीकरण का प्रभाव रीती रिवाजों के साथ साथ त्योहारों  पर भी पड़ रहा है.बीते कल में और आज में बहुत परिवर्तन आ गया है.आने वाले कल में और कितना परिवर्तन आएगा या कल हम रिवर्स में भी जा सकते हैं?
याद है ….हर साल मिट्टी के १००-१५०  नए दिए लाए जाते ,पानी में उन्हें डुबा कर रखना फिर सुखाना ,रूई की बत्तियाँ बनाना,आस पड़ोस में देने के लिए दिवाली की मिठाई की थाल के लिए नए थाल पोश बनाना,रंगोली के नए डिजाईन तलाशना ,कंदीलें बनाना[अब कंदीलें गायब हैं] ,उन दिनों रेडीमेड कपड़ों का कम चलन था सो महीने दो महीने पहले ही नए कपडे ले कर दर्जी से सिलवाना.. आदि आदि…

October 6, 2010

ऐसा भी होता है !!!


कभी कभी जीवन में बहुत कुछ ऐसा होता है जो आप ने पहले से तय नहीं किया होता. सब कुछ अप्रत्याशित सा ! पिछले दो महीने में भी बहुत कुछ इतनी तेज़ी से घटा ..
जैसे किसी सुस्त निढ़ाल से मन को पंख मिल गए थे !

August 10, 2010

आसमान पर चलना ....कैसा लगता है??


कभी सोचें कि आसमान पर चलना कैसा लगता है तो ये तो वही बता सकता है न जो आसमान पर चल कर आया हो?अगर मैं कहूँ कि मैं आसमान पर चल कर आई हूँ तो?
हाँ ,मेरा यह अनुभव भी कुछ इसी तरह का है जब मैं दुनिया की सब से बड़ी इमारत पर सबसे ऊँचे डेक पर घूम कर वहाँ से धरती को देखने का एक रोमांचक अनुभव ले कर आई हूँ.

दुनिया की सबसे ऊँची मानवनिर्मित इमारत संयुक्त एमिरात के शहर दुबई में है.विज्ञान और तकनीक ,इंसानी सूझ बूझ और मेहनत का नमूना. इस अजूबे को बनाने में अतर्राष्ट्रीय कम्पनियाँ ,एक्सपर्टस,तकनीशियन और १०० से अधिक देशों के १२००० मजदूरों की दिन रात की मेहनत लगी है.यह भी सच है कि इस में सब से अधिक योगदान भारतीय तकनीशियन और मजदूरों का है.यह आप वहाँ की तस्वीर दीर्घा में भी देख सकते हैं.

July 16, 2010

कतरनें


kids-laughing ७ जुलाई को स्कूल के पहले सत्र का आखिरी दिन था.शाम को ओपन हाउस और उसके बाद से बच्चों की गरमी की छुट्टियाँ शुरू हो गयीं,पूरे दो महीने की छुट्टियाँ हैं यानी सितम्बर में ईद के बाद ही स्कूल खुलेंगे.बच्चों की मौज लेकिन जाएँ कहाँ ?गरमी इतनी है बाहर खेल नहीं सकते सब इनडोर गेम्स /activities पर ही निर्भर रहेंगे.

गरमी की बात क्या कहें?हर साल की तरह अपने रंग में है..वही कहानी नल में दिन में इतना गरम पानी आता है कि हाथ नहीं लगा सकते ,सुबह आठ के बाद नहाना हो तो पानी भर कर ठंडा कर के इस्तमाल करना होता है और तो और रात के १ बजे भी पानी ठंडा नहीं होता है.अब आप कहेंगे पानी तो होता है न..हाँ ये भी सही है ,पानी तो २४ घंटे होता है.लेकिन नगरपालिका का पानी घर की टंकी में भरता है न कि भारत की तरह सीधा घर के पाईपों में आता है और आम तौर पर पीने का पानी बोतल वाला ही इस्तमाल किया जाता है.

July 5, 2010

हम कितने आधुनिक हैं?


