August 20, 2009

'तुम्हारी प्रिया हूँ'

पिछले कुछ दिनों से समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या लिखूं?
यूँ तो ब्लॉग पर सूचना पट लगा दिया था कि ब्रेक टाइम है!कुछ परिस्थितियां भी ब्लॉग लेखन के लिए अनुकूल नहीं हो पा रही थीं.ब्लॉग की दुनिया में महीने भर से मेरी अनियमितता बनी हुई थी.
अब स्थिति सामान्य हुई है तो सोचा यह बंद भी खोल दिया जाये.आज मुहूर्त निकल ही गया :)और यह कविता प्रस्तुत है..

fantasy2
-तुम्हारी प्रिया हूँ -
बरस जाओ बन मेह नेह का तुम,
लरज कर लता सी सिमट जाऊँगी मैं.
बिखरने लगी हैं ये व्याकुल सी अलकें,
जो पल भर भी देखो,संवर जाऊँगी मैं.

मैं कोमल कुमुदनी सी दिख तो रही हूँ,
पवन बन जो आओ महक जाऊँगी मैं,

कभी भीगें नैना और बिखरे जो काजल,
मधुर हास देना ,बदल जाऊँगी मैं.

तुम्हारी छुअन ने बनाया है चन्दन,
यूँ हीं धड़कने तो , नवल पाऊँगी मैं .

न जाओगे अब दूर,वचन मुझ को दे दो,
विरह वेदना अब न सह पाऊँगी मैं.
बरस जाओ बन मेह नेह का तुम,
लरज कर लता सी सिमट जाऊँगी मैं.
-
..अल्पना वर्मा ..

अब है गीत की बारी --
प्रस्तुत है गीत'तेरी आँखों के सिवा' [फिल्म-चिराग]--
Teri Aankhon ke siwa[Chirag]



Download or play Mp3 click Here
यह गीत पिछले साल रिकॉर्ड किया था.इन दिनों कोई नया गीत भी रिकॉर्ड नहीं कर सकी इस लिए इसे ही यहाँ कविता के साथ पोस्ट कर रही हूँ.उम्मीद है पसंद आएगा.


84 comments:

seema gupta said...

न जाओगे अब दूर,वचन मुझ को दे दो,
विरह वेदना अब न सह पाऊँगी मैं.


सुंदर प्रणय निवेदन खुबसूरत....

regards

ओम आर्य said...

बहुत बहुत बहुत बहुत बहुत खुबसूरत है यह नेह निवेदन ............खो से गये कही .....अतिसुन्दर

अर्शिया said...

Ati sundar.
( Treasurer-S. T. )

Ram said...
This comment has been removed by a blog administrator.
पी.सी.गोदियाल said...

"पिछले कुछ दिनों से समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या लिखूं?"

गुस्ताखी के लिए क्षमा कीजिये अल्पनाजी, मगर जब बिना समझ आये इंसान इतनी बढिया रचना लिख ले तो फिर उसे कुछ समझने की जरुरत क्या है ? :-))

vikram7 said...

मैं कोमल कुमुदनी सी दिख तो रही हूँ,
पवन बन जो आओ महक जाऊँगी मैं,
ati sundar

योगेन्द्र मौदगिल said...

Wah alpna g achhi rachna.......

AlbelaKhatri.com said...

khoob soorat ehsaas ka bakhoobi bayaan
waah !

हिन्दी साहित्य मंच said...

सुन्दर रचना। गीत भी लाजवाब

M VERMA said...

कितना कोमल एहसास समेटा है आपने अपनी इस रचना मे.
बरस जाओ बन मेह नेह का तुम,
लरज कर लता सी सिमट जाऊँगी मैं.
बहुत सुन्दर

Mithilesh dubey said...

सुन्दर रचना। बधाई

मीत said...

वाह जी वाह तुसी तो चा गए....
सच में अल्पना जी क्या कविता लिखी है...
क्या भावः हैं और क्या शब्द हैं... सच में आपकी मेहनत दिखती है...
मीत

रंजना [रंजू भाटिया] said...

न जाओगे अब दूर,वचन मुझ को दे दो,
विरह वेदना अब न सह पाऊँगी मैं.

हम भी यही कहेंगे की इतना रुक के देर से पोस्ट न किया करे ..आप का लिखा हमेशा अपना सा लगता है ,,बहुत सुन्दर रचना आपकी कलम से बहुत दिनों के बाद पढना बहुत अच्छा लगा ..आवाज़ तो आपकी सदा ही भाती है दिल को शुक्रिया :)

amarjeet kaunke said...

