April 13, 2010

भागें भी तो कब तक और कहाँ तक?

निश्चितता मतलबकुछ भी निश्चित नहीं ‘...
अपनी जड़ों से कट कर पौधा भी समय लेता है नयी ज़मीं पकड़ने में .
इंसान में अपनी मिटटी से दूर हो कर भविष्य के प्रति जो अनिश्चितता पैदा हो जाती है उसका निदान हर किसी को आसानी से नहीं मिलता.

खाड़ी देशों
में आये प्रवासी जानते हैं कि आज हम यहाँ हैं तो कल मालूम नहीं यहाँ हैं भी या नहीं..किसी से पूछेंगे तो कोई भी इस भय को स्वीकारेगा नहीं लेकिन अधिकांश के लिए सच यही है.कि वे भविष्य को लेकर कहीं कहीं आशंकित हैं ..इसी अनिश्चितता का परिणाम है कि ज्योतिषों और पंडितों की शरण में अब हम ज्यादा जाने लगे हैं.
साल पहले मद्रास से 'नाडी शास्त्र 'वाले एक पंडित जी का यहाँ आना हुआ.सब जगह आग की तरह ख़बर फ़ैल गयी ..यह भी आश्चर्य की बात है कि मात्र अंगूठे की छाप से पत्र ढूंढते और अगर मिल गया तो वह आप के पिता माता ,पति/पत्नी का नाम तक बता देते हैं.जन्म का समय /नक्षत्र तक.दावा यही होता है कि वह केवल पढ़ते हैं अपनी तरफ से कुछ अंदाज़ा या गणना नहीं करते.
हमने भी इस का अनुभव लिया ..अपने मरण तक भविष्य सुनकर ख़ुशी भी हुई /परेशान भी हुए ,उपाय भी लगे हाथ उनसे करवा लिए .क्योंकि उनका प्रभाव ही सभी पर इतना पड़ गया था.
तीन साल बाद उन का दोबारा'विसिट पर आना हुआ..मगर इस बार सब उनसे नाराज़..
अधिकाँश मामलों में अभी तक कुछ भी तो सही नहीं निकला था!


हाल ही में फिर से दुबई से मेरी सहेली नेफोन किया बताया कि शिवदास नामक एक व्यक्ति गुंटूर आंध्रप्रदेश सेआयेहुएहैं .
वे जेनेटिक इंजिनियर हैं ..गोल्डमेडलिस्ट ,बड़ी कंपनी में कार्यरत थे,अब उन्हें देवी की सिद्धि मिल गयी है और वे आपसे बातकर के आपका भविष्य 
बतादेतेहैं..
सुनकर हंसी भीआई..अब नाडीशास्त्रवाले पंडितजी से जो अनुभव मिला तो किसी पर यकीन नहीं आता..मैंने कहा मुझे भविष्य नहीं मालूम करना ..जो होना है वो तो होगा ही..दो ही बातें हो सकती हैं या अच्छी या बुरी.
वो पहली बार दुबई आये थे उनकी भी खूब चाँदी हुई,बहुत लोग उनसे मिले.



अनिश्चितता किस हद्द तक घेरे है और एक उदाहरण हाल ही में यहाँ एक छोटा सा इंडिया मेला लगा था वहाँ भी एक स्टाल में एक ज्योतिष जी को बिठाया गया था ..मानो या मानो ,सब से अधिक भीड़ वहीँ दिखी.ईमानदारी से कहूँ तो शायद अब भी हम सब को तलाश है किसी अच्छे ज्योतिषी की !कारण यही है कि लगभग सभी अनिश्चित हैं अपने कल के लिए! जैसे घर के रह गए हैं घाट के!

