May 26, 2010

बंज़र हथेलियाँ

एक नज़्म-:


बंज़र हथेलियाँ
---------------------
क रोज़ उग आये थे कुछ लम्हे
खुद ब खुद हथेलियों पर मेरी ,
चाहत की नमी ,
अहसास की गरमी ने पाला था उन्हें ,
और पलकों ने दिया था साया ,

जिस रोज़ आँख लगी मेरी ,
जागी तो ,
इस धरती को बंज़र पाया ,
ढूँढा बहुत ..मगर ,
कोई लम्हा फ़िर न मिला
मालूम हुआ है,
कि 'रेखाएँ ' ...खुदगर्ज़ हुआ करती हैं!

.............................अल्पना ...........................





एक त्रिवेणी-

सिलसिले टूट गए अलविदा कह कर ,


एक राह दो राहों में बंट गयी.

उस राह में एक आईना देखा था ' हमने '!

एक गीत 'ये शाम की तन्हाईयाँ 'यहाँ सुन सकते हैं.

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80 comments:

वन्दना अवस्थी दुबे said...

जिस रोज़ आँख लगी मेरी ,
जागी तो ,
इस धरती को बंज़र पाया ,
ढूँढा बहुत ..मगर ,
कोई लम्हा फ़िर न मिला
मालूम हुआ है,
कि 'रेखाएं ' ...खुदगर्ज़ हुआ करती हैं!
बहुत सुन्दर रचना. बधाई.

सलीम ख़ान said...

मालूम हुआ है,
कि 'रेखाएं ' ...खुदगर्ज़ हुआ करती हैं!

gr8!!

sanvedanshil rachna, saadhuwaad... adbhut !!!

सुलभ § Sulabh said...

जी 'रेखाएं' खुदगर्ज़ हुआ करती हैं!

माधव said...

nice

kunwarji's said...

वाह!

कल्पनाओं का संसार और शब्दों के प्रहार....

अद्भुत मिलन भावनाओं और शब्दों का...

कुंवर जी,

पी.सी.गोदियाल said...

जागी तो ,
इस धरती को बंज़र पाया ,
ढूँढा बहुत ..मगर ,
कोई लम्हा फ़िर न मिला
मालूम हुआ है,
कि 'रेखाएं ' ...खुदगर्ज़ हुआ करती हैं!

बेहद सुन्दर अल्फाज अल्पना जी

रश्मि प्रभा... said...

kuch kahne ko ungliyaan ghumayi hain aksharon per, lekin shabd bane nahin....khudgarz rekhaon ke nikat nihshabd si hun

रश्मि प्रभा... said...

kuch kahne ko ungliyaan ghumayi hain aksharon per, lekin shabd bane nahin....khudgarz rekhaon ke nikat nihshabd si hun

sangeeta swarup said...

इस धरती को बंज़र पाया ,
ढूँढा बहुत ..मगर ,
कोई लम्हा फ़िर न मिला
मालूम हुआ है,
कि 'रेखाएं ' ...खुदगर्ज़ हुआ करती हैं!

खूबसूरत शब्द दिए हैं....

zeal said...

Beautiful moments !
Cherish them.

दिलीप कवठेकर said...

अगर वह आईना है, तो राह एक ही है, बंटना एक दृष्टि भ्रम हे तो है.

अलविदा कहने से सिलसिले टूटना शायद ज़रूरी नहीं. कभी कभी यह अस्थाई हो सकता है.

सिलसिले टूटा नहीं करते कई संबंधों में< ऐसे जैसे केसेट पर कोई गाना सुनते हुए बंद कर देतें हैं , तो गाना रुक जाता है. कई समय बाद ( बरसों भी) जब भी लगाया, गाना वहीं से शुरु होगा.

मैं शायद ज़्यादा ही पोसिटिव्ह थिंकिंग रखता हूं!!! हा ,हा , हा!!

Arvind Mishra said...

उस राह में एक आईना देखा था ' हमने '
हमराह थे तो देखा था इक सपना हमने .....????

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बहुत अच्छी है आपकी नज्म.. और ऊपर से त्रिवेणी क्या खूब संगम है.

M VERMA said...

कि 'रेखाएं ' ...खुदगर्ज़ हुआ करती हैं!
जी हाँ रेखाएँ तो खुदगर्ज होती ही हैं पर अनुकूल रेखाओं को गढने का ज़ज्बा भी तो हो.
बहुत सुन्दर रचना और त्रिवेणी

महफूज़ अली said...

बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट...

मनोज कुमार said...

आग्रहों से दूर वास्तविक जमीन और अंतर्विरोधों के कई नमूने प्रस्तुत करता है।

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

मालूम हुआ है,
कि 'रेखाएं ' ...खुदगर्ज़ हुआ करती हैं!

