August 5, 2012

वो पहली मुलाकात!

वो पहली मुलाकात




रे ....ऐसे भाव क्यों?..शीर्षक पढ़कर चौंकिये मत!

यहाँ कोई रूमानी कहानी नहीं है .:)

अपने साथ हुई  एक घटना बताती हूँ ...कुछ सालों पहले की है .

किसी सरकारी दफ्तर में जाने और  काम के लिए खड़े होने का यह मेरा पहला अनुभव  था.

मुझे  दिल्ली शहर में अपनी शादी के कोर्ट सर्टिफिकेट  को   तीस हज़ारी कोर्ट की 'जज महोदया  से अटेस्ट करवाना था .
[ज्ञात हो कि वे एक देश विशेष  के  दूतावास द्वारा मनोनीत जज थीं ,दूतावास को वीसा जारी करने के लिए शादी के प्रमाण पत्र पर उन्हीं के दस्तखत चाहिए  थे]

इस के लिए मुझे  २० दिन   चक्कर काटने पड़े सिर्फ इसलिए कि मैंने घूस देने से मना कर दिया था,सीधे रस्ते काम करवाना चाहती थी.

घर से बस टर्मिनल तक पहले रिक्शे में जाना और फिर  तीस हज़ारी तक  अकेले ही रोज़ बस से जाना -आना !लगभग एक घंटा लगता था बस में ,इसलिए जहाँ से बन कर चलती है वहाँ  से बैठो तो सीट तो मिल जाती है कम से कम !

वहाँ जज  के दफ्तर के बाहर इंतज़ार करते रहना .आश्चर्य भी होता कि ऐसा क्या ये रोज़ व्यस्त रहती  हैं  कि इन्हें बाहर बैठे लोगों की फ़िक्र नहीं है?लेकिन हिम्मत रखी .

उनके दफ्तर के क्लर्क ने एक दिन पूछा, ''आप के हसबैंड नहीं आते आप के साथ?''

मैं ने कहा , वो तो  बाहर रहते हैं ..वही जाने के लिए वीसा बनवाने कि प्रक्रिया का एक हिस्सा है यह .

तब उस लड़के ने कहा  कि 'घर में और कोई ‘मेल मैम्बर’[पुरुष सदस्य ] नहीं है आप के ?'

मैं ने आश्चर्य से पूछा,'' आप ऐसा सवाल क्यूँ कर रहे हैं ?क्या यहाँ एक लेडी अकेले आ कर अपना काम  नहीं करवा सकती?


कलर्क ने सफाई दी ,'' मैं ने इसलिए कहा कि 'आदमी लोग जानते हैं कि यहाँ  काम कैसे होता है!
उनसे आप बात कर के पूछ लो.

उसकी यह बात बड़ी अजीब सी  लगी.तब उस की बात समझ में आई नहीं थी .उस पर थोडा जिद्दी भी थी कि  मैं अपने आप काम करवा लूंगी.


कोर्ट की दीवारों पर बड़ा -बड़ा लिखा था [अब भी  होगा शायद] कि' 'दलालों से सावधान, .रिश्वत न दें.'


कोर्ट जैसी जगह मुझे रोज़ आते-जाते देख कुछ ’स्थाई घूमते रहने वाले ३-४  लोग’ मुझे प्रश्न भरी निगाहों से देखने लगे कि एक दिन एक  आदमी ने बड़ी विनम्रता से  पूछा आप १० दिन से रोज़ आ रही हैं ,कोई केस फंसा हुआ है क्या??

मैं ने उन्हें अपना काम बताया .

तो उस ने कहा ,’’मैडम जी ये तो दस मिंट का काम है ,आप नाहक धक्के खा रही हैं.लाईये कागज़ ..इतने पैसे लगेंगे ,आप दे दो ,अभी साईन करवा कर दे दूँगा.!



उस ने तर्क-कुतर्क दे कर पूरी कोशिश कि मुझे कन्विंस करने की. लेकिन मैं उन दिनों क्रांतिकारी  विचारों वाली  नवयुवती थी सो मैं ने घूस देने से इनकार कर दिया.
और तो और उसे दीवारों पर लिखी चेतावनी दिखाई कि अगर ऐसे ही यहाँ काम होगा तो ये सब क्यूँ लिखते हैं आप लोग?
धमकी भी दी...कि मैं अखबार में इस बात की शिकायत लिखूंगी! [उन दिनों कंप्यूटर का ज़माना नहीं था ]

कहीं..मुझे थोडा यकीन  जज के 'महोदया' होने पर था कि शायद एक स्त्री हैं समझेंगी कि एक स्त्री रोज़ उनके दफ्तर में आ कर इंतज़ार कर रही है .[.यह तो बाद में अनुभव हुआ कि दफ्तरों आदि सब जगह अक्सर पुरुष कर्मचारी ही स्त्रियों की   अधिक मदद करते हैं  और महिला कर्मचारी  पुरुषों की !]

खैर! वे देख भी रही थीं न ..जब भी दफ्तर में दाखिल होती थीं और निकलती पता नहीं कहीं पीछे के रस्ते से थीं[??][ऐसा बताया जाता था मुझे.]
९ से १२ के समय में आती ही कभी १० कभी ११ और १२ बजे कह दिया जाता कि मैडम जी ऑफिस से चली गयीं.

