September 17, 2009

जाने क्या चाहे मन?

Painting by DeoPrakash Chaudhary'जाने क्या चाहे मन बावरा' -एक फ़िल्मी गीत की पंक्तियाँ हैं..सुनती हूँ तो सोचती हूँ कि आखिर यह मन है क्या?
किसकी परिभाषा मानी जाये..एक मनोचिकित्सक की?या 'कथित मनोरोगी' की?दोनों ही अपने ढंग से इस मन को समझते और समझाते हैं..
मैं तो मन को एक पिक्चर puzzle मानती हूँ.. .या कहीये..ये है ही एक zigsaw puzzle !
..जिसे पूरा करने में एक उम्र- एक जनम या कई जनम लग जाते हैं..अक्सर इसे अधूरा ही छोड़ दिया जाताहै..जीवन की रोज़ की आपा धापी में, दिन के दोनों सिरों को मिलाने की जुगत में इस तस्वीर के अधूरेपन की तरफ़ किसी का ध्यान नहीं जाता..और यूँ ही भुला दिया जाता है.
कभी कुछ टुकड़े मिलते हैं तो match नहीं करते फिर भी उन्हें किसी तरह फिट करने की कोशिश ताउम्र जारी रहती है..अनजाने कभी कहीं राह में चलते चलते कोई ऐसा टुकडा मिलता है जो match कर सके..तो उसको उठाने में ही हाथ लहू लुहान हो जाते हैं...और कभी सफल हुए भी तो उसको सही जगह देने के लिए 'वक़्त हाथ में नहीं होता...मुट्ठियों में बंद किये इंतज़ार करना पड़ता है....कुछ पल फुर्सत के पाने के लिए!
ऐसे में किया क्या जाए?..क्या उस हिस्से को संभाल कर रखा जाये...या फिर तस्वीर को अधूरा ही रहने दिया जाये..शायद दूसरा विकल्प सही है...आखिर मन की अहमियत ही कितनी है...इस व्यवहारिक दुनिया में?

'सोचती हूँ लपेट कर अनगिन परतों में,
छुपा दूँ सागर के गहरे तल में ,

कहते है 'मन' गहरी नींद भी सो सकता है!

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कवर गीत सुनिए फिल्म-अंकुश[1986] से-

स्वर-अल्पना

-प्रार्थना --
'इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमज़ोर हो न,
हम चलें नेक रास्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न.'


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चित्र-साभार-श्री देव प्रकाश चौधरी

48 comments:

नीरज गोस्वामी said...

ये सही है की मन को पूरा पूरा समझना टेढी खीर है...मन एक पल जिस पर अटकता है दुसरे ही पल उसे झटक कर कहीं और मुड़ लेता है...अभी भी लोग हैं जो अपने मन की सुनते हैं और मन की करते हैं....लेकिन ऐसे लोग बहुत कम हैं क्यूँ की दुनिया हमें मन की करने ही कब देती है...
नीरज
गीत बहुत अच्छे से गया है आपने....:)

ओम आर्य said...

बिल्कुल सही कहा आपने की मन की अहमियत बहुत ही कम है ........मै आपसे सहमत हूँ!

पी.सी.गोदियाल said...

"जीवन की रोज़ की आपा धापी में, दिन के दोनों सिरों को मिलाने की जुगत में इस तस्वीर के अधूरेपन की तरह किसी का ध्यान नहीं जाता..और यूँ ही भुला दिया जाता है.......................ऐसे में किया क्या जाये..क्या उस हिस्से को संभाल कर रखा जाये...या फिर तस्वीर को अधूरा ही रहने दिया जाये..शायद दूसरा विकल्प सही है...आखिर मन की अहमियत ही कितनी है...इस व्यवहारिक दुनिया में?

सुन्दर ख्याल, सोचने को मजबूर करते !

अमिताभ श्रीवास्तव said...

man...., mene bahut se shaastra padhe, purano ko khangaalaa aour aadhunik darshan ka adhdhyan kiya he kintu knhi mujhe man ke sandarbh me santushti prapt nahi hui ki me ise kis tarah sochu/ filhaal adhdhyaan jaari he/ aapka chhotaa saa lekhan meri soch ke anurup hi he/
aour jo aapne ant me teen line likhi vo bahut badi vyakhya ke laayak he/
'सोचती हूँ लपेट कर अनगिन परतों में,
छुपा दूँ सागर के गहरे तल में ,
कहते है 'मन' गहरी नींद भी सो सकता है!
aapka chintan..sachmuch saraahniya he

दिगम्बर नासवा said...

