June 9, 2012

तपती दुपहरी और उम्मीद




यूँ तो हर साल ही गरमी पड़ती है इस साल कुछ नया तो नहीं है .

रोज़ मैं , मेरा बेटा और मेरी सहकर्मी हम तीनो दोपहर के ३ बजे स्कूल की बस से उतर कर करीब १० मिनट पैदल इसी धूप में जब चल  कर घर तक आते हैं ,
तो यही सोचते  हैं सालों पहले यहाँ लोग कैसे रहते होंगे ,अब तो फिर भी इतने साधन हैं .

मज़ाक में हमने एक दूसरे से कहा कि आज तो' रोस्टेड चिकन' बेचारे  के दर्द का अहसास हो रहा है!
ऐ.सी  १८ पर रखें तभी जा आकर थोड़ी  ठंडक का अहसास होता है .

विदा होने से एक दिन पहले मेरी रामप्यारी!
खासकर इन दिनों में अपनी रामप्यारी की याद आती है जिसे  उसके ९ साल पूरे होने पर ,३ साल पहले ही विदाई दे दी गयी थी .उसके बाद नयी लाने  का मार्ग अभी तक नहीं खुला.
वो होती तो इस गर्मी में एक मिनट भी  पैदल नहीं चलना पड़ता!

पडोसी देश ओमान  की सीमा को छूता है यह शहर मगर वहाँ बादल आये, थोडा -बहुत बरसे भी  परन्तु  यहाँ से तो मुंह चिढ़ा कर चले गए.


गर्मियों में जून 15 तारीख से यहाँ की सरकार  ने भी निर्माण कार्य के मजदूरों के लिए सितम्बर १५ तक के लिए दोपहर १२ ३० से ३ बजे तक के मध्य दिन  अवकाश की घोषणा कर दी  है .
गर्मी के दुष्प्रभाव से बचने के लिए विभिन्न निर्देश जारी किये गए हैं.

लेकिन इस बार स्कूलों के साथ यह रियायत क्यूँ नहीं बरती गयी अभी तक ,स्कूल ४  जुलाई तक खुलेंगे बल्कि २४ जून से तो बच्चों के टेस्ट हैं..

यहाँ के शिक्षा मंत्रालय  द्वारा  जून के महीने के लिए  स्कूलों के समय को कम  किया जाना चाहिये मगर नहीं किया  गया .बल्कि हर साल से अलग इस बार स्कूल जुलाई ४ तक खुले रखे जाने का आदेश है.

अब तो बस ....गर्मी की छुट्टियों का इंतज़ार है और बरसात का !

अब एक कविता जैसा कुछ...

उम्मीद
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उम्मीद की वादी में बरसात का मौसम हो ,
तपती सी दुपहरी में ठंडी चले पुरवाई,
और कुछ  ऐसा भी हो जाये कि ,
 मौसम ये , लेने लगे अंगडाई,
पानी में करें छप -छप , दौडें यूँ मेरे अरमान ,
 मैं अंजुरी में भर कर सब यादें बिखेरुंगी,
 हँसती हुई किलकारियां भरती हुई कुलाचें
 वो आज़ाद उड़ेंगी इस प्यार के मौसम में,
उम्मीद की वादी में ,
हर शाख पर खिलती सी तेरी हर बात जब झूलेगी,
 मैं झूला बना उनका ,
आकाश को छू लूंगी,
आकाश में बसे तेरे अहसास को छू लूंगी !

 --------------अल्पना वर्मा ---------------


15 comments:

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

मैं भी अक्सर गर्म इलाके को देखते हुए यही सोचता हूँ "सालों पहले यहाँ लोग कैसे रहते होंगे, अब तो फिर भी इतने साधन हैं ."
यूँ ही बैठा था, आप तक पहुंचा तो गर्मी का जायजा मिला.
तापमान दिखाती फोटो वाकई रेड और हॉट है. लेकिन आपकी कविता शीतल लगी.

Sidharth Joshi said...

