April 23, 2013

प्रश्न!

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न यहाँ कौरव थे , न शतरंज की बिसात 
कातर  स्वर और पुकार 
क्यों कान्हा तुमने सुना नहीं?
देह उघडी,
हुई रूह छलनी ,
और  शर्मसार मानवता .
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................................................अल्पना ...............................................






23 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज मंगलवार (23-04-2013) के मंगलवारीय चर्चा --(1223)"धरा दिवस" (मयंक का कोना) पर भी होगी!
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ!
सूचनार्थ...सादर!

VIJAY SHINDE said...

वर्तमान में जो घटित हुआ है वह सहज अभिव्यक्त हुआ है। छोटी कविता के भीतर तार-तार कपडों की स्त्री की अवस्था देख कान्हा क्यों अवतरित नहीं हो रहे कहने पर भी कान्हा आने की संभावनाएं धुसर है या कहे नहीं है। हां अगर नारी के मन में आ जाएं तो दुर्गा जरूर बचाने के लिए आ सकती है।

कालीपद प्रसाद said...


अनुभूति की बढ़िया प्रस्तुति !
डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को, अनुभव करे मेरी अनुभूति को
latest post बे-शरम दरिंदें !
latest post सजा कैसा हो ?

Maheshwari kaneri said...

भावपूर्ण प्रस्तुति..आभार

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

वाकई शर्म आती है।

दिगम्बर नासवा said...

सच में शर्मसार है इंसानियत, मानवता ओर पुरुष समाज ... हद होती है वहशीपन की भी ...

डॉ टी एस दराल said...



मार्मिक।
कौन कब कौरव बन जाये , क्या पता !

Shashi said...

emotional and real truth in this poem .

ताऊ रामपुरिया said...

भावनाओं कॊ बहुत ही मार्मिकता से प्रकट किया है, जो आपकी भावनाएं हैं वही हर भारतीय की भावनाएं हैं. अत्यंत दुखद घटनाएं हर जगह रोज घट रही हैं. कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नही है, आखिर कब तक सहा जायेगा?

रामराम.

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

वाकई में शर्मसार करती घटना ,,,

RECENT POST: गर्मी की छुट्टी जब आये,

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

वाकई में शर्मसार करती घटना ,,,

RECENT POST: गर्मी की छुट्टी जब आये,

प्रवीण पाण्डेय said...

न जाने कितने टुकड़ों में फैली दानवता।

पूरण खण्डेलवाल said...

मार्मिक प्रस्तुति !!

expression said...

कान्हा तो नहीं आये..मगर दांव पर आखिर किसने लगाया????

:-(

अनु

Vikesh Badola said...

.....समय के विद्रूप।

Anonymous said...

kalyug .. jungle ka qanoon .. bhediye .. haiwaniyet ..andhera .. shikaar ..masoomiyet.. laachari .. aatmhattya ...

P.N. Subramanian said...

उफ्फ!

Manav Mehta 'मन' said...

nishabd

jyoti khare said...

छोटी लेकिन तीखी सटीक बात
वर्तमान का घिनोना सच

आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों

arvind mishra said...

एक चिरन्तन दारुण कथा है यह! :-(

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

ओह! बहुत सुंदर

Sunita Agarwal said...

umda prastuti ..vartmaan bhartiya parivesh ko chitrit karti ...kanhaa nhi ayenge ..ab khud striyo ko hi apni atmrakhsa ka upay karna hoga

Vinnie Pandit said...

kam shabdo me aap ne bhuta kuch kah diya hai.
vinnie