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August 24, 2012

कुछ बातें बस ऐसे ही...



ईद में सजा शोपिंग मॉल 
रामादान  गया..ईद आई और अब वह भी गई..धीरे-धीरे छुट्टियाँ खतम होने को आई हैं. दिन तो यूँ ही  गुज़रते  जाते हैं कभी आहिस्ता -आहिस्ता और कभी तेज़ी से.

ब्लॉग एक डायरी है , एक खुली डायरी जिस पर लिखा हर कोई पढ़ सकता है .


आप को समझने के लिए आप के ब्लॉग की कुछ पोस्ट्स ही काफी होती हैं [ऐसा मैं ने सुना है]
फेसबुक पर भी कुछ ऐसा ही है ,वहाँ आप कुछ अधिक मुक्त हो कर अपनी सब बातें ,अपना  रूटीन बाँटने लगते हैं ,कभी -कभी तो लगता है जैसे  खुद को ही बाँट रहे हों ,अजीब सी कोफ़्त होने लगती है .
खैर,मुझे भी वहाँ उलझन सी होने लगी  थी तो कुछ दिनों से मैंने वहाँ अपना अकाउंट बंद कर दिया है.अब दोबारा वहाँ जाने की इच्छा भी नहीं है.जिन्होंने मुझे मित्र लिस्ट में जोड़ा हुआ था उन से क्षमा मांगती हूँ कि बिना सूचना  दिए मैं वहाँ से चली आई.

हम सोचते हैं कि शायद हमारे विचार सिर्फ हम और सामने वाला  परिचित ही पढ़ रहा है  लेकिन कोई तीसरा अजनबी भी हमेशा होता है जो आप को आप के विचारों /कविताओं /लेखों में पढ़ रहा होता है...आप के मनोविज्ञान को समझ कर आप की कमज़ोरी को ढूँढ  रहा होता है.आप की कमज़ोरी  को जानकर वह आप के द्वारा अपना मकसद साधने  का प्रयास भी करता है.

'वह ' कोई भी हो सकता है कोई महिला  और कोई पुरुष भी ! अकल्पनीय अनजाना किसी बुरे स्वप्न सा !

आप कहेंगे यह कोई नयी बात नहीं है , जानती हूँ ये बातें भी इन पुराने उपकरणों की तरह ही हैं जो यहाँ एक प्रदर्शनी में रखे दिखे थे.
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अंतर्जाल की दुनिया बाहरी दुनिया से कम नहीं है यहाँ भी ऐसे अनुभव मिल जाते हैं जो बड़ी सीख दे जाते हैं .
वे अनुभव हमारे साथ हुई घटनाओं से मिले हों यह ज़रुरी नहीं बल्कि दूसरों के साथ हुई बातों से भी हम सीखते ही हैं .
खैर, सिखने-सिखाने का यह  सिलसिला जारी रहेगा .अंतर्जाल से हमें पूर्ण मुक्ति कहाँ मिल सकती है.


पिछले दिनों कुछ फ़िल्में देखीं . गेंग्स ऑफ वासेपुर २- की तारीफ़ सुनी तो इस इत्मीनान से देखने गई कि एमिरात में खूब सेंसर हो कर ही दिखाई जा रही होगी तो हिंसा वाले सीन और गालियाँ काट दी गई होंगी.
उसके बाद भी मुझे फिल्म के खून -खराबे वाले दो सीन बहुत खराब  लगे जिन्हें देख कर मन खराब हुआ.
बेशक फिल्म का निर्देशन /कलाकरों का अभिनय जबरदस्त है .संगीत भी हट कर है.

मालूम नहीं अब फिल्म वाले क्या नया ट्रेंड चला रहे हैं ,पोस्टर में भी  खून करना  ऐसे दिखाया जा रहा है,जैसे बहुत बड़ा तीर मार लिया है हीरो ने! 