शोभा डे
जन्म -१९४८, जन्म स्थान -महाराष्ट्र.,व्यवसाय- भूतपूर्व मॉडल,प्रसिद्ध कॉलमिस्ट और उपन्यासकार
वास्तविक नाम -शोभा राजध्यक्ष
शोभा डे एक विवादस्पद नाम है .लेकिन जो इन्हें करीब से जानते हैं वे मानते हैं कि उनमें गहरी अंतदृष्टि और शहरी संस्कृति की समझ है.
उन्हें लोग उनकी बेबाक अभिव्यक्ति के कारण भी जानते हैं .भारत में किताबों के ज़रिये सेक्स क्रांति लाने वाली महिलाओं में उनका नाम पहले लिया जाता है.
उनका लिखा एक लेख कल उनके ब्लॉग पर पढ़ा ,शायद बहुत लोग इस सच्चाई को जानते हों परन्तु मेरे लिए यह बहुत ही चौंकाने वाली थी.
अपनी एक मित्र के साथ इस लिंक को शेयर किया तो उस ने मुझे यही कहा कि ये बातें सब जानते हैं!शायद मैं दुनिया से कटी हुई हूँ जिसे ये बातें नयी लगीं.
मॉडल विवेक बाबाजी के दर्दनाक अंत ने एक बार फ़िर से ग्लेमर की दुनिया के राज़ दुनिया के सामने ला दिए.

June 17, 2010

निर्वात

हर साल की तरह इस बार भी गरमी अपने पूरे शबाब पर है.फ़िर वही चिर परिचित धूल भरी गरम हवाएं.
समाचारों में देख रहे हैं कि भारत में तो बारिशें खूब हो रही हैं .कुछ महीने पहले यहाँ भी हुई थी बारिश एक पूरा दिन !
दो तीन दिन लगातार होती तो कम से कम ये सड़कें ,इमारतें ,पेड़ पौधे सब अच्छी तरह धुल तो जाते !
देखीये इन चित्रों में एक दिन की हलकी मगर पूरे दिन हुई बारिश से क्या हाल हुआ था..

May 26, 2010

बंज़र हथेलियाँ

एक नज़्म-:


बंज़र हथेलियाँ
---------------------
क रोज़ उग आये थे कुछ लम्हे
खुद ब खुद हथेलियों पर मेरी ,
चाहत की नमी ,
अहसास की गरमी ने पाला था उन्हें ,
और पलकों ने दिया था साया ,

जिस रोज़ आँख लगी मेरी ,
जागी तो ,
इस धरती को बंज़र पाया ,
ढूँढा बहुत ..मगर ,
कोई लम्हा फ़िर न मिला
मालूम हुआ है,
कि 'रेखाएँ ' ...खुदगर्ज़ हुआ करती हैं!

.............................अल्पना ...........................


May 13, 2010

वक्त का बायस्कोप





भी खुद से रूबरू होने का दिल करता है,घर की छत पर जाती हूँ ,टहलती हूँ ......छत से देखूं तो एक तरफ दौड़ती भागती सड़कें दिखती हैं और दूसरी ओर है कब्रिस्तान.छत से वहाँ मुझे सिर्फ बहुत से पत्थर दिखाई देते हैं जो स्मृति चिन्ह जैसे लगाये हुए हैं.सब से बेखबर रूहें चैन से सो रही है जैसे सब कुछ ठहरा हुआ है वहीँ दूसरी तरफ ज़िन्दगी अपने पूरे जोश में दौड़ भाग रही है, thami hui lifeसिग्नल लाल होता है तो दम भरती है ,ठहर जाती है..हरा सिग्नल होते ही फिर दौड शुरू मंज़िल की ओर!
DSCN3321

खुले आकाश के नीचे ,खासकर रात के अँधेरे में इन्हें देखना मुझे कोईभी डर नहीं देता बल्कि विपरीत दिशा में बने इस विरोधाभास को देखना और खुद को इस के बीचों बीच खड़े पाना अजीब से अहसास देता है .जिसमें शायद सुकून अधिक है ,इस बात का कि मैं तो उस दौड़ में शामिल हूँ ही उस ठहराव में!

