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June 7, 2013

खुद को छलते रहना..


 --१--

धूप में चलते हुए,
इस ख़ुश्क ज़मीन पर
 क़दम ठिठके 
ज़रा छाँव मिली
लगा किसी दरख्त के नीचे आ पहुंची हूँ.
मगर नहीं ,
यह  तो बादल का एक टुकड़ा है जो 
ज़रा बरसा और पानी बन कर बह गया,
धूप अब और तेज़ लगने लगी है मुझको !
----अल्पना -----
..............................................................................................






-२-

पलकों में बंद किये सब मोती ,
दिल की एक गिरह बाँधकर 
उस में छुपा ली हैं  सब यादें, 
 मुट्ठी में कैद किये हैं  सपने 
कर लिया है चेहरे को भावों से खाली,
और खामोशियों को दे दी है जुबां ,
कारवां चले न चले साथ मगर 
चलना ही होगा अब,  
कि रास्ता मुश्किल 
और मंजिल बहुत दूर दिखती है !
-----अल्पना --------
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49 comments:

मन्टू कुमार said...

Umda Bhao Liye Hue.
Jab Iski Khabar Ho Jaye Ki Manjil Bahut Dur Hai Tab Bahut Kuchh Aasan Bhi Ho Jata Hai...

ARUN SATHI said...

अतिसुन्दर। सार्थक।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज शुक्रवार (07-06-2013) को पलटे नित-प्रति पृष्ट, आज पलटे फिर रविकर चर्चा मंच 1268 में "मयंक का कोना" पर भी है!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

प्रवीण पाण्डेय said...

बादलों का साथ जब तक, है भरोसा,
छत सदा, ठहरी वहाँ, बन जड़ खड़ी।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

मन की भावनायें कागज पर.

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

शानदार,बहुत उम्दा प्रस्तुति,,,

RECENT POST: हमने गजल पढी, (150 वीं पोस्ट )

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

दोनों रचनाएँ भाव पूर्ण

P.N. Subramanian said...

"कारवां चले न चले साथ मगर चलना ही होगा अब, कि रास्ता मुश्किल और मंजिल बहुत दूर दिखती है !" बहुत सुन्दर परन्तु ऐसी तन्हाई से किसी का भी वास्ता न पडे.

ताऊ रामपुरिया said...

पहली कविता मन की वह अवस्था खूबसूरती से बयां हुई है जब हम किसी अस्थायी टौर को पकका मान लेते हैं और मालूम पडता है यह तो दुनियां की तरह क्षण भंगुर है, सार्थक रचना.

रामराम.

ताऊ रामपुरिया said...

दूसरी कविता जीवन की सच्चाई है, जिसे बहुत ही दार्शनिक भाव से आपने अभिव्यक्त किया है, बहुत ही सुंदर रचना.

रामराम

Vikesh Badola said...

छांव,बादल,धूप
पलक,दिल,यादें
...................कोई नहीं है फिर भी है आपको ना जाने किसका इंतजार..........।

Alpana Verma said...

खुद को छलते रहना फिर भी चलते रहना ..यही तो जीवन है न!
आभार.

Alpana Verma said...

बड़े ही खूबसूरत गीत की याद दिला दी आपने ..आभार.

Alpana Verma said...

सहमत .
आभार.

Alpana Verma said...

सच है.

Alpana Verma said...

भरोसा....!

तुषार राज रस्तोगी said...

बेहतरीन

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...

प्रभावी !!!
शुभकामना
आर्यावर्त

सुज्ञ said...

गहन सार्थक अभिव्यक्ति!!

Pallavi saxena said...

भावपूर्ण गहन भाव अभिव्यक्ति ...

vandana gupta said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(8-6-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!

Manav Mehta 'मन' said...

बहुत बढ़िया

अरुणा said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!

Shashi said...

Liked it .

डॉ.विजय शिंदे said...

कारवां चले न चले पर हमें चलना होगा सकारात्मकता को लेकर आता है। आशावादी रहकर अपना काम ईमानदारी से करना बहुत जरूरी है आपकी लघु कविता बता रही है।

प्रतिभा सक्सेना said...

जीवन की यात्रा है चले बिना गुज़र भी तो नहीं !

arvind mishra said...

राबर्ट फ्रास्ट की कविता याद आई
...और अभी तो मीलों मुझको मीलों मुझको चलना है !
आपकी यह यात्रा वांच्छित फल दे -यही कामना है !
कविता गहन सम्वेदात्मक भावों से भरी है!

डॉ टी एस दराल said...

वाह ! बहुत सुन्दर क्षणिकाएं। जिंदगी में छाँव कम , धूप ज्यादा होती है।

आशा जोगळेकर said...

दोनो कविताएं सुंदर अलग सी ।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

सुन्दर अभिव्यक्ति। सच्ची अनुभूति बयाँ करती।

रचना दीक्षित said...

दोनों क्षणिकाएँ अदभुत चित्र खींचती है इस मौसम का. सुंदर प्रस्तुति.

अनूप शुक्ल said...

अच्छी छुटकी कवितायें। :)

दिगम्बर नासवा said...

अकेले में चलना हो तो सभी चीजें जरूरी होती हैं ...
यादें संबल होती हैं ... जब खामोशी बाते करे तो तन्हाई कैसे रहेगी ....कारवां भी तो साथ रहेगा ...

tejkumar suman said...

अति सुन्दर भावपूर्ण रचनाएँ। सच्चा चितरण प्रस्तुत करने के लिए बधाई। सस्नेह

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

चितन को प्रेरित करती शसक्त रचना ..सदर बधाई के साथ

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

man ko choone waalee rachnaon ke liye hardik badhayee ..saadar

jyoti khare said...

सच,सुंदर अनुभूति
बेहतरीन प्रस्तुति
सादर

आग्रह है- पापा ---------

तुषार राज रस्तोगी said...

अत्यंत सुन्दर कवितायेँ | बधाई

Brijesh Singh said...

आपकी यह रचना निर्झर टाइम्स (http://nirjhar-times.blogspot.in) पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

Reetika said...

khud ko chhalna asaan nahi hota..zakhmon ki tees kahin na kahin bani rehti hai..aise zakhm jo dikhte to nahi hain par naasoor ban humesha saath rehte hain...

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

सुन्दर भाव...बहुत बहुत बधाई...

Vikesh Badola said...

कहां हैं। बहुत दिनों से खबर नहीं है आपकी। स्‍वास्‍थ्‍य तो ठीक है ना।

arvind mishra said...

उन्ही रास्तों में ऐसा गुम होना भी ठीक नहीं ! :-(

Neeraj Kumar said...

छोटी पर सारगर्भित कवितायेँ . बहुत सुन्दर .

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर! एक महीने में एक पोस्ट का हिसाब है क्या ? :)

Maheshwari kaneri said...

सारगर्भित सुन्दर अभिव्यक्ति।..

धीरेन्द्र अस्थाना said...

gati (chalanaa)hi jivan hai.
aur prateeksha men aahlad !

Kaushal Lal said...

सार्थक,सुन्दर अभिव्यक्ति

premkephool.blogspot.com said...

बेहतरीन