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September 27, 2009

है धरा की पुकार...

दशहरा पर्व के आते ही ,याद आते हैं बचपन के दिन जब इस त्योहार का ख़ास इंतज़ार होता था.इस दिन हमारे शहर में क्षत्रिय महासभा द्वारा दशहरा मिलन समारोह ,जिसमें सामूहिक शस्त्र पूजन ,परिवारों का मिलना ,साथ खाना और बच्चों द्वारा किया जाने वाला रंगारंग कार्यक्रम होते थे. जिस में मैं भी नियमित भाग लिया करती थी ,और सब से आखिर में होता था मुख्य आकर्षण 'पारितोषिक वितरण'!


मुझे दशहरा पर रावण ,कुम्भकरण और मेघनाद के पुतलों को जलाए जाने का तर्क कभी गले से नीचे नहीं उतरा..--'ये बुराई के प्रतीक हैं क्या बस इसलिए जलाए जाते हैं!'
ज़रा सोचीये तो कितनी लकडी ,कागज़ और विस्फोटकों का इस्तमाल इनमें होता है .ध्वनि ही नहीं वायु प्रदुषण भी फैलता है..साथ ही किसी दुर्घटना के होने का अंदेशा भी रहता है।
पुतले जलाएं मगर मेरे विचार से सरकार को इनकी ऊँचाई और इनमें लगने वाले सामग्री का निर्धारण कर देना चाहिये। ताकि इनकी ऊँचाई और धमाके के लिए होने वाली अनावश्यक प्रतियोगितों से बचा जा सके।


''आप सभी को इस विजय पर्व की ढेर सारी शुभकामनाएं''


है धरा की पुकार

--------------

हर वर्ष जलाते हैं पुतले,
करते श्रम ,अर्थ व्यर्थ !
कर भस्म इन प्रतीकों को,
हर बार भ्रम में जीते हैं.
जब कि ,
रावण जीवित है अभी,
माया के मृग भी मरे नहीं,
निडर ताड़का घूम रही,
लिए अहिरावन और खरदूषण.
संताप , पाप व्यभिचारी संग
हर ओर आपदा झूम रही.

कलुषित मन मानव के हुए,
यहाँ सत्य प्रताडित होता है,
अनाचार और दुष्कर्मों से,
अब न्याय प्रभावित होता है.

प्रतिदिन जलती है चिता यहाँ,
'अग्नि ' का परखा जाता है,
दानव दहेज़ का ऐसे भी,
नव वधूओं को खा जाता है.

हुई धरती अभिशप्त क्यों?
हैं युगमनीषी अब मौन क्यों?
ना आते अब हनुमान यहाँ,
ना जामवंत ही मुंह खोलें ?

बसते थे तुम ही स्मरण करो,
यह देश तुम्हारा है राघव!
अब तुमको आना ही होगा
करने धरा पावन यहाँ!
करने धरा पावन यहाँ!

[लिखित द्वारा-अल्पना वर्मा[२७/०९/२००९,10am]


[इस कविता में 'अग्नि 'की परीक्षा ली जाती है ऐसा मैं ने कहा है ..क्योंकि सतयुग में तो निर्दोष सीता को अग्नि ने रास्ता दे दिया था और उनको सुरक्षित रखा मगर आज सीता की ही नहीं अग्नि की भी परीक्षा होती है मगर निर्दोषों को बचाने कोई नहीं आता और इस तरह दहेज़ रूपी दानव उन्हें निगल लेता है।]
आप अपने विचार यहाँ क्लिक कर के भी लिख सकते हैं.

57 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

बहुत बढ़िया रचना..दशहरा की हार्दिक शुभकामना!!

M VERMA said...

रावण जीवित है अभी,
माया के मृग भी मरे नहीं,
बिलकुल सही कहा है रावण जीवित है और शायद ---
मैने भी रावण के स्वरूप को देखा है अपने ब्लोग पर अवसर मिले तो देखियेगा.
http://verma8829.blogspot.com/2009/09/blog-post_24.html

पवन *चंदन* said...

