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December 29, 2013

नव वर्ष के स्वागत में ..

२०१४ आने वाला है इस अवसर पर सभी को नव वर्ष की अग्रिम शुभकामनाएँ!
नववर्ष के स्वागत हेतु शौपिंग मॉल  में सजावट -
बर्फ का किला -दुबई मॉल में 
मॉल ऑफ़ एमिरेट्स [दुबई ]
अल ऐन मॉल ,अल ऐन
बवादी मॉल ,अल ऐन
ग्लोबल विलेज -दुबई --आज कल बहुत भीड़ नहीं है .दुबई शोपिंग फेस्टिवल २ तारीख से शुरू होगा.
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ग्लोबल विलेज प्रवेश द्वार 
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प्रवेश द्वार 
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भारत का पवेलियन 
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टर्की का पवेलियन 
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भुने हुए भुट्टे और अन्य गिरियाँ 
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भारतीय पवेलियन 
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भारतीय पवेलियन 
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ग्लोबल विलेज-दिसंबर २०१३ 

December 24, 2013

ये ज़िद्दी बच्चे !

ये ज़िद्दी बच्चे !
आम आदमी पार्टी को ‘जिद्दी बच्चों का जमावड़ा’ कहा जाए तो गलत नहीं होगा.
जिस तरह से उन्होंने एक जिद्द पकड़ कर उसको ही सही ठहराते हुए यहाँ तक पहुँच गए हैं वह काबिले तारीफ़ है. इस सिस्टम में जहाँ भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी समाई हुई हैं उस दलदल में पाँव जमा कर खड़े होने का तरीका इन्होने इतनी जल्दी सीख लिया इसकी शाबाशी देना बनता ही है.
अन्ना हजारे के साथ अनशन से पहचान में आये कुछ लोग संगठित हो कर इस तरह से नया रूप लेंगे इसका अंदाजा लोगों को नहीं था सिस्टम से लड़ने की जिद्द को बालहठ  समझ कर लोग इन्हें दुलारते रहे लेकिन ‘आप’ पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल,मनीष सिसोदिया ने जिस तरह से  अपनी दूरदर्शिता दिखाई है जिस तरह अब तक का इनका कार्यक्रम देखा है उससे लगता है की बहुत होमवर्क करके ही यहाँ तक पहुँच पाए हैं.
गूगल इमेज से साभार 

चुनाव के नतीजों  बाद लगा कि दिल्लीवासियों ने लगता है जैसे किसी बंद हुए सर्कस के दरवाज़े खोल दिए हों और सभी को करतब दिखाने  का इंतजाम कर रहे हों .२३ तारीख तक सब मजमा लगाये बातों की चाट परोसे जा रहे थे !
 आम आदमी पार्टी के सामने  बड़ी मुश्किलें थीं...'इधर कुआँ, उधर खाई वाली' स्थिति  !
भारतीय जनता पार्टी ने  विपक्ष में बैठने की बात कह कर पहले ही पल्ला छाड़ लिया और कांग्रेस के साथ मिलकर ‘आप’ को उकसाने लगे कि ये सरकार बनाना नहीं चाहते क्योंकि वादे पूरे नहीं कर सकते .
कांग्रेस ने चतुराई से निर्णय लिया कि 'आप' को समर्थन दे कर जनता के साथ हो जायेंगे कि देखिये हम कितने भले हैं हमारी बुराई करने वालों की सरकार हम बनवा रहे हैं .और उनके इस कदम से उन्हें दोनों तरफ से फायदा होना ही है –एक वह जनता के दिल में जगह बनायेंगे कि हमने आप की पसंद को सरकार बनने में सहायता की और दूसरे यह कि अपनी कट्टर विरोधी ‘ भारतीय जनता पार्टी ‘को कुर्सी से दूर रखा ! अगर आम आदमी पार्टी सत्ता में टिक जाती है काम करती है तो भी वे जनता के बीच इसी बात को लेकर जायेंगे देखिये हमने आप को पूरा सहयोग दिया इसलिए वे कम कर सके! और अगर आप पार्टी कुछ नहीं कर पाती तब भी ‘कांग्रेस’ को जनता की सहानुभूति मिलेगी कि कांग्रेस ने अपने लिए इतना बुरा भला ‘आप ‘पार्टी से सुना फिर भी बडप्पन दिखाते हुए उन्होंने नए दल को सहयोग दिया अब वे कुछ कर नहीं पाए तो नयी पार्टी की  ख़ामी है कांग्रेस का क्या  दोष! अब इस सारे प्रकरण में नुक्सान बी जे पी का होगा .

नयी पार्टी को तो लोगों ने वैसे भी मौका दिया अगर वे न भी कर पाए तो उन्हें उनकी अनुभवहीनता का सहारा लेकर जनता से राहत मिल सकती है. वैसे भी आप’ के पास खोने को अपना कुछ नहीं है क्योंकि उनके पास जो कुछ है जनता का ही है चुनाव के लिए धन या लड़ने की हिम्मत के लिए जनता का विश्वास !

