July 26, 2011

मन की गिरह


मन की गिरह

मन की गिरह में बाँध कर तेरी यादें ,
अब अपने रस्ते चल दी हूँ मैं ,
खुलेगी नहीं ये किसी भी ठोकर से,
यूँ पत्थर सी बन गयी हूँ मैं ,

जब कभी बहती हवा थम जायेगी,
जब कभी झूमती नदी रुक जाएगी ,
जब कभी वेवक्त सांझ गहराएगी,
जब कभी खिली चाँदनी धुन्धलाएगी ,

जब कभी अजनबी सदा बुलाएगी ,
जब कभी ख़ामोशी भी डराएगी,

जब कभी चाहना स्वप्न बोयेगी
जब कभी बेवजह आँख रोएगी ,
जब कभी थक जाऊँगी चलते -चलते ,
और कोई चिराग बुझेगा जलते - जलते

तब ही किसी दरख्त की छाँव तले ,
तेरी मौजूदगी का आभास किये,
खोल दूंगी इस गिरह को मैं ,
आँखों में भर कर तेरी यादों को ,
अपनी रूह में जज़्ब कर लूंगी मैं,
फ़िर जब भी रुकेंगी साँसे,
मुझे अलग ये हो न पाएंगी,
रहेंगी साथ सदा
और जायेंगी संग, उस जहाँ में भी....
हाँ, रहेंगी साथ सदा उस जहाँ में भी....

--------------अल्पना वर्मा ---------------

53 comments:

दर्शन लाल बवेजा said...

बहुत ही अच्छे लगे ....फ़िर जब भी रुकेंगी साँसे,
मुझे अलग ये हो न पाएंगी,
आभार

सदा said...

और जायेंगी संग, उस जहाँ में भी....
हाँ, रहेंगी साथ सदा उस जहाँ में भी.

बेहतरीन शब्‍दों का संगम इस अभिव्‍यक्ति में ।

दिगम्बर नासवा said...

तेरी मौजूदगी का आभास किये,
खोल दूंगी इस गिरह को मैं ,
आँखों में भर कर तेरी यादों को ,
अपनी रूह में जज़्ब कर लूंगी मैं,..

गहरी उदासी लिए है आपकी नज़्म ... किसी की यादों को इस तरह से ज़ज्ब करना ... खुद को बना लेना और पत्थर हो जाना ... दर्द भरा नगमा है कोई ...

Anonymous said...

'दो चार दिन की बात है दिल ख़ाक में सो जायेगा
जब आग पर काग़ज़ रखा बाकी बचा कुछ भी नहीं'

इस पन्ने पर आज उदासियाँ बिखरी पड़ी हैं.

Kajal Kumar said...

कोमल भाव व दृढ जीवट. सुंदर.

कविता रावत said...

और जायेंगी संग, उस जहाँ में भी....
हाँ, रहेंगी साथ सदा उस जहाँ में भी.
...man ke gahan udas kshano mein saath nibhana yahi to jiwatta ka parichayak hai...
bahut badiya prastuti..

Mukesh Kumar Sinha said...

तब ही किसी दरख्त की छाँव तले ,
तेरी मौजूदगी का आभास किये,
खोल दूंगी इस गिरह को मैं ,
आँखों में भर कर तेरी यादों को ,
अपनी रूह में जज़्ब कर लूंगी मैं,
फ़िर जब भी रुकेंगी साँसे,
मुझे अलग ये हो न पाएंगी,
रहेंगी साथ सदा....
har pankti me ek alag sa dard hai..!!
itni udasi kyon alpana jee:)

ताऊ रामपुरिया said...

जब कभी चाहना स्वप्न बोयेगी
जब कभी बेवजह आँख रोएगी ,
जब कभी थक जाऊँगी चलते -चलते ,
और कोई चिराग बुझेगा जलते - जलते

जीवन का राज समाया है इनमें.

रामराम.

S.M.HABIB said...

एक सुगढ़ रचना मन की गिरह...
सादर...

"उदासी का एक तराना है
यह भाव सदा अनजाना है
जो रहता है भीतर दिल के
किसने इसको पहचाना है "

प्रवीण पाण्डेय said...

गहरे भावों को समेटे यह रचना।

वीना said...

और जायेंगी संग, उस जहाँ में भी....
हाँ, रहेंगी साथ सदा उस जहाँ में भी....

खूबसूरत भावों से सजी सुंदर रचना...

सुमन'मीत' said...

komal c kavita..bahut achhi lagi...