बहुत खुबसूरत अहसास और अभिव्यक्ति है.....आपकी
रचनाओं का इंतज़ार रहता है.....डॉ.अमरजीत कौंके

रंजना said...

अमृततुल्य सुस्वादु भोजन कर कोमल शय्या पर मृदुल समीर मध्य मीठी नींद में जो सुखद अनुभूति होती है,बिलकुल ऐसा ही लगा आपकी इस रचना को पढ़ने के उपरांत गीत सुनना...

एक तो आपकी सुन्दर प्रेम रस में सराबोर कविता का भोग और फिर मधुर स्वर में मधुर गीत का आनंद ....... वाह !!! आनंद आ गया सचमुच....

इस तरह आनंद प्रदान करने के लिए आपका बहुत बहुत आभार....

"अर्श" said...

अल्पना जी जैसे ही आपके ब्लॉग पे आया सबसे पहले निचे गया देखने के अगर गीत नहीं लगी है तो वापिस लौट जाऊंगा मगर नज़र तुंरत अटक गयी आपकी कविता पे ... बस दो लाइन पढा हूँ और अवाक रह गया ... अगर ब्रेक इस तरह की उम्दा सोच और ख्यालात देता है तो मैं भी जाने के लिए तैयार हूँ... निचे को गीत आपने लगा रखा है वो आपकी आवाज़ की सबसे पसंदीदा गीत है मेरे लिए ... आभार और बधाई स्वीकारें...


अर्श

डॉ .अनुराग said...

इतने दिनों बाद इस गीत से आगाज सुखद है .एक नारी के भीतरी जज़्बात उकेरे है...तेरी आँखों के सिवा गीत मुझे भी बेहद पसंद है

दिगम्बर नासवा said...

मैं कोमल कुमुदनी सी दिख तो रही हूँ,
पवन बन जो आओ महक जाऊँगी मैं,

तुम्हारी छुअन ने बनाया है चन्दन,
यूँ हीं धड़कने तो , नवल पाऊँगी मैं .

तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है .............. लाजवाब गीत और उतनी ही लाजवाब अओकी रचना ......... मन को महका गयी, किसी के होने का एहसास भी क्या कुछ कर जाता है ............ मन में उमंग, उल्लास का झरना सा बहता हुवा लगता है ......... बहुत ही मधुर, गुदगुदाता ...... रस से भरी रचना है आपकी ......... शुक्रिया

Atmaram Sharma said...

मार्मिक कविता है.

सुशील कुमार छौक्कर said...

हमेशा की तरह एक बेहतरीन रचना। शब्दों के चुनाव में आपका जवाब नहीं। एक से एक बेहतरीन शब्द। मेह शब्द तो कई दिन से मेरा पीछा कर रहा है। खैर आपकी रचना ने बहुत सुन्दर भाव कह दिये। और गीत तो हमें भी पसंद है।

शोभा said...

बरस जाओ बन मेह नेह का तुम,
लरज कर लता सी सिमट जाऊँगी मैं
नारी मन की अनुभूतियों को बहुत सुन्दर रूप में अभिव्यक्त किया है। बधाई।

Arvind Mishra said...

नेह और समर्पण की भावभीनी कविता -शिल्प और कथ्य में भी प्रभावपूर्ण ! शाबाश !
ओह ,गीत तो सुनाई नहीं पड़ रहा !

विनय ‘नज़र’ said...

मनमोहक रचना है
---
मानव मस्तिष्क पढ़ना संभव

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

मैं कोमल कुमुदनी सी
बरस जाओ बन मेह नेह का
लरज कर लता सी
ध्वनि और लय इन शब्दों में बखूबी उभरी है
अल्पना जी
सुन्दर कविता और
आपका गायन हमेशा पसंद आता है
देर से आयीं आप ...
पर, रस वर्षा कर गयीं
स्नेह,
- लावण्या

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

अति सुन्दर रचना!! गीत तो बिल्कुल कर्णप्रिय बन पडा है!!
हमें भी कभी कभार पुराने गीतों को सुनना अच्छा लगता है और सच कहूँ तो ये वाला गीत हमारी फेवरेट सूची में भी है।

mehek said...

मैं कोमल कुमुदनी सी दिख तो रही हूँ,
पवन बन जो आओ महक जाऊँगी मैं,

कभी भीगें नैना और बिखरे जो काजल,
मधुर हास देना ,बदल जाऊँगी मैं.

waah prem ras mein dubi ye khubsurat rachana bahut manbhavwanrahi,itane dino ki saari kasar puri ho gayi.lajawab.