इसी अनिश्चितता का दूसरा  पहलू .........जो भी खाड़ी देशों में आता है उसका उद्देश्य और आगे जाना होता है ,वापस भारत अपनी  मर्ज़ी से बिरले ही जाते हैं ....प्रश्न यह किस देश में जाएँ? जहाँ सही ठहराव  मिलेबेहतर विकल्प भी.यहाँ कोई लन्दन कोई ऑस्ट्रेलिया तो कोई अमेरिका ,न्यूजीलैंड  या  कनाडा जाने के लिए  कागज़ भरता  है .balconyview2
हम भी इस  अनिश्चितता सेअछूते  नहीं हैं .हमने  भी कनाडा   के  लिए  वीसा apply किया  था ..[अब खुशकिस्मती  या   बुरीकिस्मत ] वीसा  मिल गया२००८ में वहाँ  गए ..कोई  दोस्त नहीं  ,रिश्तेदार नहीं ...अनजाने मुल्कमें .अंतर्जाल ने  बहुत  सहारा  दिया .
लेपटोप साथ रहा .नेट पर सभी  जानकारी मिलती रही .ऑनलाइन बुकिंग घर की ,टूर की ..सबकुछ ...जाकर घूमकर   गए .....और परिवार को वहाँ की Permanent Residency भी मिल गयी है.........अब इसे बनाये रखने के लिए  वहाँ के  रहिवासी   कानून  के  अनुसार  पांचसाल   में 730 दिनरहनाज़रूरीहै!
सालगुज़रगए ..पेंडुलम की तरह अब फिर झूलने लगेहैं कि जाएँ या न जाएँकभी -कभी जीवन में निर्णय लेने कितने कठीन हो जाते   हैं अब समझ आ रहा हैकनाडा   जाने  का  अर्थहै  सबकुछ  फिर  से  शुरू    करना......वहाँ  के हालात यहाँ से बहुत अलग हैं.  मौसम की बात करें या फिर सुख -सुविधाओं की ...वहाँ गए थे जो भी अपनी भाषा या  कहिये कि एशिया का मिला उससे पूछताछ करते रहेमिली जुली प्रतिक्रियाएं मिलीं मगर अधिकतर वहाँ के निवासी यही कहते कि   बच्चों के लिए केनाडा आ रहे हो तो मत आओअब  अगर  जाते नहीं तो ''पी आर ''  कैंसल हो जायेगा..जिन मित्रों  को  वीसा नहीं मिल  पाया  वो  जाने के पक्ष में कहते  हैं और हमारे वहाँ शिफ्ट न होने  को बहुत बड़ा ग़लत निर्णय बता रहे हैं.
जिन्हें  हमारी  तरह residency मिलचुकी है और हमारी  तरह यहीं हैं ,वे गोलमोल जवाब देतेहैं.कहते हैं भारत तो अपना ही है कभी भी वापस चले जाना .अब चले ही जाओ !
worry
भारत जाते हैं तो सब को देख कर ऐसा लगता है ...किसी के पास समय नहीं है,सब की अपनी दुनिया बस चुकी है, बहुत आगे निकल गए हैं परन्तु हम आज भी वक़्त के पुराने काँटों में रुके हुए हैं!
'देश' छुट्टियों में जाते हैं तो पहले कुछ दिन तक अडोस पड़ोस के लोग पूछते हैं 'कब आये?'कितने दिन हो?इंडिया वापस नहीं आना क्या?
-------१०-१५ दिन गुज़रते ही उन्हीं लोगों का सवाल होता है ' कब की वापसी है? कनाडा कब जा रहे हो?इंडिया आकर जाओगे या वहीँ दुबई से चले जाओगे ?
जिस का दिल हो ..उसे भी लगेगा जैसे अब तो जाना ही पड़ेगा...क्योंकि अब सच में ही लगने लगा है कि 'एन आर आई' का अर्थ है--Not Required Indians !
बड़ी उलझन है......जाएँ तो कहाँ जाएँ और भागें भी तो कब तक और कहाँ तक?


Dont_Worry_Be_Happy
इन सब बातों को भूल कर सुनाती हूँ एक गीत जो हर बेटी के लिए उनकी माँ गाती होंगी.
'मेरे घर आई एक नन्हीं परी,चांदनी के हसीन रथ पे सवार '
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72 comments:

Suman said...

nice

Ashok Pandey said...

ज्‍यादा सोचने से उलझन बड़ी लगती है। आदमी को वहां रहना चा‍हिए, जहां उसका जी चाहे। धरती किसी की बपौती है क्‍या कि हम सोचें कि हमारे रहने के बारे में कोई क्‍या सोचता है।

sanjay vyas said...

गीत तो अभी नहीं सुना पर एक आप्रवासी के मन को खूब सुना.
इन उदास तंतुओं में जीवन का राग छिड़ता रहे.

Arvind Mishra said...

आपकी उधेड़ बुन देश और जड़ों से जुड़ाव सभी तो शिद्दत से महसूस हो रहा है -शुभकामनायें !

Arvind Mishra said...

आपकी उधेड़ बुन देश और जड़ों से जुड़ाव सभी तो शिद्दत से महसूस हो रहा है -शुभकामनायें !

Udan Tashtari said...

अरे कहाँ चक्कर में पड़ गई..इन नाड़ी महाराज से हमारी भी मुलाकात है..टेप रिकार्ड करके दिये थे.

हमने पहले ही निवेदन कर लिया था कि मरने का न बताना महाराज....तो एक डॆट के आगे कुछ बोलने से मना करने लगे..हमने कहा इसके बाद का तो बताओ तो कहने लगे आपने ही मना किया है...तो ले दे कर हम जान ही गये कि कब उल्टा नगाड़ा बजना है.

मगर अब तक तो कुछ सच नहीं निकला..वरना तो नगाड़ा बजने की डेट भी निकल चुकी है. :)

Udan Tashtari said...

कनाडा आने का तराजू बड़ा अजब है...दोनों तरफ खाई और कुंए की स्थिति है.

नये सिरे से सब शुरु करना..यहाँ तक की कैरियर भी. इनकी नजरों में कनैडियन एक्सपिरेन्स नहीं है तो कुछ भी नहीं. मगर चंद किस्मत वाले भी हैं जो आते ही चमक जाते हैं सो तो खैर हर जगह है.

हाँ, बच्चों की पढ़ाई..अगर पी आर के साथ हैं तो विश्वविद्यालय में फीस तीन गुना कम है..सो वो फायदा है. बच्चे यूँ भी हॉस्टल में रहेंगे..कौन सा आपकी नौकरी के शहर वाली यूनिवर्सिटी में ही जाना है.

बहुत सोच समझ कर फैसला लें. तय है कि एक दिन तो निश्चित इस्टेब्लिश हो जाना है मगर फिर से पढ़ना..नये सिरे से शुरुवात से जीवन शुरु करना..अपने अहम को दर किनार रखना...फिर तरक्की भी अगर मन बना रखा है तो फटाफट है.

ज्यादा डिटेल अलग से कल लिखता हूँ. यह बहुत जर्नेलाईजड है.

शुभकामनाएँ.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

आपकी दुविधा समझ सकता हूं हैं. मैं समझता हूं कि 'घर' कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है इस बात से कि कहां रहते हैं हम. और जहां खु़शी मिले घर वहीं हैं.