से ही एक दिन अचानक वक़्त मेरे सामने बाईस्कोप ले कर आ पहुंचा.थोड़ा हिचकिचाती हूँ क्योंकि वह बाईस्कोप दिखाने के लिए पैसे या कटोरा भर अनाज नहीं लेता ,एवज़ में वह मांगता है मेरी आँखों से गिरती कुछ बूँदें!
ये वक़्त इतना निष्ठुर क्यूँ है?”

bioscopeबाईस्कोप’ में झांकती हूँ तो देखती हूँ एक लड़की शायद कक्षा ७ में रही होगी,फ्राक पहने हुए है, बस से उतरी है,नहर के किनारे -किनारे पगडण्डी से यहाँ -वहाँ देखते हुए चली जा रही है.आते-जाते लोग उस से मिल रहे हैं प्यार से पूछ रहे हैं 'स्कूल ख़तम हो गए?दादी के पास आई हो?अकेली आई हो?और न आया कोई साथ में? कुछ दिन रूक कर जाएगी? सब का जवाब ‘हाँ /न’ में देती हुई आगे बढ़ रही है.नहर और खेत के बीच बना है यह रास्ता.

वह स्कूल के बाद गर्मियों की छुट्टियों में शहर से गाँव जा रही है.उसे गाँव से बहुत मोह है तभी अकेली दादी के पास रहने चली आई.गाँव में दाखिल होते ही घरों के बीच - बीच से अपनी दादी के घर पहुंची.दादी को पहले ही ख़बर थी ,सुबह दूधवाले के हाथ संदेस मिल गया था.उसके पापा ने ग्वाले के हाथ एक दिन पहले भिजवाया था.[ ये दूधवाला गाँव से दूध इकट्ठा कर के शहर बेचता था रोज़ तड़के उस का यही काम था,उसके ज़रिये यहाँ वहाँ सन्देश लाने ले जाने का काम भी हो जाता था.]

दादी ने स्नेह भरे हाथों से सर सहलाया ,प्यार किया.और पूछा 'बस में परेशानी तो न हुई'..उस ने ‘न’ कहते सर हिला दिया.

दादी से छाछ ले कर पिया ही था कि देखा आस पास घरों से उसकी मित्र मंडली भी वहाँ पहुंची हुई है.अब वह मित्र मंडली के साथ बातों में मस्त हो गयी है.शायद आते ही किसी mangotreeखुराफाती कार्यक्रम का प्लान तैयार हो रहा है!

की मुंडेरों से कूदते बच्चे इस घर से उस घ टापते हुए,हेंडपंप,बम्बे के पानी में तैरती मछलियाँ ,हरे भरे खेत,गाय-भैंसे ,कुट्टी काटने की आवाज़,दही बिलोती ताई,सिलबट्टे पर हल्दी - लहसुन पिसती भाभी,चूल्हे पर बनती गिले हाथ की नमकीन रोटी की महक ,दादी की रसोई में चूल्हे के पास ओट्ता दूध ,आम के बाग़ और उन पर तोते के खाए आम ढूँढना और गुलेल!.....

'जाने क्या swingingक्या देख रही हूँ वहाँ....'


'म्मा आप अभी तक यहाँ हो?' बेटे की आवाज़ ने चौंका दिया.
मुड़कर उसे देखा और कहा 'हाँ ,अभी नीचे आती हूँ.'
और इस के साथ ही वक़्त भी अपने बाईस्कोप समेत कहीं गायब हो गया.
सीढ़ियों से उतरते हुए रोशनी में बेटे ने मुझे देखा और पूछा'आर यू क्रायींग ?[क्या आप रो रहे हो?].
मैं ने जवाब दिया..बस ऐसे ही…इंडिया में स्कूलों की छुट्टियाँ शुरू हो गयी हैं न ,बस कुछ पुराने दिन याद आ गये.
बेटे ने याद दिलाया ‘पापा तो कहते हैं न आप अकेले हो आओ एक वीक के लिए?’ ..फ़िर चले जाओ?'

‘हाँ जाऊँगी’..कह तो देती हूँ लेकिन जानती हूँ अकेली नहीं जा पा पाऊँगी.कुछ साल पहले अकेले गयी थी तो एक चाची जी ने टोक दिया था ‘अगली बार आना तो जोड़े से आना’ किसी को क्या कहूँ कि यह बात आज तक दिल में बैठी हुई है.

सीढियां ख़तम हुईं ,दरवाजे तक पहुँचने तक मन संयत हो चुका था.


कुछ ऐसे ही भावों को समेटे एक गीत banidini-th
अब के बरस भेज .......
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[स्वर -अल्पना]




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April 22, 2010

अधूरी तहरीर

पिछली पोस्ट पर आये आप सभी के विचार ,सलाह और सुझावों का दिल से आभार.