BAHOOT HI GAHRI BAAT LIKHI HAI ... PAR MAN KO BAYAAN KARNA ITNA AASAAN SACH MEIN NAHI HAI ... IS KI PARIBHAASHA MEIN JAANE SE ACHHA HAI JIDHAR YE CHALAAYE UDHAR CHALTE JANA CHAHIYE.....

SAHI LIKHA MAN KO GAHRI NEEND MEIN SULA DENA CHAHIYE .... BAS LEHER KE SATH BAHTE JAANA CHAAHIYE .....

AAPKI AAWAAZ MEIN BAHOOT HI MADHUR GEET SUNRAHA HUN IS COMMENT KE SAATH SAATH .......

योगेश स्वप्न said...

bahut achcha likh hai alpana ji man ke baare men.

aur kshanika to lajawaab.

ye prarthna meri favourite prarthna hai. aabhaar.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

मन तो एक दर्पण है।
जैसे आप होंगे वैसा ही यह दिखायेगा।
अच्छी पोस्ट लगाई है।
आभार!

Udan Tashtari said...

सोचती हूँ लपेट कर अनगिन परतों में,
छुपा दूँ सागर के गहरे तल में ,
कहते है 'मन' गहरी नींद भी सो सकता है!

-पूरी बातों का निचोड़ है इन पंक्तियों मे.


गीत मेरा प्रिय है. अब सुनेंगे.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

मन की ही यह उथल पुथल है जो यह लिखा हुआ सामने आया है ..मन को समझना ही बहुत मुश्किल है .गहरी नींद कहाँ सो पाता है मन

Kishore Choudhary said...

आपका चिंतन बड़ा ही स्वभाविक और यथार्थपरक होता है. कभी जब आप आभासी रिश्तों के बहाने कई महत्वपूर्ण बातें आसानी से कह जाती है तो कभी चंद पंक्तियाँ जैसे कोई महाकाव्य ....
'सोचती हूँ लपेट कर अनगिन परतों में,
छुपा दूँ सागर के गहरे तल में ,
कहते है 'मन' गहरी नींद भी सो सकता है!

बहुत खूब !

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर लिखा मन के बारे, अगर मन ओर दिमाग मै बहस हो जाये तो किसे जीतना चाहिये ?? किस की जीत उत्तम होगी ?

P.N. Subramanian said...

अच्छा विश्लेषण है. लगता है कुछ फुर्सत मिल गयी है. नहीं तो मन का पोस्टमार्टम करने नहीं बैठते.गीत भी विषयानुरूप एवं सुमधुर.

ताऊ रामपुरिया said...

क्या उस हिस्से को संभाल कर रखा जाये...या फिर तस्वीर को अधूरा ही रहने दिया जाये..शायद दूसरा विकल्प सही है...आखिर मन की अहमियत ही कितनी है...इस व्यवहारिक दुनिया में?

मन के जीते जीत है..मन के हारे हार..ज्ञानियों ने तो यही कहा है.

प्रार्थना गीत बहुत ही सुंदर और कर्णप्रिय है, शुभकामनाएं.

रामराम.

सुशील कुमार छौक्कर said...

कम शब्दों में बहुत कुछ दिया आपने "मन" के बारें में। और आपने मन जो रुप दिया वो भी काबिले तारीफ है। सच कह दिया आपने।
"आखिर मन की अहमियत ही कितनी है...इस व्यवहारिक दुनिया में?"
सच्ची बात। और त्रिवेणी का जवाब नही। और आज के गीत को कई बार सुनूँगा क्योंकि ये मुझे बेहद पसंद है।

डॉ .अनुराग said...

मन को जिसने समझ लिया उसने जीवन तर लिया अल्पना जी ....बुद्ध .भी इसी मन को समझने की खातिर राजपाट छोड़कर चल दिए थे ....उम्र के साथ मन के ख्यालो की उडान की दिशा भी बदालती रहती है ......
"बाँध के रखो इन ख्यालो को
कम्बखत आसमान तक उडान भरते है "

आपका लेखन अच्छा लग रहा है ......

मन से लिख रही है न इसलिए

mehek said...

कहते है 'मन' गहरी नींद भी सो सकता है!

waah bahut khub,par gehri nin mein achet mann bhi adhaadhura sachet rehta hai,nin mein khwabdekhne ke liye.
iswariy prarthana se bhara dil ko chu kenewala sunder geet.hamesha ek sukun de jaata hai.bahut sunder.

pallavi trivedi said...