अब 'आप’ पार्टी एक बड़ी दुविधा से निकल कर तो आयी है मगर उसका यह निर्णय उसे कई सवालों के घेरे में खड़ा करता है ,जैसे  पार्टी का कहना कि वे किसी से समर्थन न लेंगे न देंगे लेकिन उन्होंने समर्थन लिया ...अब जो आंकड़े टी वी पर बताये जा रहे हैं उनके अनुसार जनता के ओपिनियन पोल में भी  दिल्ली की जनता की  २% सहमती ही थी.6 लाख एस एम् एस में से केवल २ लाख दिल्ली की जनता ने दिए थे ! इसी पर एक कार्टून देखें-
गूगल इमेज से साभार 

उस पर आरोप है कि जनता के साथ धोका किया है जिस कोंग्रेस को उन्होंने चोर कहा उसी के सहारे खड़े हो कर वे चलना शुरू कर रहे हैं .ऐसे में यह भी आशंका जताई जा रही है कि यह सब कोंग्रेस की किसी बड़ी रणनीति का हिस्सा है [जिसे मैं नहीं मानती] .

वैसे लोगों को अब शांत रहकर थोड़े दिन ‘’तमाशा ‘’ देखना चाहिये क्योंकि उन्हें क्या चाहिये वे शायद जानते ही नहीं क्योंकि जब केजरीवाल  अनशन के लिए बैठे सरकार ने सुना नहीं तब सलाह दी कि बिना राजनीति में कूदे  यह लड़ाई जारी नहीं रख  सकते [उन में मैं भी एक थी मैंने भी तब यह पोस्ट लिखी थी ]और ये ही जनता थी जो कहने लगी कि चुनाव लड़ो ..उन सब ने कैसे न कैसे मिलकर लोगों  से सहायता  और अपने बल बूते पर चुनाव लड़ा ..सभी  ये सब एक तमाशे की तरह देख रहे थे ..शीला जी 15 साल से दिल्ली में राज कर रही थीं  वे भी शायद पूरी तरह आश्वस्त थीं कि ये कल के बच्चे कहाँ उनके क्षेत्र में प्रवेश कर पायेंगे. सभी बड़ी पार्टियों ने 'आप’ पार्टी को हलके में ही लिया और जब नतीजे सामने आये तो लोग हैरान रह गए.

बीजेपी को जो सीटें मिलीं उसमें  मोदी जी के प्रभाव का ही हाथ है वरना उन्हें ये भी न मिली होतीं क्योंकि उनके कार्यकर्ता आम आदमी के पास जाते नहीं हैं [सुना है उनका काम प्रभावी  भी नहीं था] और उसी पुराने तरीके से चुनाव लड़ने की रणनीति अपनाये हुए हैं .मेरे विचार में उन्हें अगर लोकसभा में जीतना है तो जनता के बीच जाएँ उन्हें अपने विश्वास में लें .बीजेपी के पास एक से एक अच्छे वक्ता है जो दिल्ली की जनता का दिल जीत सकते हैं जैसे सुषमा स्वराज जी !बी जे पी को यह  भी ध्यान रखना चाहिये कि उनके चाहने वाले ही कहीं सोशल मीडिया के आवश्यकता से अधिक और गलत इस्तेमाल से उन्हें नुक्सान न पहुँचा दें! इसके लिए भी कोई मोनिटरिंग होनी चाहिये जो पब्लिक की मानसिकता को समझते हुए उतना ही शोर मचाये जितना ज़रूरी है. अधिकतर लोग [आप पार्टी के समर्थक में से कई] शायद मेरी ही तरह चाहते हैं कि श्री नरेंद्र मोदी जी को इस बार प्रधानमंत्री बनना चाहिये और इसके लिए बी जे पी को लोकसभा के लिए उत्तर प्रदेश ,दिल्ली और बिहार में अपनी खास जगह बनानी होगी और सभी सदस्यों को मन मुटाव भुला कर एक साथ मोदी जी के नेतृत्व को स्वीकार करते हुए पार्टी के लिए काम  करना होगा ताकि स्पष्ट बहुमत लेकर राज करें न कि त्रिशंकु रहकर !

कांग्रेस एक पुरानी पार्टी है जिसे इस बार हार ज़रूर मिली है लेकिन उस में एक से एक दिग्गज और अनुभवी नेता हैं जो जानते हैं कि साम –दंड, भेद कब क्या प्रयोग में लाया जाए सत्ता को पाने के लिए .और यह समर्थन भी उसी रणनीति का एक हिस्सा है. दिल्ली की बात करें तो उनके चीफ अरविन्दर सिंह लवली एक अच्छे वक्ता हैं और इस बार उन्हें कांग्रेस ने बहुत सही चुना है ,हाल ही में टी वी पर उनके संयत और प्रभावी जवाबों को सुनकर लगा कि कोंग्रेस की वापसी दिल्ली में अगर होगी तो उसमें  लवली सिंह का योगदान महत्वपूर्ण रहेगा. आज की स्थिति देखकर लगता है कि दिल्ली में 6 महीने से पहले ही अगर  दुबारा चुनाव हुए तो उसमें कोंग्रेस को फायदा होगा [जानती हूँ कि मेरा यह कहना आम धारणा के विपरीत है, मगर मेरा यही आकलन है]


ब वापस आप ‘ पार्टी पर आयें और उनके पक्ष को समझे तो यह ज़रूर है कि उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस से उनका कोई गठबंधन नहीं है बस बाहरी समर्थन  है.
अगर वे पार्टी नहीं बनाते तो तब भी ये ही लोग उन पर दोष मढ़ते कि ‘’आप’’ ने  डर कर मैदान छोड़ दिया और दिल्ली की जनता को दोबारा चुनाव झेलने का कारण भी सभी पार्टियाँ मिलकर आप’’ को बना देतीं! अब जब बाहर से समर्थन लिया तब भी लोग शांत नहीं हैं .
आखिर ये ‘दोषारोपण करते रहने वाले लोग चाहते क्या हैं ?शायद कुछ नहीं सिर्फ सामने वाले को लट्टू बना कर घुमाते रहना चाहते हैं !`[मेरे विचार में अगर ये  दिल्ली में दोबारा चुनाव होने देते तो बहुत से समर्थक जो इस प्रकरण के बाद आप' से अलग हो गए हैं वे जुड़े रहते ...इस पूरे प्रकरण में फिलहाल ''आप'' का नुक्सान ही दिख रहा है जब तक ये अगले कुछ हफ़्तों में कुछ साबित कर के नहीं दिखाते.]

