March 13, 2010

तीन पन्ने

time

[चित्र साभार - गूगल ]

वक़्त को कई बार रूप बदलते देखा है.
आज कल कुछ ज्यादा ही साफ़ और करीब दिखाई देता है.
क्योंकि अब हम बच्चे नहीं हैं इसलिए उसका रूप पहले की तरह नर्म और स्नेहमयी नहीं है,
एक हाथ में नियम /काएदे की लिस्ट और दूसरे हाथ में एक मीज़ान लिए रहता है.
ये शायद मेरा मन ही है जो वक़्त की श़क्ल धर लेता है.
हम खुद भीतर से बच्चे बने रहना चाहते हैं मगर अपने बच्चों को कायदे सिखाते हैं ऐसा करो वैसा न करो .तुम अब बड़े हो गए हो!
यह हमारा दोहरा व्यवहार है या विरासत में मिले ये शब्द जिन्हें चाहे अनचाहे दोहराते रहते हैं हम पीढ़ी दर पीढ़ी ,हर पीढ़ी ?

pg

[चित्र साभार-प्रकाश गोविन्द]

कैमरे जब तक डिजिटल नहीं थे ठीक था ,कम से कम तस्वीरें हार्ड पेपर पर बन कर अल्बम में लग जाती थीं.
अब वो पी सी में रहती हैं य यू एस बी में !
पेपर में उन्हें बदलवाने के लिए समय टलता रहता है आज नहीं कल पर..
कैद कर लेना उन लम्हों को और फिर टुकड़ों टुकड़ों में उन्हें सालों साल फिर से जीना कितना सुखद लगता है!
एक तस्वीर कितना कुछ याद दिला जाती है.उस समय की उस के आगे पीछे की घटनाओं की.
दिमाग में इतना सब कहाँ स्टोर रहता है?
बहुत सी बातों के बारे में हम सोचते हैं कि हम भूल गए हैं मगर कोई एक शब्द/ कोई वाक्य/ कोई तस्वीर किसी का चेहरा /किसी की आवाज़ याद दिला जाती है सब कुछ ...नहीं तो बहुत कुछ !
यादें चीर जाती हैं कहीं भीतर तक दिल को ...दिल में दर्द का दरिया जो जमी बरफ सा था अब तक .....अहसासों की गरमाहट से पिघलने लगता है.
कैसे समाये हुए हैं इतना सब कुछ हम अपने भीतर ?
आँखों में पलकों के पीछे छुपा धुंआ न जाने कैसे बादल बन बरसने लगता है!
ऐसे में यकायक शायर बशीर बद्र का एक शेर याद आया है -
'जी बहुत चाहता है सच बोलें,
क्या करें हौसला नहीं होता !'

चलते चलते एक त्रिवेणी लिखने की कोशिश -:

वो चाँद ही था जो ले जाता था पैग़ाम मेरे ,
अब तो वो भी ,सुनता नहीं सदायें मेरी,

सुना है रुसवा बहुत चांदनी ने किया है उसे!

66 comments:

M VERMA said...

तीनो पन्ने लाजवाब
'यह हमारा दोहरा व्यवहार है या विरासत में मिले ये शब्द जिन्हें चाहे अनचाहे दोहराते रहते हैं हम पीढ़ी दर पीढ़ी ,हर पीढ़ी ?'
बचपन वो शै है जिसे जिन्दा रखना जरूरी है.

Arvind Mishra said...

सभी तो वेद वाक्य /सूत्र है जीवन के ....क्या कहूं किस पर कहूं -
हम खुद भीतर से बच्चे बने रहना चाहते हैं मगर अपने बच्चों को कायदे सिखाते हैं ऐसा करो वैसा न करो .तुम अब बड़े हो गए हो!
(सहज ही कितने मार्के की बात कही आपने )
और हाँ चांदनी ही जब चान्द की रुसवाई में लग जाय तो कहीं यह कयामत का सन्देश तो नहीं ?
त्रिवेणी में सरस्वती का यह तो प्रछन्न कहाँ, पूरा उत्फुल्ल प्रवाह है !