ताऊ रामपुरिया said...

बेहद सुंदर और प्रभावशाली गीत, और उतनी ही कुशलता पुर्वक गाया गीत. लेखन और गायन का सुंदर संयोजन. बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

योगेश स्वप्न said...

bahut manmohak/madhur geet.

alpana ji , sabhi panktian moti jadi.

bahut pasand aya ye geet. dheron badhai.

सुशीला पुरी said...

कुछ खटकता तो है पहलू में मेरे रह रह कर ,
अब खुदा जाने तेरी याद है या दिल मेरा .

Abhishek Mishra said...

ब्रेक के बाद वाकई एक बेहतरीन वापसी. अच्छी लगी रचना आपकी.

Udan Tashtari said...

बेहतरीन!!!

बहुत उम्दा!

Udan Tashtari said...

रिकार्डिंग अभी सुनी..बहुत सुन्दर गाया है!! बधाई

Anil Pusadkar said...

सुन्दर्।

अनूप शुक्ल said...

कविता अभी पढ़ी। अच्छी लगी। गाना सुनकर बहुत बहुत अच्छा लगा। आपकी आवाज बहुत अच्छी है जी। :)

Kishore Choudhary said...

बरस जाओ बन मेह नेह का तुम,
लरज कर लता सी सिमट जाऊँगी मैं.

बहुत ही सुन्दर, इन दिनों हिंदी के गीतों की स्मृतियाँ आपकी पोस्ट से तजा हुआ करती है. कल तलत महमूद की आवाज़ में मधुकर राजस्थानी का गीत सुन रहा था "क्या इतना भी अधिकार नहीं ..." आज आपके गीत ने फिर उसकी याद दिला दी.

टेम्पलेट, उसका रंग संयोजन, आपकी तस्वीर, विजेट्स यानि सब कुछ बहुत सुन्दर दीख रहा है. भीतर का कलाकार कभी बाहर आ ही जाता है.

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

मनोहारी कविता और कर्णप्रिय गीत.. ब्रेक टाइम ओवर तो उम्मीद करते हैं कि अब हमें ये एंटरटेनिंग डबलडोज़ लगातार मिलती रहेंगी.. हैपी ब्लॉगिंग

Pratik Maheshwari said...

बहुत सुन्दर कविता..

अजय कुमार झा said...

sirf itna ki ....ab se pehle aapko kyun nahin padha maine kabhi..main tha kahaan jo aapke is blog par nahin pahunchee nazar ...so follower soochee se jod liya hai khud ko ..aapko padhna-sunna yaadgaar rahega...

रश्मि प्रभा... said...

sundar rachna,madhur aawaaz .....aap aayin bahar aayi

अमिताभ श्रीवास्तव said...

bahut dino baad aapne kuchh likha/ me roz aapke blog par apane samaynusaar aataa thaa aour lout jaataa thaa/ aaj mila kuchh aour har baar ki tarah behtreen/
are me bhool gayaa ji...20 aug. aapka janmdin/ ishvar aapko sukhi-prasnna aour hamesha svasth rakhe/ meri aatmiya shubhkamnaye he/ AAMIN.

जितेन्द़ भगत said...

सुंदर कवि‍ता रची है आपने।

आपकी आवाज मधुर है। मेरे मन में एक सवाल कई दि‍नों से है। आपने गीत रि‍कार्ड कि‍या है पर बैकग्राउण्‍ड म्‍यूजि‍क के लि‍ए सारा एरेंजमेंट कैसे करती हैं? आवश्‍यक समझें तो मेरे मेल पर जानकारी देने की कृपा करें।

शोभना चौरे said...

alpnaji bhut dno bad aapki bhigi hui kavita padhkar acha lga .khte hai aadt buri hoti hai vaise hi kuch blog niymit dekhne ki aadat ho gai hai shayd kuch nya mile .
bhut achi rachna .
abhar

बदायूनी said...

sunder kavita hai
bahut bahut sunder

RAJESHWAR VASHISTHA said...

सुन्दर रचनाओं के लिए साधुवाद...

दिलीप कवठेकर said...
This comment has been removed by a blog administrator.
दिलीप कवठेकर said...

कई बार यहां आ कर मायूस सा लौटा, मगर आज यहां फ़िर यह कविता देख कर और पढ कर अच्छा लगा.

