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October 14, 2013

मुक्त - उन्मुक्त

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छाया : सुनो माया, तुम्हारे पंख कहाँ हैं?
माया :पंख तो जब उतारे तभी से न जाने कहीं खो गए हैं।

छाया : तो अब क्या करोगी?
माया : नए पंख बना रही हूँ।

छाया : कब तक बन जायेंगे?
माया : मालूम नहीं।

छाया : तब तक ?
माया : तब तक धरती पर हूँ यहीं रहूंगी।

छाया : माया, तुम्हारे हाथ इतने ठंडे कैसे? तुम्हारा जिस्म भी ठंडा? सारी उष्णता कहाँ है?
माया : उष्णता सब भावों में समेट दी है।

छाया : भाव कहाँ हैं?
माया : ये देखो इस डिब्बे में हैं।

छाया : अरे, इस में तो सब दम तोड़ देंगे।
माया : नहीं, देखो मैंने कुछ सुराख बनाये हैं ...  सांस लेते रहेंगे।

छाया : तुम इनका क्या करोगी?
माया : जब पंख बन जायेंगे तब इनसे रंग भरुंगी।

छाया : जब तक ये पूरे होंगे, तुम उड़ना भूल जाओगी माया तब तक।
माया : पता नहीं, लेकिन आखिरी सांस तक प्रयास रहेगा कि पंखों को पा सकूँ, चाहे उड़ना संभव हो या नहीं।

छाया : ये कैसी चाहत है माया?
माया : बिलकुल वैसी ही जैसी चातक को बरखा की पहली बूंदों की होती है।


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41 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

पँख.

आह.

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

बहुत ही सुंदर रचना !
विजयादशमी की शुभकामनाए...!

RECENT POST : - एक जबाब माँगा था.

Kaushal Lal said...

------ द्वन्द ------

प्रवीण पाण्डेय said...

पंख उगेंगे, भाव उड़ेंगे।

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

वाकई चातक जैसी दीवानगी इ ही होनी चाहिए ...इस रचना को मुझे पुनः पढ़ना होगा ...सादर बधाई के साथ

दिगम्बर नासवा said...

Deewangi ki ye had bahut kuch sochne ko majboor karti hai ...
Bahut samvedansheel likha hai ...

दिगम्बर नासवा said...

विजयादशमी की शुभकामनाए

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुन्दर .
नई पोस्ट : रावण जलता नहीं
नई पोस्ट : प्रिय प्रवासी बिसरा गया
विजयादशमी की शुभकामनाएँ .

राजीव कुमार झा said...

इस पोस्ट की चर्चा, मंगलवार, दिनांक :-15/10/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" चर्चा अंक -25 पर.
आप भी पधारें, सादर ....राजीव कुमार झा

Vikesh Badola said...

पंख रगेंगे, उड़ चलेंगे
चातक वर्षा में भीगेंगे.................सुन्‍दर।

अनूप शुक्ल said...

वाह! बहुत खूब।
इसे पढ़कर मुझे रमानाथ अवस्थीजी की कविता याद आ गयी।
" मेरे पंख कट गये है, वर्ना मैं गगन को गाता"

इसे यहां सुन सकती हैं।
http://hindini.com/fursatiya/archives/1257

P.N. Subramanian said...

वाकई उन्मुक्त भाव से लिखी रचना है यह. बेहद सुन्दर एक नयापन लिए.

Maheshwari kaneri said...

बहुत सुन्दर ....विजयादशमी की शुभकामनाएँ .

arvind mishra said...

''रटत रटत रसना लटी तृषा सूखिगे अंग।
तुलसी चातक प्रेम को नित नूतन रुचि रंग॥''
तस्वीर तो सचमुच चातक की ही है !

ajay yadav said...

सुंदर रचना|

richa shukla said...

बहुत ही सुंदर रचना...
भावनाओं के सुंदर पंख
prathamprayaas.blogspot.in-

Shashi said...

loved this poem ,so beautifully written .

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज मंगलवार (15-10-2013) "रावण जिंदा रह गया..!" (मंगलवासरीय चर्चाःअंक1399) में "मयंक का कोना" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का उपयोग किसी पत्रिका में किया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Safarchand said...

बहुत खूब ! माया,छाया, किसकी ! जिसके जिस्म हो उसकी ! अल्पना की कल्पना -- मोहक भी और उमंग की सकारात्मकता भी...मुझे मोह लिया इस रचना ने

निहार रंजन said...

आस पर ही दुनिया है...सुन्दर.

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ही नायाब और अनोखा सोच, शुभकामनाएं.

रामराम.

मन के - मनके said...


बहुत सुंदर

Virendra Kumar Sharma said...


छाया : जब तक ये पूरे होंगे, तुम उड़ना भूल जाओगी माया तब तक।
माया : पता नहीं, लेकिन आखिरी सांस तक प्रयास रहेगा कि पंखों को पा सकूँ, चाहे उड़ना संभव हो या नहीं।

छाया : ये कैसी चाहत है माया?
माया : बिलकुल वैसी ही जैसी चातक को बरखा की पहली बूंदों की होती है।

बेहद के आशा वादी स्वर अरी बावली !ये पंख ही तो मेरी ज़िन्दगी हैं तू इतना भी नहीं जानती पूछे जा रही है सवाल दर सवाल।

सु..मन(Suman Kapoor) said...