अमिताभ श्रीवास्तव said...

गिरह बंध गई तो समझों वह 'उस' जहां तक साथ रहना है. और अगर वो मन की हो तो रास्तों से होते हुए हवा, नदी, सांझ, चांदनी, स्वप्न, चिराग, दरख्त, रूह से होते हुए उतर जाती है इस पूरी प्रकृति में..चाहे रुक जाये सांसे भी, क्या फर्क? गिरह होती ही ऐसी हैं।

भावप्रधान शब्द कविता के रूप में..बहुत दिनों बाद पोस्ट हुए..., अच्छे लगे..।

ज्योति सिंह said...

तब ही किसी दरख्त की छाँव तले ,
तेरी मौजूदगी का आभास किये,
खोल दूंगी इस गिरह को मैं ,
आँखों में भर कर तेरी यादों को ,
अपनी रूह में जज़्ब कर लूंगी मैं,
फ़िर जब भी रुकेंगी साँसे,
मुझे अलग ये हो न पाएंगी,
रहेंगी साथ सदा
और जायेंगी संग, उस जहाँ में भी....
हाँ, रहेंगी साथ सदा उस जहाँ में भी....
gam ka khazana tera bhi hai mera bhi -gazal ki line yaad aa gayi ,bahut hi sundar likha hai mano mere khyaal ko apne shabdo me piro diya ,baat dil ko chhoo gayi ,adbhut .yakin nahi ho magar aese hi khyaal mere jahan me janm liye the tabhi padhkar taslli hui ,kuchh shabd uske tumhe likh rahi hoon ---jameen se hokar juda ek aur jahan banaye ......

ज्योति सिंह said...

tasvir bhi bahut pyaari hai ,

रंजना [रंजू भाटिया] said...

तब ही किसी दरख्त की छाँव तले ,
तेरी मौजूदगी का आभास किये,
खोल दूंगी इस गिरह को मैं ,
आँखों में भर कर तेरी यादों को ,
अपनी रूह में जज़्ब कर लूंगी मैं,

बहुत सुन्दर बेहतरीन पंक्तियाँ इस रचना की

नीरज गोस्वामी said...

तब ही किसी दरख्त की छाँव तले ,
तेरी मौजूदगी का आभास किये,
खोल दूंगी इस गिरह को मैं ,
आँखों में भर कर तेरी यादों को ,

वाह..कमाल की रचना...बधाई स्वीकारें

नीरज

Dr (Miss) Sharad Singh said...

खोल दूंगी इस गिरह को मैं ,
आँखों में भर कर तेरी यादों को ,
अपनी रूह में जज़्ब कर लूंगी मैं,
फ़िर जब भी रुकेंगी साँसे,
मुझे अलग ये हो न पाएंगी,


बहुत सुन्दर रचना.....

mahendra srivastava said...

बहुत सुंदर..भावपूर्ण रचना

जब कभी चाहना स्वप्न बोयेगी
जब कभी बेवजह आँख रोएगी ,
जब कभी थक जाऊँगी चलते -चलते ,
और कोई चिराग बुझेगा जलते - जलते


क्या कहने

Vijai Mathur said...

मार्मिक कविता का संदेश अच्छा है ।

Rakesh Kumar said...

कितना सुन्दर लिखतीं हैं आप.
कल कल छल छल धाराप्रवाह सा
भाव और शब्द अति उत्तम हैं.
मन पर छाप छोडतें जाते है.

अनुपम प्रस्तुति के लिए आभार.

मेरे ब्लॉग पर दर्शन देकर शानदार टिपण्णी
से आपने मुझे निहाल कर दिया है.
बहुत बहुत शुक्रिया अल्पना जी.

डॉ .अनुराग said...

दर्द है भीतर ..

डॉ. मनोज मिश्र said...

@मन की गिरह में बाँध कर तेरी यादें ,
अब अपने रस्ते चल दी हूँ मैं ,
खुलेगी नहीं ये किसी भी ठोकर से,
यूँ पत्थर सी बन गयी हूँ मैं ...
गहन भाव लिए बेजोड़ पंक्तियाँ , सुंदर रचना की प्रस्तुति के लिए आपको धन्यवाद.

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

गहन अभिव्यक्ति लिए रचना ...बहुत सुंदर

Arvind Mishra said...

