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June 18, 2009

बरखा और बाँवरी

भारत में ग्रीष्मावकाश के बाद नए सत्र में स्कूल खुल रहे हैं और यहाँ स्कूल के पहले सत्र की परिक्षाओं के बाद २२ जून से गरमी की दो महीने की छुट्टियाँ शुरू हो रही हैं और छुट्टियों में बच्चों को व्यस्त रखना एक बड़ी चुनौती होती है.

जब दुबई fesitival सिटी[शौपिंग काम्प्लेक्स] जाना हुआ था तब वहां ली गयीं तस्वीरों में से दो यहाँ दे रही हूँ.

पहली तस्वीर में एक बहुत ही बड़ा झूमर देख सकते हैं जो इस मॉल के प्रवेश द्वार पर है.

Click on pictures for a better & bigger view.

दूसरी तस्वीर में पहले तल पर जाने वाली सीढियों की बनावट आकर्षित कर रही है.


अब प्रस्तुत है यह कविता--:

सावन की पड़ी फुहार तो बाँवरी बिरहन का मन उस से क्या बोल उठा? इस रचना में कहने का प्रयास किया है.



बरखा और बाँवरी
-------------------

उमड़ घुमड़ कर छाये बादल,
रिमझिम रिमझिम जल बरसायें,
हौले आती बोल बाँवरी,
काहे को यूँ ही अलसाए?

भीजे पात हरे सगरे,
हैं फूल मगन,कलियाँ मुस्काए,
बरखा के संग नाच बाँवरी,
काहे को यूँ ही शर्माए?

छपक छपाक गूंजे सरगम सी
बूँद छम्म से जो गिर जाये,
झूम पवन संग आज बाँवरी ,
काहे को यूँ ही घबराए?

भरते सूखे नदी ताल सब,
देख देख कुदरत हरषाए,
रब से तू भी मांग बाँवरी,
परदेसी घर वापस आये!
परदेसी घर वापस आये!
------------------------

60 comments:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

बरखा और बावरी को पढ कर मन बारिश में भीगने के मचल उठा है, पर कमबख्त बारिश है कि होने का नाम ही नहीं ले रही।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

रंजना [रंजू भाटिया] said...

चित्र सुन्दर है और कविता बहुत ही प्यारी लगी ..अभी तो दिल्ली में बहुत गर्मी है ..आपकी लिखी यह कविता सुखद फुहार दे गयी
छपक छपाक गूंजे सरगम सी
बूँद छम्म से जो गिर जाये,

शब्द संयोजन बहुत सुन्दर है शुक्रिया

श्यामल सुमन said...

बारिश आए परदेशी संग किया खूब मनुहार।
जीवन में ऐसा होता जब बन जाता उपहार।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.

Navnit Nirav said...

bahut hi khoobsoorat rachna hai aapki.
भरते सूखे नदी ताल सब,
देख देख कुदरत हरषाए,
रब से तू भी मांग बाँवरी,
परदेसी घर वापस आये!
kudrat kush hai is liye sachmuch banvari ko kuch mang lena chahiye.

डॉ .अनुराग said...

यहाँ तो परदेसी वापस आते नजर नहीं आते .....कभी किसी रात आते भी है तो आंधी डांट के भगा देती है .दो बार से ताडी पार है ...देखिये अब कब जुगत बैठे.....

राज भाटिय़ा said...

कविता बहुत मन भई, बहुत सुंदर,

woyaadein said...

ऐसी झमाझम बारिश हो जाए तो फ़िर किसका मन बावरा नहीं होगा....दुबई की ताजातरीन खबरें भी मिल गयी और कविता की फुहारें भी....एक पंथ दो काज.....हाँ बांवरी का परदेसी आ जाए तो वह भी खुश हो ले......

साभार
हमसफ़र यादों का.......

ओम आर्य said...

भरते सूखे नदी ताल सब,
देख देख कुदरत हरषाए,
रब से तू भी मांग बाँवरी,
परदेसी घर वापस आये!
परदेसी घर वापस आये
अल्पना जी

इन पंक्तियो मे कमाल के भाव और शब्द समायोजन है .......जिसका कोई जबाव नही.....बहुत सुन्दर

मीत said...

आपकी यह रचना मन भीगा गयी....
बहुत सुंदर...
बरखा ओ ऐसा विषय है, जिसके सोचने भर से ही मन भीग जाता है...
बहुत सुंदर...
मीत

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

वाह! कालिदास और मेघदूत याद हो आये।

ताऊ रामपुरिया said...

आपकी रचनाओं के भाव और शब्द संयोजन बिल्कुल साहित्यिक होता है.बहुत ही उच्च कोटि की रचना. बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

SWAPN said...