Udan Tashtari said...

वो चाँद ही था जो ले जाता था पैग़ाम मेरे ,
अब तो वो भी ,सुनता नहीं सदायें मेरी,

सुना है रुसवा बहुत चांदनी ने किया है उसे!



--हमने तो सुना उस रोज दिवाली ही...

रात मावस की काली थी...


-बेहतरीन प्रस्तुति!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत बढ़िया रहे आपके तीनों पन्ने!

प्रवीण पाण्डेय said...

तीनों पन्ने, तीन सत्य ।
क्या हौसला करें, अब तो फैसला नहीं होता ।

सुशीला पुरी said...

तीन पन्नों मे सारा जहाँ .........अनुपम .

ताऊ रामपुरिया said...

ये शायद मेरा मन ही है जो वक़्त की श़क्ल धर लेता है.

मुझे तो पहले पन्ने का यही गूढ सारांश लगता है. मेरी निजी सोच कहलें या अनुभव कहलें..मुझे तिनों अवस्थाएं मन द्वारा ही सम्चालित लगती हैं. शायद हमारे मन के अंदर का अबोध शिशु कभी नही मरता और जिस रोज मर गया उस रोज चलती फ़िरती लाश के सिवा इंसान कुछ नही बचता.

दुसरे पन्ने से - हां यह सही है कि कागज की तस्वीरे कुछ ज्यादा मायने रखती है डिजिटल के मुकाबले. उनके पीले पदते पन्ने कितना कुछ कह जाते हैं?

और त्रिवेणी तो लाजवाब है : आज कल चांदनी का काम ही यही रह गया है.

कुल मिलाकर आज के तीनों पन्ने सुंदरतम और उत्कृष्ट सृजन है.

रामराम.

ताऊ रामपुरिया said...

वर्तनी सुधार :

तिनों = तीनों
सम्चालित = संचालित
पदते = पडते

पढा जाये!

रामराम.

Mithilesh dubey said...

बेहतरीन , लाजवाब, उम्दा , बहुत खूब ।

भारतीय नागरिक said...

त्रिवेणी बहुत बढ़िया है. लाजबाव.

इस्मत ज़ैदी said...

नमस्कार ,बहुत सुंदर और सच्ची बातें,
ब्धाई हो
सच बोलने का हौसला वाक़ई सब में नहीं होता

बूझो तो जानें said...

हर पन्ना अपनी कहानी बयान करता है.हमारे मनोभावों को उजागर करता यह पोस्ट सुन्दर बन पडा है.
तीसरे पन्ने की पन्क्तियां बहुत अच्छी लगी.


चलते चलते--- तसवीरों के माध्यम से प्रस्तुती सुन्दर बन पडी है.तस्वीर स्थिर तो होते है लेकिन बहुत कुछ अनकहे रूप मे बयान कर जाते है.

सुशील कुमार छौक्कर said...

सुबह सुबह तीन पन्नों में लिखी प्यारी और गहरी बातें पढने को मिल सच सुबह की ताजगी महसूस हो रही है। अभी इसी से मिलता जुलता एक विचार एक जगह लिख डाला है। और आपकी त्रिवेणी का तो जवाब नही। खूबसूरत।

शरद कोकास said...

तीसरे पन्ने का चित्र सबसे सुन्दर है ..मेरे मन के एलबम मे सहेज कर रख लिया है ..देखा करूंगा हर शाम ।

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

यादें चीर जाती हैं कहीं भीतर तक दिल को ...दिल में दर्द का दरिया जो जमी बरफ सा था अब तक .....अहसासों की गरमाहट से पिघलने लगता है.
कैसे समाये हुए हैं इतना सब कुछ हम अपने भीतर ?
आँखों में पलकों के पीछे छुपा धुंआ न जाने कैसे बादल बन बरसने लगता है!
वाह......और आह का संगम.
ये तस्वीर वाली बात बिल्कुल सही कही आपने, कोई प्रोब्लम हो, तो फ़ोर्मेट करते ही सब कुछ छूमंतर हो जाता है..
त्रिवेणी भी बहुत अच्छी रही.