और हम सोच रहे थे, कि थार के मरुस्‍थल में केवल हमीं गर्मी का मुकाबला कर रहे हैं... :)

manu shrivastav said...

गर्मी यहाँ भी बहुत भयानक है. ४6.४ तक तो हो ही जाता है..धुप में शरीर ढक के निकालिए. ग्लूकोज पीजिये. बरफ के गोले का आनंद लीजिये.. सर्दी में तो नहीं हीं खा पाइयेगा
मेरे ब्लॉग पे आएगा गर्मी में माहौल थोडा खुशनुमा हो जाये
तरकश

प्रवीण पाण्डेय said...

बाहर न ही निकलें, वही अच्छा है..

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सुपर रोस्टेड मामला है यह तो ..यहाँ हम ४० डिग्री में ही भुने जा रहे हैं ...पानी के सिवा कुछ नहीं सूझ रहा है :)ठीक आपकी लिखी कविता के अनुसार ..जो बेहद ठंडक का एहसास करवा रही है :)
उम्मीद की वादी में बरसात का मौसम हो ,
तपती सी दुपहरी में ठंडी चले पुरवाई,
और कुछ ऐसा भी हो जाये कि ,
मौसम ये , लेने लगे अंगडाई,
पानी में करें छप -छप , दौडें यूँ मेरे अरमान ,

अनूप शुक्ल said...

गर्मी कम होने के लिये शुभकामनायें।

रचना दीक्षित said...

मुझे तो लगता है कि मौसम से ज्यादा हम बदल गए है और गर्मी में बाहर निकलने के बारे में सोच के भी पसीना छूट जाता है. पहले तो ऐसा नहीं होता था. आराम से तमाम सहूलियतों में रहना इसका मुख्य कारण लगता है.

Devendra Gautam said...

आप रेगिस्तान की बात कर रही हैं...मैं रांची में डेढ़-दो महीने से 38 -40 डिग्री की गर्मी झेल रहा हूं. वही रांची जिसे अंग्रेजों ने बिहार की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाई थी. जहां गर्मियों की रात में भी मोटा चद्दर ओढना पड़ता था और पंखा तक चलने की ज़रुरत नहीं पड़ती थी. दिन में 38 तक भी टेम्प्रेचर जाने पर शाम होते-होते बारिश हो जाती थी. इस बार दो महीने से बारिश नहीं हो रही है. कभी-कभार बादल आते भी हैं तो अंगूठा दिखाकर फुर्र हो जाते हैं.

दिगम्बर नासवा said...

ये उम्मीद की किरण वैसे तो बनी रहनी चाहिए ... पर इस तपती धूप में बारिश की उम्मीद कम ही रखनी चाहिए ...
सच कहा है गर्मी अभी तो बढ़नी शुरू हुयी है ... जिस हिसाब से यहां भी मौसम बदल रहा है आने वाला समय कैसा होगा सोच के रोंगटे खड़े हो रहे हैं ...

Arvind Mishra said...

उम्मीदों के ग़ज़ल राहते रूह रही वरना आपकी पोस्ट ने दिल ही नहीं सारे बदन को झुलसा दिया था -उफ़!

Vaneet Nagpal said...

४६ डिग्री टेम्प्रेचर तो पंजाब के इस छोटे से शहर जलालाबाद का भी रिकार्ड हो चुका है |

टिप्स हिंदी में

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सार्थक प्रस्तुति!
वाकई बहुत गर्मी है!

अनूप शुक्ल said...

बहुत गरम मौसम है वहां! आज जबलपुर का तापमान बताया गया पैंतीस डिग्री! फ़िर भी गरम लग रहा है। वहां के हाल क्या होंगे। :)

आशा जोगळेकर said...

कई साल पहले कुवैत में रहते हुए हम भी झेल चुके हैं इस त्रासदी को ।
पर आपकी कविता बहुत सुंदर बारिश की फुहार जैसी ।

Rakesh Kumar said...

रामप्यारी को क्या हुआ अल्पना जी.
बाप रे बाप ५०-५२ डिग्री सेंटीग्रेड.

रोस्टेड एंड लोस्टड