वाह कितनी कोमल और समर्पित भावनाओं की अभिव्यक्ति -कोई ऐसा चाहने वाला मिले तो जीवन सार्थक हो जाए!सुन्दर अभिव्यक्ति ,सुन्दर पुरकशिश कविता !

daanish said...

मन की गिरह में बाँध कर तेरी यादें
अब अपने रस्ते चल दी हूँ मैं
खुलेगी नहीं ये किसी भी ठोकर से
यूँ पत्थर सी बन गयी हूँ मैं

गीत
प्रारम्भ से ही अपना प्रभाव बना रहा है
हर पंक्ति के साथ ही हर पढने वाला
शब्द शब्द स्वयं को खोजने का प्रयास करता महसूस होता है
एक उत्तम रचना के सृजन पर बधाई स्वीकारें .

PUKHRAJ JANGID पुखराज जाँगिड said...

भाव, अभाव, साहस और जिजीविषा की कविता...

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri said...

गहन भावों को समेटे कुछ उदास करती आध्यात्मिक चिंतन को दर्शाती अलौकिक
प्रेम की अभिव्यक्ति....!!

P.N. Subramanian said...

जिन पंक्तियों को मैं उद्धृत करना छह रहा था वे सब चुरा लिए गए हैं. बेहद खूबसूरत, भावनात्मक रचना. आभार.

himkar said...

आपके इस गुण से अबतक अनजान था. आपकी काव्य प्रतिभा विलक्षण है. इस गीत में आपकी कवित्व क्षमता खुल कर सामने आयी है.
वैसे यादों को तो मन जीवन पर्यंत संजोता है. प्रेम की बेल को मीरा की तरह आंसुओं से सींचना ही पड़ता है.
रात और दिन का एक खूबसूरत गीत याद आ रहा है. दिल की गिरह खोल दो, चुप न बैठो, कोई गीत गाओ...

Amrita Tanmay said...

Gahan bhavon ko sundar shabd deti rachana

Mrs. Asha Joglekar said...

कुछ यादें सदा के लिये बस जाती हैं मन में पर आप तो उसे उस पार भी ले गईँ । भावपूर्ण प्रेम कविता .

Vijay Kumar Sappatti said...

अल्पना जी

बहुत दिनों के बाद आया हूँ क्षमा.

आपकी इस कविता ने मन को भिगो सा दिया है .. क्या कहूँ शब्द नहीं है ..कुछ कहने के लिये ..

आभार

विजय

कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

स्नेहमयी अल्पना जी
सादर सस्नेहाभिवादन !

मन की गिरह क्या है … भावनाओं का ज्वार है ! एहसासात की उथल-पुथल रही होगी लिखते वक़्त भी वैसी ही , जैसी पढ़ते समय कोई भी महसूस कर सकता है …

अल्पना जी , क्या कुछ नहीं समाहित-समाविष्ट कर दिया आपने इस रचना में !!
मन की पीड़ा , ठेस पहुंचने से उत्पन्न प्रतिक्रिया , मर्माहत होने का भाव , करुणा , वेदना ,नैराश्य , स्वाभिमान , कुछ कर दिखाने का संकल्प , संतुष्टि , समर्पण भाव , निश्चय और विश्वास …

बहुत प्रभावित करने वाली रचना है … नमन !!

चलती रहे लेखनी यूं ही निर्बाध …
… साथ ही मधुर कंठ से भी सरस्वती का प्रसाद बांटती रहें … … …
हार्दिक मंगलकामनाएं !

मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाओ के साथ
-राजेन्द्र स्वर्णकार

Ehsaas said...

gazab ka likha hai aapne...shabd ho ya jazbaat...sab kuchh..bas kamaal hai...!!


http://teri-galatfahmi.blogspot.com/

Sapna Nigam ( mitanigoth.blogspot.com ) said...

बेहद कोमल भावनाओं को सादगी से पिरो कर गहरी बात कही गयी है.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

kamaal ki bhavnaayon se ot-prot. prem ka ek roop ye bhi...

ज्योति सिंह said...

swatantrata divas ki badhai .

सतीश सक्सेना said...

कहाँ खो गयी हैं आप .....
शुभकामनायें !

Anonymous said...

मन पर प्रभाव छोडती हुई कविता.

-रजनी प्रभाकर

๑♥!!अक्षय-मन!!♥๑, said...

shadon ke bahav main behta chala gya
mam bahut hi accha likhaa har baar ki tarhaan

ज्योति सिंह said...