पंकज said...

वो चाँद ही था जो ले जाता था पैग़ाम मेरे अब तो वो भी ,सुनता नहीं सदायें मेरी,क्योंकि अब जाते नहीं हमारा उससे छत पर बतियाने. सब कुछ ई जो हो गया है, सभी के पते अब ईमेल आईडी हैं और पैगाम भी अब ई मेल हैं.

निर्मला कपिला said...

तीनो पन्ने लाजवाब दिल को छू गये। आभार्

डॉ .अनुराग said...

कई बार
सोचता हूँ
कि
फलक पर
सीडीया लगा कर
चढ़ जायूँ
ओर जोर- जोर
से चिल्लाकर पूंछू

....कोई है ?

काजल कुमार Kajal Kumar said...

डिजीटल कैमेरे की आपने सही कही.
कल तक मैं भी यही करता था कि बहुत हुआ तो डिजीटल फ़ोटो लैपटाप में डालीं व भूल गए.

लेकिन एक बार मैंने रीडर्स डाइजेस्ट में किसी का एक लेख पढ़ा ठीक इसी मुद्दे पर.. तब से मैं हर यात्रा आदि के बाद फ़ोटो पैनड्राइव में डाल कर दुकान पर ले जा, अच्छे बच्चों की तरह डवैलप करवा लाता हूं :)

kavita said...

कुछ बताते हैं,कुछ छुपाते हैं,पूरा सच बताने का किस का हौसला होता है अल्पना जी!
त्रिवेणी सहित यह पोस्ट बहुत ही अच्छी प्रस्तुति लगी .

रश्मि प्रभा... said...

kadam dar kadam ke faaslon mein bahut kuch mila.......jo dil ke paas simatkar baith gaya

"अर्श" said...

tino panno me khas kar dusaraa panna mujhe jyada karib lagaa... aisaa lagaa sath hai mere... triveni bhi... padh to liya magar sunane ke liye.. :)



arsh

"अर्श" said...

are haan manish ji ne ek khubsurat geet post kiyaa hai ... aap jarur sune fir uspe baat karnege...


arsh

गिरिजेश राव said...

फ्लैशबैक कैमरा
बचपन के चित्र घूमते हैं
काश खींच सकता
उन बीते पलों को !

मुझे नहीं पता ये पंक्तियाँ क्यों यहाँ आ उतरीं तीन पन्नों की सोहबत में।

Ram Krishna Gautam said...

त्रिवेणी में चांदनी का चाँद को रुसवा किया जाना वाकई ग़ज़ब का अनुभव है! पाठकों और चाँद, दोनों को बेहद संजीदा अनुभव दिया है आपने... तहेदिल से इस्तकबाल...



शुभ भाव

राम कृष्ण गौतम "राम"

MUFLIS said...

teen panne...
barsoN-barsoN ki baat kr gaye
aur,,,
"kaise smaaye hue haiN itna kuchh
hm sb apne bheetar.."
shayad..
na-qaabil-e-bayaan
lekin.. apka likha...
na-qaabil-e-faraamosh
(avismaraneey)

and thanks
thanks for the consideration

regards,,,
'muflis'

mukti said...

अद्भुत शैली,
सहज भाषा,
गम्भीर भाव .

pallavi trivedi said...

आपके तीनो पन्ने बहुत जाने पहचाने से लगे....लगा हरेक जिंदगी के अपने ही पल हैं!

गौतम राजरिशी said...

तीनों ही पन्ने भाये, लेकिन आखिरी पन्ने की त्रिवेनी ने सब कसर पूरी कर दी। ले जा रहा हूँ चुरा कर इसे, मैम...