Suman said...

nice

ताऊ रामपुरिया said...

आज का पूरा आलेख ही बडा मार्मिक है. ज्योतिषियों की जहां तक बात है "यह भय को बेचने का धंधा है" कोई भी चतुर और वाकपटु आदमी कर सकता है.:)

NRI की अपनी पीडायें हैं जिन्हें आपने बहुत अच्छी तरह अभिव्यक्त किया है. बहुत शुभकामनाएं.

गीत बडा मधुर और स्नेहिल है.

रामराम.

kunwarji's said...

ji bahut khoob!ek anubhav or sahi....


kunwar ji,

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

अल्पना जी, आदाब
इंसानी फ़ितरत है, कि अपनी समस्याओं के निराकरण के लिये अलौकिक शक्ति का सहारा तलाश करता रहता है. इसी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाने के लिये साधारण से कुछ तेज़ लोग सामने आत रहते हैं.
सबसे अच्छा उपाय यही माना जाता है कि अपने ईष्ट देव को याद करते हुए अपने लक्ष्य की और जाया जाये.
इस लेख के लिये बधाई.

उन्मुक्त said...

अनिश्चितता तो हम सब के साथ हैं चाहे वे भारत में ही क्यों न रहते हों।

सतीश सक्सेना said...

शुरू से अंत तक विभिन्न खण्डों को बिना पढ़े छोड़ नहीं सका , विचारणीय लेख, शुभकामनायें !

kshama said...

भारत जाते हैं तो सब को देख कर ऐसा लगता है ...किसी के पास समय नहीं है,सब की अपनी दुनिया बस चुकी है, बहुत आगे निकल गए हैं परन्तु हम आज भी वक़्त के पुराने काँटों में रुके हुए हैं!
'देश' छुट्टियों में जाते हैं तो पहले कुछ दिन तक अडोस पड़ोस के लोग पूछते हैं 'कब आये?'कितने दिन हो?इंडिया वापस नहीं आना क्या?
-------१०-१५ दिन गुज़रते ही उन्हीं लोगों का सवाल होता है ' कब की वापसी है? कनाडा कब जा रहे हो?इंडिया आकर जाओगे या वहीँ दुबई से चले जाओगे ?
Meri beti bhi paraye deshme rahti hai..lekin, jaise wo kaha karti thi ki, ham chand saalon baad Bharat lautenge, waisa hua nahi...aur mujhme use poochhne ki himmat nahi...kahin kah de,ki, ham wahin base rahenge!

सुशीला पुरी said...

आपकी कशमकश जायज़ है पर इन्ही सारी उहापोहो के बीच जिन्दगी अपनी धुन थाम लेती है .....जिस तरह आपने गुनगुनाई जिन्दगी को .

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

अपनी मिट्टी से जुड़ाव अच्छा है, लेकिन यहां के बाशिन्दे अपने नहीं.. वही असंवेदनशील लोग, निर्दय अधिकारी, ह्रदयहीन नेता. भ्रष्टाचार का साम्राज्य.. आप हमेशा हमें रिक्वायर्ड हैं. लेकिन आपके लिये इस देश के कायदे-कानून नहीं बने हैं..

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुती।

डॉ .अनुराग said...

बैचैनी सब जगह है ..उम्र के एक मोड़ पर आपकी टेबल पर सबसे ऊँचे पायदान पर कुछ चीजे होती है जो वक़्त के साथ अपनी जगह शिफ्ट करती रहती है ..रिश्ते नाते जरूर अब फिक्स खानों में बंट गए है ....जिनके लिए कुछ शर्ते है........

जाहिर है मन ...सारा खेल उसी का है .बाकि सरहद के उस पर या इस पार ......सिर्फ स्टेज अलग है

रंजना [रंजू भाटिया] said...

प्रवासी मन के प्रवासी सपने ..मन की बात लफ़्ज़ों में उतर कर आ गयी है ..वाकई बहुत अजीब महसूस होता होगा अपने देश से यूँ दूर कर रहना ..

Vijay Kumar Sappatti said...

alpana ji

aapke is lekh me bahut kuch hai ..jo ki haamri man ki stithi ko darshaata hai .. hamara bhaybheet rahna ,hamare jeevan ko aur jyaada dukho se bhar deta hai aur phir ham inhi jyotishiyo ,ityadi ke chakkar lagate hai .... khair ...that is also a part of life...

bahut dino ke baad aaya hoon , iske liye maafi chahunga .. aur haan ye gana ,meri patni aur mai apni bitiya ko sunaate the... aapko sunkar wo saare din taaza ho gaye , jo hamne use bhadte hue dekha tha aur jiya tha ....

aabhar

vijay
- pls read my new poem at my blog -www.poemsofvijay.blogspot.com

रश्मि प्रभा... said...

mujhe to geet ne moh liya .... din mast ho chala

दिगम्बर नासवा said...

प्रवासी मन की गाँठों को खोल दिया है आज आपने .... ये सच है दूसरे पढ़ने वालों को बता डू सच के सिवा कुछ नही है ... इस मानसिक दौर से मैं भी पिछले १५ वर्षों से गुज़र रहा हूँ ... हालाँकि कुछ हद तक मैने ये दौर जल्दी तय कर के दिशा निर्धारित कर ली है ... सन १९९२ से १९९५ तक में दुबई ताहा फिर भारत वापर चला गया फिर २००० में कॅनडा गया (समीर जी से मुलाकात का सिलसिला वहीं चालू हुवा) ६ महीनों में वापस आ गया दुबारा दुबई ... दोस्तों ने कहा कनाडा मत छोड़ो, मत छोड़ो .... पर छोड़ दिया और वो भी हमेशा के लिए ... अब लगता है ग़लत फैंसला नही था ... पर दुबई से कहाँ कभी कभी जद्दो जहद चलती रहती है ... हाँ पंडितों के चक्कर से अभी तक बचा हुवा हूँ ... सोच कर दिशा तय करने के बाद टिके रहने की कोशिश करता हूँ ... शायद इसलिए पिछले १० साल से दुबई में आ कर कॅनडा की नही सोची ...

psingh said...

