स्वदेश वापसी /दुबई से दिल्ली-'वन्दे भारत मिशन' Repatriation Flight from UAE to India

'वन्दे भारत मिशन' के तहत  स्वदेश  वापसी   Covid 19 के कारण असामान्य परिस्थितियाँ/दुबई से दिल्ली-Evacuation Flight Air India मई ,...

March 22, 2012

जब मैं 'मैं' नहीं 'हम' होता है...


इसी नतीजे पे पहुँचते हैं सभी आखिर में,
  हासिल ए सैर ए जहाँ कुछ नहीं हैरानी है . ---------------------------------
जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने
----------------------------------
शाम होते ही खुली सड़कों की याद आती है
सोचता रोज़ हूं मैं घर से नहीं निकलूंगा
-------------------------------------
सबका अहवाल वही है जो हमारा है आज
ये अलग बात है शिकवा किया तन्हा हमने
---शहरयार----

इन पंक्तियों के लिखने वाले मशहूर शायर शहरयार साहब थे. इन शेरों को पढ़ कर उनकी   छवि एक संवेदनशील शायर के रूप में दिमाग में बन जाती है और इन्हीं पंक्तियों के लिखने वाले के बारे में जब कोई ऐसा बयान आता है जो इस छवि के विपरीत हो..जैसा कि उनकी पत्नी ने उनके मरणोपरांत दिया था. कोई भी यकीन नहीं कर पाता .

यह भी काफी हद तक सच है कि एक स्त्री जो कई साल अपने पति के साथ रही है वह उस के मरने के बाद उसके लिए गलत नहीं बोल सकती.



बहुत सी आलोचनाएं हुई /बहस हुईं........क्या किसी ने सोचा कि यह सब दोषारोपण अगर सच है तो फिर ऐसा कारण क्या रहा जो उन्होंने ऐसा कथित बर्ताव अपने घरवालों के साथ किया जो उनकी 'संवेदनशील शायर 'की पहचान से मेल नहीं खाता है.


Picture by Steven Wilson
मनोविज्ञान में व्यक्तित्व /पहचान से सम्बन्धित एक रोग Dissociative identity disorder बताया गया है जिसे हम कहते हैं ये आम भाषा में कहें तो क्या इस तरह का दोहरा व्यवहार ये सोच स्प्लिट पर्सनेलिटी की वजह से है?
देखा जाए तो हम में से बहुत से लोग ऐसे हैं जिनका दोहरा व्यक्तिव है मगर कोई इस बात को स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि हम खुद नहीं जानते कि किस हद तक हम इस की छाया में आ चुके हैं.


खासकर कला और साहित्य के क्षेत्र  से जुड़े लोग या बेहद संवेदनशील लोग इस रोग के शिकार  आसानी से हो सकते हैं.
विस्तार में इस रोग के बारे में फिर कभी लिखूंगी लेकिन फिलहाल यही सोचती हूँ कि हम में से बहुत से लोग ऐसे हैं जो जाने -अनजाने समान्तर दो अलग -अलग ज़िंदगियाँ जीते चले जाते हैं ,वह भी अक्सर विपरीत स्वाभाव वाली ज़िंदगियाँ!
जब तक कोई बड़ी समस्या नहीं आती हमें खुद  मालूम नहीं चलता कि हम कहाँ और कैसे चल रहे हैं? या दोहरा व्यक्तित्व रखते हैं और मैं 'मैं' के साथ नहीं 'हम ' बन कर जीता है एक ही शरीर में !

26 comments:

  1. अद्भुत है यह बिमारी, और सही भी है बिमार स्वयं नहीं जान सकता कि वह उसका शिकार है। उच्च बौद्धिक स्तर के लोगों में अगर यह आम है तो लोग प्रायः स्वभाव का सनकीपन मानकर किनारा करते है। और वह स्वयं लोगो को हीन मानकर दूर होता चला जाता है।

    ReplyDelete
  2. एक दम सही कहा....
    सिर्फ लेखन ही नहीं तकरीबन हर इंसान एक ,दो नहीं कई पहचान लिए चलता है....
    जो बिलकुल जुदा होतीं है एक दूसरे से..