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

न जाने क्यूँ आपकी ये पोस्ट पढकर कहीं बहुत पहले किसी पुस्तक में पढी ये चन्द पंक्तियाँ दिमाग में गूंजने लगी कि "मन के विषय में मस्तिष्क सदैव झूठ बोलता है। मस्तिष्क इस मन को अभिनय करना सिखाता है--और जब कभी मन उस अभिनय को भूलने लगता है, तभी अपने तर्कों से मस्तिष्क उसके ऊपर प्रहार करने लगता है। मस्तिष्क मानता नहीं और लगा रहता है मन को दाव पेंच सिखाने में--इधर मन भी एक फूहड खिलाडी की भान्ती बस हारता चला जाता है"
मैं नहीं जानता कि उपरोक्त पंक्तियों कि आपकी इस पोस्ट के साथ कोई संगति बैठती है या नहीं...बस मन में आया तो लिख दिया...शायद यहाँ भी मस्तिष्क इस मन पर अपना प्रहार कर गया :-)

मो सम कौन ? said...

अल्पना मैडम, पन्ने तीन ही क्यूं हैं? हर पन्ने ने प्यास बढ़ा दी है। तीसरा पन्ना तो अल्टीमेट है। बहुत अच्छे लगे।

योगेश स्वप्न said...

teenon panne behatareen.sunder bhavnayen sanjoye.

श्याम कोरी 'उदय' said...

....तीन पन्नों के रूप में अभिव्यक्ति कुछ "डिफ़रेंट" है ..... प्रभावशाली अभिव्यक्ति!!!!

रचना दीक्षित said...

अल्पना जी बधाई हो इस खुबसूरत पोस्ट की यहाँ तो हर पन्ना अपना सा लगा जैसे किसी ने मेरी ही चोरी पकड़ ली हो और अपने दिल के कैमरे में कैद कर ली हो

Mrs. Asha Joglekar said...

आपके ये बिल्वपत्र से तीन पन्ने बहुत ही खूबसूरत लगे जैसे मन के भाव आपने कागज पर उतार दिये ।
और त्रिवणी
वो चाँद ही था जो ले जाता था पैग़ाम मेरे ,
अब तो वो भी ,सुनता नहीं सदायें मेरी,

सुना है रुसवा बहुत चांदनी ने किया है उसे!

बहुत खूब ।

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

काफ़ी दिनो बाद आपके ब्लाग पर आया हू...ये नयी शैली अद्भुत है..जैसे दर्शन सिमट कर आपके इन तीन पन्नो मे रह गया हो..

रंजना [रंजू भाटिया] said...

तीन पन्नों का सत्य और हर रंग दिल में उतर गया और इस पर आपकी लिखी त्रिवेणी कमाल की है ..आज कई दिन बाद आना हुआ नेट पर .बहुत अच्छा लगा अल्पना जी आपका लिखा पढ़ कर ...

मीत said...

वाह और आह!! एकसाथ निकल गई आपकी इस पोस्ट को पढ़ कर... बहुत सुंदर लिखा है मेम
मीत

BrijmohanShrivastava said...

बच्चों को कायदा सिखाने पर से याद आया एक पिताजी ने बेटे के मुंह से गाली सुनी ,बच्चे को पीटने लगे ,गाली देना सीख गया है और मजेदार बात यह कि वे पीटते वक्त खुद भी गाली देते जा रहे थे | दूसरा पन्ना =ऐसा बताते है कि दिमाग का अभी तक दस प्रतिशत हिस्सा ही उपयोग में आसका है \मष्तिष्क में अपार सागर भरा हुआ है यादों का |कब किस बात पर क्या याद आजाये कहा नहीं जा सकता ,सपनों के वारे में भी कहा जाता है कि जाने कितने वर्ष पहले न जाने कौन सी बात दिमाग में बैठ चुकी थी | चाँद वाली बात अच्छी लगी ,अपराध चांदनी का और सजा भुगत रहे है हम |सही कहा है तुलसी दास जी ने कि "और करहि अपराध कोऊ ,और पाँव फल कोऊ |

डॉ. मनोज मिश्र said...

वो चाँद ही था जो ले जाता था पैग़ाम मेरे ,
अब तो वो भी ,सुनता नहीं सदायें मेरी,

सुना है रुसवा बहुत चांदनी ने किया है उसे.....

अब क्या कहें..?

यूनान मिश्र रोमा.........,कुछ बात है की हस्ती मिटती नही हमारी....

