April 25, 2012

बहुमुखी प्रतिभासंपन्न होना एक शाप ...

चित्र-गूगल से साभार.
जब आप के किसी ख़ास गुण की तारीफ़ की जाती है तो सुन कर खुश होना स्वाभाविक है.
लेकिन जब आप बहमुखी प्रतिभासंपन्न हों तो आप के गुण ,आप की काबीलियत आप के लिए मुसीबतें खड़ी कर सकती है!
ये मुसीबतें  इस हद्द तक बढ़ जाती हैं कि ऐसा गुणवान होना आप को एक शाप लगने लगता है.
मेरे विचार में किसी संस्था में नौकरी हेतु आप जब अपना सी.वी. देते हैं तो ध्यान रखिये ..सिर्फ उतना ही बताएँ जितना ज़रुरी है.अपनी हर उपलब्धि का बखान करना भविष्य में मुश्किलें खड़ी कर सकता है.

अगर आप ने ऐसा किया तो अचानक आप को ऐसा अहसास दिलाया जाने लगेगा कि आप से अधिक योग्य और कोई नहीं ..अधिक से अधिक जिम्मेदारियाँ दी जाने लगेंगी..कहते हैं ' न' कहना भी एक कला है.अगर आप हर काम के लिए 'मैं कर लूंगा' कहते हैं तो समझिये...कि यह स्थिति अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारने से अधिक कुछ नहीं होगी!

 प्रबंधक  को तो सिर्फ अपना काम करवाना है उसे आप से कोई सहानुभूति नहीं होती इस बात को आप को शुरू में समझ नहीं आएगा लेकिन जब आप का गाय के समान होना आप को भारी पड़ेगा जब न केवल मानसिक दवाब  में आ जाएँगे बल्कि शारीरिक कष्ट भी शुरू हो जायेंगे,और इस का असर आप के आस पास आप के साथ रहने वाले हर व्यक्ति पर किसी न किसी रूप में पड़ेगा.

काम की अधिकता आप को विवश करेगी कि काम को घर भी ले जाया जाए.उस स्थिति  में सोच सकते हैं कि क्या- क्या हो सकता है...

हद्द तो तब होगी..जब आप को यह आभास होगा कि यह प्रबंधक को उसकी तारीफों के पुल बाँधा  करता है महज अपने स्वार्थ की पूर्ति हेतु! उसे तो काम हुआ मिलना है जैसे- तैसे..!उस के लिए बलि का बकरा आप होंगे..क्योंकि आप  में 'प्रतिभा का भंडार 'है और आप को 'न'  कहना भी नहीं आता!

यह आभास आप को तब होगा जब आप उस के सामने अपनी बेहद जेन्युन समस्या ले कर जाईये .चाहे वह आप की उस बीमारी की हो तो आप के इस नौकरी के कारण हुई..'ऑक्युपेशनल 'है...वो आप की बात अनसुनी कर के आप से  अपनी मजबूरी का रोना रोता है और कन्विंस करने का प्रयास करता है कि आप उसकी बताई जिम्मेदारी ले लें ...तब आप बताएँ आप के मन में कैसे भाव आयेंगे??नफरत के/अफ़सोस के?
या फिर कुंठाएं जन्म लेंगी कि ऐसे प्रतिभाशाली होने से बेहतर हम मूर्ख रहते तो  बेहतर था ,इस प्रतिभा से मिला क्या सिर्फ अपने शरीर का नुक्सान और  थोडा नाम ..जो आप का बैंक बेलेंस बढ़ाता नहीं बल्कि खाली करता है .
जितना आपने कमाया उससे अधिक अपनी इन प्रतिभाओं के कारण उत्पन्न याँ बढ़ी  हुई तकलीफों के इलाज में खर्च हुआ.
चित्र-गूगल से साभार.
इच्छा होगी कि क्यूँ न हम भी इन सहकर्मियों की तारह हुए जो 'मुर्दों 'की भांति रहते हैं.सही भी है.
हर जिम्मेदारी  से बचने का सीधा तरीका है कह दें कि हमें काम नहीं आता या ऐसे कर के दीजीये कि पहली बार ही काम देने वाला तौबा कर ले .क्योंकि आप कितना भी काम करें आप के सहकर्मियों और आप को एक ही तन्खवाह भी मिलती रहेगी...अतिरिक्ति जिम्मेदारियों के कोई अतिरिक्त  पैसे भी तो मिलते नहीं!