मन तो जिंदगी को पूरी तरह जीना चाहता है मगर हमें ये प्रश्न अपने आप से पूछना चाहिए कि हम मन की बात कितनी और कहाँ तक मानते हैं....

काजल कुमार Kajal Kumar said...

आपको गाते सुनकर ईर्श्या होती है क्योंकि मैं गा नहीं सकता पर, मुझे कान बहुत अच्छे मिले हैं...चलो हिसाब बराबर..कोई शिकायत बाक़ी नहीं

Anonymous said...

kitna sundar gati hain aap... aawaz mein ek aisi baat hai jo barbas apni or kheenchti hai...
boojho to jane.....

प्रकाश पाखी said...

आपके भाव और अभिव्यक्ति दोनों अद्भुत है...फिर आपकी स्वर लहरियां अभिभूत कर देने वाली है.सरस्वती की पूर्ण कृपा है आप पर....बधाई और आभार!

AlbelaKhatri.com said...

मन से बड़ा कोई मीत नहीं है
बस इसे समझ भर लो.......
__
___आपकी संपूर्ण अभिव्यक्ति मन को समझने का प्रयास है और अत्यन्त उर्जस्वित प्रयास है..........

आपकी बात में बात है..........
चमत्कार है, करामात है......
बधाई !

विपिन बिहारी गोयल said...

मन खुश हो गया इतना अच्छा लेख पढ़ कर और गायन तो बेहद कर्णप्रिय है

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

"जीवन की रोज़ की आपा धापी में, दिन के दोनों सिरों को मिलाने की जुगत में इस तस्वीर के अधूरेपन की तरह किसी का ध्यान नहीं जाता..और यूँ ही भुला दिया जाता है...क्या उस हिस्से को संभाल कर रखा जाये...या फिर तस्वीर को अधूरा ही रहने दिया जाये..शायद दूसरा विकल्प सही है...आखिर मन की अहमियत ही कितनी है...इस व्यवहारिक दुनिया में?"

अल्पना जी, आज तो आपका लेखन दार्शनिकता से सराबोर दिखाई दे रहा है।
मन के स्वरुप,उसी क्षमता और उसका मूल्यांकन करना तो शायद किसी के लिए भी मुमकिन नहीं है,क्योंकि मेरे विचार से तो यह एक ऐसा शाश्वत तत्व है जो कि हर बंधन एवं हर नियम से परे है।
बढिया लेखन और उतना ही मधुर गीत....

शरद कोकास said...

यह गीत सुनकर तो मेरा मन डूब-उतरा रहा है .. मन बावरा .. जिसका शरीर में कहीं कोई अस्तित्व ही नहीं है sum of all the functions of the BRAIn i,e mind कितनी कितनी परिभाषायें चलिये रहने दें यह शब्दजाल मै तो आपकी आवाज़ मे खोया हूँ .. बस अभी अभी रोया हूँ ..मन से !?!

Apoorv said...

शायद हमारा वणिक्‌ दिमाग उन चीजों को ज्यादा तवज्जो नही देता जिनको पाने मे फ़ायदा कम और नुक्सान ज्यादा हो..कैलकुलेट कर के सोचता हो कि game is not worth the candle..मगर बावरा मन फ़ायदा-नुकसान कहाँ सोचता है..तभी रहता है उपेक्षित..मगर कुछ लोगों के लिये तस्वीर के टुकड़े इकट्ठे करने मे ही जीवन की सार्थकता है..बड़े पेंच हैं मन की गुत्थी के
..त्रिवेणी जबर्दस्त रही

संगीता पुरी said...

ज्‍योतिष के अनुसार हमारे मन पर चंद्रमा का प्रभाव है .. इसलिए चंद्रमा के आकार के अनुसाह ही यह घटता बढता रहता है .. पल में खुश तो पल में नाराज !!

सुशीला पुरी said...

मन की मानो तो सब सुन्दर है ..........और वक़्त हाथ में क्यूँ नही होगा ? वक़्त को हथेलियों में उगायेंगे . आवाज में आपकी बेहद कशिश है .........आपका यह प्रयोग अनूठा है .

Anonymous said...