हाँ ,अन्ना का स्टेंड इस विषय पर मुझे कुछ समझ नहीं आया. उन्होंने  ‘नो कमेंट्स’ क्यों कहा ?यह पार्टी तो आप के आन्दोलन से निकली पार्टी है .एक शुभकामना तो बनती ही थी.

मेरे विचार में ‘आप’ पार्टी अपनी मेहनत से  धाराओं के विपरीत बहते हुए यहाँ तक पहुँची है ,उन्हें उनका काम करने के लिए सभी को पूरा सहयोग ,समय  और अवसर देना चाहिये. ‘आप ‘ पार्टी को किसी को भी अब बिना अधिक सफाई देते हुए अपने काम पर लग जाना चाहिये. आप अच्छा काम  करेंगे तब भी लोग तैयार बैठे हैं मीन -मेख निकालने के लिए और नहीं करेंगे तो भी लोग पहले से ही हंगामा करने  को तैयार बैठे मिलेंगे. इसी कुव्यवस्था में आप एक बड़ी लड़ाई लड़कर यहाँ तक पहुंचे हैं तो आगे बढ़कर अपनी जिम्मेदारी निभाते चलें .यहाँ मैं आप को नरेन्द्र मोदी जी का उदाहरण  देना चाहूंगी जिस तरह उन्होंने ‘अपने विरोधियों ,प्लेग , भूकंप’ आदि तूफानों में  से गुज़र कर अपनी गुजरात रूपी नैय्या को पार लगाया है उसी तरह अगर ‘आप’ भी ईमानदार है तो अपनी छवि और साफ़ करने के लिए कुछ कर के दिखाना होगा. आज जो गुजरात जा कर आता है तारीफें करता रहता है ‘आप ‘से उम्मीदें करते हैं कि वह भी दिल्ली को ऐसा ही सुन्दर रहने लायक सुरक्षित शहर बना कर दिखाएँ! जिस जिद्द को लेकर चले थे ‘’आप’’ उसे बनाए रखिये ..जनता ‘आप’ के साथ हैं.
श्री अरविन्द केजरीवाल ,मनीष सिसोदिया और कुमार विश्वास सहित ‘आप’ पार्टी के सभी सदस्यों को शुभकामनाएँ और बधाई!
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November 2, 2013

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ

PIcture by Alpana-


'ज्योति मुखरित हो,हर घर के आँगन में,

कोई भी कोना ,ना रजनी का डेरा हो,
खिल जाएँ व्यथित मन,आशा का बसेरा हो,
करें विजय तिमिर पर ,अपने मन के बल से,
दीपों की दीप्ती यह संदेसा लाई है,
करें मिल कर स्वागत,दीवाली आई है.' 


“आप सभी को दीपावली  के इस पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ”
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October 14, 2013

मुक्त - उन्मुक्त

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छाया : सुनो माया, तुम्हारे पंख कहाँ हैं?
माया :पंख तो जब उतारे तभी से न जाने कहीं खो गए हैं।

छाया : तो अब क्या करोगी?
माया : नए पंख बना रही हूँ।

छाया : कब तक बन जायेंगे?
माया : मालूम नहीं।

छाया : तब तक ?
माया : तब तक धरती पर हूँ यहीं रहूंगी।

छाया : माया, तुम्हारे हाथ इतने ठंडे कैसे? तुम्हारा जिस्म भी ठंडा? सारी उष्णता कहाँ है?
माया : उष्णता सब भावों में समेट दी है।

छाया : भाव कहाँ हैं?
माया : ये देखो इस डिब्बे में हैं।

छाया : अरे, इस में तो सब दम तोड़ देंगे।
माया : नहीं, देखो मैंने कुछ सुराख बनाये हैं ...  सांस लेते रहेंगे।

छाया : तुम इनका क्या करोगी?
माया : जब पंख बन जायेंगे तब इनसे रंग भरुंगी।

छाया : जब तक ये पूरे होंगे, तुम उड़ना भूल जाओगी माया तब तक।
माया : पता नहीं, लेकिन आखिरी सांस तक प्रयास रहेगा कि पंखों को पा सकूँ, चाहे उड़ना संभव हो या नहीं।

छाया : ये कैसी चाहत है माया?
माया : बिलकुल वैसी ही जैसी चातक को बरखा की पहली बूंदों की होती है।


