July 5, 2011

बरखा और बाँवरी

सावन की पड़ी फुहार तो बाँवरी बिरहन का मन उस से क्या बोल उठा? सुनिए -:



बरखा और बाँवरी
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उमड़ घुमड़ कर छाये बादल,
रिमझिम रिमझिम जल बरसायें,
हौले आती बोल बाँवरी,
काहे को यूँ ही अलसाए?

भीजे पात हरे सगरे,
हैं फूल मगन,कलियाँ मुस्काए,
बरखा के संग नाच बाँवरी,
काहे को यूँ ही शर्माए?

छपक छपाक गूंजे सरगम सी
बूँद छम्म से जो गिर जाये,
झूम पवन संग आज बाँवरी ,
काहे को यूँ ही घबराए?

भरते सूखे नदी ताल सब,
देख देख कुदरत हरषाए,
रब से तू भी मांग बाँवरी,
परदेसी लौट आये!
परदेसी लौट आये!
----------अल्पना वर्मा --------
इसी गीत को बारिश ,बादल और चिड़ियों की आवाजों के साथ मेरे स्वर में सुनिए-:

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Also can Download Or Play Here Mp3
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36 comments:

कुश said...

ठंडी ठंडी बयारे यहाँ तक आ पहुंची...

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

इस गीत और आपकी आवाज़ की बात ही कुछ और है.
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कल 06/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी-पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Vijai Mathur said...

चित्र और कविता मनोरम हैं.

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

सुप्रिय आदरणीया अल्पना जी

सादर सस्नेह अभिवादन !

क्या बात है ! मैंने कहा क्या बात है !!

आज आनन्द की वर्षा करदी आपने ।


आपके ब्लॉग का लगभग हर गीत , जो आपने गाया है …सुना हैं मैंने । आपने अपनी गीत रचना को अपनी बनाई धुन में , अपने मधुर स्वर में शायद पहली बार गाया है …

शब्दों के लिए 100में सौ मार्क्स हैं …तो स्वर संयोजन , मधुर गायकी को 100 में 200 मार्क्स :))
उमड़ घुमड़ कर छाये बादल,
रिमझिम जल बरसायें,
हौले आती बोल बाँवरी,
काहे को अलसाए?


आपके बरखा गीत ने झुलसते हुए बीकानेर के इस बंदे को बड़ी राहत दी है … आभार !

चित्र भी छांट कर ख़ूब लगाए हैं … और … और … और … आऊंगा न फिर
अभी दो-चार बार गीत सुनने का लुत्फ़ लेना चाहूंगा … … … :)
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !

- राजेन्द्र स्वर्णकार

नीरज गोस्वामी said...

आपका मधुर स्वर, पीछे गिरती बारिश की बूँदें और बीच बीच में चिड़िया चहचहाहट ने बारिश का मंज़र साकार कर दिया है...बधाई स्वीकारें...
नीरज

Kailash C Sharma said...

बहुत सुन्दर..शब्दों, भावों और लय का उत्कृष्ट संयोजन..लाज़वाब प्रस्तुति.

डॉ. मनोज मिश्र said...

सुंदर गीत,खूब मन से गाया है आपने,आनंद आ गया.

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी रचना।

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

उमड़ घुमड़ कर छाये बादल,
रिमझिम जल बरसायें,
हौले आती बोल बाँवरी,
काहे को अलसाए?

बहुत सुंदर प्रस्तुति..... चित्र ,शब्द, स्वर सभी प्रभावित करते हैं ....

आशा said...

बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना |आपकी आवाज ने उसमें चार चाँद लगा दिए |बधाई
आशा

आशा said...

सुन्दर भाव पूर्ण रचना और मधुर स्वर बधाई
आशा

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही अच्छा, शब्द नहीं हैं।

S.M.HABIB said...

पहली बार आया आपके ब्लॉग पर....
आनंद आ गया अल्पना जी मधुर गीत सुनकर...
सादर बधाई.....

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

खुला झरोखा और बरसात
मन हर्षित है पुलकित गात.
सुंदर शब्दों में रिमझिम स्वरों ने ललित्य भर दिया.

Mukesh Kumar Sinha said...

wah jee wah!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बरखा की कविता के साथ चित्र भी मनोरम

दिगम्बर नासवा said...

छपक छपाक गूंजे सरगम सी
बूँद छम्म से जो गिर जाये,
झूम पवन संग आज बाँवरी ,
काहे को यूँ ही घबराए ...