बहुत सुन्दर जानकारी पूर्ण पोस्ट
आभार

मो सम कौन ? said...

ये भी शादी का लड्डू हो गया लगता है कि जो खाये वो भी पछताये और जो न खाये वो भी पछताये।
बाकी दिल की आवाज सुनिये जी, बस।

रचना दीक्षित said...

आपकी पोस्ट पढ़ कर बहुत कुछ जानने समझने की कोशिश की, ऐसा नहीं है की ये स्थिति केवल वहीँ है यही स्थिति तो आजकल हर जगह है.पर ये बात इकदम सत्य है की कई बार हम जिन अपनों के लिए जो हमें बार बार बुलाते हैं, अपनी बसी बसाई जिंदगी और नौकरी छोड़ कर आ जाते हैं हमारे आने के बाद वो ही हमें नहीं पूंछते.आजकल तो बस दूर के ढोल सुहावने वाले कहावत चरितार्थ है

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

वाह, हमारे लल्लू मामा ज्योतिषी हैं। ठीक ठाक। पर घर की मुरगी दाल बराबर। उनको सजेस्ट करता हूं कि बाहर घूम आयें! :-)

बेचैन आत्मा said...

बड़ी उलझन है......जाएँ तो कहाँ जाएँ और भागें भी तो कब तक और कहाँ तक?
-aapka अनुभव काफी कुछ सोंचने के लिए विवश कर देता है। अपनी जड़ों से कट कर पौधा भी समय लेता है नयी ज़मीं पकड़ने में मंगर वह पौधा क्या करे जिसे फिर नई हवा में सांस लेना है ।

आप अपने इसी कमजोर हालात को जीने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करें. इसके लिए साहित्य ही अच्छा माध्यम है। अपना अनुभव लिखें ..खूब लिखें इससे आपको सकून तो मिलेगा ही दूसरों का भी ग्यान बढ़ेगा।
-आभार।

सुशील कुमार छौक्कर said...

अनिशिचता अब हर जगह बनी हुई चाहे वो देश हो या परदेश। इन्हीं अनिशिचता के बीच हमें कुछ निशिचता बनानी होती है सो मेरा अनुभव यही कहता है कि अंदर की आवाज सुनो और कर्म करते जाओ और जो घटता जाता है उसे घटने दो बस। और मैं तो इसमें ज्यादा यकीन करता हूँ जो मैंने बचपन में संस्कृत में एक श्लोक पढा था। "ईश्वर यत करोती शोभनम करोती" शायद यही शब्द थे पर अर्थ अब भी सही सही पता है कि "ईश्वर जो करता है वो अच्छा ही करता है।"

kshama said...

Aaj phir ekbaar chainse padha aapka blog..udhedbun samajh sakti hun...meri apni beti Canada me settle hone ki khwahish mand hai...mai sirf chupchap sun leti hun..

डॉ. मनोज मिश्र said...

-Not Required Indians !
बड़ी उलझन है......जाएँ तो कहाँ जाएँ और भागें भी तो कब तक और कहाँ तक?..
अप्रवासी भारतीयों के मन की कसक को बेहतरीन भावों में आपनें व्यक्त किया है.मैं आपको बताउं कि देश के ही अन्य प्रदेश से आने वाले सभी से अक्सर यह सवाल लोग पूछ लेते हैं की भाई कब तक हैं.
जो लोग अपनी जन्म भूमि से लगाव रखते हैं और रहना चाहते है वे भी इन्ही सब के चलते रुक नहीं पातें हैं.
एक सचाई यह भी है कि जो जहाँ है कुछ न कुछ ऐसे कारण हैं कि वह संतुष्ट नहीं है.संतुष्टि कहाँ हैं यह नहीं जान पा रहे.
आज की पोस्ट मनोभावों की पड़ताल करती लगी,बेहतरीन.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस सुन्दर पोस्ट की चर्चा यहाँ भी तो है-
http://charchamanch.blogspot.com/2010/04/blog-post_13.html

BrijmohanShrivastava said...

यह भावुकता है देश पराया छोड़ के आजा पंछी पिंजरा तोड़ के आजा ,आजा उम्र बहुत है छोटी अपने घर में भी है रोटी (फिल्म नाम ) और हकीकत यह है कि रोजी से रोजा होता है ,इस संसार में निश्चित कुछ भी नहीं है लेकिन जब तक हम इस जहां में है तब तक तो सब निश्चित ही मान कर रोजी ,रोटी ,व्यवसाय बच्चों की उच्च शिक्षा ,उन्हें भी सुख सुबिधा युक्त जीवन जीने की व्यवस्था आदि करने के लिए जाही विधी राखे राम ताहि विधि रहिये का पालन करते हुए ही रहना पडता है |लेख से पीड़ा तो झलक रही है ।
,भविष्य बक्ता की पचास प्रतिशत बातें सही निकलती यह मेरा अनुभव है क्योंकि हमारे मध्य प्रदेश के ज्योतिषी ने शिवराजसिंह से भी कहा और दिग्विजयसिंह से भी कहा "मुख्य मंत्री बनोगे " शिवराजसिंह बन गए ५० प्रतिशत भविष्य बाणी सच निकली |

हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar said...