हां हमने नहीं जलाया है अभी तक रावणीय प्रवृतियों को, पूरे जमाने पर हावी है रावणत्‍व और मिटाए नहीं मिट रहा है। इससे भी बुरी बात ये है कि रामत्‍व मन मस्तिष्‍क में प्रवेश ही नहीं कर पा रहा है
कहीं न कहीं हमारी मानसिकताएं रावणत्‍व की और कुछ ज्‍यादा ही आसक्‍त हैं। लोभ मोह क्रोध द्वेष त्‍यागने के न जाने कितने उपदेश कानों में आते और चले जाते हैं। असरदार नहीं हो पा रहे।
अच्‍छी रचना के लिए धन्‍यवाद

अनिल कान्त : said...

बहुत ही बेहतरीन रचना है
बधाई स्वीकार करें

ओम आर्य said...

दशहरा की हार्दिक शुभकामना!!
बेहद खुबसूरत रचना............

योगेश स्वप्न said...

बसते थे तुम ही स्मरण करो,
यह देश तुम्हारा है राघव!
अब तुमको आना ही होगा
करने धरा पावन यहाँ!
करने धरा पावन यहाँ!

bahut sunder alpana ji , jab jan jan art swar se pukaar karega aur chahega buraiyon ko mitana to raghav ko aana hi hoga.

मोहन वशिष्‍ठ 9988097449 said...

दशहरा की हार्दिक शुभकामना!!
बेहद खुबसूरत रचना अल्‍पना जी बेहतरीन
दशहरा पर्व पर घर वापस आ जाओ आपको आपके देश की मिटटी बुला रही है

ताऊ रामपुरिया said...

दशहरे पर आज जो रावण आदि के पुतलों को जलाने की परंपरा इन पर दिन विराट रुप लेती जा रही है इसके पीछे इन्हे कार्पोरेट्स द्वारा प्रायोजित किया जाना और राजनैतिक दलों की शह होती है.

आपकी कविता बहुत ही सामयीक और सटीक है. दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं.

रामराम.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सही और सुन्दर रचना ..
यह पंक्तियाँ बहुत सही कही है आपने श्री राम जी को भी अब आने के लिए याद दिलाना पड़ता है
बसते थे तुम ही स्मरण करो,
यह देश तुम्हारा है राघव!
अब तुमको आना ही होगा
करने धरा पावन यहाँ!
करने धरा पावन यहाँ!

Arvind Mishra said...

वाह ,ओजस्वी उदघोष !आपने ठीक ही कहा है की रावण मेघनाथ कुम्भकर्ण के पुतलों की कुछ लम्बाई चौडाई का सीमांकन होना ही चाहिए ! आखिर हम पर्यावरणीय चेतना के युग में जी रहे हैं !

वन्दना अवस्थी दुबे said...

कर भस्म इन प्रतीकों को,
हर बार भ्रम में जीते हैं.
बहुत सही और सुन्दर अभिव्यक्ति.

Apanatva said...

bahut hee pyaree rachana samyik yatharth dikhatee aur pradushan kee aur bhee jagrut karatee rachana!
badhai.

Apanatva said...

bahut hee pyaree rachana samyik yatharth dikhatee aur pradushan kee aur bhee jagrut karatee rachana!
badhai.

P.N. Subramanian said...

Behad sundar rachna. Rawan zinda hai, prati varsh jalaye jaane ke baawzood.
vijay dashmi ke liye agrim shubhkamnayen.

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर रचना.आप को ओर आप के परिवार को दुर्गा पूजा व विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं.

naveentyagi said...

bahut sundar rachana hai.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

रावण का जाना इतना आसान भी नहीं है
और राम के बने रहने के लिए शायद रावण का होना ज़रूरी है

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बढ़िया आलेख!
सुन्दर कविता!!
विजयादशमी पर्व की आपको शुभकामनाएँ!

Harkirat Haqeer said...

प्रतिदिन जलती है चिता यहाँ,
'अग्नि ' का परखा जाता है,
दानव दहेज़ का ऐसे भी,
नव वधूओं को खा जाता है.

बहुत सुंदर रचना पेश की आपने दसहरे के मौके पे अल्पना जी ...!!

Anil Pusadkar said...

रावण ज़िंदा ही रोज़ बढता ही जा रहा है।अच्छी रचना,दशहरे की बधाई।

Harsh said...

bahut khoob.... dashhara ki hardik shubhkamnaaye...

ताऊ रामपुरिया said...

इष्टमित्रों और परिवार सहित आपको, दशहरे की घणी रामराम.

रामराम.

दिगम्बर नासवा said...

रावण जीवित है अभी,
माया के मृग भी मरे नहीं,
निडर ताड़का घूम रही,
लिए अहिरावन और खरदूषण.....

