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''यूँ तो वतन से दूर हूँ लेकिन इस की मिट्टी मुझे हमेशा अपनी ओर खींचे रहती है''

May 26, 2010

बंज़र हथेलियाँ

एक नज़्म-:


बंज़र हथेलियाँ
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क रोज़ उग आये थे कुछ लम्हे
खुद ब खुद हथेलियों पर मेरी ,
चाहत की नमी ,
अहसास की गरमी ने पाला था उन्हें ,
और पलकों ने दिया था साया ,

जिस रोज़ आँख लगी मेरी ,
जागी तो ,
इस धरती को बंज़र पाया ,
ढूँढा बहुत ..मगर ,
कोई लम्हा फ़िर न मिला
मालूम हुआ है,
कि 'रेखाएँ ' ...खुदगर्ज़ हुआ करती हैं!

.............................अल्पना ...........................


May 13, 2010

वक्त का बायस्कोप





भी खुद से रूबरू होने का दिल करता है,घर की छत पर जाती हूँ ,टहलती हूँ ......छत से देखूं तो एक तरफ दौड़ती भागती सड़कें दिखती हैं और दूसरी ओर है कब्रिस्तान.छत से वहाँ मुझे सिर्फ बहुत से पत्थर दिखाई देते हैं जो स्मृति चिन्ह जैसे लगाये हुए हैं.सब से बेखबर रूहें चैन से सो रही है जैसे सब कुछ ठहरा हुआ है वहीँ दूसरी तरफ ज़िन्दगी अपने पूरे जोश में दौड़ भाग रही है, thami hui lifeसिग्नल लाल होता है तो दम भरती है ,ठहर जाती है..हरा सिग्नल होते ही फिर दौड शुरू मंज़िल की ओर!
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खुले आकाश के नीचे ,खासकर रात के अँधेरे में इन्हें देखना मुझे कोईभी डर नहीं देता बल्कि विपरीत दिशा में बने इस विरोधाभास को देखना और खुद को इस के बीचों बीच खड़े पाना अजीब से अहसास देता है .जिसमें शायद सुकून अधिक है ,इस बात का कि मैं तो उस दौड़ में शामिल हूँ ही उस ठहराव में!

से ही एक दिन अचानक वक़्त मेरे सामने बाईस्कोप ले कर आ पहुंचा.थोड़ा हिचकिचाती हूँ क्योंकि वह बाईस्कोप दिखाने के लिए पैसे या कटोरा भर अनाज नहीं लेता ,एवज़ में वह मांगता है मेरी आँखों से गिरती कुछ बूँदें!
ये वक़्त इतना निष्ठुर क्यूँ है?”

bioscopeबाईस्कोप’ में झांकती हूँ तो देखती हूँ एक लड़की शायद कक्षा ७ में रही होगी,फ्राक पहने हुए है, बस से उतरी है,नहर के किनारे -किनारे पगडण्डी से यहाँ -वहाँ देखते हुए चली जा रही है.आते-जाते लोग उस से मिल रहे हैं प्यार से पूछ रहे हैं 'स्कूल ख़तम हो गए?दादी के पास आई हो?अकेली आई हो?और न आया कोई साथ में? कुछ दिन रूक कर जाएगी? सब का जवाब ‘हाँ /न’ में देती हुई आगे बढ़ रही है.नहर और खेत के बीच बना है यह रास्ता.

वह स्कूल के बाद गर्मियों की छुट्टियों में शहर से गाँव जा रही है.उसे गाँव से बहुत मोह है तभी अकेली दादी के पास रहने चली आई.गाँव में दाखिल होते ही घरों के बीच - बीच से अपनी दादी के घर पहुंची.दादी को पहले ही ख़बर थी ,सुबह दूधवाले के हाथ संदेस मिल गया था.उसके पापा ने ग्वाले के हाथ एक दिन पहले भिजवाया था.[ ये दूधवाला गाँव से दूध इकट्ठा कर के शहर बेचता था रोज़ तड़के उस का यही काम था,उसके ज़रिये यहाँ वहाँ सन्देश लाने ले जाने का काम भी हो जाता था.]

दादी ने स्नेह भरे हाथों से सर सहलाया ,प्यार किया.और पूछा 'बस में परेशानी तो न हुई'..उस ने ‘न’ कहते सर हिला दिया.

दादी से छाछ ले कर पिया ही था कि देखा आस पास घरों से उसकी मित्र मंडली भी वहाँ पहुंची हुई है.अब वह मित्र मंडली के साथ बातों में मस्त हो गयी है.शायद आते ही किसी mangotreeखुराफाती कार्यक्रम का प्लान तैयार हो रहा है!

की मुंडेरों से कूदते बच्चे इस घर से उस घ टापते हुए,हेंडपंप,बम्बे के पानी में तैरती मछलियाँ ,हरे भरे खेत,गाय-भैंसे ,कुट्टी काटने की आवाज़,दही बिलोती ताई,सिलबट्टे पर हल्दी - लहसुन पिसती भाभी,चूल्हे पर बनती गिले हाथ की नमकीन रोटी की महक ,दादी की रसोई में चूल्हे के पास ओट्ता दूध ,आम के बाग़ और उन पर तोते के खाए आम ढूँढना और गुलेल!.....

'जाने क्या swingingक्या देख रही हूँ वहाँ....'


'म्मा आप अभी तक यहाँ हो?' बेटे की आवाज़ ने चौंका दिया.
मुड़कर उसे देखा और कहा 'हाँ ,अभी नीचे आती हूँ.'
और इस के साथ ही वक़्त भी अपने बाईस्कोप समेत कहीं गायब हो गया.
सीढ़ियों से उतरते हुए रोशनी में बेटे ने मुझे देखा और पूछा'आर यू क्रायींग ?[क्या आप रो रहे हो?].
मैं ने जवाब दिया..बस ऐसे ही…इंडिया में स्कूलों की छुट्टियाँ शुरू हो गयी हैं न ,बस कुछ पुराने दिन याद आ गये.
बेटे ने याद दिलाया ‘पापा तो कहते हैं न आप अकेले हो आओ एक वीक के लिए?’ ..फ़िर चले जाओ?'

‘हाँ जाऊँगी’..कह तो देती हूँ लेकिन जानती हूँ अकेली नहीं जा पा पाऊँगी.कुछ साल पहले अकेले गयी थी तो एक चाची जी ने टोक दिया था ‘अगली बार आना तो जोड़े से आना’ किसी को क्या कहूँ कि यह बात आज तक दिल में बैठी हुई है.

सीढियां ख़तम हुईं ,दरवाजे तक पहुँचने तक मन संयत हो चुका था.


कुछ ऐसे ही भावों को समेटे एक गीत banidini-th
अब के बरस भेज .......
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[स्वर -अल्पना]




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