इसलिए इस से पहले 'आप में भावों के उबलते ज्वार का एक्स्प्लोशन' हो जाए उस से पहले ही खुद को एक्स्प्लोयट' होने से बचाएँ.और भविष्य में कहीं भी अपने बारे में बताते समय सावधानी बरतें..और सब से बड़ी बात उपयुक्त अवसर पर  ' न 'कहना सीखें..आप की  चुप्पी आप के लिए घातक  सिद्ध हो सकी है!मेरा अपना अनुभव यही कहता है..कि बहुमुखी प्रतिभासंपन्न होना एक शाप  है उस से अधिक कुछ नहीं!



22 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बहुमुखी प्रति‍भा होना तो अच्‍छा है पर हां दूसरे अनुचि‍त लाभ उठाएं तो सजग रहने की बात तो है ☺

रविकर फैजाबादी said...

सही बात ।
थोड़ी प्रशंसा और व्यस्तता ।
सुन्दर प्रस्तुति ।

प्रवीण पाण्डेय said...

जैसे ही कोई बड़ाई करना प्रारम्भ करता है तो लगने लगता है कि गये काम से।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

एक न और सौ आराम ..:) सही लिखा है अल्पना सजग रहना और दुसरे के कहे की नीयत पहचनाना जरुरी है

वन्दना said...

बिल्कुल सही कहा

mark rai said...

kai baar isi karan pareshaani khadi ho jati hai....achchi rachna aur saamyik lekh...

शारदा अरोरा said...

sach kaha aapne ...offices hi nahi gharo me bhi anuchit laabh uthha kar log vaapis mud kar bhi nahi dekhte ....

शारदा अरोरा said...

sach kaha aapne ...offices hi nahi gharo me bhi anuchit laabh uthha kar log vaapis mud kar bhi nahi dekhte ....

प्रतीक माहेश्वरी said...

जी हाँ अगर इतने प्रतिभावान हैं तो "ना" बोलने की प्रतिभा भी सीख लेनी चाहिए जो कि एक मुश्किल कला है :)

BS Pabla said...

सही है

R.K.Srivastava said...

बहुत सही लिखा है. जो इस लेख के विपक्ष में कहते हैं उनके लिए मेरा यह कमेन्ट है.

हिंदी में एक कहवात है -जाके पैर न फटे बिवाई वो क्या जाने पीर परायी''
प्रतिभावान होना अच्छी बात है लेकिन जब आप की प्रतिभा का अनुचित लाभ उठाया जा रहा है..तब तो बन्दा खुद को शापित समझेगा ही और इसे शाप कहेगा ही.
दूसरे आप को एक विभाग का चार्ज सौंपा जाता है फिर दूसरे का भी क्यूँ कि आप उस विषय के भी जानकार हैं और फिर कोई छुट्टी चला जाए तो या नौकरी छोड़ जाए तो. उन विभागों का भी दायित्व एक ही व्यक्ति के कंधे पर डाल दें [बिना कोई अर्थ लाभ किसी पद उन्नति ]जबकि आप के पास भरपूर स्टाफ हो! बस यह कहते रहें कि उस के जैसा और कोई संभाल नहीं सकता,तो आप क्या कहेंगे तब?
ऐसे भाव तभी आते हैं जब आप देखते हैं कि आप से अधिक तन्खवाह वाले बिना कोई दायित्व लिए मजे में हैं और आप के सर पर कई जिम्मेदारियाँ हैं जिन्हें निभाने के लिए आप अपना व्यक्तिगत ही नहीं परिवार ,मित्रों का भी समय लगा रहे हैं अंततः परिणाम क्या ?या तो वह व्यक्ति बीमार होगा या फिर कुंठित या फिर उस संस्था से इस्तीफा दे कर मुक्ति पायेगा.
सौ बातों की एक बात -:
प्रतिभावान स्टाफ की प्रतिभाओं का सही उपयोग करना भी हर संस्था को नहीं आता .
अगर आता होता तो आज यह महोदया ऐसा लेख न लिखतीं. बॉस लोग अपना सर दर्द मिटाने के लिए 'जो करता है उसी को काम सौंपते चले जाते हैं.बिना उस की स्थिति पर कोई विचार किये.
वैसे एक बात कहूँ माफ़ी के साथ कि जो बहुमुखी प्रतिभावान होते हैं वे होते हैं 'जॅक फॉर ऑल ,मास्टर फॉर नन'क्योंकि उनकी सारी उर्जा अलग लग बँट जाती है .एक दिशा में सारी उर्जा लगाएँ तो येही लोग कहाँ से कहाँ पहुँच सकते हैं.
मुझे तो लेख में सच्चाई लगी.
[सभी बहनों से माफ़ी के साथ-वैसे भी लड़कियों के लिए अधिक प्रतिभावान होना एक सीमा तक ही ठीक है नौकरी करती हैं तो काम आएगी अन्यथा शादी के बाद उनकी प्रतिभाओं का कहाँ सदुपयोग हो पाता है.बहुत से उदहारण मेरे आस पास हैं.
NBT पर आप लिंक मिला .यह अच्छा ब्लॉग है.अच्छा लिख लेती हैं.अन्य विषयों पर भी कलम चलाईये.शुभकामनाएँ .