    उत्तम लेखन..

    ReplyDelete
  3. बढ़िया प्रस्तुति |
    नव वर्ष मंगलमय हो ||

    ReplyDelete
  4. Alpana ji,apne ek bahut hi gambhir par am samasya ko bahut sahajta se prastut kiya hai....

    Hemant Kumar

    ReplyDelete
  5. उनकी पत्नी काफी पढ़ी लिखी थीं, और उन्होंने एक साक्षात्कार में यह भी कहा कि शायद शहरयार साहब के ऊपर किसी ने कुछ करा दिया था.
    इस से भी उनकी हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है.
    वैसे प्रतिभा का होना और व्यक्तिगत हालातों में कोई साम्य नहीं है. प्रतिभा एक अलग चीज है और व्यक्तिगत रिश्ते निहायत अलग.

    ReplyDelete
  6. ..नहीं जानता कि शहरयार साब के बारे में ,उनके जीवन के बारे में उनकी पत्नी ने क्या कहा था,पर इतना ज़रूर मानता हूँ कि कवि,शेयर या लेखक जो लिखता है,सोचता है,वैसा ही उसे होना भी चाहिए.

    हमारी जिंदगी दोहरे-रूपों में होती है कई बार लेकिन मूल सिद्धांत एकदम उलट-पलट नहीं होने चाहिए !

    ReplyDelete
  7. मैं खुद क्या कहूं जो ऐसी ही किसी किसी हालात में मुब्तिला हूँ :)
    शहरयार ने अपनी पत्नी मन -निकासी कर दी थी ....फिर कभी पास नहीं गए !
    रहिमन कड़वे मुखन को चहियत यही सजाय !

    ReplyDelete
  8. घर में खाते डांट नित, भीगी बिल्ली जान ।

    बेगम के सम्मुख गई, बुद्धि भूल पहचान ।

    बुद्धि भूल पहचान, मंच पर अकड़ दिखाते ।

    दोहरा जीवन मान, भले इल्जाम लगाते ।

    रविकर बाहर मस्त, अगर थोडा मुस्काते ।

    हो दुनिया को कष्ट, डांट क्यूँ घर में खाते ।।

    ReplyDelete
  9. रविकर बाहर मस्त, अगर थोडा मुस्काते ।
    हो दुनिया को कष्ट, डांट ना बाहर खाते ।।

    ReplyDelete
  10. सचमुश ऐसा ही होता है अल्पना जी. सुन्दर ग़ज़ल पढवाने के लिये आभार.

    ReplyDelete
  11. आ0 अल्पना जी
    आप का प्रयास सराहनीय है मगर एक बात कहनी है

    " कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
    कभी ज़मीं तो कभी आसमाँ नहीं मिलता "---

    यह शे’र जनाब ’निदा फ़ाज़ली" साहेब का है..."शहरयार " साहब का नहीं ।
    यह बात दीगर है कि दोनो ही आला मर्तबा के शायर हैं
    सादर
    आनन्द.पाठक

    ReplyDelete



  12. बहुत हट कर लिखा है आपने
    # कला और साहित्य के क्षेत्र से जुड़े लोग या बेहद संवेदनशील लोग इस रोग के शिकार आसानी से हो सकते हैं.
    अरे बाबा रे ...!
    :)

    आदरणीया अल्पना जी
    आप कहती हैं - हम में से बहुत से लोग ऐसे हैं जिनका दोहरा व्यक्तिव है मगर कोई इस बात को स्वीकार नहीं करेगा
    Dissociative identity disorder नामक इस रोग का तो डर लग रहा है ...
    :(
    अब तो विस्तृत जानकारी वाली आपकी पोस्ट का इंतजार रहेगा ...

