December 24, 2013

ये ज़िद्दी बच्चे !

ये ज़िद्दी बच्चे !
आम आदमी पार्टी को ‘जिद्दी बच्चों का जमावड़ा’ कहा जाए तो गलत नहीं होगा.
जिस तरह से उन्होंने एक जिद्द पकड़ कर उसको ही सही ठहराते हुए यहाँ तक पहुँच गए हैं वह काबिले तारीफ़ है. इस सिस्टम में जहाँ भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी समाई हुई हैं उस दलदल में पाँव जमा कर खड़े होने का तरीका इन्होने इतनी जल्दी सीख लिया इसकी शाबाशी देना बनता ही है.
अन्ना हजारे के साथ अनशन से पहचान में आये कुछ लोग संगठित हो कर इस तरह से नया रूप लेंगे इसका अंदाजा लोगों को नहीं था सिस्टम से लड़ने की जिद्द को बालहठ  समझ कर लोग इन्हें दुलारते रहे लेकिन ‘आप’ पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल,मनीष सिसोदिया ने जिस तरह से  अपनी दूरदर्शिता दिखाई है जिस तरह अब तक का इनका कार्यक्रम देखा है उससे लगता है की बहुत होमवर्क करके ही यहाँ तक पहुँच पाए हैं.
गूगल इमेज से साभार 

चुनाव के नतीजों  बाद लगा कि दिल्लीवासियों ने लगता है जैसे किसी बंद हुए सर्कस के दरवाज़े खोल दिए हों और सभी को करतब दिखाने  का इंतजाम कर रहे हों .२३ तारीख तक सब मजमा लगाये बातों की चाट परोसे जा रहे थे !
 आम आदमी पार्टी के सामने  बड़ी मुश्किलें थीं...'इधर कुआँ, उधर खाई वाली' स्थिति  !
भारतीय जनता पार्टी ने  विपक्ष में बैठने की बात कह कर पहले ही पल्ला छाड़ लिया और कांग्रेस के साथ मिलकर ‘आप’ को उकसाने लगे कि ये सरकार बनाना नहीं चाहते क्योंकि वादे पूरे नहीं कर सकते .
कांग्रेस ने चतुराई से निर्णय लिया कि 'आप' को समर्थन दे कर जनता के साथ हो जायेंगे कि देखिये हम कितने भले हैं हमारी बुराई करने वालों की सरकार हम बनवा रहे हैं .और उनके इस कदम से उन्हें दोनों तरफ से फायदा होना ही है –एक वह जनता के दिल में जगह बनायेंगे कि हमने आप की पसंद को सरकार बनने में सहायता की और दूसरे यह कि अपनी कट्टर विरोधी ‘ भारतीय जनता पार्टी ‘को कुर्सी से दूर रखा ! अगर आम आदमी पार्टी सत्ता में टिक जाती है काम करती है तो भी वे जनता के बीच इसी बात को लेकर जायेंगे देखिये हमने आप को पूरा सहयोग दिया इसलिए वे कम कर सके! और अगर आप पार्टी कुछ नहीं कर पाती तब भी ‘कांग्रेस’ को जनता की सहानुभूति मिलेगी कि कांग्रेस ने अपने लिए इतना बुरा भला ‘आप ‘पार्टी से सुना फिर भी बडप्पन दिखाते हुए उन्होंने नए दल को सहयोग दिया अब वे कुछ कर नहीं पाए तो नयी पार्टी की  ख़ामी है कांग्रेस का क्या  दोष! अब इस सारे प्रकरण में नुक्सान बी जे पी का होगा .

नयी पार्टी को तो लोगों ने वैसे भी मौका दिया अगर वे न भी कर पाए तो उन्हें उनकी अनुभवहीनता का सहारा लेकर जनता से राहत मिल सकती है. वैसे भी आप’ के पास खोने को अपना कुछ नहीं है क्योंकि उनके पास जो कुछ है जनता का ही है चुनाव के लिए धन या लड़ने की हिम्मत के लिए जनता का विश्वास !