आप की कही हर बात मेरे लिए महत्वपूर्ण है और सभी के विचारों को और अपना भी मत ध्यान में रखते हुए क्या निर्णय ले पाए हैं..२-३ महीने में बता सकूंगी.

माहोल को बदलते हुए एक नज़्म कहने की कोशिश है.




अधूरी तहरीर
-------------
भी ख्वाबों में टहलते हैं जज़्बात हर घडी ,

और माज़ी में धडकती हैं कई यादें,

अहसास के दरख्तों पर खिलते हैं नए फूल,

चांदनी रात में अब भी ओस गिरा करती है ,

अब भी जागी आँखें टांकती हैं सितारे ,

आसमाँ के दामन में !


भी किसी आवाज़ पर पलट ,दूर चली जाती हूँ,

सब कुछ तो वही है मगर..

अब नहीं दिखती हाथों में कोई लकीर,

वक्त का दरया भी है खामोश

इश्क़ की तहरीर अधूरी सी ,

किस का इंतज़ार किया करती है?


था रखा है अब तक आस का दामन ,

रोशनी राह में यादें किया करती हैं,

जो कभी मेरी निगेहबां हुआ करती थीं,

वो निगाहें अब भी कहीं करती तो होंगी मेरा इंतज़ार,

फ़िर मिलेंगी कभी कहीं इत्तेफाक़ से!

का दामन थामे भटकती है रूह ,

इस भरम में अब भी !

हाँ,भटकती है रूह ,इस भरम में अब भी !
-----अल्पना -----


चलते चलते एक त्रिवेणी-



आज हाथ झटक कर मेरा ,

मेरे हिस्से की खुशियाँ गिरा दीं उसने,

मेरी मुट्ठियों में उसे 'राज़' नज़र आते थे !


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April 13, 2010

भागें भी तो कब तक और कहाँ तक?

निश्चितता मतलबकुछ भी निश्चित नहीं ‘...
अपनी जड़ों से कट कर पौधा भी समय लेता है नयी ज़मीं पकड़ने में .
इंसान में अपनी मिटटी से दूर हो कर भविष्य के प्रति जो अनिश्चितता पैदा हो जाती है उसका निदान हर किसी को आसानी से नहीं मिलता.

खाड़ी देशों
में आये प्रवासी जानते हैं कि आज हम यहाँ हैं तो कल मालूम नहीं यहाँ हैं भी या नहीं..किसी से पूछेंगे तो कोई भी इस भय को स्वीकारेगा नहीं लेकिन अधिकांश के लिए सच यही है.कि वे भविष्य को लेकर कहीं कहीं आशंकित हैं ..इसी अनिश्चितता का परिणाम है कि ज्योतिषों और पंडितों की शरण में अब हम ज्यादा जाने लगे हैं.
साल पहले मद्रास से 'नाडी शास्त्र 'वाले एक पंडित जी का यहाँ आना हुआ.सब जगह आग की तरह ख़बर फ़ैल गयी ..यह भी आश्चर्य की बात है कि मात्र अंगूठे की छाप से पत्र ढूंढते और अगर मिल गया तो वह आप के पिता माता ,पति/पत्नी का नाम तक बता देते हैं.जन्म का समय /नक्षत्र तक.दावा यही होता है कि वह केवल पढ़ते हैं अपनी तरफ से कुछ अंदाज़ा या गणना नहीं करते.
हमने भी इस का अनुभव लिया ..अपने मरण तक भविष्य सुनकर ख़ुशी भी हुई /परेशान भी हुए ,उपाय भी लगे हाथ उनसे करवा लिए .क्योंकि उनका प्रभाव ही सभी पर इतना पड़ गया था.
तीन साल बाद उन का दोबारा'विसिट पर आना हुआ..मगर इस बार सब उनसे नाराज़..
अधिकाँश मामलों में अभी तक कुछ भी तो सही नहीं निकला था!