बहुत बढ़िया

Alpana Verma said...

आभार Sir.

Alpana Verma said...

सच कहा आप ने..आभार.

Alpana Verma said...

धन्यवाद sir.

Alpana Verma said...

शुक्रिया शशि जी ,आप का ब्लॉग नज़र नहीं आ रहा..क्या अब लिखना बंद कर दिया?

Alpana Verma said...

चातक की बात हो रही है तो चित्र उसी का लगाया है.

Alpana Verma said...

धन्यवाद आशुतोष जी .

Ankur Jain said...

तीन बार रचना को पढ़ा फिर भी बहुत से भाव समझ नहीं आये..लेकिन जितने भी समझ में आये वे बेहद गहरे और मार्मिक हैं...

Alpana Verma said...

@Ankur...आभार कि आप ने मेरी इस रचना को समझने का प्रयास किया ...
अनूप जी ने मुझे अपने कमेन्ट में कवि रमानाथ अवस्थी जी की कविता का लिंक दिया वही कविता मैं यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ ..क्योंकि मुझे लगता है कि वह बहुत अर्थों में वही मायने रखती है जो मैं इस रचना में कहना चाहती हूँ --मेरे पंख कट गये हैं
वरना मैं गगन को गाता।

कोई मुझे सुनावो
फिर से वही कहानी,
कैसे हुई थी मीरा
घनश्याम की दीवानी।

मीरा के गीत को भी
कोई विष रहा सताता!
मेरे पंख कट गये हैं
वरना मैं गगन को गाता।

कभी दुनिया के दिखावे
कभी खुद में डूबता हूं,
थोड़ी देर खुश हुआ तो
बड़ी देर ऊबता हूं।

मेरा दिल ही मेरा दुश्मन
कैसे दोस्ती निभाता!
मेरे पंख कट गये हैं
वरना मैं गगन को गाता।

मेरे पास वह नहीं है
जो होना चाहिये था,
मैं मुस्कराया तब भी
जब रोना चाहिये था।

मुझे सबने शक से देखा
मैं किसको क्या बताता?
मेरे पंख कट गये हैं
वरना मैं गगन को गाता।

वह जो नाव डूबनी है
मैं उसी को खे रहा हूं,
तुम्हें डूबने से पहले
एक भेद दे रहा हूं।

मेरे पास कुछ नहीं है
जो तुमसे मैं छिपाता।

मेरे पंख कट गये हैं
वरना मैं गगन को गाता।

रमानाथ अवस्थी
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Vinnie Pandit said...

प्याज ने रूलाया ज़ार-ज़ार,

मैं लन्दन की सैर कर भारत लौट आई हूँ।बाहर जा कर कौन अपने प्यारे भारत को भुला सकता है।पर यहाँ वापिस आकर देखा कि मँहगाई तो सब को मारे ड़ाले दे रही है।हर कोई जूझ रहा है उसी से। खास तौर पर प्याज ब हुत मँहगा हुआ है। इस की जरूरत हर सब्जी में होती है।मेरा नया लेख ,"प्याज ने रुलाया ज़ार-ज़ार"जरा पढ़ कर देखिये।आप का स्वागत है मेरे ब्लोग,"Unwarat.com" पर।अपने विचार अवशय व्यक्त करें|v

ज्योति सिंह said...

alpalna adbhut ,dono hi rachana apni apni jagah khash hai ,padhwane ke liye dil se aabhari hoon tumahari ,

आशा जोगळेकर said...

Bilkul waisee hee jaise chatak ko Warsha ke pahali boond kee hoti hai..............
wah sunder adhyatm nayee shaili men.

संतोष पाण्डेय said...

is ichchha ko bachaye rakhiyega.

ज्योति सिंह said...

alpana shukriyaan badhai ke liye ,do saal se bitiyaan ki shaadi ki taiyari me vyast rahi ab nani ki padvi sambhal rahi hoon ,2 oct ko nati ka janm hua ,bahut pyara beta hai ,soch rahi thi agli post par tasvir dalne ko ,magar ismat ki badhai se ab sab ko aage hi jaankaari ho gayi ,aaj hi swapn bhi dekhi hoon tumahara ki tum satna aai hui ho hum sub se milne ,tabhi jaan gayi rahi tum yaad jaroor ki hogi .
a

संतोष पाण्डेय said...

आपका दूसरा ब्लॉग गुनगुनाती धूप देखा और आपकी आवाज में गीत दिल हुम हुम करे सुना, अच्छा लगा। कहीं- कहीं आपकी आवाज थोड़ी ज्यादा तेज लगी। बहरहाल, आवाज अच्छी है और गीतों का चयन सुरुचिपूर्ण।

Alpana Verma said...

धन्यवाद संतोष जी.

GGShaikh said...

Gyasu Shaikh:
नई-नई सी अभिव्यक्ति है
प्रतीकों से प्रयत्नों की उड़ान…
जो दमदार है…संबल भी दे।

pbchaturvedi प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

वाह....अनुपम प्रस्तुति....आपको और समस्त ब्लॉगर मित्रों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं...
नयी पोस्ट@बड़ी मुश्किल है बोलो क्या बताएं