कविता का यह भाग अच्छा लगा..

मैं कोमल कुमुदनी सी दिख तो रही हूँ,
पवन बन जो आओ महक जाऊँगी मैं...

नारी के स्वाभाविक समर्पण की भावनाओं को कम शब्दों में रखा है, और इसी मुख्तसर सी बात में महक गयी यह कविता.

गाना नहीं सुन पा रहा हूं, फ़िर कोशिश करूंगा.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

बहुत दिन बाद सुना जी आपको। अच्छा लगा बहुत!

Mumukshh Ki Rachanain said...

"चाहत अगर साकार मिले तो समर्पण कौन नहीं चाहेगा", उपरोक्त विचार का अत्यंत मनोहर वर्णन आपने अपने गीत में किया है.
हार्दिक बधाई.

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

अल्पना जी,
आप सही कह रही हैं।कभी-कभी कुछ अच्छा नहीं लगता तो ब्लाग से भी दूरी बढ़ जाती है।मगर कुछ दिनों बाद पुनः हम वापस आ जाते हैं।शायद जीवन की एकरसता को कुछ विराम की आवश्यकता होती है।
सुन्दर रचना है...ये गीत तो मैं पहले भी आप की आवाज में सुन चुका हूँ....

BrijmohanShrivastava said...

लता लरज कर सिमटती नहीं है लता को एक सहारे की आवश्यता होती है नेह का मेह बरसेगा और लता सिमटेगी तो सिमटने के लिए उसे जमीन मिलेगी |सिमटने की जगह जो शब्द माकूल है उसे साहित्य में प्रयोग करना भी लगभग अनुचित सा है इसलिए सिमटना ही शब्द ठीक है |पवन बनने से कुमुदनी का महक जाना स्वाभाविक है किन्तु यहाँ तो कुमुदनी सी दिखना शब्द आया है दिखना और होने में अंतर है |'''यूँ हीं धड़कने तो , नवल पाऊँगी मैं ""इसका अर्थ मैं समझ नहीं पाया हूँ |दूर जाने पर विरह वेदना का न सह पाना विल्कुल स्वाभाविक बन पढ़ा है
टिप्पणी में कुछ बुरा लगा हो तो उस शब्द को डिलीट कर दीजियेगा

अल्पना वर्मा said...

माननीय बृजमोहन सर जी,आप ने कविता पढ़ी और जिस तरह से इसे समझाया है..आप से टिपण्णी पाना अच्छा लगा..आप ने कहीं भी कुछ ऐसा नहीं लिखा जिस से मुझे बुरा लगे और मुझे टिप्पणी डिलीट करने की आवश्यकता हो..आप ने लिखा है..धड़कने वाली पंक्ति समझ नहीं आई..वह पंक्तियाँ हैं--

तुम्हारी छुअन ने बनाया है चन्दन,
यूँ हीं धड़कने तो , नवल पाऊँगी मैं.
यहाँ नायिका कहती है की नायक के छूने मात्र से वह चन्दन सी शीतल हो गयी है..और उसमें नयी धडकनों का संचार हुआ है..
इस प्रकार से नायक के सामीप्य से उसके स्पर्श से, नायिका के मन की अग्नि शीतल तो होती ही है उसमें जीने के नयी उमंगें भी जागती हैं.इस जीने की इच्छा को धड़कन का नाम दिया है.क्योंकि धड़कनों से ही तो जीवन है.
--
दूसरे-
मैं कोमल कुमुदनी सी दिख तो रही हूँ,
पवन बन जो आओ महक जाऊँगी मैं,
- 'दिखना ' लिखा अगर गलत लग रहा है तो यह ऐसे हो सकता है--
मैं कोमल कुमुदुनी सी इतरा रही हूँ../बहकी हुई हूँ/..
--lekin--
मैं ने यहाँ 'दिख'शब्द इस लिए इस्तमाल किया है -कारण - नायिका खुद को ऐसी कोमल कुमुदनी सा मान रही है ..जो बिना पवन के अपनी महक[या महत्ता को ]किसी को भी बता नहीं सकती..या बिना पवन के उसकी उपस्थिति का भान होना संभव है मगर उसकी खासीयत/विशेषता के बारे में किसी को ज्ञान नहीं ho pata है.

सर,आप ke prashno ya alochna se से mujhe सीखने को मिलता है .यहाँ प्रकशित पोस्ट सम्बंधित आप के हर प्रश्न या आलोचना का स्वागत है.
सादर,
अल्पना

Harkirat Haqeer said...

