March 10, 2008

इंतज़ार

उनके आने की खबर क्यों, अब नहीं आती,

बेरुखी उनकी अब-यूं तो सही नहीं जाती,

रात भर याद कर के उन्हें, रोया है कोई,

पर यह शिक़ायत भी,अब -की नहीं जाती,

एक उम्मीद पर हैं- दीयों को रोशन किये,

न जाने क्यूं रोशनी-उन से, अब नहीं आती .

-Alpana Verma

7 comments:

mehek said...

bahut sundar

DR.ANURAG ARYA said...

रात भर याद कर के उन्हें, रोया है कोई,

पर यह शिक़ायत भी,अब -की नहीं जाती,

vah alpna jee...maine to ise kai bar gungana liya....

Dr. RAMJI GIRI said...

प्रिय के विरह में भावातिरेक अंदाज़ में लिखा है आपने..
माने कभी इसको ऐसे देखा था..


"सारी रात 'दिया' जलता रहा उसकी रोशनी का लिए ,
और वो दीवानावार था जुगनू की चांदनी के लिए..."

Dr. RAMJI GIRI said...

प्रिय के विरह में भावातिरेक अंदाज़ में लिखा है आपने..
माने कभी इसको ऐसे देखा था..


"सारी रात 'दिया' जलता रहा उसकी रोशनी का लिए ,
और वो दीवानावार था जुगनू की चांदनी के लिए..."

रवीन्द्र प्रभात said...

बढिया है , जारी रखें !

Paras said...

बहोत ख़ूब!

Anonymous said...

bahut khuub likha hai.