अब 'आप’ पार्टी एक बड़ी दुविधा से निकल कर तो आयी है मगर उसका यह निर्णय उसे कई सवालों के घेरे में खड़ा करता है ,जैसे  पार्टी का कहना कि वे किसी से समर्थन न लेंगे न देंगे लेकिन उन्होंने समर्थन लिया ...अब जो आंकड़े टी वी पर बताये जा रहे हैं उनके अनुसार जनता के ओपिनियन पोल में भी  दिल्ली की जनता की  २% सहमती ही थी.6 लाख एस एम् एस में से केवल २ लाख दिल्ली की जनता ने दिए थे ! इसी पर एक कार्टून देखें-
गूगल इमेज से साभार 

उस पर आरोप है कि जनता के साथ धोका किया है जिस कोंग्रेस को उन्होंने चोर कहा उसी के सहारे खड़े हो कर वे चलना शुरू कर रहे हैं .ऐसे में यह भी आशंका जताई जा रही है कि यह सब कोंग्रेस की किसी बड़ी रणनीति का हिस्सा है [जिसे मैं नहीं मानती] .

वैसे लोगों को अब शांत रहकर थोड़े दिन ‘’तमाशा ‘’ देखना चाहिये क्योंकि उन्हें क्या चाहिये वे शायद जानते ही नहीं क्योंकि जब केजरीवाल  अनशन के लिए बैठे सरकार ने सुना नहीं तब सलाह दी कि बिना राजनीति में कूदे  यह लड़ाई जारी नहीं रख  सकते [उन में मैं भी एक थी मैंने भी तब यह पोस्ट लिखी थी ]और ये ही जनता थी जो कहने लगी कि चुनाव लड़ो ..उन सब ने कैसे न कैसे मिलकर लोगों  से सहायता  और अपने बल बूते पर चुनाव लड़ा ..सभी  ये सब एक तमाशे की तरह देख रहे थे ..शीला जी 15 साल से दिल्ली में राज कर रही थीं  वे भी शायद पूरी तरह आश्वस्त थीं कि ये कल के बच्चे कहाँ उनके क्षेत्र में प्रवेश कर पायेंगे. सभी बड़ी पार्टियों ने 'आप’ पार्टी को हलके में ही लिया और जब नतीजे सामने आये तो लोग हैरान रह गए.

बीजेपी को जो सीटें मिलीं उसमें  मोदी जी के प्रभाव का ही हाथ है वरना उन्हें ये भी न मिली होतीं क्योंकि उनके कार्यकर्ता आम आदमी के पास जाते नहीं हैं [सुना है उनका काम प्रभावी  भी नहीं था] और उसी पुराने तरीके से चुनाव लड़ने की रणनीति अपनाये हुए हैं .मेरे विचार में उन्हें अगर लोकसभा में जीतना है तो जनता के बीच जाएँ उन्हें अपने विश्वास में लें .बीजेपी के पास एक से एक अच्छे वक्ता है जो दिल्ली की जनता का दिल जीत सकते हैं जैसे सुषमा स्वराज जी !बी जे पी को यह  भी ध्यान रखना चाहिये कि उनके चाहने वाले ही कहीं सोशल मीडिया के आवश्यकता से अधिक और गलत इस्तेमाल से उन्हें नुक्सान न पहुँचा दें! इसके लिए भी कोई मोनिटरिंग होनी चाहिये जो पब्लिक की मानसिकता को समझते हुए उतना ही शोर मचाये जितना ज़रूरी है. अधिकतर लोग [आप पार्टी के समर्थक में से कई] शायद मेरी ही तरह चाहते हैं कि श्री नरेंद्र मोदी जी को इस बार प्रधानमंत्री बनना चाहिये और इसके लिए बी जे पी को लोकसभा के लिए उत्तर प्रदेश ,दिल्ली और बिहार में अपनी खास जगह बनानी होगी और सभी सदस्यों को मन मुटाव भुला कर एक साथ मोदी जी के नेतृत्व को स्वीकार करते हुए पार्टी के लिए काम  करना होगा ताकि स्पष्ट बहुमत लेकर राज करें न कि त्रिशंकु रहकर !