इसी तरह लिखती रहें--वाह.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

जी बहुत चाहता है सच बोलें,
क्या करें हौसला नहीं होता !'
लेकिन आपने सच बोलने की गुस्ताखी की है. बहुत सुन्दर. देर से पहुंची, माफ़ी चाहती हूं.

दिलीप कवठेकर said...

तीन अलग अलग खयालात तवज्जुह के काबिल हैं.

मन के भीतर का बालमन ही अंत तक जीवन की कडी़ सच्चाईयों से लढेगा और हमारी सेनीटी को बरकरार रखेगा. अनुशासन वह नांव है जिसपर बैठ कर ही पार जाया जा सकता है. फ़िर भी बचपना मन की संवेदनशीलता को, कोमल एहसासात को भीगे रखता है.

ओ पालन हारे का विडियो देखा. बेहद बढिया सिंक किया है.गीत तो गुनगुनाती धूप पर सुन ही चुका हूं.

गुडी पाडवा और नववर्ष की अनेक शुभकामनायें...

हरकीरत ' हीर' said...

पन्नोंकी बात बाद में करती हूँ .....मुझे तो आज ही पता चला कि प्रकाश गोविन्द जी इतनी अच्छी पेंटिंग करते हैं ....बहुत सुंदर चित्र है जो आपने लगाया है .....उन्हें ढेरों मुबारकबाद ......कल ही सोच रही थी उनके बारे ....आजकल वे आते नहीं पहले नियमित आते थे ....यूँ सबके ब्लॉग पर जाना संभव भी नहीं हो पाता ......
खैर ....आज आप कुछ गुमसुम सी लगीं ......

@ कोई एक शब्द/ कोई वाक्य/ कोई तस्वीर किसी का चेहरा /किसी की आवाज़ याद दिला जाती है सब कुछ ...नहीं तो बहुत कुछ..... कोई तो बात है ....किन्ही तस्वीरों का पिटारा खोले बैठी हैं लगता है ......

@आँखों में पलकों के पीछे छुपा धुंआ न जाने कैसे बादल बन बरसने लगता है.....मुफलिस जी ने इस बार कि पोस्ट कि भूमिका में इक शे;र लिखा है याद है .....?

प्यार और बारिश एक-से होते हैं,,,बारिश पास रह कर
तन भिगोती है और प्यार दूर रह कर आँखें..."

रंजना said...

सही कहा...
अपने अन्दर के बच्चे को कभी हम खुद ही तो कभी बहार वाले,निअरंतर ही बड़ा बनाने की चेष्टा में लगे रहते हैं और वह बच्चा है कि आँखों में अश्रुमिश्रित याचना लिए हमें देखता और कहता है..."प्लीज मुझे ऐसा ही रहने दो"

सभी भाग,त्रिवेणी,पूरा ही आलेख भावमय , अनुपम...

अमिताभ श्रीवास्तव said...

khoobsoorati se jo baat likhi jaaye vo hajam ho jaati he. aapke teen panno me se do vakai aapki gmbhirta, soch aour pusht vichaar ko parilakshit karate he.
triveni..dilchasp he.

सुमन'मीत' said...

जिन्दगी की किताब के पन्नों को पढाने का शुक्रिया सुमन ‘मीत’

ज्योति सिंह said...

वो चाँद ही था जो ले जाता था पैग़ाम मेरे ,
अब तो वो भी ,सुनता नहीं सदायें मेरी,

सुना है रुसवा बहुत चांदनी ने किया है उसे!
ek se badhkar ek ,ye sangam adbhut hai .bashir ji ki line bha gayi ,kamaal hai aur sach bhi .

kunwarji's said...

"ये शायद मेरा मन ही है जो वक़्त की श़क्ल धर लेता है."


ह्रदय छु कर गए जी तीनो पन्ने,

बड़ी इमानदारी से लिखते हो आप,

कुंवर जी,

anjana said...

वो चाँद ही था जो ले जाता था पैग़ाम मेरे ,
अब तो वो भी ,सुनता नहीं सदायें मेरी,

सुना है रुसवा बहुत चांदनी ने किया है उसे!
वाह बहुत खूब !!
विक्रम संवत 2076 और नवरात्रे की अनेक शुभकामनायें...