अल्पना जी, आपका लेख पढ़ कर मुझे भी अपने बीते हुये दिनों की याद आ गयी---मैं भी भारतवर्ष में ही इलाहाबद--दिल्ली---पुणे---मुम्बई के ऊहापोह में फ़ंस चुका हूं--(रोजी रोटी के लिये)---और अन्त में आकर लखनऊ में फ़ंस गया। लेकिन किया क्या जाय--नौकरी--बच्चों की पढ़ाई सभी कुछ देखना पड़ता है--------------वैसे आपका लेख हर प्रवासी भारतीय के अन्तर्मन का वास्तविक विश्लेषण है।

PRAN SHARMA said...

PRAVASEE JEEWAN PAR CHINTNIY LEKH.
BADHAAEE.

mukti said...

मन थोड़ा बेचैन हो गया. कारण आपके अनुभवों से एक जुड़ाव सा हो गया पोस्ट पढ़ते-पढ़ते. सभी अनिश्चित हैं, और सभी जगह. बस बात इतनी है कि अपनी जड़ों से ज्यादा दूर होने पर बेचैनी ज्यादा हो जाती है...शायद.
गाना सुना...माँ की ममता छलक पड़ी है इसमें.

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

अल्पना जी कभी कभी हमे भी लगता है कि Non Residential UPite बन गये है.. भारत मे रहते हुये भी घर शायद साल मे २ बार जाना होता है। हमारी ज़िन्दगी हमे कहा कहा ले जाती है पता ही नही चलता.. कभी कभी लगता है किसके पीछे भाग रहा हू.. कभी कभी लगता है कि ये मिल जाये तब भी क्या है..

ये उलझने/निर्णय हमेशा परेशान करते ही है.. शायद ज़िन्दगी का नाम चलते जाना है और चलते चलते अपने तजुर्बो की गुल्लक को भरते जाना है...

काफ़ी दिनो बाद लिखा आपने और हमेशा की तरह बहुत मन से लिखा..

सुमन'मीत' said...

सच में अपने वतन की याद रुला जाती होगी ना

रंजना said...

ज्योतिषियों के पास चक्कर लगाने के पीछे केवल भविष्य के प्रति अनिश्चितता और आशंका ही नहीं बल्कि जिज्ञासा भी है,जो कि मानव स्वभाव का एक सहज और अत्यंत स्वाभाविक गुण है...

मेरा एक विश्वास है....सुनो सबकी,जानो सबकुछ पर जब मानने/करने की बात हो तो सौ प्रतिशत तो अपनी भी बात न मानो...

अबतक आपने कईयों की सुनी होगी, अपने कई अनुभव हुए होंगे आपके...अब तो बस उन सब के साथ निश्चिन्त मन से एक निष्कर्ष निकालिए और उसके अनुसार निर्णय कर लीजिये...सौ प्रतिशत सबकुछ सही कभी नहीं मिलता...कहीं कोई कमी होगी तो कहीं कोई...सो जहाँ दिक्कत न्यूनतम हो वहीँ हो लीजिये...

दिलीप said...

aisa nahi hai Alpana ji...sirf adhe hi hai jinke paas waqt nahi hai...baaki adhe berozgaar yunhi befikri me sadakon pe pade hai...aap logon ka to bada yogdaan chahiye...
http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

दिलीप said...

aur haan kisi sajjan ne ek hi comment do baar kaha..'Nice' pata nahi unhone kuch padha bhi ya nahi....

दिलीप said...

sahi hai...Alpana ji...ham kuch nahi kar sakte par jab tipani mile aur usse saaf pata chale ki apka bhav to usne samjha hi nahi to bura lagta hai....kitne to maine aise dekhe ki bas title dekh comment kar diya...par andar kuch aur hi likha tha....

pata nahi aise hindi aage badh bhi payegi ya nahi....idhar bhi 'Anishchitta' hai... :D

M VERMA said...

क्योंकि अब सच में ही लगने लगा है कि 'एन आर आई' का अर्थ है--Not Required Indians !
प्रवासी का दर्द वाकई असहनीय बन जाता होगा. मातृभूमि का आशीर्वाद जब न हो तो छोटी छोटी बातें भी सालती होंगी.
बखूबी उकेरा है आपने, अन्दाजे बयां अन्दर तक छूती है.

सुशील कुमार छौक्कर said...

कल जब पोस्ट पढ रहा था तो सब ध्यान था कि क्या कमेंट करना है पर जब बात चली अनिशिचता की तो सब भूल गया। खैर बेटी बड़ी प्यारी है। और जिस गीत को आपने लगाया है इस् गीत को मैं खुद अपनी बेटी के गुनगुनाता हूँ और मेरा फेवरेट है।

अनूप शुक्ल said...

अच्छा लगा इस पोस्ट को पढ़ना! पूरे एक महीने बाद लिखा है आपने। गाना बहुत अच्छा लगा।

Anonymous said...