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September 14, 2013

हिंदी दिवस और हिंदी

१४ सितम्बर ' हिंदी दिवस वर्ष बिता  कर लौट आया है.
'हिंदी दिवस की शुभकामनाएँ '
भारत में ८५० भाषाएँ हैं लेकिन जिस भाषा को हम देश की जीवन रेखा कहते हैं ,राष्ट्र को एकता में बाँधने वाला कहते हैं ,उसे एक दिन का सम्मान मिलता है फिर अंग्रेजी के मानस पुत्रों द्वारा होता है  वही रोज़ का अपमान ,इस में संदेह नहीं कि अपने ही देश में पराई होती जा रही है।
अंग्रेजी  भाषा को केवल ५ % भारतीय समझ  पाते हैं उसे ही सबसे अधिक मान हिंदी की कीमत पर  दिया जा रहा है.
कहने को राजभाषा है ,परन्तु राजकाज में इसे कितना अपनाया  गया ?मंत्रालयों में ही नहीं ,अन्य  कुछ क्षेत्रों में भी देखें तो जैसे कि  शेयर मार्किट,सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक और बीमा   कम्पनियाँ आदि । हिंदी का प्रयोग न के बराबर ही पाएँगे मानो वहाँ सभी अँगरेज़ हैं !हम अंग्रेजी के विरोधी नहीं हैं,यह चाहते हैं कि इन स्थानों पर अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी काम हो।

भारत सरकार के कानून के अनुसार हिन्दी में वेबसाइट बनाना और उसे समय-समय पर अंग्रेजी वेबसाइट के साथ अद्यतन करना कानूनन अनिवार्य है परकई राज्यों की वेबसाइट मात्र अंग्रेजी में हैं  उनकी अपनी क्षेत्रीय भाषा में भी नहीं हैं हिंदी तो दूर की बात है।
ये राज्य अपनी वेबसाइट पर जानकारी अंग्रेजी में ही बता  कर गर्व का अनुभव कर रहे हैं।
कौन सुध लेगा?
आप हिंदी भाषी राज्य की ही बात करें तो उत्तर प्रदेश की साईट देखें ,यह साईट अंग्रेजी में ही खुलती है ,मैंने उन्हें २  महीने पहले इस विषय में लिखा था तब यहाँ हिंदी का टेब  भी नहीं  था ,अब हिंदी पेज है लेकिन अधूरा !आप 'प्राकृतिक संपदा 'पर ही चटका लगायें तो जिस पेज  पर पहुंचेंगे वह अंग्रेजी का होगा।

आशा है हिंदी पेज पर पूरी जानकारी कम से कम हिंदी भाषी राज्य तो अपनी  वेबसाइट पर दें!
मध्य प्रदेश सरकार की सराहना करनी चाहिये जहाँ साईट का पता डालते ही हिंदी में साईट खुलती है.
केरल की पर्यटन साईट भी हिंदी ,अंग्रेजी दोनों में है.
भाषा प्रेम का एक अच्छा उदाहरण एमिरात   से ही लीजिये जो कि  भारत की तुलना में एक छोटा देश है यहाँ बाज़ार में मिलने वाला सभी सामान चाहे वह  आयातित  हो या घरेलू ,हर वस्तु  पर अंग्रेजी /या जिस देश  से उत्पाद आया है वहाँ  की भाषा के साथ अरबिक में भी उत्पाद की पूरी जानकारी उसकी पैकिंग पर  होती है. मगर हमारे भारत देश में मिलने वाले सामान /मॉल/वास्तु पर क्षेत्रीय या हिंदी भाषा में जानकारी का होना अनिवार्य नहीं है ,अधिकतर उत्पादों पर अंग्रेजी में जानकारी छपी होती है। ग्राहक  उत्पाद की जानकारी कैसे जाने? ढेरों सरकारी  रूपये खर्च कर ग्राहक जागो का अभियान चलाती है मगर इस पक्ष पर सरकार ने आँखें मूंद रखी हैं.
हम चाहते हैं कि  सरकार जल्दी ही कोई कड़ा कानून बनाए ताकि हर कम्पनी अपने  उत्पाद की जानकारी उसकी पैकिंग पर  राजभाषा हिंदी  में या क्षेत्रीय भाषा में जानकारी  दे और ९५% ग्राहकों के अधिकारों का हनन न हो. मोती लाल गुप्ता जी ने एक मुहीम इसी विषय पर चलाई हुई है परन्तु सरकार की तरफ से अभी तक कोई सकारात्मक कार्यवाही नहीं  हुई.
ऐसे कई हिंदी  प्रेमी हैं जो इस भाषा की सेवा में जी जान से लगे हुए हैं ,इसे प्रयाप्त सम्मान मिले ऐसे प्रयास कर रहे हैं । इनमें कई  उल्लेखनीय नाम हैं जैसे मोती लाल गुप्ता , मुम्बई के प्रवीण कुमार  जैन और  मोहन गुप्ता जी। और कई नाम होंगे मगर मेरी जानकारी में नहीं हैं ,आप जानते हों तो अवश्य ही हमें भी बताएँ। 
प्रवीण जैन जी ने हाल ही में अपने प्रयासों से एक बड़ी सफलता हासिल की - 'अब पसूका  वेबसाइट की सभी सेवाओं में हिन्दी को प्राथमिकता मिलेगी '… जिसे आप उनके ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं।

सच यही है कि हिंदी को  उसका पूरा मान दिलाने का प्रयास सभी देशवासियों   को मिलकर करना है।

September 5, 2013

शिक्षक दिवस पर दो बातें


भारत में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी आज के दिन ‘शिक्षक दिवस’ मनाया जा रहा है। यहाँ एमिरात में अधिकतर विद्यालय ८ सितम्बर से खुलेंगे इसलिए इस औपचारिकता तो उसी हफ्ते किसी दिन पूरा किया जाएगा। दो मास का ग्रीष्म अवकाश समाप्त होने में मात्र दो दिन रह गए हैं।