    ~*~नवरात्रि और नव संवत्सर की बधाइयां शुभकामनाएं !~*~
    शुभकामनाओं-मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

    ReplyDelete
  13. सहमत, बहुधा आदर्श लेखनी के बवाले हो जाता है।

    ReplyDelete
  14. संवत 2069 विक्रमी आप सब को सपरिवार शुभ एवं मंगलमय हो।

    ReplyDelete
  15. पिछले दिनों अचानक फेसबुक पर दिमाग में उठी लहर ने एक पंक्ति उधृत की थी कि- 'मै' अकेला होता है...'हम' में भी एक 'मै; होता है और वो नितांत अकेला होता है.." आज आपके ब्लॉग पर कुछ इसी अंदाज़ का लेखन पढ़ा ...
    दोहरी जिन्दगी चिपकी होती है..हर एक के तन से ..मानता हूँ मै...दिमाग इस दोहरे पन को अपनी बुद्धि अनुसार छानता है..जीवन में कितने छन जाया करते है हम..अपने मूल 'मै' को भी कही इतना घिस लेते है ..कि बेचारा महीन हो जर्जर जाता है .., आवरण पर आवरण ...

    ReplyDelete
  16. आपसी रिश्ते, आपसी व्यवहार, संवेदनशीलता और किसी भी प्रतिभा का होना ... या कला का होना ... ये सब अलग अलग बातें हैं मुझे ऐसा लगता है ... जहाँ तक इस बिमारी की बात है कई बार जाने अनजाने भी ऐसा हो सकता है ... एक व्यक्ति के दो व्यक्तित्व हो सकते हैं ... पर अगर ये किसी को नुक्सान नहीं देते तो सब जायज है ...

    ReplyDelete
  17. संवेदन शील विषय पर उतना ही संवेदनशील चिंतन...

    प्रस्तुत कलाम में कन्फ्युसन है शायद...
    इसके शायर शहरयार साहब का न होकर जनाब निदा फाजली साहब हैं... ।
    Movie: Ahista Ahista
    Year: 1981
    Singer: Bhupinder Singh
    Music: Khayyam
    Lyrics: Nida Fazli

    सादर।

    ReplyDelete
  18. हर आदमी मुखौटा लगाये घूम रहा है, शायर भी इससे अछूते तो नही ।

    ReplyDelete
  19. @आनंद पाठक जी,आप ने जिस त्रुटि की ओर ध्यान दिलाया उस के लिए धन्यवाद.
    अपेक्षित सुधार कर दिया गया है.
    पिछले दिनों अंतर्जाल से दूर थी इसलिए देर से प्रतिक्रिया दे पा रही हूँ इसके लिए क्षमा चाहती हूँ.

    ReplyDelete
  20. Achha!!...aisa bhi hai koi rog?...yun to dohra vyaktitv kafi log rakhte hain.....par ye vyakti-dar-vyakti badalta rahta hai.. Aapke vistrut lekh ki pratiksha rahegi...
    En dohre vyaktitv valon ke liye urz hai....

    Chehre pe mukhota liya, ya,... ye hi asal hai...
    Dekhi nahi khushiyan, ya koi gam dikha vahan...

    ReplyDelete
  21. सुन्दर रचना!
    नवसम्वतसर की हार्दिक शुभकामनाएँ!

    ReplyDelete
  22. यह तो सच है ....
    आभार बढ़िया पोस्ट के लिए !

    ReplyDelete
  23. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


    इंडिया दर्पण
    की ओर से शुभकामनाएँ।

    ReplyDelete
  24. is beemari ke bishay me koi jaankari nahi thee...gyanvardhak lekh..sadar badhayee aaur apni nayee post par aapke amantran ke sath...aapke gaaye geet bhee sune ..kya aap ham logon ke ghazlon ko khobsurat see dhun de sakti hain..

    ReplyDelete
  25. BILKUL SAHI BAT LIKHI APNE ....ASANTUSHTI MANAV PRAVRITTI BN CHUKI HAI ....HR JAGAH LOG DOHRA JEEVAN JEE RAHE HAIN ...AISA LAGATA HAI YH BEEMARI NAHI BALKI PRAKRITI PRADTT MANVEEY PAHCHAN BN CHUKI HAI...

    ReplyDelete

आप के विचारों का स्वागत है.
~~अल्पना