Ye Gana bohot acha gaya hai aur lagta hai shaid banhon main nanhi pari pakdi hui thi aur janaba lehek lehek kar ga rahi thein....
very nice singing

~~~Jav
nyc

सुलभ § सतरंगी said...

बड़ी उलझन है....जाएँ तो कहाँ जाएँ और भागें भी तो कब तक और कहाँ तक? इसी उहापोह के बीच जीवन गुजरता रहता है.

आनंद तब है जब अपने मनोनुकूल कार्य करने को जीवन भर अवसर मिलता रहे. बेहतर सुरक्षित विकल्प से ज्यादा महत्वपूर्ण है, अपने घर की ख़ुशी और अपना कार्य अपने शौक. ऐसा मेरा मानना है. लेकिन अनिश्चितता तो हर जगह हर किसी के साथ है. खुश वही हैं जो अपने घर के चाहरदीवारी में अपने प्रियजन के साथ ख़ुशी से सांस ले रहे हैं और अपने शौक(समाज सेवा या अन्य कुछ भी हो) पुरे करने के अवसर मिल रहे हैं.


गीत दुसरे दिन सुन लूँगा
आपके बेहतर जीवन के लिए शुभकामनाएं !!

बूझो तो जानें said...

आपने अपने अनुभव बांटे, अच्छा लगा.
कुछ प्रश्न भी उभरकर सामने आये.


शुभकामनायें.

नीरज गोस्वामी said...

प्रवासियों को लेकर बहुत अच्छी बातें लिखी हैं आपने...मैं लगभग पूरी दुनिया घूमा हूँ और अनेक प्रवासियों से मिला हूँ सब में एक बात कामन मिली वो थी अपने वतन लौटने की तमन्ना...सब लौटना चाहते हैं लेकिन कोई वहां की सुविधाओं को छोड़ना नहीं चाहता...बच्चों को भारतीय परिवेश के बिलकुल विपरीत पलते देख दुखी होता रहता है...लौट कर क्या करे का सवाल लिए परेशां रहता है...जीवन में हम जो पाते हैं उसकी कीमत चुकानी पड़ती है...सुविधाओं के लिए अपना वतन ही नहीं छोड़ते हमसे बहुत कुछ पीछे छूट जाता है जिसकी कसक हमेशा सालती रहती है...
नीरज

वन्दना अवस्थी दुबे said...

कितनी शिद्दत के साथ अपनी व्यथा को शब्द दिये हैं आपने. भीतर तक उतर गया एक-एक शब्द.
इसी ऊहापोह में शायद ब्लॉग जगत से भी दूर रहीं आप.

अमिताभ श्रीवास्तव said...

apna desha sachmuch apanaa hotaa he..aapki peeda kaa anubhav mujhe to nahi kintu me to apne desh me hi esa kuchh mahsoos karne lagaa hu, jab shetriy vaad haavi hokar mahanagro me dhoom machaataa he.., bhasha ke naam par, jaati ke naam par jesa dogla vyavhaar kiya jaa rahaa he usaki peedaa bhi kam nahi.../ kher..aapki mansthiti ka pooraa pooraa vivarn padhhkar bahut kuch janane ko milaa.., bhaage bhi to kab tak aor kanhaa tak....?? sheershak me hi samaai hui he athaah peeda..../

श्रद्धा जैन said...

aapne to man ki baat kah di ....

NRI ka sahi meaning bataya hai ...

हरकीरत ' हीर' said...

आपकी पोस्ट में कुछ उदासीनता छिपी है .....जायें तो कहाँ जायें .....

पर पोस्ट दिल से लिखी ...बिलकुल साफ़ और सरल .....!!

समीर जी ने तो हंसा दिए नगाड़े की बात कह .....!!


गीत बहुत सुंदर बन पड़ा है .....मेरे घर आई इक नन्ही परी ......!!

हिमांशु । Himanshu said...

प्रवासी-मन की सच्ची अभिव्यक्ति ! गीत बेहतरीन है । आभार ।

मीत said...

silent!!

भूतनाथ said...

ह्म्म्मम्म्म्म........बेबसी है.....बेचैनी है....भावुकता है.....रिश्तें हैं.....आस है.....मगर साथ ही अनिश्चितता भी....अनिश्चितता काल भी है...जीवन भी....सब कुछ जान लेना कभी-कभी समाधान नहीं...समस्या हो जाती है....तो मेरे जानते अनिश्चितता जीवन है....तरंग है....उमंग है...अनिश्चितता सबसे बड़ी प्रेरणा है आदमी की...कहाँ जाना है...क्या पाना है....उससे और सिर्फ उसी से समाधान है....कभी तो हम परिस्थितियों के पीछे चल पड़ते हैं....तो कभी नयी राह चुनते हैं....नयी राह हमेशा सोची हुई जगह पर नहीं ले जाती....और परिस्थितियाँ भी हमेशा साथ नहीं देती....जीवन एक बहुत बड़ी अनिश्चितता है....और यही अनिश्चितता जीवन भी....मगर इसी में कहीं सार भी है....और वो सबके लिए अलग-अलग है....मेरे लिए अलग....तुम्हारे लिए अलग....किसी और के लिए अलग....चाहना क्या है....यही महत्वपूर्ण है !!

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