हाल ही में फिर से दुबई से मेरी सहेली नेफोन किया बताया कि शिवदास नामक एक व्यक्ति गुंटूर आंध्रप्रदेश सेआयेहुएहैं .
वे जेनेटिक इंजिनियर हैं ..गोल्डमेडलिस्ट ,बड़ी कंपनी में कार्यरत थे,अब उन्हें देवी की सिद्धि मिल गयी है और वे आपसे बातकर के आपका भविष्य 
बतादेतेहैं..
सुनकर हंसी भीआई..अब नाडीशास्त्रवाले पंडितजी से जो अनुभव मिला तो किसी पर यकीन नहीं आता..मैंने कहा मुझे भविष्य नहीं मालूम करना ..जो होना है वो तो होगा ही..दो ही बातें हो सकती हैं या अच्छी या बुरी.
वो पहली बार दुबई आये थे उनकी भी खूब चाँदी हुई,बहुत लोग उनसे मिले.



अनिश्चितता किस हद्द तक घेरे है और एक उदाहरण हाल ही में यहाँ एक छोटा सा इंडिया मेला लगा था वहाँ भी एक स्टाल में एक ज्योतिष जी को बिठाया गया था ..मानो या मानो ,सब से अधिक भीड़ वहीँ दिखी.ईमानदारी से कहूँ तो शायद अब भी हम सब को तलाश है किसी अच्छे ज्योतिषी की !कारण यही है कि लगभग सभी अनिश्चित हैं अपने कल के लिए! जैसे घर के रह गए हैं घाट के!

इसी अनिश्चितता का दूसरा  पहलू .........जो भी खाड़ी देशों में आता है उसका उद्देश्य और आगे जाना होता है ,वापस भारत अपनी  मर्ज़ी से बिरले ही जाते हैं ....प्रश्न यह किस देश में जाएँ? जहाँ सही ठहराव  मिलेबेहतर विकल्प भी.यहाँ कोई लन्दन कोई ऑस्ट्रेलिया तो कोई अमेरिका ,न्यूजीलैंड  या  कनाडा जाने के लिए  कागज़ भरता  है .balconyview2
हम भी इस  अनिश्चितता सेअछूते  नहीं हैं .हमने  भी कनाडा   के  लिए  वीसा apply किया  था ..[अब खुशकिस्मती  या   बुरीकिस्मत ] वीसा  मिल गया२००८ में वहाँ  गए ..कोई  दोस्त नहीं  ,रिश्तेदार नहीं ...अनजाने मुल्कमें .अंतर्जाल ने  बहुत  सहारा  दिया .
लेपटोप साथ रहा .नेट पर सभी  जानकारी मिलती रही .ऑनलाइन बुकिंग घर की ,टूर की ..सबकुछ ...जाकर घूमकर   गए .....और परिवार को वहाँ की Permanent Residency भी मिल गयी है.........अब इसे बनाये रखने के लिए  वहाँ के  रहिवासी   कानून  के  अनुसार  पांचसाल   में 730 दिनरहनाज़रूरीहै!
सालगुज़रगए ..पेंडुलम की तरह अब फिर झूलने लगेहैं कि जाएँ या न जाएँकभी -कभी जीवन में निर्णय लेने कितने कठीन हो जाते   हैं अब समझ आ रहा हैकनाडा   जाने  का  अर्थहै  सबकुछ  फिर  से  शुरू    करना......वहाँ  के हालात यहाँ से बहुत अलग हैं.  मौसम की बात करें या फिर सुख -सुविधाओं की ...वहाँ गए थे जो भी अपनी भाषा या  कहिये कि एशिया का मिला उससे पूछताछ करते रहेमिली जुली प्रतिक्रियाएं मिलीं मगर अधिकतर वहाँ के निवासी यही कहते कि   बच्चों के लिए केनाडा आ रहे हो तो मत आओअब  अगर  जाते नहीं तो ''पी आर ''  कैंसल हो जायेगा..जिन मित्रों  को  वीसा नहीं मिल  पाया  वो  जाने के पक्ष में कहते  हैं और हमारे वहाँ शिफ्ट न होने  को बहुत बड़ा ग़लत निर्णय बता रहे हैं.
जिन्हें  हमारी  तरह residency मिलचुकी है और हमारी  तरह यहीं हैं ,वे गोलमोल जवाब देतेहैं.कहते हैं भारत तो अपना ही है कभी भी वापस चले जाना .अब चले ही जाओ !
worry
भारत जाते हैं तो सब को देख कर ऐसा लगता है ...किसी के पास समय नहीं है,सब की अपनी दुनिया बस चुकी है, बहुत आगे निकल गए हैं परन्तु हम आज भी वक़्त के पुराने काँटों में रुके हुए हैं!
'देश' छुट्टियों में जाते हैं तो पहले कुछ दिन तक अडोस पड़ोस के लोग पूछते हैं 'कब आये?'कितने दिन हो?इंडिया वापस नहीं आना क्या?
-------१०-१५ दिन गुज़रते ही उन्हीं लोगों का सवाल होता है ' कब की वापसी है? कनाडा कब जा रहे हो?इंडिया आकर जाओगे या वहीँ दुबई से चले जाओगे ?
जिस का दिल हो ..उसे भी लगेगा जैसे अब तो जाना ही पड़ेगा...क्योंकि अब सच में ही लगने लगा है कि 'एन आर आई' का अर्थ है--Not Required Indians !
बड़ी उलझन है......जाएँ तो कहाँ जाएँ और भागें भी तो कब तक और कहाँ तक?