शोभना चौरे said...

alpnaji
bahut ache se aap sbke man ke bhvo ko janti hai tbhi to ham sab jud gye hai
in tasveero ke madhyam se ,bachpan ki masumiyat ki akanksha liye .
bahut hi khubsurt rachna hai ak imandar man ki bat .

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

बहुत खूब....अच्छी प्रस्तुति........बधाई.....

Dinesh Dadhichi said...

तीनों पन्ने आत्मालाप की स्थितियों के मार्मिक दस्तावेज हैं . सुन्दर प्रस्तुति .

JHAROKHA said...

Alpan ji,
apne to in teen pannon ke madhyam se poora jeevan darshan prastut kar diya hai---bahut sundar prastuti.
Poonam

KK Yadava said...

वो चाँद ही था जो ले जाता था पैग़ाम मेरे ,
अब तो वो भी ,सुनता नहीं सदायें मेरी,

सुना है रुसवा बहुत चांदनी ने किया है उसे!
.....बहुत ही खूबसूरत और मनभावन पंक्तियाँ..बधाई .


____________
''शब्द-सृजन की ओर" पर- गौरैया कहाँ से आयेगी

दिगम्बर नासवा said...

वो चाँद ही था जो ले जाता था पैग़ाम मेरे ,
अब तो वो भी ,सुनता नहीं सदायें मेरी,

सुना है रुसवा बहुत चांदनी ने किया है उसे

यादों की दहलीज लाँघ कर निकले तीनो पन्ने मान की संवेदनाओं का चित्रण हैं ...
बदलते समय के साथ साथ सब कुछ बदलता है ... सोचने का ढंग भी बदलता है ... पर जो सच है वो सच ही रहता है ...
आपने बहुत ईमानदारी से लिखा है ... दरअसल मन हमेशा बच्चा बना रहना चाहता है .. पर डरता है अपने ही बनाए नियमों से ... बहुत अच्छा लिखा ....

manu said...

kamaal ki trivenee....

kshama said...

Triveni aur aalekh,donohi behad achhe hain..kya kahun? Alfaaz kam padte hain..
Ramnavmiki anek shubhkamnayen!

संजय भास्कर said...

तीन पन्नों मे सारा जहाँ ........

संजय भास्कर said...

जिन्दगी की किताब के पन्नों को पढाने का शुक्रिया

भूतनाथ said...

kyaa baat....kyaa baat....kyaa baat...laazavaab.....!!

mridula pradhan said...

behad khoobsurat kavitayen hain.

अमिताभ श्रीवास्तव said...

alpnaji, itani gambhirta se kisi rachna ko padhhna..aapki saahityik ruchi ki aur ingeet kartaa he, yah ab bahut durlabh ho chalaa he, khaaskar is blogjagat me..aour yakeen maaniye me aapki us tippani ke chalte jisame aapne likhane va likhate rahne par jor diyaa thaa, amal kar rahaa hu, aur aap tathaa ap jeso chand saahityik premiyo ke liye hi likhunga.
dhanyavaad..

वन्दना अवस्थी दुबे said...

कहां व्यस्त हैं अल्पना जी आप? कब से कोई पोस्ट नहीं डाली आपने...

sandhyagupta said...

ये शायद मेरा मन ही है जो वक़्त की श़क्ल धर लेता है.

Bahut kuch kah diya aapne.Shubkamnayen.

mehhekk said...

चाँद ही था जो ले जाता था पैग़ाम मेरे ,
अब तो वो भी ,सुनता नहीं सदायें मेरी,

सुना है रुसवा बहुत चांदनी ने किया है उसे!
waah behtarin, sach naa jane magar chand ruswa hona kab chodega.

jeevan ka kuch gudh samaya is lekhani mein,behad sunder,bas baar baar padhne ko jee kare hai.

MUFLIS said...

उत्तम साहित्य की
उत्तम पुस्तक के
अगले तीन पन्नों की
प्रतीक्षा है ......