वाह..... आपका ये बदला सा रूप अच्छा लगा .....ये पंक्तियाँ छू गयीं .....

कभी भीगें नैना और बिखरे जो काजल,
मधुर हास देना ,बदल जाऊँगी मैं.

Nirmla Kapila said...

न जाओगे अब दूर,वचन मुझ को दे दो,
विरह वेदना अब न सह पाऊँगी मैं.बहुत सुन्दर
कभी भीगें नैना और बिखरे जो काजल,
मधुर हास देना ,बदल जाऊँगी मैं. लाजवाब रचना और आवाज़ बहुत सुरीली है बहुत सुन्दर गीत चुना है बाधाई

kshama said...

क्या गज़ब ढाया है आपने ..हरेक पंक्ती मानो किसी बिरहन की चीत्कार -सी महसूस हुई ...जिसने ये भोग है...शायद,वही उस गहराई तक पहुँच पायेगा...प्रिया अपने प्रियतम के लिए क्या कुछ निछावर नही करती..?

महफूज़ अली said...

Welcum bak...... kai baar aisa hota hai ki hamare samajh mein nahin aata ki kya likhen? vichaar bhi hote hain, pen bhi aur shabd bhi..... par kuch to aisa hota hai ki sab kuch hote huye bhi hum unhe uker nahi paate..... khair! aapne bahut hi achcha likha hai.......
बिखरने लगी हैं ये व्याकुल सी अलकें,
जो पल भर भी देखो,संवर जाऊँगी मैं.



मैं कोमल कुमुदनी सी दिख तो रही हूँ,
पवन बन जो आओ महक जाऊँगी मैं,



कभी भीगें नैना और बिखरे जो काजल,
मधुर हास देना ,बदल जाऊँगी मैं.


in lines ne dil ko chhoo liya hai...... bhaavnaon ko bahut hi acchhe se ukera hai aapne.......




Dhanyawaad.......

गौतम राजरिशी said...

ये लंबा गैप कुछ अखर तो रहा था जरूर....

कविता बहुत सुंदर है...ऊपर से बृजमोहन जी की टिप्पणी के पश्‍चात की गयी आपकी व्याख्या ने सोने पे सुहागा का काम किया।

गीत सुन नहीं पा रहा...मेरा नेट इजाजत नहीं देता!

क्रिएटिव मंच said...

बिखरने लगी हैं ये व्याकुल सी अलकें,
जो पल भर भी देखो,संवर जाऊँगी मैं.

बहुत सुन्दर गीत लिखा है आपने
अच्छा लगा


********************************
C.M. को प्रतीक्षा है - चैम्पियन की

प्रत्येक बुधवार
सुबह 9.00 बजे C.M. Quiz
********************************
क्रियेटिव मंच

कंचन सिंह चौहान said...

क्या कविता है....! समर्पण का भाव लिये...! प्रेम की अभिव्यक्ति लिये बहुत खूब....!

गीत पूरा नही सुन पा रही हूँ मगर इस गीत का "ठोकर जहाँ मैने खाई" वाला अंतरा मुझे बहुत पसंद है...!

सुलभ [Sulabh] said...

कविता अपने भावों में पूरी तरह डूबी हुई है.
तेरी आँखों के सिवा गीत मुझे बेहद पसंद है.
- सुलभ ( यादों का इंद्रजाल)

विपिन बिहारी गोयल said...

बहुत खूब

Anonymous said...

वाह सुंदर सी प्यारी सी हिंदी ग़ज़ल
शब्द शब्द छू रहा है
अंतर के व्योम को
कर दिया रस सिक्त
प्राण रोम रोम को .....

दर्पण साह "दर्शन" said...

मैं कोमल कुमुदनी सी दिख तो रही हूँ,
पवन बन जो आओ महक जाऊँगी मैं,



कभी भीगें नैना और बिखरे जो काजल,
मधुर हास देना ,बदल जाऊँगी मैं.



तुम्हारी छुअन ने बनाया है चन्दन,
यूँ हीं धड़कने तो , नवल पाऊँगी मैं .



न जाओगे अब दूर,वचन मुझ को दे दो,
विरह वेदना अब न सह पाऊँगी मैं.

Alpana ji,
Adhunik bharamar geet kaisa hota hai....
..iski kalpan karna chahoo to is geet ko 'udharan' banana chahoonga.
khaas taur par udrith 4 duplets behteerin hi nahi tazatareen lage.

दर्पण साह "दर्शन" said...

waise comment main brijmohan ji ko bhi padha...