शिक्षकों को मान-सम्मान के साथ धन्यवाद देने का यह दिवस कुछ कार्यक्रमों और भाषणों के साथ संपन्न कर दिया जाता है।सभी भाषण आदर्श बातें कहते हैं, उनका अर्थ समझे जाने या ग्रहण किये बिना  बस ‘कह’ दिया जाता है,उसके बाद वही दिनचर्या वही छात्रों का शिक्षकों के प्रति और छात्रों का शिक्षकों  के प्रति व्यवहार रहता है ।

क्या शिक्षक  छात्रों के मन में इस दिवस विशेष के बाद/के कारण  अधिक सम्मान अर्जित कर पाते हैं?
शायद नहीं क्योंकि हमारी शिक्षा व्यस्वथा ही ऐसी है कि बच्चों को एक निर्धारित पाठ्यक्रम को बस पढ़ाया जाता है और छात्रों के लिए रिपोर्ट कार्ड में अच्छे ग्रेड हासिल करना शिक्षकों और अभिभावकों का मुख्य लक्ष्य रहता है। उन्हें पढ़ने नहीं दिया जाता ! स्वयं सीखने पर बल नहीं दिया जाता।

एमिरात शिक्षा बोर्ड के विभिन्न देशों के स्कूलों के एक अध्ययन में यह बताया गया था कि भारतीय अध्यापक बोलते अधिक हैं, पढ़ाते समय छात्रों को बोलने का अवसर नहीं दिया जाता! [यह  रिपोर्ट स्थानीय अखबारों में प्रकाशित हुई थी] और मुझे सबसे पहले यह खबर देने वाला पाँचवीं कक्षा का मेरा एक विद्यार्थी था।

हम शिक्षकों को यह  याद  रखना होगा कि स्कूली जीवन उम्र का ऐसा दौर होता है जिसमें छात्र हर पल कुछ न कुछ सीखता और ग्रहण करता रहता है यह अवस्था बहुत ही संवेदनशील और गीली मिट्टी की तरह होती है जिसे कुम्हार कोई भी रूप दे सकता है। अपने आसपास के वातावरण से ,अपने घर से अपने सहपाठियों से और फिर अपने अध्यापकों से सीखता है।सिखाने से अधिक उसके सीखने  पर बल देना होगा।

शिक्षक दिवस पर खानापूर्ति  के आयोजन के अतिरिक्त  हमें शिक्षा के वर्तमान स्वरूप,शिक्षा-शिक्षकों के  गिरते  स्तर पर भी बात करनी चाहिए।उन समस्याओं पर भी  विचार करना चाहिए जिनसे छात्रों और शिक्षकों के बीच दूरी उत्पन्न हो गयी है। दोनों पक्षों के बारे में कुछ बातें मैं  यहाँ कहना चाहती हूँ।

बहुत से शिक्षक  पुस्तकों से बाहर आना नहीं चाहते कक्षा में पुस्तकीय ज्ञान देकर समझ लेते हैं कि उनका कार्य समाप्त हुआ जबकि ऐसा नहीं है ।घर के बाद बच्चा  सब से अधिक समय विद्यालय में ही रहता है ,ये आठ घंटे उसके जीवन के बहुमूल्य घंटे होते हैं। इस कारण भी एक विद्यालय और उसके शिक्षकों का उसके भविष्य  की नींव बनाने में बड़ा हाथ होता है।मुझे दुःख होता है जब मैं किसी को कहते सुनती हूँ कि मुझे अपना स्कूल याद नहीं करना या मुझे स्कूल पसंद नहीं है। स्कूल की छवि बच्चे के दिल में उसके संपर्क में आए उसके शिक्षकों से बनती है। कहीं न कहीं इस के लिए हमारी शिक्षा व्यस्वथा भी  दोषी है जो पुस्तक में सिमट गयी है,सी बी एस सी ने सतत सिखने की प्रक्रिया के तहत नए कार्यक्रम और पद्धतियाँ लागू की परंतु वे इस बात को अनदेखा कर रहे हैं  कि भारतीय मानसिकता पहले  अंकों में सिमटी थी और अब ग्रेडिंग या सी  जी पी ऐ  में अटकी गई  है ,बच्चे के सर्वांगीण विकास की  यह नई योजना अब भी सही मायनो में कहीं सफल होती दिखती नहीं है ।जिसके कारणों हेतु बहस के लिए यह एक अहम विषय हो सकता है।

छात्रों में अनुशासनहीनता की बातें आम हो गयी हैं जिसके कई कारण हैं मुख्य कारण उसके आसपास का वातावरण है।ऐसे घटनाएँ देखी गयी हैं जिनमें छात्र अपने शिक्षक के प्रति हिंसक हो जाते हैं ।

