एक नज़्म-:
![]() बंज़र हथेलियाँ --------------------- एक रोज़ उग आये थे कुछ लम्हे खुद ब खुद हथेलियों पर मेरी , चाहत की नमी , अहसास की गरमी ने पाला था उन्हें , और पलकों ने दिया था साया , जिस रोज़ आँख लगी मेरी , जागी तो , इस धरती को बंज़र पाया , ढूँढा बहुत ..मगर , कोई लम्हा फ़िर न मिला मालूम हुआ है, कि 'रेखाएँ ' ...खुदगर्ज़ हुआ करती हैं! .............................अल्पना ........................... |