Dont_Worry_Be_Happy
इन सब बातों को भूल कर सुनाती हूँ एक गीत जो हर बेटी के लिए उनकी माँ गाती होंगी.
'मेरे घर आई एक नन्हीं परी,चांदनी के हसीन रथ पे सवार '
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March 13, 2010

तीन पन्ने

time

[चित्र साभार - गूगल ]

वक़्त को कई बार रूप बदलते देखा है.
आज कल कुछ ज्यादा ही साफ़ और करीब दिखाई देता है.
क्योंकि अब हम बच्चे नहीं हैं इसलिए उसका रूप पहले की तरह नर्म और स्नेहमयी नहीं है,
एक हाथ में नियम /काएदे की लिस्ट और दूसरे हाथ में एक मीज़ान लिए रहता है.
ये शायद मेरा मन ही है जो वक़्त की श़क्ल धर लेता है.
हम खुद भीतर से बच्चे बने रहना चाहते हैं मगर अपने बच्चों को कायदे सिखाते हैं ऐसा करो वैसा न करो .तुम अब बड़े हो गए हो!
यह हमारा दोहरा व्यवहार है या विरासत में मिले ये शब्द जिन्हें चाहे अनचाहे दोहराते रहते हैं हम पीढ़ी दर पीढ़ी ,हर पीढ़ी ?

pg

[चित्र साभार-प्रकाश गोविन्द]

कैमरे जब तक डिजिटल नहीं थे ठीक था ,कम से कम तस्वीरें हार्ड पेपर पर बन कर अल्बम में लग जाती थीं.
अब वो पी सी में रहती हैं य यू एस बी में !
पेपर में उन्हें बदलवाने के लिए समय टलता रहता है आज नहीं कल पर..
कैद कर लेना उन लम्हों को और फिर टुकड़ों टुकड़ों में उन्हें सालों साल फिर से जीना कितना सुखद लगता है!
एक तस्वीर कितना कुछ याद दिला जाती है.उस समय की उस के आगे पीछे की घटनाओं की.
दिमाग में इतना सब कहाँ स्टोर रहता है?
बहुत सी बातों के बारे में हम सोचते हैं कि हम भूल गए हैं मगर कोई एक शब्द/ कोई वाक्य/ कोई तस्वीर किसी का चेहरा /किसी की आवाज़ याद दिला जाती है सब कुछ ...नहीं तो बहुत कुछ !
यादें चीर जाती हैं कहीं भीतर तक दिल को ...दिल में दर्द का दरिया जो जमी बरफ सा था अब तक .....अहसासों की गरमाहट से पिघलने लगता है.
कैसे समाये हुए हैं इतना सब कुछ हम अपने भीतर ?
आँखों में पलकों के पीछे छुपा धुंआ न जाने कैसे बादल बन बरसने लगता है!
ऐसे में यकायक शायर बशीर बद्र का एक शेर याद आया है -
'जी बहुत चाहता है सच बोलें,
क्या करें हौसला नहीं होता !'

चलते चलते एक त्रिवेणी लिखने की कोशिश -:

वो चाँद ही था जो ले जाता था पैग़ाम मेरे ,
अब तो वो भी ,सुनता नहीं सदायें मेरी,

सुना है रुसवा बहुत चांदनी ने किया है उसे!