आपने ठीक ही कहा है हम रावण मेघनाथ कुम्भकर्ण के पुतले जला कर जो सन्देश देना चाहते हैं वो सन्देश जा नहीं पा रहा है सिर्फ दिखावा मात्र ही रह गया है ......... पैसे का प्रदर्शन बन के रहा गया है ......... किसका रावण कितना ऊंचा है .......... किसके बम्ब ज्यादा लगे हैं ....... बस ये प्रतिस्पर्धा ही चलती रहती है ...........सच है पुतलों की कुछ लम्बाई चौडाई तय हो जानी चाहिए ........... आपकी ओज पूर्ण रचना दिल में झंझावात पैदा करती है ......... ऊर्जा देती है ........... बहूत ही लाजवाब लिखा है .......

JHAROKHA said...

हुई धरती अभिशप्त क्यों?
हैं युगमनीषी अब मौन क्यों?
ना आते अब हनुमान यहाँ,
ना जामवंत ही मुंह खोलें ?

अल्पना जी,
बहुत अच्छी बात कही है आपने इस कविता में ।हमारे समाज का एकदम यथार्थ चित्रण । आपको विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनायें।
पूनम

महफूज़ अली said...

bahut hi badhiya laga...........

aapko dussehra ki bahut bahut shubhkaamnayen......

Manoj Bharti said...

सुंदर रचना !

समाज की विद्रुपताओं और विसंगतियों का बेहद सजीव व प्रासंगिक चित्रण ।

http://gunjanugunj.blogspot.com

अल्पना वर्मा said...
This comment has been removed by the author.
सुशील कुमार छौक्कर said...

आपने तो हमारे बचपन की भी याद दिला जब हम रामलीला देखने जाया करते थे। और इस दिन इतनी बेहतरीन रचना लिखी है आपने। सच्ची बात कह दी। पर हम भ्रम में ही जीते है।
हर वर्ष जलाते हैं पुतले,
करते श्रम ,अर्थ व्यर्थ !
कर भस्म इन प्रतीकों को,
हर बार भ्रम में जीते हैं.
...............
हुई धरती अभिशप्त क्यों?
हैं युगमनीषी अब मौन क्यों?
ना आते अब हनुमान यहाँ,
ना जामवंत ही मुंह खोलें ?

सच्ची और सही बात। साथ ही आपको और आपके परिवार को दशहरे की बधाई।

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

बहुत ही सुन्दर सी कविता सहित आपकी ये पोस्ट पूर्णत: सामयिक एवं सटीक लगी.....
एक बात तो तय है कि हम लोग पर्व त्योहारों में छिपे संदेशों को अंगीकार किए बिना बस उन्हे जस का तस ढोए चले जा रहे हैं.....अब इस विजयदशमी के त्योहार को ही देख लीजिए...जिसके जरिए एक साफ स्पष्ट रूप से संदेश दिया गया है कि हम लोग अपने भीतर के रावणरूपी दोषों का नाश करके राम की मर्यादा के महत्व को समझ सकें...लेकिन नहीं,हम तो सिर्फ रावण के पुतले जलाना जानते है....अपने अन्दर के रावण को समाप्त करने की अपेक्षा राम को ही नष्ट करने पे तुले हुए हैं।। अब लोगों के लिए कैसी विजयदशमी---क्या होली और क्या दीवाली---सब के सब बस व्यवसायिक लाभ के प्रतीक मात्र बन के रह गये हैं।।
खैर.....चाहे औपचारिकता मात्र के लिए ही सही...आपको भी सपरिवार विजयादशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाऎँ!!!!!!

Nirmla Kapila said...

रावण जीवित है अभी,
माया के मृग भी मरे नहीं,
निडर ताड़का घूम रही,
लिए अहिरावन और खरदूषण.
संताप , पाप व्यभिचारी संग
हर ओर आपदा झूम रही.
बहुत सामयिक और सटीक अभिव्यक्ति है
दशहरा की हार्दिक शुभकामना!!

Himalayi Dharohar said...

आपको पढ़कर बहुत अच्छा लगा. सार्थक लेखन हेतु शुभकामनाएं. जारी रहें.

दिलीप कवठेकर said...

रावण जीवित है अभी... सही कहा है.

अग्नि भी अब परखा जा रहा है, ये भावना सामयिक है.आपके सभी खयालात ओरिजिनल होते हैं.