डॉ .अनुराग said...

वैसे प्रतिभाये छिपती नहीं है .

Deepak Shukla said...

Kahte hain gadhe hi lade jaate hain...so naukari main gadha ban ladna hai to apni kabiliyat dikhate raho...anyatha naalayak chahe koi mana jaye...par laada kabhi nahi jayega...

Kaam us se liya jaata hai...jo kar ke deta ho....jab aapke sahkarmi 5 baje haath jhaad muskurate hue chal dete hain...tab kitni koft hoti hai yah kaam karne wala hi samajh sakta hai...

Science main work done par adharit kayee rule padhe hain...

Ab suniye Deepak's Rule of Efficiency...( jo main apne 25 saal ke career main khud par hi lagu nahi kar paaya...shayad kisi ke kaam aa jaye!!!)

More Work...More Mistakes...More Criticism...= Less Efficiency...

Less Work... Less Mistakes.. Less Criticism= More Efficiency...

So....Efficiency is inversly proportional to Work done...

i.e. E = 1/W....here E is efficiency...& W is Work Done...

Regards..

अनूप शुक्ल said...

बात सही है। लेकिन यह भी सही है कि हुनर/प्रतिभा अपने प्रदर्शन के लिये कुलबुलाती रहती हैं। :)

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

ek kahavat yaad aa gayi...aa bail mujhe maar....sahi kaha hai aapne sadar badhayee ke sath,

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

ek kahavat yaad aa gayi...aa bail mujhe maar....sahi kaha hai aapne sadar badhayee ke sath,

रंजना said...

बहुत सही आकलन किया आपने...

यह केवल कार्य स्थल की ही बात कहाँ है..? घर परिवार में ही देखिये न, जो सदस्य अधिक काबिल होता है , जिम्मेदारियों का बोझ भी सबसे अधिक वही ढ़ोता है.सबकी अपेक्षाएं उसी से होती हैं और मजे की बात की सबके सुख के आगे अपने सुखों की बलि भी हमेशा वही देता है..लोग मानकर चलते हैं की इतना तो वह करेगा ही..उसकी मजबूरियां किसी के लिए कोई मायने नहीं रखतीं, बल्कि लोग इसे उसकी बहानेबाजी, उपेक्षा मानने में भी दो पल नहीं झिझकते...

और जो किसी के लिए कुछ नहीं करता, उससे किसीको कोई अपेक्षा नहीं रहती...

दिगम्बर नासवा said...

सामने वाले कों समझ के उचित जवाब देना ही अच्छा है .. स्थिति का सही आंकलन किया है आपने ...

Nimish said...

bilkul sahi kaha hai apne .ranjnaji ne bhi sahi hi kha hai ghro me bhi yahi hota hai .kabhi hm bhi apni tarif sunakar behd khush hokar apni kshmta se bhi adhik kam kiya karte the meri aik shubhchintk ?kahti thi hmesha mera paksh lekar ki "ganna agr mitha hai to log jad se hi kat dalte hai "

Arvind Mishra said...

मैंने नवभारत टाईम्स पर इस पोस्ट को पहले ही पढी है -
सहमत हूँ क्योकि आपने दुखती राग पकड़ी है ..
हम तो रोज़ रोज़ यही झेल रहे हैं ...
शाख से तोड़े गए फूल ने ये हंस के कहा अच्छा होना भी बुरी बात है
इस दुनिया में ...

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

क्या बताऊँ, इन दिनों मैं स्वयं झेल रहा हूँ. कब डिप्लोमेटिक और मतलबी बनूँगा भगवान् जाने.
शायद ये सबक भी जरुरी है.

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

"सजग रहना और दुसरे के कहे की नीयत पहचनाना जरुरी है" नफरत कुंठा और शारीरिक कष्ट के बाद अब समझ पा रहा हूँ.