मन रे तू काहे न धीर धरे ......
न जाने कितनी अवस्थाएं होती हैं मन की ! न जाने कितनी यादें और अहसास कैद होते हैं मन में ! कभी मन के सागर से अनमोल मोती हाथ आ जाते हैं तो कभी उद्वेलित लहरों संग असंख्य कंकड़ हाथ लगते हैं !
मन का इंसान से बहुत गहरा सम्बन्ध है ! इनका झरना हमारे अन्दर बहुत गहरे तक बहता रहता है ! इनका सम्बन्ध अवचेतन मन से होता है ! अच्छा और बुरा , जानते हुए भी इंसान मन के प्रवाह में बह जाता है ! वो होता ही इतना प्रबल है कि सारे बंधन तोड़ कर बहता ही जाता है ! कितना अच्छा हो कि वह निर्मल , स्वच्छ , शांत पानी की धार बन बहता रहे और जीवन को एक नया आयाम प्रदान करे !
मन कभी अमावस का चाँद होता है तो कभी पूरा चाँद , कभी घना अँधेरा तो कभी जगमगाता सूरज , कभी चहचहाती चिडियों का संगीत तो कभी गिद्धों की चीख पुकार , कभी बसंत तो कभी पतझड़ ! कभी खनखनाते सिक्कों सा चमकता है तो कभी धुंधलाती परछाईयों सा दिखाई देता है ! आधे-अधूरे मन की प्यास बढती ही जाती है और वह पूरा दरिया पी जाना चाहता है , ...एक दरिया से दूसरा दरिया ,और उसके भी पार एक और दरिया फिर एक और ...

कभी अर्ध विराम सा तो कभी अंडरलाइन सा ! मन पर पूर्ण विराम लगाना नामुमकिन है ! मन की भी हजारों लाखों दशाएं होती हैं , वो कहते हैं ना कि '' मन के नयन हज़ार '' !
उसकी दौड़ मृत्यु तक है ! जब तक वह नहीं आती तब तक मन को दौड़ना ही है ! जीवन से मृत्यु तक की यात्रा में व्यक्ति का मन उसके साथ दौड़ता रहता है !

"न जाने कितने होते हैं इस मन के हिस्से
कुछ भीगे भीगे , कुछ सूखे सूखे
मन के भी होते हैं मुख्तलिफ इलाके
मुख्तसिर ज़िन्दगी की नब्ज़ चलाते
मन के भी होते हैं मुख्तलिफ इलाके !"


आपने 'अंकुश' फिल्म का प्रार्थना गीत सुन्दरता से गाया है ..... सभो के दिल को छूता है - यह गीत !
-PG

Dipti said...

दरअसल यही तो मज़ा इस ज़िंदगी का...

मीत said...

सच कहा आपने अल्पना में...
यह गाना मुझे बहुत पसंद है...
मन को क्या कहीं कमबख्त है ही चपल चंचल ..
मीत

गौतम राजरिशी said...

अँखियन मेरे सावन चला...जाने क्या चाहे मन बावरा...

काश कि सचमुच मन कभी गहरी नें द सो पाता..

त्रिवेणी मन को छूती हुई! गीत सुन नहीं पा रहा!!

creativekona said...

'सोचती हूँ लपेट कर अनगिन परतों में,
छुपा दूँ सागर के गहरे तल में ,
कहते है 'मन' गहरी नींद भी सो सकता है!

अल्पना जी ,
मन के ऊहापोह को बहुत सरल शब्दों में व्याख्यायित किया है आपने .अच्छी लगी आपकी यह पोस्ट .
हेमंत कुमार

दिलीप कवठेकर said...

कहते है 'मन' गहरी नींद भी सो सकता है!

क्षमा करें, सहमत नहीं हूं.

मन तो एक अश्व है.वेगवान, उर्जावान, बलिष्ठ और अंतर्मन के सपनों को साकार करने हेतु एक वेहिकल, जो आपके लक्श्य की प्राप्ति में आपका सहायक है.इसका वेग, उर्जा अंतर्मन के नियंत्रण में रखना ही सबसे अधिक श्रेयस्कर. आप याने आपका अंतर्मन, या आत्मा इस अश्वरूपी मन पर सवार हो इसके इंद्रियरूपी लगामों से इसे काबू में रखते है.

दुख यही है कि अधिकतर (९५%)यही अश्व हम पर सवार हो जाता है, और हमें हांकने लगता है, और हम रोलर्कोस्टर में बैठे अनियंत्रित ऊपर नीचे होते रहते हैं.

संत महात्मा इसी अश्व को साधते हैं और इसिलिये अपने बनाये राह पर चलाते हैं.