कांग्रेस एक पुरानी पार्टी है जिसे इस बार हार ज़रूर मिली है लेकिन उस में एक से एक दिग्गज और अनुभवी नेता हैं जो जानते हैं कि साम –दंड, भेद कब क्या प्रयोग में लाया जाए सत्ता को पाने के लिए .और यह समर्थन भी उसी रणनीति का एक हिस्सा है. दिल्ली की बात करें तो उनके चीफ अरविन्दर सिंह लवली एक अच्छे वक्ता हैं और इस बार उन्हें कांग्रेस ने बहुत सही चुना है ,हाल ही में टी वी पर उनके संयत और प्रभावी जवाबों को सुनकर लगा कि कोंग्रेस की वापसी दिल्ली में अगर होगी तो उसमें  लवली सिंह का योगदान महत्वपूर्ण रहेगा. आज की स्थिति देखकर लगता है कि दिल्ली में 6 महीने से पहले ही अगर  दुबारा चुनाव हुए तो उसमें कोंग्रेस को फायदा होगा [जानती हूँ कि मेरा यह कहना आम धारणा के विपरीत है, मगर मेरा यही आकलन है]


ब वापस आप ‘ पार्टी पर आयें और उनके पक्ष को समझे तो यह ज़रूर है कि उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस से उनका कोई गठबंधन नहीं है बस बाहरी समर्थन  है.
अगर वे पार्टी नहीं बनाते तो तब भी ये ही लोग उन पर दोष मढ़ते कि ‘’आप’’ ने  डर कर मैदान छोड़ दिया और दिल्ली की जनता को दोबारा चुनाव झेलने का कारण भी सभी पार्टियाँ मिलकर आप’’ को बना देतीं! अब जब बाहर से समर्थन लिया तब भी लोग शांत नहीं हैं .
आखिर ये ‘दोषारोपण करते रहने वाले लोग चाहते क्या हैं ?शायद कुछ नहीं सिर्फ सामने वाले को लट्टू बना कर घुमाते रहना चाहते हैं !`[मेरे विचार में अगर ये  दिल्ली में दोबारा चुनाव होने देते तो बहुत से समर्थक जो इस प्रकरण के बाद आप' से अलग हो गए हैं वे जुड़े रहते ...इस पूरे प्रकरण में फिलहाल ''आप'' का नुक्सान ही दिख रहा है जब तक ये अगले कुछ हफ़्तों में कुछ साबित कर के नहीं दिखाते.]

हाँ ,अन्ना का स्टेंड इस विषय पर मुझे कुछ समझ नहीं आया. उन्होंने  ‘नो कमेंट्स’ क्यों कहा ?यह पार्टी तो आप के आन्दोलन से निकली पार्टी है .एक शुभकामना तो बनती ही थी.