बहुत बढिया रचना...अल्पना जी!
हालाँकि हमारे जैसे कविता/गजल जैसी विधा से अनभिज्ञ इन्सान के लिए शब्दों की गहराई तक पहुँचने में बुद्धि को खास मशक्कत करनी पडती है...लेकिन वो रचना ही क्या जो सोचने के लिए दिमाग को विवश न कर दे....
आभार्!

pawan dhiman said...

अहसास की गरमी ने पाला था उन्हें ,और पलकों ने दिया था साया.. awesome!

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

मालूम हुआ है,
कि 'रेखाएं ' ...खुदगर्ज़ हुआ करती हैं!

वाह ! क्या बात है ... बहुत सुन्दर रचना !

Udan Tashtari said...

ओह! बहुत सुन्दर!!


त्रिवेणी जबरदस्त रही!!

शोभना चौरे said...

ये दिल और उनकी निगाहों के साये
कुछ यही गीत अचानक जेहन में आया आपकी इस खुबसूरत नज्म को पढ़कर |
त्रिवेणी ने तो मन मोह लिया |

रचना दीक्षित said...

बेहतरीन लाजवाब और क्या कहूँ. अद्भुत शब्द कौशल और भरपूर नयापन

राकेश कौशिक said...

"बंजर हथेलियाँ"
"सिलसिले टूट गए अलविदा कह कर,
एक राह दो राहों में बंट गयी."
गहन और मार्मिक

दिगम्बर नासवा said...

वाह ... क्या बात कही है ... रेखाएँ ख़ुदग़र्ज़ होती हैं ...
सच है हथेलियाँ हर उस चीज़ को फिसला देती हैं जो हसीन होती हैं ... बहुत समय बाद आपने उच लिखा है आज ... मज़ा आ गया आपकी नज़्म पढ़ कर...

Deepak Shukla said...

Hi..

Haathon pe lamhe jo tere..
Aaj na dikhte wahan..
Har wo lamha swapn sa..
Aankhon main teri dikh raha..

Kitna hi khudgarj rekha haath ki tere rahen..
Lamhe jo hain aankhon main..
Unka ye rekha kya karen..

Sundar kavita,
aur Triveni.. Wah..

DEEPAK..

Reetika said...

Khudgarzee ka kya kahein !! adhbhut bimb !

Rajendra Swarnkar said...

"चाहत की नमी ,
अहसास की गरमी ,
और…
पलकों का साया "
बड़े नर्म नाज़ुक बिंबों ,कोमल भावों और पाक जज़्बों को समेटे हुए

एक बहुत बड़ी लघु कविता
जिसमें शब्दों को ज़्यादा मशक़्क़त नहीं करनी पड़ रही है , भाव ख़ुदबख़ुद रूह से गुफ़्तगूज़दा हैं ।

'रेखाएं ' ...खुदगर्ज़ हुआ करती हैं !
बिल्कुल सच है अल्पनाजी !
'रेखाएं ' ...खुदगर्ज़ ही हुआ करती हैं !

संवेदनाओं की नाज़ुक नसें टटोलती सुंदर भावप्रवण रचना के लिए अंतर्मन से बधाइयां !

{ और हां, आपकी त्रिवेणियों से मुझे भी प्रेरणा ले'कर कुछ नया सृजन करने की इच्छा हो रही है । 2500-3000 गीत ग़ज़ल लिख चुका मैं आज तक एक भी त्रिवेणी नहीं लिख पाया हूं । }

आपकी लेखनी की चमक में उत्तरोतर निखार आता जाए , और किसी की नज़र न लगे … यही कामना है ।
- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं

Manish said...

जिस रोज़ आँख लगी मेरी ,
जागी तो ,
इस धरती को बंज़र पाया ,
ढूँढा बहुत ..मगर ,
कोई लम्हा फ़िर न मिला
मालूम हुआ है,
कि 'रेखाएं ' ...खुदगर्ज़ हुआ करती हैं!

meri kahani kahti ye lines..

bahut din baad aaya... lekin sab kuchh vaisa hi paaya

anjana said...

बहुत अच्छी नज्म और त्रिवेणी का तो जवाब नही...

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

ये रचना इसलिये भी खास लगी,
क्योंकि इसकी कई पंक्तियां अपने आप में संपूर्ण हैं.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

रेखाएं खुदगर्ज हुआ करती है वाकई यही सच है और बहुत खूबसूरती से आपके इस भाव को पंक्ति में ढाला है ..त्रिवेणी लाजवाब है ....बहुत पसंद आई यह

mehek said...

इस धरती को बंज़र पाया ,
ढूँढा बहुत ..मगर ,
yahi tho dastur hai,sach kaha rekhayein badi khudgarj hoti hai.sunder kavita.