दशहरा की हार्दिक शुभकामनायें....

प्रकाश गोविन्द said...

सबसे पहले तो मैं आपके ब्लॉग के माध्यम से परम आदरणीय लता दीदी को जन्म-दिन की शुभकामनाएं देना चाहता हूँ ! प्लीज आप उनके आगे लिखे 80 को हटा दीजिये ! अभी तो उन्हें दीपिका और कैटरिना के बच्चों के लिए भी गीत गाने हैं !
**********************

आपने सामयिक और अर्थपूर्ण पोस्ट लिखी है !

हम लोग त्योहारों के मर्म को जानने-समझने की बजाय हम परंपराओं के नाम पर पीढियों से चली आ रहे रीति रिवाजों को जस का तस निबाहे जा रहे हैं । संस्क्रति को ज़िन्दा रखने के लिए ज़रुरी है कि समय-समय पर उसका पुनरावलोकन हो !

हर साल लोग सपरिवार जाते हैं और धूम-धाम से रावण को जलाकर वापस आ जाते हैं ! मगर क्या हम नहीं जानते कि सचमुच में कितना मुश्किल है रावण को मारना,,,, उसे हराना ....... वो रावण चाहे हमारे अन्दर का हो या बाहर का !

हर पर्व कुछ न कुछ सन्देश देते हैं -
विजयादशमी भी हमें सांकेतिक रूप से आगाह कर जाती है कि समाज में रहने के लिए स्वेच्छा से नियम-कायदों का पालन करना होगा ! एक सुखी और सार्थक जीवन हेतु उतने से ही संतुष्ट रहो, जो वाकई तुम्हारे हिस्से का है।

आपको सार्थक रचना के लिए बधाई
एवं
विजयादशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ!

गर्दूं-गाफिल said...

यदि आक्रोश हवाओं का यूँ भी हवाएं हो सकता है
तो पुतलों का दहन खेल रावण का भी हो सकता है
लेकिन ऐसी परम्पराओं से शौर्य शक्ति बढ़ जाती है
सहज मानुष में छुपे राम को बाहर तक ले आती है
इसलिए परम से पार निकल जाने का यह संकेत सुनो
युद्ध नाद में लोहा लेने का कठोर संकल्प बुनो

रचना और विचार शक्ती के लिए सुभकामनाएँ
दशहरा मंगलमय हो

Kishore Choudhary said...

धरा कि पुकार मार्मिक है
और कविता तो सदा की भांति गहरी, गंभीर व सजीव

मीत said...

हुई धरती अभिशप्त क्यों?
हैं युगमनीषी अब मौन क्यों?
ना आते अब हनुमान यहाँ,
ना जामवंत ही मुंह खोलें ?

बेहद सुंदर रचना...
मन को छु गई...
मीत

रश्मि प्रभा... said...

हर वर्ष जलाते हैं पुतले,
करते श्रम ,अर्थ व्यर्थ !
कर भस्म इन प्रतीकों को,
हर बार भ्रम में जीते हैं.
जब कि ,
रावण जीवित है अभी,
माया के मृग भी मरे नहीं,
निडर ताड़का घूम रही,
लिए अहिरावन और खरदूषण.
संताप , पाप व्यभिचारी संग
हर ओर आपदा झूम रही.behtareen bhawnaaon ki gahraaiyaan hain

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

आपको भी विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

शोभना चौरे said...

अल्पनाजी
बहुत अच्छी कविता अच्छी सोच मेरे मन में भी हमेशा एक ही प्रश्न आता है रामजी ने रावन को बनो से मारा था तो ये पुतला दहन क्यों?मै जब choti थी तो हमारे गाँव में रामलीला होती थी और दशहरे के दिन
वही रामजी रावन बने व्यक्ति को जिसके शारीर पर चारो और घास lpet दी जाती थी रामजी एक बाण marte थे और रावन dhrashayi हो जाता था वो sadgi का dhahra bhulaye nhi bhulta ..
पता नही कैसे? इन त्योहारों ने बाजारों का रुख कर लिया .
आभार

Acharya Kishore Ji said...

vatan apna yaad aata hi hain .....aapko dushare ki shubhkaamnaaye
http//jyotishkishore.blogspot.com

Udan Tashtari said...

एक बेहतरीन रचना..रावण कब मरेगा..कौन जाने.

Gurinder Singh Kalsi said...