मेरे विचार में ‘आप’ पार्टी अपनी मेहनत से  धाराओं के विपरीत बहते हुए यहाँ तक पहुँची है ,उन्हें उनका काम करने के लिए सभी को पूरा सहयोग ,समय  और अवसर देना चाहिये. ‘आप ‘ पार्टी को किसी को भी अब बिना अधिक सफाई देते हुए अपने काम पर लग जाना चाहिये. आप अच्छा काम  करेंगे तब भी लोग तैयार बैठे हैं मीन -मेख निकालने के लिए और नहीं करेंगे तो भी लोग पहले से ही हंगामा करने  को तैयार बैठे मिलेंगे. इसी कुव्यवस्था में आप एक बड़ी लड़ाई लड़कर यहाँ तक पहुंचे हैं तो आगे बढ़कर अपनी जिम्मेदारी निभाते चलें .यहाँ मैं आप को नरेन्द्र मोदी जी का उदाहरण  देना चाहूंगी जिस तरह उन्होंने ‘अपने विरोधियों ,प्लेग , भूकंप’ आदि तूफानों में  से गुज़र कर अपनी गुजरात रूपी नैय्या को पार लगाया है उसी तरह अगर ‘आप’ भी ईमानदार है तो अपनी छवि और साफ़ करने के लिए कुछ कर के दिखाना होगा. आज जो गुजरात जा कर आता है तारीफें करता रहता है ‘आप ‘से उम्मीदें करते हैं कि वह भी दिल्ली को ऐसा ही सुन्दर रहने लायक सुरक्षित शहर बना कर दिखाएँ! जिस जिद्द को लेकर चले थे ‘’आप’’ उसे बनाए रखिये ..जनता ‘आप’ के साथ हैं.
श्री अरविन्द केजरीवाल ,मनीष सिसोदिया और कुमार विश्वास सहित ‘आप’ पार्टी के सभी सदस्यों को शुभकामनाएँ और बधाई!
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15 comments:

Digamber Naswa said...

वैसे भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है किसी को कुछ नहीं पता ... पर अब तक के सभी कदम केजरीवाल के पक्ष में जाते हैं ... हां जब तक उन्हें सवा सेर नहीं मिलता ... शुभकामनायें हैं आप वालों को ...

काजल कुमार Kajal Kumar said...

'आप' को बहुत मेहनत की दरकार है

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (25-12-13) को "सेंटा क्लॉज है लगता प्यारा" (चर्चा मंच : अंक-1472) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सूबेदार जी पटना said...

बहुत अच्छा लिखा है आपने आप पार्टी की गंगोत्री ठीक नहीं है ये विदेशी हाथो के खिलौने के अतिरिक्त कुछ नहीं कोई भी एनजीओ सरकार नहीं चला सकता वैसे केजरीवाल अपने जीवन का बेईमान ब्यक्ति है

arvind mishra said...

अच्छा तो जनाब को राजनीति में भी रूचि है -चस्का या टशन भी कह लीजिये !
मैंने आपको सरकार बनाने की भविष्यवाणी की थी तब आप की हिचक देखी थी !
यह सब एक सोची समझी रणनीति के तहत हो रहा है -दिमाग की लड़ाई है अब!
कांग्रेस का पासा पलट गया है।
अब कोई भी कम से कम लोकसभा निर्वाचन तक सरकार गिराने की हिमाकत नहीं कर सकता !
अगर कांग्रेस अविश्वास प्रस्ताव लाती है या बी जे पी तो भी वह पारित नहीं नहीं होगा -गणित का उलझाव है !
कई समीकरण बनते हैं -मगर अब मेरी दूसरी भविष्यवाणी है कि लोकसभा चुनाव तक आप सुरक्षित है

Alpana Verma said...

@सूबेदार जी धन्यवाद .
अरविन्द केजरीवाल के बारे में जितना पढ़ा- सुना है और देखा है मुझे वह एक ईमानदार और सीधे व्यक्ति ही लगते हैं.
मेरा मत है कि वे सरकार चला सकते हैं,बशर्ते उनके अपने भीतर मतभेद न हों.
@आभार अरविन्द जी ..कोग्रेस का पासा ज़रूर पलटा है परन्तु उन्हें हर स्थिति को भुनाना आता है..बहुत सोच समझ कर उन्होंने बाहरी समर्थन की बात की है ..मैं ने लिखा है न कि दिल्ली वालों ने एक बंद पड़े सर्कस के दरवाजे खोल दिए हैं .बस अब देखते जाईये इनकी उठा पटक ..आप'' टीम के एक जिद्दी बच्चे ने कल कुछ खुलासा करने की बात कही है ..एक अरसे बाद मीडिया कर्मी भी इसी सब के कारण बहुत व्यस्त हो गए हैं !