Mukesh Kumar Sinha said...

rekhayen khudgarj aur hatheliyan banjar......:)

badi khubsurat baat kahi aapne...:)

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर रचना और त्रिवेणी

संजय भास्कर said...

मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है
क्या गरीब अब अपनी बेटी की शादी कर पायेगा ....!
http://sanjaybhaskar.blogspot.com/2010/05/blog-post_6458.html

सुशीला पुरी said...

बहुत दिनों बाद आना हुआ और आपके वहाँ आकर आपको पढ़कर बहुत कुछ भूला याद आने लगा ,आँख नाम है ,....आभार ।

शमीम said...

बहुत सुन्दर नज़्म.

बूझो तो जानें said...

दीदी नमस्कार,
एक अलग सा भाव लिये , आपकी यह रचना बहुत सुन्दर है. बधाई....

काजल कुमार Kajal Kumar said...

अच्छा लगा यह सकारात्मक दृष्टिकोण. वास्तविकताएं कुछ भी रहें आशा की डोर बंधी ही रहनी चाहिये.

अरुणेश मिश्र said...

अल्पना जी . रचना अतिप्रशंसनीय . बधाई ।

आशीष/ ASHISH said...

Kya baat hai!

हरकीरत ' हीर' said...

शीर्षक बहुत ही उम्दा .....
नज़्म कुछ वक़्त मांगती लगी ......
त्रिवेणी भाव स्पष्ट नहीं कर रही .....समझाएं ......!!

अल्पना वर्मा said...

@हरकीरत जी कुछ यूँ व्याख्या है इस त्रिवेणी की ...
त्रिवेणी में पहली पंक्ति बताती है कि एक शब्द अलविदा 'कहने से और दो हमसफ़र जुदा हो गए [सदा के लिए]
--दूसरे में यही बात और अधिक स्पष्ट करती हैं कि एक राह थी जो अब अलग दो राहों में बँट गयी है.दोनों के रस्ते अलग हो गए.
--तीसरे में इस का कारण है...उस राह में [जब एक साथ चल रहे थे...आईना देखा था हमने.[हमने का हम दोनों से मतलब है]..अर्थात--आईना जो आप को असली चेहरा दिखता है ..ये आईना ऐसी परिस्थितियाँ हैं जिनसे दोनों को यह मालूम हुआ/अहसास हुआ कि वे एक दूसरे के लिए नहीं बने हैं.
-----------------------
शायद मैं अपना अर्थ स्पष्ट कर सकीं हूँ .
शुक्रिया .

मीत said...

बेहद खूबसूरत और दर्द से सराबोर...
बहुत अच्छी लगी...
आँखों में नमी ले आई आपकी यह नज़्म..
मीत

k.r. billore said...

alpanaji aapki rachnaye padhi bhut achi lagi man ko chu gai .eske purv bhi aapke blog par sunder bhav purnpanktiya padhi man aakhe bhig gaye aansu bankar tap se tpke ,phir aakhe sukhi man bhiga aour ham vahi khade hai .....kamana billore mumbai...

श्रद्धा जैन said...

Rekhayen khudgurz hua karti hai ..... khoob kaha hai ..

aaina bhi saath nahi chalta ..... bahut sach kaha hai raah bant hi jaati hai kitna bhi dard ho .....

singhsdm said...

जिस रोज़ आँख लगी मेरी ,
जागी तो ,
इस धरती को बंज़र पाया ,
ढूँढा बहुत ..मगर ,
कोई लम्हा फ़िर न मिला
मालूम हुआ है,
कि 'रेखाएं ' ...खुदगर्ज़ हुआ करती हैं!

बहुत ही प्यारी नज़्म....क्या अलफ़ाज़ क्या एमोसंस हैं...जितनी तारीफ़ करूं कम है....!

अमिताभ श्रीवास्तव said...

lamho ka uganaa aour unka khudgarj niklna..jeevan ki sachchaai pesh karti rachna he. jeevan ke darshan bhi kitane vistaar liye hote he ki usaki seemaa nahi..jitanaa jyada usme mashgool ho utane hi shabd nikalte he, soch banti he, vichaar prasfutit hote he.
triveni bhi bahut kuchh kajti he.
laazavaab

Parul said...

awesome alpna ji...awesome!

kavita said...

बहुत खूबसूरत नज़्म कही है अल्पना जी.
त्रिवेणी बहुत खास लगी.
दोनों में ग़म की छाया है.

Mrs. Asha Joglekar said...