इस तरह की फ़िल्में युवकों  गलत सोच को बढ़ावा दे रही हैं ,क्या यह फिल्म बनने वाले और सेंसर बोर्ड को समझ नहीं आता है ?
फिल्मों से सिगरेट हटी तो  शराब पीना -पिलाना और बन्दूक चलाना/हत्याएँ करना /मारधाड़ ऐसे ग्लेमरस बना कर दिखाया जाता है जैसे वही आज स्टेटस सिम्बल हैं.

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उस के बाद दूसरी फिल्म देखी 'एक था टाईगर '.ऐसा लगता है जैसे पूरी फिल्म में पकड़म -पकडाई का खेल चल रहा हो.एक प्रेम गाथा दिखाने का प्रयास था सफल भी हुआ. अच्छा टाईम पास है. कई देश देखने को मिल गए.
पाकिस्तान में फिल्म को बैन  किया हुआ है ,जबकि थियेटर में  देखने वालों में पाकिस्तानी भी खूब आये हुए थे.अब बैन लगाने वालों को  समझना चाहिए कि  बैन लगने से लोगों की जिज्ञासा  और बढ़ जाती  है कि इस में ऐसा क्या है ?
ऐसे बैन लगने से तो  फिल्म को प्रचार ही मिलता है और फायदा भी.
अधिकतर नयी फ़िल्में अपनी जगह मनोरंजन हेतु टाइम पास जैसी हो सकती हैं परंतु पुरानी क्लासिक फिल्मों की बात ही और है !
पुष्पक /एक रुका हुआ फैसला /चारुलता [बंगाली]और चौदहवीं  का चाँद फ़िल्में देखीं ..सभी बहुत ही अच्छी लगीं. कोई मुकाबला  नहीं !
>>>>>>>>>>..................फिर मिलते हैं जल्द :) नयी पोस्ट के साथ ............................<<<<<<<<<<<<

22 comments:

DrZakir Ali Rajnish said...

अल्‍पना जी, कभी कभी कुछ बातें ऐसे ही कहने को जी चाहता है। और यकीनन यह सब भी दिल को बहुत अच्‍छा लगता है।

ईद की हार्दिक शुभकामनाएं।

............
डायन का तिलिस्‍म!

सतीश सक्सेना said...

आपके विचार अच्छे लगे अल्पना जी ...फेसबुक के बारे में सावधान रहना है !शुभकामनायें !

संतोष त्रिवेदी said...

छुट्टियाँ खतम होने की तकलीफ हमसे बेहतर कौन जानता है !

...फेसबुक और ब्लॉगिंग दोनों से सावधान रहो |

प्रवीण पाण्डेय said...

रोचक विवरण..

रंजना [रंजू भाटिया] said...

हम्म मैंने देखा अल्पना तुम अब फेसबुक पर नहीं हो ..अच्छे बुरे लोग हर जगह है .बस समझ से चलने की जरूरत महसूस होती है ...आक की फ़िल्में न जाने के सोच कर बनायी जा रही है ...इतनी सारी जल्दबाजी हर चीज और नए नए ज़िन्दगी जीने के आयाम से अक्सर न जाने मुझे क्यों भ्रम हो जाता है की हर इंसान जैसे वक़्त से पहले किसी काम को बस निपटा देने वाली हालत मैं है ..सकून शब्द अब ज़िन्दगी के शब्दकोश से गायब है :)फिर चाहे वह ब्लॉग हो ..फेसबुक हो ..या आज की फ़िल्में :)

वाणी गीत said...

तरस आता है उन लोगो पर जिन्हें सुनने के लिए कोई एक भी अपना उनके पास नहीं है , बिना किसी उद्देश्य के उनको हर बात फेसबुक और ब्लॉग पर शेयर करनी पड़ती है .
भाग लेना समस्या का हल नहीं लगता , वास्तविक जीवन में तो समस्याएं सर पर ही खड़ी होती है , अंतरजाल पर कम से कम नेट बंद करने पर थोड़ी देर तो समाप्त हो जाती है !

सदा said...

आपकी प्रस्‍तुति रोचकता लिए हुए शुरू से लेकर अंत तक ...

G.N.SHAW said...