उन्होंने बाहर बैठे लोगों की कभी सुध ली नहीं इसलिए भी मुझे लगता है कि उन्हें  घूस में से कमीशन मिलता होगा .

बीस  दिन से रोज़ आने वाली मैं ...मेरी परेशानी को  देख आखिरकार उस दफ्तर के एक युवक  क्लर्क को एक दिन दया आ गयी.

उसने कहा कि अपनी जान-पहचान का बता कर जज साहिबा से कागज़ पर साईन ले लूँगा,आप कागज़ दें.[उसके अनुसार इस रस्ते के अलावा सीधे रस्ते तो  मेरा वहाँ काम नहीं होने वाला था  ]

उस ने यह भी जोड़ा कि मेडम जी ,यहाँ तो काम तभी होता है जब  तो आप पैसे खिलाईये या आप की सिफारिश /जान-पहचान हो ]...ये ‘जो बाहर घूम रहे हैं इनकी रोज़ी इसी ['रिश्वत]से चलती है.

उस ने कागज़ पर साईन ले कर मुझे दिया तब  मैंने उसकी 'उदारता' पर उसे 'चाय-पानी के लिए टिप १०० रूपये पकडाए.
इस तरह  काम पूरा हुआ मगर मेरा समय कितना खराब हुआ और हर बार आने -जाने का किराया अलग !
मानसिक परेशानी हुई सो अलग.बस एक काम अच्छा यह भी  हुआ कि अपना एक हाफ स्वेटर बनाना शुरू किया .बस से  आने - जाने में वो पूरा हो गया !


सोचती हूँ ,यह तो तब हाल था जब मेरे कागज़ ताज़ा बने हुए थे और हर तरह् से सही थे.जिनके कागजों में थोड़ी भी कमी हो उसे तो ये दौड़ा –दौड़ा  कर बेहाल कर दें.

उस समय मेरे पास ‘समय’ था और किराए के पैसे की चिंता नहीं थी..थोडा जिद्दी थी इसलिए मैं अपने ‘सिद्धांतों पर  कायम रह सकी.  लेकिन जिस के पास दोनों में से एक की भी दिक्कत हो तो वो एक ही बार में भला त्रस्त न क्यूँ हो जाए कि जाने दो.....दे दो घूस और काम करवा के छुट्टी करो! 

‘सिद्धांत-विद्धांत गए एक तरफ!'

हम से से बहुत से लोग न चाहते हुए भी घूस देने को मजबूर हो जाते हैं .

Well..यह थी मेरी पहली मुलाकात ‘भ्रष्टाचार के एक  दानव ‘से ! 

यह तो बस एक किस्सा है.सभी के जीवन में ऐसे किस्से बहुत होंगे ..कभी न कभी तो किसी न किसी के भ्रष्ट आचरण से पाला पड़ा ही होगा या फिर पड़ता ही रहता होगा.जहाँ हम निरीह हो जाते हैं ,लाचार हो जाते हैं इस दानव  के आगे घुटने टेकने पर विवश भी.

आप के मन में सवाल होगा कि क्या मुझे  कभी जीवन में घूस नहीं देनी पड़ी ??
इसका जवाब अगली बार ,अगले अनुभव के साथ ! तब तक के लिए विदा!

'Just relax and listen song !


चलते-चलते :-
एक गीत 'दिल का दिया जला के गया' ...स्वर-- अल्पना



Cover Version
फिल्म- आकाशदीप,संगीतकार -चित्रगुप्त   और   गीतकार - मजरूह सुल्तानपुरी
मूल गायिका -लता मंगेशकर,फिल्म में अभिनय-निम्मी
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19 comments:

अनूप शुक्ल said...

क्या शानदार मुलाकात हुई है आपकी! मजा आ गया। :)

’दिल का दिया जला के गया’ सुनकर बहुत अच्छा लगा।

संतोष त्रिवेदी said...

यही सब बातें हैं जिनसे हर भारतीय रोज़ दो-चार होता है.जिनके पास समय नहीं है,वे पैसे देकर काम करवाते हैं और जिनके पास पैसे नहीं हैं वे धक्के खाते हैं.
....मगर चिंता मत करिए,यह व्यवस्था केवल आम आदमी के लिए है :-)

रंजना [रंजू भाटिया] said...

:) पैसों के बिना भी कोई काम हो सकता है यह सोचना बहुत मुश्किल लगता है ....बहुत कोशिश रहती है की न दो ..पर आम आदमी कितने धक्के खाए ...और हाँ हाफ स्वेटर पूरा होने की बधाई :)

mukti said...

