July 20, 2011

आखिरी मुशायरा

मार्च २००९  में मुशायरा और कवि सम्मलेन करवाया गया था. २०१० में मंत्रालय  की अनुमति नहीं मिली.
इस साल मार्च , २०११ में अनवर अफ़ाकी साहब यहाँ -वहाँ खूब भाग दौड कर रहे थे कि किसी तरह इस साल अनुमति मिल जाये .मैंने दिगंबर नासवा जी को भी निमंत्रण भेजा था कि वे भी भाग लें परंतु उन्हें उस तारीख को शहर से बाहर जाना था.

अलेन में मुशायरा और कवि सम्मलेन करवाने की शुरुआत ग्यारह साल पहले इंडियन सोशल सेण्टर में अब्दुल सत्तार शेफ़्ता जी ने की थी. मुझे भी इस मंच पर पहला अवसर देने का श्रेय उन्हीं को जाता है.शेफ़्ता साहब पिछले कुछ सालों से अबू धाबी शिफ्ट हो गए थे .

तय  दिन के ठीक दो दिन पहले आयोजन के लिए अनुमति मिल गयी.२४ तारीख को शाम सब एकत्र हुए.कम समय के नोटिस पर भी हर साल से कहीं अधिक भीड़ इस बार दिखाई दी.९ बजे से १२ बजे तक की अनुमति थी तो १० बजे किसी तरह कार्यक्रम शुरू हुआ.  स्वागत भाषण के बाद  कवियों /शायरों का सम्मान [रवायत के मुताबिक प्रोग्राम के आखिर में होता है वह इस बार पहले  ही कर दिया गया]शेफ़्ता साहब को  सेंटर में दी गयी उनकी सेवाओं के लिए खास सम्मान दिया  गया.सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी सराही गयी.

प्रोग्राम रात १० ३० बजे शुरू हुआ ..पहले स्थानीय  [अलेन के ]कवियों को आमंत्रित किया गया उसके बाद दुबई  /शारजाह/अबू धाबी के कवियों को पढ़ना था.खुद अनवर साहब जो प्रोग्राम के संचालक थे उन्होंने अपना कलाम पढ़ा.फिर अब्दुल रज्जाक साहब ने  तरन्नुम में अपनी गज़ल सुनायी.अब जैसे ही शेफ़्ता जी को आवाज़ दी गयी..हाल तालियों से गूंज उठा.उनकी लोकप्रियता हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी दोनों ही सुनने वालों में खूब थी.उन्होंने अपनी ताज़ा ग़ज़ल सुनायी..माहौल बहुत खुशनुमा हो गया था.

उनके  बाद मुझे मंच पर पढ़ने के लिए बुलाया गया .मैं ने अपनी एक नज़्म [फसाना-ए-शब-ए-ग़म'
]
पढ़ी ,नज़्म की अंतिम पंक्ति थी 'आगोश में तुझको ,कज़ा के ही
अब तो चैन आएगा!'

 जिससे सुनने के बाद एक अलग सा वातावरण हो गया..जहाँ ' कज़ा '[मौत] की बात आये वहाँ ऐसा ही होता है ..
मुझ से श्रोता गण गीत -या गज़ल तरन्नुम में सुनाने  की फरमाईश करने लगे ..मैं ने अपना  गीत 'बरखा और बाँवरी 'शुरू ही किया था ..एक पंक्ति के बाद माईक में डिस्टर्बेंस होने लगी .शेफ़्ता साहब उठे और संचालक का माईक ले कर मेरे माईक से बदल दिया ..फिर भी एक पंक्ति के बाद गडबड हुई तब वह  साउंड अरेंजेर/ मिक्सर के पास बैठे व्यक्ति के पास गए ..उससे दूसरा माईक लिया और मुझे दिया मैं ने पूछा...अब ठीक है???उन्होंने कहा...हाँ ,अब ठीक है ,आप पढ़िये .
वे  मुड़े और गिर पड़े , एकदम मेरे पाँव के पास मेरे पीछे...मुझे लगा कि शायद मंच के कारपेट में पाँव उलझ  गया होगा.परंतु वे मंच पर बेहोश पड़े थे.एक अजीब सा सुकून था उनके खामोश चेहरे पर .मुंह पर  पानी के छींटे दिए गए  मगर कोई हरकत नहीं हुई.