राख कितनी राख है, चारों तरफ बिखरी हुई,
राख में चिनगारियां ही देख अंगारे न देख।
dushyant ji ko padhkar maja aa gaya ,tippani ka vikalp rakhna chahiye hum apne vichar kase jahir kare ,post kitni achchhi hai tumahari .

NEELKAMAL VAISHNAW said...

नमस्कार....
बहुत ही सुन्दर लेख है आपकी बधाई स्वीकार करें

मैं आपके ब्लाग का फालोवर हूँ क्या आपको नहीं लगता की आपको भी मेरे ब्लाग में आकर अपनी सदस्यता का समावेश करना चाहिए मुझे बहुत प्रसन्नता होगी जब आप मेरे ब्लाग पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएँगे तो आपकी आगमन की आशा में........

आपका ब्लागर मित्र
नीलकमल वैष्णव "अनिश"

इस लिंक के द्वारा आप मेरे ब्लाग तक पहुँच सकते हैं धन्यवाद्
वहा से मेरे अन्य ब्लाग लिखा है वह क्लिक करके दुसरे ब्लागों पर भी जा सकते है धन्यवाद्

MITRA-MADHUR: ज्ञान की कुंजी ......

Ojaswi Kaushal said...

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Rakesh Kumar said...

मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.
नई पोस्ट पर अपने सुविचार प्रकट कीजियेगा.

indu puri said...

तब ही किसी दरख्त की छाँव तले ,
तेरी मौजूदगी का आभास किये,
खोल दूंगी इस गिरह को मैं ,
आँखों में भर कर तेरी यादों को ,
अपनी रूह में जज़्ब कर लूंगी मैं,

देखो जैसे मैंने अलग नही किया खुद को आप लोगों से.मेल आई डी ब्लोक क्या हास्ब बहा लेगया.अते..पते...सब.
आई तो देखती हूँ प्रेम में पगी एक रचना जैसे मेरे भावों को अपने शब्द वसन से धक लेने को तैयार खड़ी है.
प्रेम बहता ही नही सोते-सा फूटता है तुम्हारी रचनाओं में से............

वर्ज्य नारी स्वर said...

शुभकामनायें

NEELKAMAL VAISHNAW said...

आपको अग्रिम हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं. हमारी "मातृ भाषा" का दिन है तो आज से हम संकल्प करें की हम हमेशा इसकी मान रखेंगें...
आप भी मेरे ब्लाग पर आये और मुझे अपने ब्लागर साथी बनने का मौका दे मुझे ज्वाइन करके या फालो करके आप निचे लिंक में क्लिक करके मेरे ब्लाग्स में पहुच जायेंगे जरुर आये और मेरे रचना पर अपने स्नेह जरुर दर्शाए..
MADHUR VAANI कृपया यहाँ चटका लगाये
BINDAAS_BAATEN कृपया यहाँ चटका लगाये
MITRA-MADHUR कृपया यहाँ चटका लगाये

uljheshabd said...

बहुत मार्मिक सन्देश आपने इस शब्द्लाहरी के माध्यम से दिया है ..कृपया बधाई स्वीकार करें ....

Rakesh Kumar said...

आपकी नई पोस्ट की आशा में आपके ब्लॉग पर आया था.
नई पोस्ट का इंतजार है, अल्पना जी.

मेरी नई पोस्ट 'सीता जन्म आध्यात्मिक चिंतन-४'
पर आईयेगा. आपका इंतजार है.

Vaneet Nagpal said...

नमस्कार,
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं |
आप के लिए "दिवाली मुबारक" का एक सन्देश अलग तरीके से "टिप्स हिंदी में" ब्लॉग पर तिथि 26 अक्टूबर 2011 को सुबह के ठीक 8.00 बजे प्रकट होगा | इस पेज का टाइटल "आप सब को "टिप्स हिंदी में ब्लॉग की तरफ दीवाली के पावन अवसर पर शुभकामनाएं" होगा पर अपना सन्देश पाने के लिए आप के लिए एक बटन दिखाई देगा | आप उस बटन पर कलिक करेंगे तो आपके लिए सन्देश उभरेगा | आपसे गुजारिश है कि आप इस बधाई सन्देश को प्राप्त करने के लिए मेरे ब्लॉग पर जरूर दर्शन दें |
धन्यवाद |
विनीत नागपाल

Naveen Mani Tripathi said...

behatareen rachana lagi ....bahut bahut abhar Alpana ji

Anupama Tripathi said...

गहन रचना ,,छाप छोड़ रही है ...
शुभकामनायें ...