उनके मन में शिक्षकों के प्रति सम्मान की कमी होना भी कहीं न कहीं शिक्षकों को भी दोषी बताता है।ऐसे शिक्षक जो स्वयं अनुशासनहीन हैं ,जो  अहंकार, ईर्ष्‍या , द्वेष और पक्षपात का प्रदर्शन करते हैं जिन्होंने इसे व्यापार  बना डाला है ,जो विद्यालयों में  काम सिर्फ इसलिए करते हैं कि उन्हें अधिक से अधिक ट्यूशन मिले ,जो अभिभावकों पर दवाब डालते हैं कि उन्हीं के पास उनके बच्चों को ट्यूशन के लिए भेजा जाए तो उन्हें कौन मान देगा? आज के विद्यार्थियों में अगर संस्कारों की कमी  हैं तो उनका परिवेश ही नहीं उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षक भी कहीं न कहीं दोषी माने जाते हैं। ऐसी घटनाएँ सुनने में आती हैं ऐसे शिक्षक भी हैं जो अपने छात्रों का शारीरिक तथा मानसिक शोषण करना  अपना अधिकार समझते हैं।कितने लोग स्वीकारते हैं कि शिक्षा छात्रों का मौलिक अधिकार है,व्यापार नहीं!
कहना होगा कि वर्तमान हालात बहुत अच्छे नहीं हैं लेकिन आज भी इस पद को गरिमापूर्ण और सम्मानीय माना जाता है।

मैं स्वयं को सौभाग्यशाली समझती हूँ कि मुझे स्कूल से कॉलेज  तक अच्छे शिक्षक मिले।
कक्षा चार की मेरी अध्यापिका श्रीमती गुरुचरण कौर जी से मैं विशेष प्रभावित  हुई थी और उन्हें देख कर मैंने भी शिक्षक बनने का सोच लिया था।मेरा भी प्रयास है कि मैं भी उन्हीं की तरह सफल अध्यापक बनूँ और अपने छात्रों को हमेशा याद रहूँ।

शिक्षक दिवस पर सभी शिक्षकों को बधाई और शुभकामनाएँ!

गत वर्ष मिला  कार्ड 

August 29, 2013

कान्हा के नाम.....


कल कृष्ण जन्माष्टमी खूब धूमधाम से मनाई गई।  कान्हा के नाम कुछ हायकू मैंने लिखे हैं ,जिन्हें मैं यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ --- 

 कन्हा के नाम --हायकू 




-कृष्ण-लीला 

बाँवरा  कान्हा 

करे अठखेलियाँ 

बलिहारी मैं.


२-भक्ति 

कृष्णमय हो 

भवसागर तरना 

जीवन तप 

३-पाती   

पाती राधा की  

कान्हा के नाम मिली 

गोपियाँ जले 


४-दही-हांडी 

टोलियाँ सजी 

तोड़ने को   मटकी 

हर्षाये जन 

५-मुक्ति-मार्ग 

हरी का नाम 

जप सुबह-शाम 

मिलेगी मुक्ति .

६-वंशी 

कान्हा  की प्यारी 

अधरों से छूटे ना  

राधा की सौत 


७-पुकार 

रो रहा नभ 

कराह रही धरती 

कृष्ण आ जाओ !


……………अल्पना …… 


August 13, 2013

क्या बदला है अब तक? क्या बदलेगा आगे?

इस साल २०१३ का स्वतंत्रता दिवस आने ही वाला है ,हर वर्ष की भांति वही औपचारिकताएँ दोहराई जाएँगी।
भारत व भारत के बाहर भारतीय समुदायों में झंडा फहराया जाएगा,भाषण दिए जाएँगे ,मार्च पास्ट ,तरह -तरह के आयोजन एवं प्रतियोगिताएँ आदि होंगी।
समारोह समाप्त होने के बाद देशभक्ति की भावना अवकाश की प्रसन्नता में घुल जाएगी ।
हम फिर से वही हो जाएँगे जो देशगान और झंडे फहराए जाने से पहले तक थे अर्थात वही तटस्थ नागरिक जो स्वयं में मग्न है ,जो अपने आसपास होने वाली हर घटना से उदासीन है।
अन्याय कहीं हो रहा है तो होने दो।।हमारे साथ तो नहीं हो रहा न! यह सोच वाला एक आम नागरिक।

मैं इस नागरिक को दोष नहीं दूँगी क्योंकि इसे ऐसा परिस्थितियों ने बनाया है।

वह कहीं हो रहे हर एक अन्याय को रोक नहीं सकता क्योंकि उसके पास कई कारण हैं -

  • ·        उसके हाथ बंधे हैं
  • ·        उसे अपने मौलिक अधिकारों का ज्ञान नहीं है
  • ·        वह कमज़ोर है [आर्थिक/सामाजिक/शारीरिक किसी भी स्थिति से]
  • ·        वह डरता है कुशासन से ।
  • ·        वह जानता है कि अगर वह यहाँ हस्तक्षेप करेगा तो उसका खुद का या उसके सगे सम्बन्धियों का जीवन भी दांव पर लग सकता है।
  • ·        वह चिल्ला नहीं सकता क्योंकि उसे न्याय व्यवस्था पर पूर्ण विश्वास नहीं है।
  • ·        वह शंका में है कि शिकायत करे तो किस से ?
  • ·        उसकी आँखों पर ऐसी पट्टी है जो उस ने खुद ही बाँधी है ,जिसके द्वारा वह कुछ भी ऐसा देखना नहीं चाहता जो उसे किसी कठिनाई में डाल दे।
  • ·        वह बचता -बचाता चलता है जब तक स्वयं  कुव्यवस्था की किसी दुर्घटना का शिकार न हो जाए !
  • आदि,आदि 