सुनने वालों में इत्तेफाक से अलेन के सब से बड़े सरकारी हस्पताल के सीनियर कार्डियोलोजिस्ट [सलाहकार] डॉ.सिद्दीकी भी बैठे थे.उनके साथ एक  और बड़े डॉक्टर थे .वे दोनों  तुरंत मंच पर आये ..उन्होंने  कृत्रिम साँस और कार्डिएक मसाज दिया , हस्पताल शिफ्ट किया गया.वेंटिलेटर पर रखा. उन्हें होश नहीं आया था.
यह सारा मंजर मेरी आँखों के सामने हो रहा था और मैं कुछ समझ नहीं पा रही थी.हम सभी प्रार्थना कर रहे थे कि उन्हें होश आ जाये.लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था ..

शुक्रवार के दिन सुबह के २ बजे  उनके परलोक सिधार जाने का दुखद समाचार मिला.उनकी मृत्यु  के   एक हफ्ते बाद अब्दुल  रज़्ज़ाक साहब का दिल के दौरे से इंतकाल हो गया.इन्होंने  उसी दिन दूसरे नंबर पर ग़ज़ल पढ़ी थी.ये दोनों ही बहुत अच्छे दोस्त भी थे.
आज तक वह सारा मंज़र मेरे ज़हन से हटता नहीं है.सच ही है ,समय कब किस का हुआ?

48 वर्षीय शेफ़्ता साहब की लोकप्रियता इतनी थी  कि उनके अंतिम  दर्शन के लिए   हस्पताल में रिकॉर्ड लोग जमा हुए थे.सेंटर में उनके लिए शोक सभा रखी गयी. मैं नहीं जा सकी क्योंकि मैं इंडिया गयी हुई थी.
शेफ़्ता साहब २३ सालों से यू ए ई में  सपरिवार रहते थे.वे स्कूल में    गणित और अंग्रेज़ी  पढाया करते थे .
हिंदी -उर्दू में लिखने वाले एक शायर के रूप में उनकी बहुत लोकप्रियता थी.अपने अच्छे स्वभाव के कारण भी वे लोगों के प्रिय हो जाते थे.रात -बिरात किसी भी समय शेफ़्ता साहब को काम बता दीजीये वे दौड -धूप कर के अपने सारे प्रयास लगा देते थे.

उनके मधुर स्वभाव और हर किसी की मदद करने की आदत को आज भी याद किया जाता है.
उस मुशायरे की विडियो क्लिप नहीं मिल सकी, न ही तस्वीरें..चूँकि उस दिन शाम को मुशायरे में जाने का मेरा बिलकुल मन नहीं था  इसलिए मैं अपना केमरा साथ नहीं ले कर गयी थी.
अपनी आँखों के सामने कुछेक पलों में सब कुछ घटते देखा और लगा कि वक्त के आगे  हम सभी बेबस हैं.

शेफ़्ता साहब की यह ग़ज़ल पढ़िये जो उन्होंने उस आखिरी मुशायरे में पढ़ी थी.यह ग़ज़ल मुझे उर्दू में लिखी मिली थी जिसे  ग़ज़लकार  दानिश [मुफलिस ] जी ने देवनागरी स्क्रिप्ट में  बदल कर दिया है.साथ ही उन्होंने उर्दू के शब्दों के अर्थ भी दिए हैं.दानिश जी का दिल से आभार प्रकट करती हूँ.
शेफ़्ता साहब आप जहाँ भी हैं वहाँ खुश रहिये.ईश्वर आप की आत्मा को शांति दे.आप को हमारी  भावपूर्ण श्रद्धांजलि ...