कहीं न कहीं हमारी अनिश्चितता और भविष्य का डर ही हमें आने वाले कल को जानने के लिए प्रेरित करता है लेकिन आज समय कुछ ऎसा है कि जितना हम भविष्य की अनिश्चितता को जानने का प्रयास करते हैं, शायद उतना ही ओर अधिक भ्रमित होते चले जाते हैं...अब दोष किसे दिया जाए अज्ञानी, ठग भविष्यवक्ताओं को या इस कलयुग को।

खैर...आपके शब्दों में छिपी आपके मन की उलझन स्पष्ट रूप से दृ्ष्टिगोचर हो रही है...इसलिए दो बातें कहना चाह रहा हूँ कि इन्सान जब निरन्तर परिस्थितियों के मूल्यांकन,वर्गीकरण और विश्लेषण में लगा रहता है, तो उसके अन्तर्मन में द्वंद्व उत्पन्न होता ही है जो विशुद्ध सामर्थ्य और इन्सान के बीच सतत ऊर्जा के प्रवाह को रोकने का काम करता है। इसलिए हमें जीवन में थोडा बहुत अनिर्णय का अभ्यास जरूर करना चाहिए। यानि कि बिना कोई निर्णय लिए दृ्ष्टा भाव से परिस्थितियों का सिर्फ अवलोकन करना...बिना किसी मूल्याँकन या विश्लेषण के।
दूसरी बात ये कि यदि हम ये स्वीकार कर लें कि जीवन की प्रत्येक समस्या/बाधा में हमारे लिए कोई न कोई सुअवसर अवश्य छिपा रहता है तो यही सोच हमें जीवन में स्थितियों का लाभ उठाकर भविष्य संवारने का अवसर प्रदान कर देती है।
उम्मीद करता हूँ कि आप मेरी इन उपरोक्त बातों को किसी पंडित द्वारा दिए गए फोकट के प्रवचन के रूप में न लेंगी....:-)

प्रकाश गोविन्द said...

अल्पना जी
आप भी कहाँ इस 'नाडी शास्त्र' के चक्कर में पड़ गयीं ? इन गुरुघंटालों की महिमा का क्या वर्णन करूँ ....ये तो इंसान से बहुत ज्यादा और भगवान से थोड़े ही कम होते हैं! रही-सही सुख-शान्ति भी नष्ट करनी हो तो इनकी शरण में जाना बढ़िया उपाय है!

इन गुरु घंटालों के मोहल्ले की बहुत सारी अन्य गलियां भी हैं--हस्त ज्योतिष, जन्म कुंडली, अंक ज्योतिष, रत्न-ताबीज, तंत्र-मन्त्र, टैरो कार्ड, वास्तु-शास्त्र.....जरा बचियेगा सबसे :)
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प्रवासी मन के अंतर्द्वंद को दिखाती ह्रदयस्पर्शी पोस्ट !
जिम्मेदारियाँ हमको गंभीर व परिपक्व बना देती है। हम बने तो हाड़-माँस से हैं फिर भी समय की गति ने यांत्रिक पुतले सा बना दिया है! किसी रोबोट की भांति भावहीन ! भावनाओं को स्थान मिले भी तो कैसे । कितना विचित्र लगता है भावनाओं का यह मेला।
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देश से दूर, अपनों से दूर, ......... जीने की तमाम सुख-सुविधाएँ है, तो उनकी कीमत भी तय है - जी तोड़ मेहनत, संघर्ष, व्यस्तता, अकेलापन। दो अलग-अलग देश, दो अलग-अलग विचारधाराएँ, दो अलग-अलग सभ्यताएँ-संस्कृतियाँ, ऐसे में असमानताएँ तो होंगी ही। अप्रवासी भारतीय दोहरी जिंदगी जीते है, दोहरी कोशिश करते हैं।

आमतौर पर अप्रवासी भारतीय के बारे में धारणा है कि विदेशों में बसते ही वे भारतीय अपनी जड़ों को भूलने लगते हैं जबकि सच यह है कि अपने देश से दूर होकर वे उसके और अधिक करीब आ जाते हैं। ज्यादा गहराई और गंभीरता से अपने देश को समझने लगते हैं।

अल्पना जी आपकी पोस्ट पढ़ते हुए एक काव्य-संग्रह "प्रवासिनी के बोल" की याद आ गयी ! प्रवासी जीवन में अपने देश और संस्कृति से दूर रहकर जो उपलब्धि और विघटन क्रम होता है, उसे महसूस करते हुए नारी ह्रदय के उदगार कुछ यूँ हैं :
ख़्याल उसका हरेक लम्हा मन में रहता है
वो शम्मा बन के मेरी अंजुमन में रहता है
मैं तेरे पास हूँ, परदेस में हूँ, खुश भी हूँ
मगर ख़्याल तो हर दम वतन में रहता है।

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वात्सल्य से परिपूर्ण चिर-परिचित इस लोरी को सुनकर बहुत अच्छा लगा! अनगिनत बच्चों ने इसे अपनी माँ से जरूर सुना होगा ......भले ही अब स्मरण में न हो !
कुल मिलाकर बेहतरीन पोस्ट
तहे दिल से शुभ कामनाएं

Harsh said...

alpana ji lambe samay se aapke blog par aana nahi hua tha.. ajaa gaya naya rang achcha laga.. post bhii achchi hai...

JHAROKHA said...

अल्पना जी,ऐसी स्थितियों से हम सभी को जीवन में रूबरू होना पड़ता है---लेकिन फ़िर कहीं न कहीं कोई मार्ग दिखाई ही पड़ जाता है---और हम उस मार्ग के माध्यम से फ़िर जीवन की राह पर निकल पड़ते हैं---अच्छी पोस्ट्।

शरद कोकास said...