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

मेहनत करने की जरूरत है,फिलहाल लोकसभा चुनाव तक आप पार्टी सुरक्षित है...!
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RECENT POST -: हम पंछी थे एक डाल के.

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस प्रस्तुति को आज की बुलेटिन मोहम्मद रफ़ी साहब और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Kaushal Lal said...

आप सफल होगी या असफल ये तो भविष्य के गर्भ में है ,किन्तु जिस विचार को लेकर वो चले है वो अवश्य सफल रहे ऐसी मेरी कामना है ,बेसक केजरीवाल राजनीती में इन विचारो से आगे विचलित हो जाए किन्तु जो भी इन विचारो का पोषक होगा उस पर लोगो का आस रहेगा। सुन्दर आलेख ....

Vinnie Pandit said...


आप की सोच प्रंशसनीय है क्या खूब रखा है नाम उन का 'वे जिद्दी बच्चे'। आप का कहना ठीक है कि यह उन की परीक्षा की घड़ी है।उन के हर काम की तुलना पहली सरकार यानि का काग्रेस से की जा रही है। अच्छा है काग्रेस को भी आत्म चिन्तन कर अपनी गल्तियाँ ढूढू ने का समय मिल गया है। जनता आस लगाये है और Wait & watch नीति से नयी सरकार के हर कार्य पर नजर गढाये है। हर क्रिया का निरीक्षण कर रही है।सभी यही कहते है देखते हैं यह सरकार क्या करेगी।अबतो इन जिद्दी बच्चों को पैर जमा कर रखने की हम सब को उन्हें प्रोत्साहित करने की जरूरत है।

विन्नी,



प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी ही रोचक स्थिति का निर्माण हो रहा है।

Suman said...

बढ़िया आलेख अल्पना जी ,
परिवर्तन की सबको जरुरत है, आप पार्टी जनता की उम्मीदों पर खरी उतरे यही शुभकामनाएं ! बहुत बहुत आभार !

Vikesh Badola said...

राजनीति की नई संभावनाओं पर अच्‍छा विश्‍लेषण किया है आप ने। आपका यह लेख पढ़ कर अच्‍छा महसूस हुआ। आपको राजनीति की उठापटक से हट कर राजनीतिक समाजवाद की चिंता है, यह जान कर और भी खुशी हुई।

Maheshwari kaneri said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!

हिमकर श्याम said...

'आप' का अच्छा मूल्यांकन किया है आपने अल्पना जी।
'आप' का उदय पूरे देश की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था को एक चुनौती है। जनता व्यवस्था और उसे चलानेवाले को बदलना चाहती है। केजरीवाल एक ताकतवर नेता होकर उभरे हैं। दिल्ली ने उन्हें एक मौका दिया है। उनके पास राज्य की उम्मीदों को पूरा करने का मौका है। विश्वासमत तो उन्हें मिल गया, अब काम की बारी है। असल चुनौती लोगों की बढ़ी उम्मीदों पर खड़ा उतरने की है। सत्ता व्यक्ति को भ्रष्ट, अहंकारी और निरंकुश बनाती है। 'आप' नेताओं के बयानों और व्यवहारों में अहंकार झलकने लगा है। यदि सचमुच कुछ करने की चाहत हैं तो उन्हें इन सब से बचना होगा। 'आप' से ढेरों अपेक्षाएं हैं। केजरीवाल और उनकी टीम की राह में चुनौतियां भी बेशुमार हैं। 'देखना दिलचस्प होगा कि बेशुमार चुनौतियों और आशंकाओं का भार लिए 'आप' अपने वायदों को कितना और किस तरह से अमल में लाती है और काजल की कोठरी में रह कर केजरीवाल कब तक पाक साफ बने रहते हैं।
आप मेरे ब्लॉग पर आयीं, अच्छा लगा। आप की उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया से हौसला बढ़ा। ब्लॉग नया है। आपकी प्रतिक्रियाओं और सुझावों का स्वागत है।