Dushehra ke utsav ke liye ek jaandaar rachna hai yeh,asliyat ke nikat.Congrats....

सुलभ सतरंगी said...

ठोस शब्दों में एक सामयिक पुकार. धन्यवाद आपका!

अमिताभ श्रीवास्तव said...

sach kahaa aapne, sab kuchh jinda he/ kya badla?
aapki rachnaye mujhe prabhaavit karti he/ sundar dhhnag se vyakt ki gai sachchaai aour shbdo me bahate bhaav/ mugdh ho jataa hu padhhkar/

haalanki dashahra beet gayaa he kintu aapko vijayparva ki badhaai/ mere shat shat PRANAAM

Mumukshh Ki Rachanain said...

हर वर्ष जलाते हैं पुतले,
करते श्रम ,अर्थ व्यर्थ !
कर भस्म इन प्रतीकों को,
हर बार भ्रम में जीते हैं.

उपरोक्त पंक्तियाँ ही नहीं बल्कि पूरी की पूरी कविता ही बेहद अच्छी, सच्चाइयों से भरी हुई है.

हार्दिक बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

Garima said...

अल्पनाजी ,हार्दिक बधाई.. आपने बिल्कुल 'कटु सत्य 'लिखा है..| अति सुंदर रचना !!!

Mrs. Asha Joglekar said...

Sochane ko majboor karati rachna. such hee putale jala kar nahee apne andar ka rawan jalane kee awashykta hai.

Murari Pareek said...

har saal rawan ka kad badhataa jataa hai jitnaa marte hain utanaa jita hai !!

रंजना said...

पूर्णतः सहमत हूँ आपसे.....पुतले जलने की प्रासंगिकता मुझे भी आज तक समझ नहीं आई...

यथार्थ का सार्थकता से उद्भेदन आप की कविता ने मन मोह लिया...बहुत बहुत बहुत ही सुन्दर कविता लिखी आपने...साधुवाद आपका..

"अर्श" said...

सच में आज रावन जीवित है मैं तो कहता हूँ के शुक्र है पहले एक ही रावन था आज तो हर को रावन का किरदार निभाता है वास्तविक जीवन में कभी न कभी और कहीं ना कहीं... कविता बहुत खुबसूरत है मगर पोस्ट के निचे आता हूँ एक लालसा होती है और उसे आप बखूभी समझ सकती है मैं क्या चाहता हूँ...?/?

अर्श

दर्पण साह "दर्शन" said...

agni ki pariksha vala vichaar naye ke saath saath badhiya bhi tha....

...ati sudar rachna !!

Rachna ki geyta ne bhi prabhavit kiya .

Documentry 'An unconventional truth' ki baat yaad aa gayi...
..dhara ko bukhaar hai !!

डॉ .अनुराग said...

रावण मरे नहीं ....अमर है ..भले ही उनके पुतले कितने बड़े हो...उनके जलाने वाला विषय बहस का विषय है जिस पर कभी विस्तार से चर्चा करेगे ....

mehek said...

बसते थे तुम ही स्मरण करो,
यह देश तुम्हारा है राघव!
अब तुमको आना ही होगा
करने धरा पावन यहाँ
bahut sahi hai,ab ram ji ko fhara par aana hi hoga.har insaan ke andar base ravan ka sanhaar karne.sunder kavita.
hame kabhi ganesh visarjan aur ravan jalana raas nahi aaya.nisaarg ka nuksaan hi bahut hota hai.

Harkirat Haqeer said...

ध्यान देने योग्य बात उठाई है आपने पुतले जलाने में यह व्यर्थ का आडंबर क्यों ...??

केवल रामलीला द्वारा भी यह संदेश पहुँचाया जा सकता है ....!!

इस पवन मौके पर मानवता का संदेश देती आपकी रचना को सलाम .....!!

ज्योति सिंह said...

happy dashhara .bahut hi sundar rachana .
रावण जीवित है अभी,
माया के मृग भी मरे नहीं,
निडर ताड़का घूम रही,
लिए अहिरावन और खरदूषण.
संताप , पाप व्यभिचारी संग
हर ओर आपदा झूम रही.

Bahadur Patel said...

bahut badhiya hai.

रविंद्र रवि said...

अल्पनाजी बहुत अछि बात कही है आपने. मुजे भी बचपन से ही उस बारूदवाली गंध से घृणा है. हम इतना प्रदुषण न फैलाये तो कितना अच्छा हो.