पहली बार पर बढ़िया लगा..जिज्ञासा बढ़ी है ...

दिगम्बर नासवा said...

अमीरात में गर्मियों की छुट्टियाँ बिताना अपने आप में एक प्रोजेक्ट हो जाता है ... बस मॉल ही रह जाती हैं और ये पिक्चरें ....
गेंग ऑफ वासेपुर तो नहीं देखि .. इच्छा भी नहीं हुयी ... टाइगर को जरूर देखा ... ठीक ठाक टाइम पास है ...
ईद की बधाई आपको ...

Dr (Miss) Sharad Singh said...

रोचक विचार...आमने-सामने बैठ कर बातें करने जैसा सुखद लगा.....

Shashi said...

liked it , it is so true . I also closed my account on face book . the post is beautifully written .

जयकृष्ण राय तुषार said...

बहुत अच्छी पोस्ट |

दिलबाग विर्क said...

आपकी पोस्ट कल 23/8/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें

चर्चा - 980 :चर्चाकार-दिलबाग विर्क

sm said...

nice post

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (25-08-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

ताऊ रामपुरिया said...

ब्लागिंग का यही सदुपयोग है, फ़िल्में आजकल जो बन रही है उनका सटीक वर्णन किया है आपने. शुभकामनाएं.

रामराम

वन्दना अवस्थी दुबे said...

ठीक कह रही हैं अल्पना जी. फेसबुक गंभीर चिंतन की जगह ही नहीं है.

प्रेम सरोवर said...

अच्छी प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है।

सुशील said...

"अंतर्जाल की दुनिया बाहरी दुनिया से कम नहीं है यहाँ भी ऐसे अनुभव मिल जाते हैं जो बड़ी सीख दे जाते हैं .
वे अनुभव हमारे साथ हुई घटनाओं से मिले हों यह ज़रुरी नहीं बल्कि दूसरों के साथ हुई बातों से भी हम सीखते......

बाहरी दुनिया सरल है ज्यादा
यहाँ किस का क्या है इरादा
कहाँ समझ में है आता
छ्द्म ज्यादा है देख पाता
बाहर वो सामने आ कर है बताता
यहाँ मुँह छुपा कर कह ले जाता
क्या मंशा है किसकी सामने वाला
कहाँ कभी है ये समझ पाता !!

Arvind Mishra said...

आपका मन भी न :-( .....फोटुए आज के युग में देखते हुए काल विपर्यय (anachronism ) का अजीब अहसास सा देती हैं ...और गृह विरही(नोस्टालजिक ) तो बनाती ही हैं ......
कहीं से अकाउंट बंद कर देना /डिलीट कर देना कम से कम उस समस्या का समाधान तो कतई नहीं है जो आपने गिनाये हैं --यह खुद से मुंह मोड़ने की बात है ,अपने आप से भागने की बात है -हाँ अकाउंट डिलीट करने के अन्य बहुत से स्वीकार्य और उपयुक्त कारण हो सकते हैं -समय की कमी आदि -मगर मैं यह सब कह ही क्यों रहा हूँ ? और सर्वोपरि तो यह कि अपना निर्णय अपनी फ्रीडम सबसे बड़ी बात है -सो एंजाय ईर फ्रीडम मैंम !
खुद का खुद से भय सबसे खतरनाक भयों में है बस उससे बचियेगा -आमीन ..आज वाराणसी से अवमुक्त हो गया तो मैं बहुत विषणण मूड में हूँ -कितनी यादगार बातें यहाँ से जुडी हैं ....मेरी यह टिप्पणी भी इसी के प्रभाव में है !
आमीन!

Arvind Mishra said...

और हाँ ,एक था टाईगर पर आपके कमेंट्स से सहमत हूँ!

काजल कुमार Kajal Kumar said...

फ़ेसबुक का अकाउंट बन्‍द ! ओह.
तरह तरह के व्‍यंजन पास होने पर भी ज़रूरी तो नहीं कि‍ सभी खाए ही जाएं. रखा जा सकता था अकाउंट /:-)