बहुत खूब .. आपने तो यु ए इ की तपती गर्मी में ठण्ड का एहसास जगा दिया ... बहुत ही मधुर कंठ है आपके ... और सुनना भी उतनी ही महक दे रहा है जितना पढ़ना ..

श्रीप्रकाश डिमरी /Sriprakash Dimri said...

आपके सुन्दर मनभावन गीत ..और रिमझिम बरसात की अबोध फुहार ..इस गर्मी में शीतल बयार मन को आल्हादित कर गयी सुन्दर संयोजन के लिए कोटि कोटि आभार एवं शुभ कामनाएं....

Rakesh Kumar said...

वाह! घिर घिर कर बादल आ गए हैं,घुमड़ घुमड़ कर बरसात होने लगी है.
क्या यह राग 'वर्षा राग' है , जो जैसे ही पढा व सुनने बैठे बारिश की झड़ी लग गई है.

आपने सरल शब्दों में भावों की सुन्दर बरसात की है ,जिससे मेघ देवता भी आकर जल बरसाने लगे हैं.

सुन्दर प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार.

मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है.

Arvind Mishra said...

वाह, कविता और तरन्नुम में आप द्वारा वाचन भी ..बस आनन्दम आनन्दम !
आप भी एक ही हीरा हैं -बहुत शुभकामनाएं!

Sapna Nigam ( mitanigoth.blogspot.com ) said...

कमरे में ही बरखा का मौसम ला दिया आपने.पठनीय,श्रवणीय और दर्शनीय त्रियामी पोस्ट में आपका बहु आयामी व्यक्तित्व देख मन हर्षित हो गया.

सुमन'मीत' said...

bahut khoob ..aapki aawaj me sun kar bahut mza aaya

ऋचा.... said...

nice collection

Ravi Rajbhar said...

Bahut khoob apki awaj me kuchh khas hai.

रश्मि प्रभा... said...

bahut bahut bahut badhiya

sm said...

cool cool
nice poem

veerubhai said...

उमड़ घुमड़ कर छाये बदल रिम झिम रस बरसाए -बादलों की रिम झिम में आपका स्वर सावन को साकार कर गया

प्रतीक माहेश्वरी said...

अल्पना जी, आजकल तो बारिश में जाने से दर लगता है.. कहीं कोई बीमारी न गले पद जाए..
अपनी आस-पास की प्रकृति को जो प्रदूषित कर रहे हैं.. उसका फल भी भोग ही रहे हैं..

पार आपका वर्णन निश्चय ही गाँवों में अब भी देखने को मिलता होगा... :)

परवरिश पर आपके विचारों का इंतज़ार है..
आभार

रंजना said...

शब्द और स्वर से भाव और दृश्य को ह्रदय तक पहुंचा रोमांचित कर दिया आपने....

बहुत बहुत बहुत आभार...

Dr (Miss) Sharad Singh said...

मधुर गीत.... सुमधुर स्वर...

देवेन्द्र पाण्डेय said...

सुंदर वर्षा गीत।

ज्योति सिंह said...

न तूफानों से घबराए जराअत उसको कहते हैं
जला डाले जो कश्ती इस्त्कामत उसको कहते हैं

दरे बातिल से टकराना शुजाअत उसको कहते हैं
जो कर दे जान नज़राना शहादत इसको कहते हैं
aage wali post par tippani karne gayi to wahan pata chala tumne lock kar diya ,
छपक छपाक गूंजे सरगम सी
बूँद छम्म से जो गिर जाये,
झूम पवन संग आज बाँवरी ,
काहे को यूँ ही घबराए ...
is post ye tippani bahut lubhavani kavita hai

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

आपकी एक पोस्ट की हलचल आज यहाँ भी है

mehhekk said...

barakha ki thandi thandi fuhaar aur boondon ki cham cham sidhe dil mein utat gayi,behad sunder.kaisi hai app alpanaji,aasha hai sab thik hai.am fine to.mehek.

P.N. Subramanian said...

सुन्दर प्रस्तुति. मेरे घर में ही एक हरश्रृंगार का पेड़ है. शामहोते ही हजारों की संख्या में गौरैय्ये सामूहिक गायन करने लगते हैं. बारिश भी हो रही है. मैंने आपके गीत को उस सन्दर्भ के साथ जोड़ कर आनंदित हुआ.

Amrita Tanmay said...

Madhur aur sundar geet hai ..karnpriya