जागी तो ,
इस धरती को बंज़र पाया ,
ढूँढा बहुत ..मगर ,
कोई लम्हा फ़िर न मिला
मालूम हुआ है,
कि 'रेखाएं ' ...खुदगर्ज़ हुआ करती हैं!
bahut hee alag shabdon men wyakt kee hai bichudne kee peeda aapne. abhi jahan hoon wahan computer men indic fonts nahee hain. kshama. mere kerala prawas par aapkee tippni achchee lagi. palace kee shooting kee ijajat nahee mili to rawi verma ke painting nahee dikha sakee aapko . khed hai.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

कल्पना की विस्मयकारी उड़ान को यथार्थ से इस तरह गूंथा है कि पाठक मंत्रमुग्ध सा हो जाए...
--------
क्या आप जवान रहना चाहते हैं?
ढ़ाक कहो टेसू कहो या फिर कहो पलाश...

Pratik Maheshwari said...

"एक त्रिवेणी" बहुत ही सुन्दर लगी..

आभार..

hem pandey said...

लम्हे को पकड़ के रखा जा सकता है - यादों में.

ज्योति सिंह said...

जिस रोज़ आँख लगी मेरी ,
जागी तो ,
इस धरती को बंज़र पाया ,
ढूँढा बहुत ..मगर ,
कोई लम्हा फ़िर न मिला
मालूम हुआ है,
कि 'रेखाएं ' ...खुदगर्ज़ हुआ करती हैं
triveni is aakash me chaand ki tarah chamak rahi hai .saara ka saara vyom khoobsurat .

kshama said...

Fursat ke lamhon me kayi baar aapka blog khol ke padhti hun..ek ajeeb-sa sukun milta hai..aur prerna bhi..

Jayant Chaudhary said...

Waah banjar hatheliyaan...

रंजना said...

दोनों ही रंग ...लाजवाब...लाजवाब !!!!

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

बेहद खूबसूरत...
बहुत अच्छी लगी....

Jyotsna Pandey said...

"रेखाएं खुदगर्ज़ हुआ कराती है " क्या बात कही है ....

त्रिवेणी बहुत जानदार है ...

बधाई ....

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

बहुत दिन हुए अल्पना जी आपकी पोस्ट आए।
इस शमा को जलाए रखें।
--------
ब्लॉगवाणी माहौल खराब कर रहा है?

dwij said...

Fantabulous!

dwij said...

Fantabulous!

शरद कोकास said...

तृप्त हुए ।

Mumukshh Ki Rachanain said...

अति सुन्दर प्रस्तुति

रेखाएं ' ...खुदगर्ज़ हुआ करती हैं!

जानकर , समझकर ज्ञान प्राप्ति हुई.


हार्दिक आभार.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर

JHAROKHA said...

जिस रोज़ आँख लगी मेरी ,
जागी तो ,
इस धरती को बंज़र पाया ,
ढूँढा बहुत ..मगर ,
कोई लम्हा फ़िर न मिला
मालूम हुआ है,
कि 'रेखाएं ' ...खुदगर्ज़ हुआ करती हैं!--------------अल्पना ज़ी, आपके बिम्बों का भी जवाब नहीं।बहुत सुन्दर कविता।

हिमान्शु मोहन said...

दोबारा आया हूँ। बहुत सुगठित रचना, गज़ल जैसी - जो हो जाती है, की नहीं जाती। जो कही जाती है, लिखी नहीं जाती।
फिर भी जो अनकहा है - जो शब्दों की सामर्थ्य से परे है, वह भी झलक गया, यह बधाई के क़ाबिल है।

सतीश सक्सेना said...

खूबसूरत रचना !

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

अच्छी प्रस्तुति........बधाई.....

Kishore Choudhary said...

नज़्म से हुई मालूमात बहुत दर्द भरी है.
और त्रिवेणी कई बार पढ़ा और कई नए अर्थ जाने.
बहुत बढ़िया.

मोहन वशिष्‍ठ 9991428447 said...

एक रोज़ उग आये थे कुछ लम्हे
खुद ब खुद हथेलियों पर मेरी ,
चाहत की नमी ,
अहसास की गरमी ने पाला था उन्हें ,
और पलकों ने दिया था साया ,

wah ji alpna ji behatrin

sanu shukla said...

बहुत सुंदर रचना....

iisanuii.blogspot.com

Jayant Chaudhary said...

Good one..

हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar said...

छोटी लेकिन बेहद सशक्त अभिव्यक्ति---

प्रवीण पाण्डेय said...

गहरी बात कह गये इतने कम में ।

Harash Mahajan said...

Aapke blog ka bhraman kiya ...saffer achha raha....Achha keh leti haiN aap....Khush rahiye...likhte rahiye


Harash

mridula pradhan said...

bahut achcha likhin hain.

अनूप शुक्ल said...

रेखायें खुदगर्ज हो गयीं- वाह!

vandana said...

bht sundar likha hai alpana ji

mind blowing !

gahra aarth jhalak raha hai ....

really nice...

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι said...

रेखायें कितनी ख़ुदगरज़ होती हैं । सुन्दर अभिव्यक्ति। बधाई।