दिवंगत शायर अब्दुल सत्तार शेफ़्ता


ग़ज़ल

तेरा हद से गुज़र जाना, शरारत उस को कहते हैं
मेरा हद से गुज़र जाना, बगावत इस को कहते हैं

तेरा गिर कर सँभल जाना ज़हानत उस को कहते हैं
मेरा गिर कर फिसल जाना हिमाक़त इस को कहते हैं

तुम्हारी तंज़िया झिडकी जराफत उस को कहते हैं
मेरा गुस्ताखियाँ सहना शराफत इसको कहते हैं

तुम्हारी नीमबाज़ आँखें नजाकत उसको कहते हैं
लबों का मुस्करा देना हलावत इसको कहते हैं

तुम्हारा ख़ुशनुमा चेहरा मतानत उसको कहते हैं
मेरे अश`आर  का पैकर  अलामत इसको कहते हैं

ज़ुलैखा की तरह चेहरा  सबाहत उसको कहते हैं
मगर युसूफ का बच जाना इता`अत इसको कहते हैं

मुझे नीलाम कर देना तिजारत उसको कहते हैं
मेरा सब कुछ लुटा देना सखावत इसको कहते हैं

तुम्हारा झूट फैलाना  सहाफत उसको कहते हैं
हमारा होंट सी लेना शिकायत इसको कहते हैं

तुम्हारा साजिशें रचना, रवायत उसको कहते हैं
हमारा घुट के मर जाना  मलामत इसको कहते हैं

तेरा खंजर  मेरा सीना  इनायत उसको कहते हैं
मगर आह औ बक़ा निकले अदावत इसको कहते हैं

खयाली, मनघडत ज़ुल्मत  हिकायत उसको कहते हैं
अँधेरों से निकल आना हिदायत इसको कहते हैं

हो नाकामी तो मायूसी नदामत उसको कहते हैं
बहरसूरत  रिज़ाजोई  qina`अत इसको कहते हैं

तेरा सफ़बस्त: हो जाना इक़ामत उसको कहते हैं
तेरा मिल जुल के झुक जाना इयादत इसको कहते हैं

न हो मरऊब गैरों से इमामत उसको कहते हैं
मगर इन्साफ सबसे हो, अदालत इसको कहते हैं

न तूफानों से घबराए जराअत उसको कहते हैं
जला डाले जो कश्ती इस्त्कामत उसको कहते हैं

दरे बातिल से टकराना शुजाअत उसको कहते हैं
जो कर दे जान नज़राना शहादत इसको कहते हैं

-शायर  अब्दुल  सत्तार 'शेफ़्ता ' की लिखी हुई -
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कठिन  उर्दू शब्दों के अर्थ -:
ज़हानत=विवेक , समझ-बूझ
हिमाक़त=अज्ञान , मूर्खता
तंज़िया=व्यंग पूर्ण
जराफत=ठिठोली
नीमबाज़=नशीली , अधखुली
हलावत=मिठास
मतानत=धीरता , संजीदगी
पैकर=आकृति
जुलेखा=मिस्र  की  सुन्दर  युवती 
सबाहत=गोरापन , सुन्दरता
युसूफ=जुलेखा का प्रेमी , बहुत खूबसूरत व्यक्ति
इता`अत=सेवा , आज्ञा पालन
सहाफत=पत्रकारिता
मलामत=निंदा
qinayat=संतोष , भाग्य तुष्टि
सफ़ बस्त:=कतार में होना
इक़ामत=रहना , बसना
मरऊब=आतंकित 
जरा`अत =रोना , विनती करना
बातिल=असत्य
पोस्ट पर टिप्पणी करने का विकल्प बंद कर दिया गया था .
इमेल के ज़रिए कुछ विचार प्राप्त हुए जिन्हें मैं यहाँ पोस्ट कर रही हूँ.