अब प्रश्न यह है कि एक आम नागरिक में देश के प्रति प्रेम क्यों नहीं है? किसने उसे ऐसा उदासीन बनाया?
शायद उसके ऐसा बनने की दोषी  बहुत हद तक यहाँ की व्यवस्था  भी है जो आज भी गुलामी वाली मानसिकता का शिकार है !
आज भी गोरी चमड़ी वाले विदेशी के आगे नतमस्तक हो जाने की मानसिकता,उन्हें ही उच्चकोटि का उच्चवर्ग का  मानने की मानसिकता ! बिना सोचे -समझे उनके हर अच्छे-बुरे आचरण  का अनुकरण / अनुसरण  करने की मानसिकता। स्वयं  को उनसे हीन समझने की मानसिकता

स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी हम में बदला क्या है ?जो भी परिवर्तन हुआ है उस में अधिकतर ऐसे नकारात्मक बदलाव भी हैं जो समय रहते न चेते तो देश और देश की संस्कृति को गहरे रसातल में ले जा सकते  हैं !
मेरी नज़र में कुछ परिवर्तन ऐसे  हुए हैं,जो चिंताजनक तो हैं ही भविष्य में अवश्य ही देश को नुकसान पहुँचायेंगे-
 
साभार-गूगल 
पहला ,हम अपनी भाषा को तुच्छ मानने लगे हैं ,आप झुठलायें  मगर यह सच है कि अंगेजी बोलने वाले को सम्मान और अपनी भाषा में ही सिर्फ बात करने वाले को नीची नज़र से देखा जाने लगा है।
अन्य विदेशी भाषा सीखना /आना अच्छी बात है मगर उसे अपनी भाषा की जगह दे देना ,भविष्य के लिए बिलकुल अच्छा नहीं है।
अंग्रेज़ी बोलना स्टेट्स सिम्बल बन गया है।
एक उदाहरण खुद का देखा हुआ--अक्सर घरों में बच्चों से कहते सुना होगा कि  बेटे एपल ले लो, बेटे ग्रेप्स खा लो!
अंग्रेज़ी के प्रति मोह इतना है कि हमने  नूडल्स,पास्ता या पिज्ज़ा के नाम नहीं बदले बल्कि अपने व्यंजनों के हिंदी के नाम अंग्रेज़ी में बदल दिए ।।पानी-पूरी को वाटर बाल्स' कहने लगे! 
हिंदी बोलने वाले अब हिंगलिश बोलने लगे हैं !
 फिल्मों का भी भाषा के प्रसार में बड़ा हाथ है,अब की फ़िल्में हिंगलिश को बढ़ावा दे रही हैं।

हमने  विदेशी कंपनियों का सामान देश में बेचना -खरीदना शुरू कर तो दिया लेकिन उन्हें उनके सामान पर जानकारी हिंदी या क्षेत्रीय भाषा में देना अनिवार्य नहीं किया ।
क्यों?जबकि यह बहुत ही महत्वपूर्ण है कि उत्पाद की जानकारी उसके लेबल पर हिंदी या  क्षेत्रीय भारतीय भाषा में भी हो। क्या यहाँ सभी अंग्रेज़ी जानते हैं ?
हमारी सरकारी तंत्र ही कभी अपनी भाषा को लेकर गंभीर हुआ ही नहीं तो विदेशी कंपनियां भी क्यूँ रूचि लें?

यूँ ही नहीं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी ने वर्षों पूर्व अपनी कविता मातृभाषा में कहा है  कि 'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।'

दूसरा बड़ा परिवर्तन है पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण! हम अपनी समृद्ध भारतीय संस्कृति को भूल रहे हैं जो आने वाले कल के लिए घातक साबित होगी।

बड़ों के साथ व्यवहार ,उनके सामने उठने -बैठने ,बोलने की तमीज-तहजीब,कपड़े पहनने का तरीका  सब पश्चिमी तौर तरीकों के अनुसार किया जाने लगा है।

मदिरापान यानि लिकर का प्रयोग जहाँ भारतीय संस्कृति में वर्जित था इसे असुरों का पेय बताया जाता था वहीँ अब नयी युवा पीढ़ी को आप इसके सेवन का आदी देखें तो आश्चर्य नहीं होगा! क्या लड़के ,क्या लड़कियाँ ।।अब इसे फैशन और स्टेटस सिम्बल बताते हैं।
भारत आगे आने वाले १० सालों में युवाओं का देश  होगा क्योंकि उस समय यहाँ सबसे अधिक युवा होंगे लेकिन अगर ये युवा इस तरह पश्चिमी तौर तरीकों का ,उनकी संस्कृति का अंधानुकरण करेंगे तो क्या यह देश को आगे ले जाने में सक्षम होंगे?
 
