April 6, 2008

जाने क्यूँ


जाने क्यूँ [एक गीत ]
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जाने क्यूँ मैं अनजान डगर जाती हूँ,
मिल के अनजान लम्हों से बहल जाती हूँ.

टूट कर जुड़ता नहीं ,माना के नाज़ुक दिल है,
गिरने लगती हूँ मगर ख़ुद ही संभल जाती हूँ.

ज़िंदगी से नहीं शिकवा न गिला अब कोई,
सुनसान राहों से बेखौफ गुज़र जाती हूँ.

गैर के हाथों उनके नाम की मेहँदी है रची,
जान कर ,अपनी तमन्ना में खलल पाती हूँ.

है खबर वक्त का निशाना मैं हूँ ,फ़िर भी-
उनके हाथों मिटने को मचल जाती हूँ.
--अल्पना वर्मा

16 comments:

रचना said...

aap ko padhaa achcha lagaa
aap ko http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/
ka invite bejaha haen
ek prayaas mahila blogers ko saath daekhnae ka

रचना said...

agar invite naa mila ho to spam mae avshya check kare

mehek said...

wah bahut khub,anjan lamhe bhi apnese anjan safar bhi apnasa lagta hai jab dil ko kisi se pyar ho,very beautiful wordings.

singh said...

है खबर वक्त का निशाना मैं हूँ ,फ़िर भी-
उनके हाथों मिटने को मचल जाती हूँ.

बहुत खूब

DR.ANURAG ARYA said...

है खबर वक्त का निशाना मैं हूँ ,फ़िर भी-
उनके हाथों मिटने को मचल जाती हूँ.

सुभान अल्लाह ..बेहद खूबसूरत शेर......

अजित वडनेरकर said...

बहुत खूब लिखती हैं आप...

sidheshwer said...

बोफ़्फ़ाईन साब !
उम्दा!

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

bahut aachhe aplana ji.. bahut hi sundar rachna..

Amiya Prasoon Mullick, said...

achchhi rachna, nihaayat hi achchhi.

नीरज गोस्वामी said...

टूट कर जुड़ता नहीं ,माना के नाज़ुक दिल है,
गिरने लगती हूँ मगर ख़ुद ही संभल जाती हूँ.
टूट कर जुड़ता नहीं ,माना के नाज़ुक दिल है,
गिरने लगती हूँ मगर ख़ुद ही संभल जाती हूँ.
अल्पना जी
आप को आज पढ़ा..आप के पास भाव और शब्द दोनों खूब हैं.आप बहुत दिल से लिखती हैं. इश्वर आप को हमेशा खुश रखे.
नीरज

राज भाटिय़ा said...

अल्पना जी पहली बार आया हू आप के ब्लोग पर बहुत अच्छा लगा,आप की कविताये बहुत ही सुन्दर लगी, धीरे धीरे पढेगे,ओर यह दो लाइने बहुत ही अच्छी लगी
है खबर वक्त का निशाना मैं हूँ ,फ़िर भी-
उनके हाथों मिटने को मचल जाती हूँ.
आप का धन्यवाद

अल्पना वर्मा said...

आप सब गुनिजानो की टिप्पणियां पढ़ कर उत्साह बढ़ गया है.ब्लॉग की दुनिया इतनी सहयोगी है यह अब पता चल रहा है.सच में ,दिल से आप सभी का आभार प्रकट करती हूँ.
सादर
-अल्पना

Piyush (Amrit) said...

bahut si sundar abhivyakti.

Dr.Sridhar Saxena said...

Alpana ji
I just happened to visit ur blog and hear ur poems.You have put ur heart in poems and the composition is also outstanding...congratulations..keep it up.
Why dont u sing some songs and upload them. I am sure u can do justice to those as well..with regards

Dr Sridhar Saxena

अमिताभ फौजदार said...

ज़िंदगी से नहीं शिकवा न गिला अब कोई,
सुनसान राहों से बेखौफ गुज़र जाती हूँ.

very nice !!

Dr. Vijay Tiwari "Kislay" said...

अल्पना जी
नमस्कार
महेंद्र मिश्रा जी के ब्लॉग पर आपका लिंक देख कर मैंने आपकी साहित्य साधना को देखा /पढा / सुना . बहुत अच्छा लगा.
मई भी जबलपुर म.प. का एक कवि हूँ. आप मेरा ब्लॉग www.hindisahityasangam.blogspot.com देख कर अपना साहित्य सहचर मान सकती हैं.
आज मैंने आपकी रचना जाने क्यूं पढ़ी ...>
गैर के हाथों उनके नाम की मेहँदी है रची,
जान कर ,अपनी तमन्ना में खलल पाती हूँ.

है खबर वक्त का निशाना मैं हूँ ,फ़िर भी-
उनके हाथों मिटने को मचल जाती हूँ.
इस रचना में एन अनजानी सी कसक और प्रेम से समर्पण का भावः देख कर ऐसा लगा की रचना छोटी जरूर है लेकिन संवेदनाएं गहरीं हैं.
इस रचना के लिए बधाई स्वीकार करे

आपका
डा. विजय तिवारी "किसलय"
जबलपुर, मध्य प्रदेश