गज़लकार दानिश जी ने कहा-:
शेफ्ता साहब (मरहूम) जी की इस ग़ज़ल को नायाब धरोहर बना कर अदब-नवाज़ लोगों तक
पहुंचा कर, आपने बड़ा पुण्य का काम किया है.ये तख्लीक़ (रचना) सिर्फ ग़ज़ल ना होकर
एक अध्ययन है ग़ज़ल कहने/सुनने/पढने वालों के लिए ..इस ग़ज़ल में कुछ अलग किस्म के क़ाफ़ियों को इस्तेमाल करके ये समझाने की कोशिश की गयी है कि सिर्फ एक शब्द चुन लेनाऔर उसे क़ाफ़िया बना देना ही काफी नहीं होता बल्कि उस मखसूस लफ़्ज़ के मआने भी कहे गए मिसरे से ख़ास निस्बत रखते हों या किसी अलग किस्म के क़ाफिये को अगर ग़ज़ल के शेर में रखना ही है, तो उसे निभाया कैसे जाता है
ये सिखलाने का मकसद भी रहा होगा शेफ्ता साहब का ,,
ऐसा मेरा विश्वास है .
मैं अपनी ओर से स्वर्गीय शेफ्ता जी की आत्मिक शान्ति के लिये प्रार्थना करता हूँ
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डॉ.अरविन्द मिश्र जी कहते हैं-
मरहूम शायर जनाब अब्दुल सत्तार शेफ़्ता को खुदा ने जन्नत बख्शा होगा ...पूरा वृत्तांत पढ़कर मुझे धक्का सा लगा और उस समय आपकी स्थति ,पशोपेश ,दुरुहता का भी आभास हुआ -आपका यह वाक्य पढ़ते ही कि उन्हें होश नहीं आया मैं आशंका से ग्रस्त हुआ था ..ऐसे ही एक घटना मेरी नजरों के सामने हुई थी -दरअसल हार्ट अटैक इतना ही भयानक होता है ..
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14 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

ज़िन्दगी कब किस का साथ निभाती है .मौत भी कैसे कहाँ आ जाती है ....कब क्या हो किसी के साथ कौन सोच सकता है ....विन्रम श्रदांजली ...उनके लिखे यह शेर बहुत बहुत पसंद आये ख़ास कर आखिरी

दरे बातिल से टकराना शुजाअत उसको कहते हैं
जो कर दे जान नज़राना शहादत इसको कहते हैं

दर्शन लाल बवेजा said...

मगर इन्साफ सबसे हो, अदालत इसको कहते हैं
बहुत खूब ..
...वक्त के आगे हम सभी बेबस हैं.

Anupam karn said...

वाह! बहुत खूब
मुद्दतों बाद ऐसे शेर पढ़ने को मिले
आभार!

नीरज गोस्वामी said...

क्या शायरी है...सुभान अल्लाह...

नीरज

डॉ .अनुराग said...

कब कहाँ कैसे जिंदगी की डोर खींच जाये पता नहीं चलता ..अक्सर देखा है ओर कुदरत की इस मार के आगे बेबस महसूस किया है ....एक अच्छे इन्सान का जाना हमेशा खलता है .विनम्र श्रदांजली

सुज्ञ said...

कितनी खूबसूरत भावप्रवण गज़ल है।

इस प्रस्तुति के लिए आभार, अल्पना जी

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

अल्लाह से उनकी मग़फ़िरत के लिए दुआ करते हैं...
बहुत अच्छा और अलग अंदाज़ का कलाम है.

डॉ. मनोज मिश्र said...

हमारी भी भावपूर्ण श्रद्धांजलि ...

योगेन्द्र मौदगिल said...

shradhha-suman arpit karta hoon......

ताऊ रामपुरिया said...

जिंदगी की डोर कितनी लंबी है? कोई नही जानता, विनम्र श्रद्धांजलि.

रामराम.

MohmmadArif said...

He Was Like Father To Me.Every Time I Am Was With Him,But I Donot Know I Was Not Him That Time.He Force Me To Attend.I Am Feeling He Will Come,I Still Watting For His Phone Call.Mohammad Arif Ur Rahman.Abu Dhabi.

Rakesh Kumar said...

दिवंगत शायर अब्दुल सत्तार शेफ़्ता जी को भाव भीनी श्रृद्धांजलि.
वक़्त की हर शै गुलाम.मौत जिंदगी का सबसे बड़ा सच है.
आपने उनकी खूबसूरत गजल को प्रस्तुत किया,इसके लिए बहुत बहुत आभार आपका.

दिल हल्का करने के लिए कुछ क्षण मेरे ब्लॉग पर बितायियेगा.आशा है सकून मिलेगा.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

दुखद.. अफसोसनाक...

अल्पना वर्मा said...

इस पोस्ट पर टिप्पणी करने का विकल्प खत्म किया जा रहा है.
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