चित्र गूगल से 
युवाओं में नशे की आदत को बढ़ाने के लिए मैं न केवल उनके अभिभावकों जो उन्हें खुल कर पैसा देते हैं,उनकी गतिविधियों पर नज़र और नियंत्रण नहीं रखते बल्कि फिल्मों  को भी दोष दूँगी जिन्होंने पीना -पिलाना इतना ग्लेमरस बना दिया है कि युवा इसे फैशन या स्टेटस सिम्बल मानने लगे हैं।१९५० की एक फिल्म के गाने का दृश्य देखा था जिस में पार्टी चल रही है और सभी के हाथों में चाय का कप था ।और फ़िल्में जिन्हें समाज का दर्पण भी कहा जाता है ।आज की फ़िल्में देख लिजीए । चाहे हीरो हो या हेरोइन नशा करते ,नशे में झूमते -गाते दिखाई दे जाते हैं !
मुझे जहाँ तक याद है कि [शायद] फ़िल्मी परदे पर सबसे पहले 'साहब ,बीवी और गुलाम' में परदे पर मीना कुमारी के किरदार ने बहुत परेशान हो कर जब पीना शुरू किया तो सभी के दिल में किरदार के प्रति सहानुभूति जाग गयी थी।
उसके बाद फिल्मों में  पीना-पिलाना सिर्फ निराशा और हताशा की स्थिति में ही दिखाया जाता था लेकिन   आधुनिकता के नाम पर अब तो फिल्म में हीरो- हीरोईन खुशी में ,रोमांच के लिए पीते हैं । हेरोईन गाती है 'मैं टल्ली हो गयी!'। भाषा में अभद्र शब्दावली की बात क्या  करें अश्लील गाने गाना वाला आज ७० लाख रूपये प्रति गाना ले रहा है । क्योंकि उसकी माँग है वही पसंद बन गयी है मगर क्यों? क्या यह एक संकेत नहीं कि युवाओं की मानसिकता में क्या बदलाव आया है?
पाश्चात्य जीवन शैली जो आत्मकेंद्रित मानी जाती है उसे अपना कर अपनों से दूर रहने में सुख का अनुभव करते हैं। ऐसे में आपसी सहयोग, एकता ,प्रेम का महत्व ये कितना समझ पाते हैं?
कहाँ ले जा रहे हैं हम अपनी इस युवा पीढ़ी को ? हम इन से क्या नैतिकता की बातें कर सकते हैं?

[यह चित्र फेसबुक से लिया गया है.इस पर लिखा शेर किसका है मालूम नहीं ]

तीसरा जो परिवर्तन है वह राजनीति में है -राजनैतिक नैतिकता का ह्रास होना ,राजनैतिक चरित्र में गिरावट का आना ।जिसके चलते इतने वर्षों बाद भी हर नागरिक को खाना,पानी,आवास,शिक्षा  जैसी मूलभूत सुविधाएँ भी प्राप्त नहीं हैं
उन नेताओं की सोच इसका कारण है जो सिर्फ कुर्सी पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार है।जिन्होने कृषि प्रधान देश को कुर्सी प्रधान देश  बना डाला ! आम जनता को बेवकूफ बनाने के लिए राज्यों  को /लोगों को भी बाँट रहे हैं। उनके लिए उनकी स्वार्थपूर्ति पहले हैं देश नहीं ।
एक समय था जब इस देश में श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने नारा दिया था।।'जय जवान,जय किसान ' क्योंकि वे इन दोनों का महत्व जानते थे।
लेकिन आज न किसान को महत्व दिया जा रहा है बल्कि वह तो गंवार अनपढ़ और 'परे हट' वाली श्रेणी में रखा जाने लगा  है ! और जवान!।। उसके लिए तो बिहार एक मंत्री यह कहते सुनायी दिए कि वे तो जाते ही मरने के लिए हैं ! अफ़सोस होता है ऐसी सोच पर! इसी तरह की सोच के व्यवहार का एक उदाहरण देखें 'किसे क्या मिला?' इन चित्रों में -
कमांडो के लिए साधारण बस [ताज पर हुए आतंकी हमले पर जीत के बाद ]
खिलाडियों के लिए डिलक्स बस मेच जीतने के बाद 

आज क्रिकेट के खिलाडियों और फ़िल्मी कलाकारों को जिस स्तर पर  सम्मान  /आर्थिक सहायता /पुरस्कार दिए जाते हैं क्या वैसे ही कभी सैनिकों या किसानो के लिए दिए गए?
हम कहते हैं उन्हें आप ये सभी सम्मान नहीं देते परंतु  कम से कम मान तो दें!

मेरे विचार में हमारे देश में यही दो सबसे अधिक उपेक्षा के शिकार हैं जो भविष्य के लिए हितकारी नहीं है।

आने वाले कल की युवा पीढ़ी जो सब कुछ इंस्टेंट चाहती है ,जो आराम पसंद है वह जब ऐसे वातावरण में बढ़ी होगी तो क्या कल सेना  में या खेतों में काम करना पसंद  करेगी?

कौन अन्न पैदा करेगा और कौन देश की जल/थल/वायु सीमा की रक्षा करेगा ? और तो और ,इन सेवाओं  में लोग नहीं भरती होंगे तो स्वयं इन नेताओं को सुरक्षा घेरा देने वाले नहीं होंगे!

रोज़गार के अवसर और सुरक्षित  वातावरण जब तक देश में नहीं होगा तब तक देश से प्रतिभाओं का पलायन भी होता रहेगा। देश से प्रतिभाओं के पलायन व्यवस्था में दोष के कारण ही है।
सब जानते  हैं कि राजनैतिक चरित्र गिरता है तो राष्ट्र पर सीधा असर पड़ता है।
ईश्वर की कृपा है इस देश  पर कि अभी भी कुछ अच्छे लोग राजनीति  में हैं जिनके कारण हम भविष्य के लिए आशा बनाए रख सकते हैं।
लिखने को कहने  को बहुत कुछ है लेकिन आज के लिए बस इतना ही!

जिस तरह की घटनाएँ बनती दिखाई दे रही हैं उनके चलते एक विचार आता है  कि  स्वतंत्रता दिवस हर वर्ष मनाना है तो हर नागरिक को देश के प्रति प्रेम की भावना जगाए रखना होगा और अपनी आँखें भी खुली रखनी होगी ताकि किसी भी  रूप में आ कर कोई' अपना या पराया  हमारी यह आज़ादी न छीन  ले!
 १५ अगस्त -स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!