मैं भी वीसा के लिए अपनी सहेली के मैरिज सर्टिफिकेट पर मुहर लगवाने के लिए पटियाला हाउस कोर्ट तक दौड़ी हूँ. पर मैंने एक एजेंट से ही काम करवाया था. इसीलिये दो दिन ही जाना पड़ा. बिना कमीशन दिए, तो मैं काम करवाने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी क्योंकि मुझे ऐसे ही बताया गया था कि फलां नोटरी के पास चली जाओ, वो काम करवा देंगे. जो भी पैसे-वैसे देने थे, वो सहेली को देने थे.
भ्रष्टाचार से सीधा सामना तो नहीं हुआ, लेकिन अकेली लड़की को यूँ वकीलों के चैम्बरों में भटकते देख लोग घूर बहुत रहे थे, क्योंकि वहाँ दूर-दूर तक कोई औरत नहीं दिख रही थी. पर ऐसी जगहों पर जाने में आत्मविश्वास और ज्यादा बढ़ जाता है.

Arvind Mishra said...

मैं उन दिनों क्रांतिकारी विचारों वाली नवयुवती थी -आज भी हैं!
मुझे पूरा यकीन है कि उन्हें भी शायद घूस में से कमीशन मिलता होगा- न्यायालय का अपमान :-)

तब तक के लिए विदा! -लम्बी विदाई/जुदाई नहीं चलेगी ....

अल्पना वर्मा said...

@अरविन्द जी,
नहीं ,यह न्यायलय का अपमान नहीं है यह उन महोदया के प्रति मेरी व्यक्तिगत राय है जो उनके प्रति बनी ..कुछ हिंट तो वहाँ मुझे सलाह देने वालों ने दे ही दिया था.
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क्रांतिकारी...:)..हाँ, हूँ तो लेकिन सीमित ही...बहती हवा के साथ चलना थोडा सीख लिया है.
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लंबी विदाई..नहीं अभी थोड़े दिन और गर्मी की छुट्टियाँ बाकि हैं!एकाध पोस्ट लिखी जा सकेगी..

प्रवीण पाण्डेय said...

अपने ही लोगों के लिये कितना कष्ट उत्पन्न कर दिया है इस धन-लोलुपता ने...काश सब सीधी तरह से होने लगे।

devendra gautam said...

इसे रिश्वत नहीं सुविधा राशि कहते हैं अल्पना जी ! यह संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था का अभिन्न अंग बन चुका है. दुनिया के हर हिस्से में पाया जाता है जहां यह व्यवस्था है. पैमाने में फर्क हो सकता है प्रवृति में नहीं. बिलकुल लाइलाज मर्ज़....कोई नई व्यवस्था आने पर ही इसमें बदलाव संभव है.

आशा जोगळेकर said...

दुख होता है यह देख देख कर कि बिना घूस दिये कोई काम हो ही नही सकता होता भी नही । आपक अगले अनुभव के प्रतीक्षा में ।

Mukesh Kumar Sinha said...

ye chhote mote ghus ab bhrastachar ke hisse se bahar ho chuke hain...!!
hai na....

वन्दना अवस्थी दुबे said...

इस तरह का कोई भी काम बिना घूस दिए हमारे देश में बड़ा मुश्किल है. रिश्वत लेने की लत तो जैसे इन लोगों की नसों में दौड़ रही है. बिना रिश्वत के काम करवाने में जितना समय और श्रम लगता है, ज़रूरी नहीं की उस वक्त vo हो. लिहाजा जल्दी के चक्कर में रिश्वत देनी पड़ती है. रिश्वत ख़त्म हो, इसके लिए तो सबसे पहले रिश्वत देने वालों को एकजुट होना पड़ेगा :)

प्रेम सरोवर said...

बहुत ही सुंदर प्रस्तुति । मेरे पोस्ट पर आपका हार्दिक अभिनंदन है। धन्यवाद ।

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बढिया, पूरी तरह सहमत हूं
सच बयां करती पोस्ट

बहुत बढिया

दिगम्बर नासवा said...

सिटिज़न चार्टर इस दिशा में छोटी सी शुरुआत है ... पता नहीं कितनी कामयाब होगी अपने देश में ... पर जैसा की आपने किया ... क्रान्ति से तो जरूर संभव है ये सब ...

डॉ .अनुराग said...

कोर्ट में आपको सही काम समय पर करने के लिए पैसे देने पड़ते है .मैंने खुद दिए है सब लोग देते है दिक्कत यही है अल्पना जी भ्रष्टाचार न लेफ्ट विंग का होता है न राईट विंग का फिर भी लोग अन्ना की साइड लेने से पहले विंग ढूंढते थे .अब देखिये न सब खुश हो गए. मायावती.मुलायम भी

Dr (Miss) Sharad Singh said...

यथार्थ के धरातल पर रची गयी एक सार्थक प्रस्तुति ...

मनोज कुमार said...

रोचक वृत्तांत।

भावना said...

घूस ,रिश्वत ,सुविधा शुल्क या "वजन" माँगते वक्त ऐसे लोगों को न तो शर्म आती है और न ही देते वक्क्त....इश्वर इस दीमक से देश की नयी पौध को बचा ले यही प्राथना है.आपका ब्लॉग पढ़ कर अच्छा लगा.

Sriprakash Dimri said...

सुविधा शुल्क एक आम बात हो गयी है ...भ्रस्टाचार के चरम पर पहुंचे देश की एक आम बीमारी ..यथार्थ परक आलेख ...