मेरे जैसे साधक को अधिक नहीं,यह इतना तो पता चल गया है, और कोशिश यही है कि जो मुझ पर सवार है उसपर अंततः सवार हो जाऊं . आम मनुष्य के लिये कठिन मगर असंभव नहीं.

फ़िर ये जिग जा पज़ल नही रहेगी. छोटे छोटे टुकडों में आकृतियां सेट करने की आवश्यकता नही रहेगी.ये टुकडे ही बडे टुकडों में तब्दिल होने लगेंगे, इनके कोने शार्प नूकीले नहीं हो कर गोलाई में होंगे, एक सुरीली तान की तरह.और एक दिन , इन्शा अल्ला , वह होगा जब एक ही टुकडा बचेगा.

वो सुबह कभी तो आयेगी, उस सुबह का इंतेज़ार करें, हम सभी, हमख्याल, हमसफ़र........

Mrs. Asha Joglekar said...

Man ko janane kee koshish har koee karata rehata hai. par Adhoora hee rah jata hai ye janana bhee aur prayas bhee. par kaee bar hamara man hee hume chunka deta hai,ki are is situation me mai hamesha to aisee react nahee hotee. Sunder aalekah

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

क्या कहूं - जिन्दगी मन का निग्रह साधने में ही निकल जा रही है!

आकांक्षा~Akanksha said...

शारदीय नवरात्र की हार्दिक शुभकामनायें !!

हमारे नए ब्लॉग "उत्सव के रंग" पर आपका स्वागत है. अपनी प्रतिक्रियाओं से हमारा हौसला बढायें तो ख़ुशी होगी.

भूतनाथ said...

हम्म्म्म्म्म....बढ़िया है.....!!

रंजना said...

मन है तो इच्छाएं हैं,सपने हैं,कुछ पाने की लालसा है,कुछ न पाने की टीस है...यानि मन है तो ही जीवन तरंगित स्पंदित है....सब कुछ पूरा ही हो जाये तो किसी चीज की लासा या उत्साह ही कहाँ बचेगा....युधिष्ठिर ने यक्ष से कहा था,दुनिया में सबसे तेज चलने वाला मन ही है...इसलिए इसका सो जाना किसी भी अवस्था में असंभव है...

आपका चिंतन पाठक के चिंतन को सहज ही उद्वेलित कर दूर बहा ले जाने वाला है...बहुत बहुत आभार...

यह गीत मेरे ह्रदय के बहुत ही निकट है,सो सुनकर आनंद विभोर हो गयी...

Harsh said...

bahut sundar geet.......... dil khush ho gaya.... alpana ji aajkal mere blog par aapka aana nahi hota hai .....

Harsh said...

bahut sundar geet.......... dil khush ho gaya.... alpana ji aajkal mere blog par aapka aana nahi hota hai .....

जितेन्द़ भगत said...

हम सभी अपनी जिंदगी के पज़ल सुलझाने में व्‍यस्‍त हैं।
दि‍ल हूम-हूम करे मुझे काफी पसंद है आपने अच्‍छा गाया है।

Mumukshh Ki Rachanain said...

बहुत टेढा प्रश्न खडा किया आपने, मैं तो बस यह ही जानता हूँ कि

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत,
परमातम को पाईये, मन के ही परतीत.

एक अच्छे गीत को तो आपने अपनी मधुर आवाज से चार चाँद ही लगा दिए.......

हार्दिक बधाई.
चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

मन की थाह कौन पा पाया,
कोई भी कुछ जान न पाया।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

BrijmohanShrivastava said...

अत्यंत ध्यान मग्न होकर गीत (भजन ) सुना |आनंद दायक

Acharya Kishore Ji said...

sahi hai mann ko mann nahi samajh paata

सुलभ सतरंगी said...

इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमज़ोर हो न, हम चलें नेक रास्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न.'

प्रभु की कृपा बनी रहे. धन्यवाद आपका!!

indu said...

deepawali ki shubhkamnaen ,
janti hain aap mere mobile ka 'ring tone' yahi song hai
teacher hun school men bhi jyadatar yahi prayer karwati hun . mere blog 'moon-uddhv ' par aaiye aapka swagat hai .aur apni bebaq rai dijiye.
samwedansheel lagti hain aap rachnaon ki gahrai ki samjh bhi spsht dikhta hai aap me , shayad aapko achchha lage... shesh fir kbhi....
sadar
indu puri

Rajendra Raikwar said...

Bahut khoob likha hai wah!!