...aur aapka uttar bhi.

saartakh vartalaap.

डॉ.राधिका उमडे़कर बुधकर said...

बहुत ही सुन्दर कविता के लिए आपको बधाई

Reetika said...

tum jab hanste ho din ho jaata hai, tum gale lage to, din so jaata hai......

sandhyagupta said...

Der aaye durust aaye.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

सचमुच बहुत दिनों के बाद लेकिन बेहद रोमानी, नाज़ुक सी रचना.......

shikha varshney said...

कोमल ,खुबसूरत एहसासों से गुंथी रोमानी रचना ,बहुत सुंदर.

vikram7 said...

अल्पना जी.
गीत'तेरी आँखों के सिवा' आज सुना,गीत पूरा सुनने को नही मिला,पर आवाज मे एक कशिश जरूर महसूस की, बधाई

kavita said...

pyari si rumaani kavita aur waisa hi sundar geet.badhaayi.

Suman said...

nice

JHAROKHA said...

न जाओगे अब दूर,वचन मुझ को दे दो,
विरह वेदना अब न सह पाऊँगी मैं.

बरस जाओ बन मेह नेह का तुम,
लरज कर लता सी सिमट जाऊँगी मैं.

-
Alpana ji,
thoda der se aa payee lekin ....bahut sundar geet padhane ko mila......bhavnatmak panktiyan.
shubhakamnayen.
Poonam

शरद कोकास said...

हमे तो आपका कराओके वाला गीत अच्छा लगा
यह शौक मुझे भी है इसके लिये क्या करना होगा कृपया तकनीकी जानकारी प्रदान करें -शरद कोकास

abhivyakti said...

कभी भीगें नैना और बिखरे जो काजल,
मधुर हास देना ,बदल जाऊँगी मैं.
शब्दों को कोमलता के भावों से सजाया है..एक औदात्य्पूर्ण समर्पण की चरम अभिव्यक्ति है यह कविता...आपने अपनी टिप्पणी में व्याख्या कर कविता के भावो को जिस तरह से समझाया है उसे भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहा जा सकता
आपकी आवाज में गीत सुना बहुत मधुर लगा कहीं कही राग पूरी तरह से लय में नहीं आ रहा था..
प्रकाश

गजेन्द्र बिष्ट said...

वाह!! बहुत-बहुत खुबसूरत है यह रचना, अति-सुन्दर कविता के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई

गीत सुन नहीं पाया, मेरा नेट इजाजत नहीं देता!

महफूज़ अली said...

गीत'तेरी आँखों के सिवा' [फिल्म-चिराग]--
ko suna aapki awaaz mein.... khoobsoorat .....


achcha laga........




aur download bhi kar ke save kar liya hai.....

मोहन वशिष्‍ठ 9988097449 said...

बहुत सुंदर कविता के लिए बधाई

देरी के लिए माफी

नोट : आजकल समस्‍त ब्‍लाग जगत के ब्‍लागर मुझसे पता नहीं किस बात पर नाराज हैं कि कभी मेरे मन की बात जानने की कोशिश भी नहीं करते खासकर बहुत सारे हैं नाम नहीं लूंगा अपने आप जान जाएंगे अगर इस नाचीज से कोई चूक हो गई हो तो माफी चाहूंगा और तनिक हमारे मन की गली में आकर हमारा मार्गदर्शन कर दें आप सभी

अनिल कान्त : said...

बेहद खूबसूरत, मुझे बहुत अच्छी लगी

अनिल कान्त : said...

बेहद खूबसूरत, मुझे बहुत अच्छी लगी

सुलभ सतरंगी said...

एक सुन्दर नेह निवेदन.

अनूप शुक्ल said...

अगली प्रस्तुति की प्रतीक्षा है जी।

खुशदीप सहगल said...

अल्पनाजी, आपकी तरह पुराने हिंदी फिल्मी गानों का मैं भी बड़ा मुरीद हूं..मेरे ब्लॉग पर आकर जिस तरह आपने मेरा उत्साह बढ़ाया, आभार जताने के लिए शब्द नहीं हैं मेरे पास...आशा करता हूं आगे भी पढ़ना-कहना चलता रहेगा

अर्शिया said...

ऐसे ब्लॉग बहुत कम हैं, जहां गद्य, पद्य और गीत एक साथ मिल जाए।
( Treasurer-S. T. )

veerubhai said...

Alpna ji behtreen geeet ,sahbhaavi veerubhai.blogspot.com