नाड़ी शास्त्र वाले भूल गये थे कि एक बार जहाँ जाते है वहाँ दोबारा नही जाते । भारत तो बहुत बड़ा देश है यहाँ पाखंडियों की रोजी रोटी कहीं भी चलती है ।

योगेश स्वप्न said...

aapki uljhan sahi hai, sab kuchh MURLIWALE PAR CHHOD DO, JO HOGA ACHCHA HOGA, NISHCHIT JAANEN. YAHI THEEK HAI CHINTA MAN SE NIKAAL DEN.

GEET MADHUR HAI.

मानसी said...

कनाडा आने का निर्णय बहुत सोच समझ कर लें। शुरुआत बहुत कठिन होती है। अपने को कम से कम एक साल का समय देना होगा, यहाँ, जमने से पहले। मानसिक व आर्थिक रूप से खुद को तैयार कर के आयें। एक महत्वपूर्ण बात ये है, कि सिर्फ़ एफ़र्ट नहीं, भाग्य का बड़ा हाथ होगा इस में, यह मान कर चलें।

अगर पर्सनली संपर्क करना चाहें तो ये है मेरा पता- cmanoshi@gmail.com

anjana said...

अल्पना जी आप का जो मन कहता है उसी पर गौर कीजिए । आप का आत्मविश्वास ही आप को सही डगर की राह दिखा देगा ।
एक बात ओर....
जो इंसान असन्तुष्ट हुआ है,वह अपनी समर्थ को भी नही जानता ।वह सदा उलझन मे पडा रहता है और इसी परेशानी मे पडा रहता है कि अब क्या करुँ,कैसे करूँ ? सन्तुष्ट रहने से ओर निश्चयात्मक होने से बुद्धि का सन्तुलन रहता है और निर्णय हो पाता है,वरना इंसान दो-मुखी घोडे की तरह दुविधा मे रहता है। मेरी शुभकामनाएँ..

ज्योति सिंह said...

main to ek ek shabd mahsoos kar rahi sach abhi kuchh kah nahi paa rahi phir aaungi jab man kuchh kahne ko taiyaar ho jayega .padhna achchha laga .

hem pandey said...

एन.आर.आई.की व्यथा भी कुछ कुछ वैसी ही है जैसी देश के महानगरों में विभिन्न अंचलों से आये प्रवासियों की.

अरुणेश मिश्र said...

प्रवासी की अभिव्यक्ति ।
यथार्थ ।

हिमान्शु मोहन said...

अल्पना जी,
नमस्ते।
पहले भी आया कई बार मगर रचनाएँ पढ़ कर, टिप्पणी किए बिना निकल गया। इस बार, एक तो परदेसी की पीड़ा टीस गई और दूसरे यह भी बताना था कि अभी भी हिन्दुस्तान में चमत्कारी सिद्ध पुरुषों की कमी नहीं है।
यह सिर्फ़ ढोंगियों का पेशा ही नहीं, अभी भी ऐसी विद्याएँ न केवल ज़िन्दा हैं बल्कि उनके ज्ञाता भी अनेक हैं। बस यही एक फ़र्क है कि वे न तो पैसे से, न प्रसिद्धि के लिए - जनता के बीच सामान्यत: ये सिद्धियाँ प्रकट नहीं करते।
सामान्यजन के लिए वे सब भी यही सलाह देते हैं कि ऐसी सिद्धियों के चक्कर में न पड़ें और न ही सिद्ध पुरुषों के। कर्म से ही भाग्य बनाने पर यकीन रखें और सत्कर्मों पर।
बहरहाल, आपकी रचनाशीलता उच्च कोटि की है और उसके लिए आपको बधाई। आप का शब्दों का ही नहीं, चित्रों का खेल भी सधा हुआ है।

मीत said...

मेम, आज आपकी इस [पोस्ट को पढने फिर से चला आया, और पिछली बार की तरह इस बार भी मौन हूँ और आंखे भी नम हैं...
लेकिन एक बात बताइए क्या आप वापस अपने वतन नहीं आ सकती.. यहाँ और कोई न हो लेकिन मैं तो हूँ... अपनी मिटटी तो है... जो दिल को सकूं देने के लिए काफी है.. यूं तो नेट हमें आपसे जोड़े रखा है...लेकिन जब भी ये सोचता हूँ की आप परदेस में हैं, तो आपको बहुत ही दूर पाता हूँ... काश आप हमेशा के लिए भारत आ जाती...
मैं आपसे कहता हूँ आप वापस आ जाइये न!! यही बस जाइये अपने लोग, अपना देश.. सब कुछ अपना... ज्यादा क्या कहूँ बस आपकी यह पोस्ट पद कर दिल में जो आया लिख दिया, कुछ गलत हो तो माफ़ कीजियेगा...
मीत

P.N. Subramanian said...

भारत में भी अब कई राष्ट्रीयताएँ बनती जा रही हैं. अप्रवासी यूपी वाले, बिहारी, मद्रासी आदि आदि. जैसे सबने ही कहा है, सोच समझ कर निर्णय लें.हमें तो विश्वास था की कनाडा मध्य पूर्व से बेहतर होगी.हमारी शुभकामनायें सदैव रहेंगी.

अनूप शुक्ल said...

पोस्ट फ़िर से पढ़ी। गीत फ़िर से सुना। फ़िर बहुत अच्छा लगा। :)

शोभना चौरे said...

जिन्हें हम अपना कहते है प्रत्यक्ष मिलने पर मन के कई किले ढह जाते से लगते है आप चाहे विदेश में हो या घर से दूर भारत में ही अन्यत्र हो आपसे वापसी की कोई अपेक्षा नहीं और उस रिक्त स्थान को कोई वापस भरना भी नहीं चाहता ।
मेरे तो बेटे है किन्तु यह गीत मैंने अपनी बहू के आने पर उसे लिख कर दिया था |
बहुत सुन्दर गीत है