भरते सूखे नदी ताल सब,
देख देख कुदरत हरषाए,
रब से तू भी मांग बाँवरी,
परदेसी घर वापस आये!
परदेसी घर वापस आये!

sunder alpana ji, manbhavan shabd chitra.

hriday chura le gain mera barkha ki boonden,
khoj kari, dhoondha, sajan ke paas mila.

bahut sunder abhivyakti ke liye badhai.

‘नज़र’ said...

बहुत सुन्दर काव्य

दिगम्बर नासवा said...

sundar chitron के साथ...sundar rachnaa
umad ghumad kar aate baadalon से aati bheeni bheeni khushboo ki tarah is rachnaa ne भी barsaat ki yaad taaza kar दी...........

नीरज गोस्वामी said...

अद्भुत चित्र और लाजवाब रचना...वाह अल्पना जी वाह...
नीरज

P.N. Subramanian said...

उत्कृष्ट रचना.आभार. यहाँ तो आकाश से आग ही मिल रही है. बरखा का बेसब्री से इंतज़ार है.

raj said...

रब से तू भी मांग बाँवरी,
परदेसी घर वापस आये!har baar ki tarah sunder kavita...

kavita said...

अल्पना जी,बारिशें तो नहीं आयीं अभी तक..मगर आप की कविता ने ठंडक जरुर दी है..
बहुत ही प्यारी कविता है.
सुरुचिपूर्ण किया शब्द संयोजन मन को भा गया.

बच्चों के साथ साथ ,गरमी की छुट्टियाँ आप भी खूब मजे से मनाईये.

Arvind Mishra said...

आपकी इस कविता ने तो बरसात की चाह शिद्दत के साथ बढ़ा दी है -यहाँ भीषण गर्मीं पड़ रही है इन दिनों ! मौसम दगा दे गया है !

सुशील कुमार छौक्कर said...

आपकी यह कविता पढकर बादल भी जल्दी से बरस जाए तो मजा आ जाए। बहुत ही उम्दा रचना।
छपक छपाक गूंजे सरगम सी
बूँद छम्म से जो गिर जाये,
झूम पवन संग आज बाँवरी ,
काहे को यूँ ही घबराए?

क्या कहें.....। इन सुन्दर फोटो के बीच अगर एक बरखा की बूंदो का सुन्दर फोटो भी लग जाता तो सच में और आनंद आ जाता है।

रविकांत पाण्डेय said...

रब से तू भी मांग बाँवरी,
परदेसी घर वापस आये!
परदेसी घर वापस आये!

बहुत सुंदर!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

अल्पना जी ,
सुँदर चित्र व एक सुँदर कृति से बरखा का स्वागत किया है आपने जो प्रिय लगा !

●๋• सैयद | Syed ●๋• said...

सावन की फुहारों पर बाँवरी बिरहन के मन के बोल सुन कर अच्छा लगा.

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

अरे हमारी छुट्टियाँ तो अब ख़तम होने वाली हैं ....और बारिश अब तक दगा दे रही है !!


सुन्दर है कविता!!
शुक्रिया!!!

योगेन्द्र मौदगिल said...

Wah Alpna g behtreen rachna... behtreen chitra..

वन्दना अवस्थी दुबे said...

पानी को तरसते हमारे मनों को कुछ ठंडक पहुंची..

Ratan Singh Shekhawat said...

सुन्दर चित्रों के साथ बेहतरीन कविता |

Anonymous said...

are vaah......kya gazab kiya....ajab kiya...man-mayur ko lakdak kiya....!!

डॉ. मनोज मिश्र said...

छपक छपाक गूंजे सरगम सी
बूँद छम्म से जो गिर जाये,
झूम पवन संग आज बाँवरी ,
काहे को यूँ ही घबराए?
क्या मनभावन लाइनें लिखा है आपनें .भाव-विभोर करनें वाली रचना .

Anil Pusadkar said...

बरसात का मौसम मुझे बहुत पसंद है और भीगना मेरा शौक्।आपको पढ कर मन बावरा मचल गया है भीगने को मगर यंहा बरखा लगातार धोका दे रही है।पता नही आप जानती हैं या नही,यंहा छत्तीसगढ मे परदेस गये लोगो की वापसी बरसात मे ही होती है।तीन माह यंहा काम कर लाखों मज़ूर निकल पड़ते हैं रोजी-रोटी की तलाश मे देश के कोने कोने पर और फ़िर बरसात के आते ही अपने ही देस के ये परदेसी लौट आते हैं।

मोना परसाई "प्रदक्षिणा" said...

भीजे पात हरे सगरे,
हैं फूल मगन,कलियाँ मुस्काए,
बरखा के संग नाच बाँवरी,
काहे को यूँ ही शर्माए

लोक -गीतों की मिठास में पगा यह सुंदर गीत बारिश के लिए तरसते प्राणों को ठंडक देने वाला है .

अशोक पाण्डेय said...

प्रकृति में कविता और कविता में प्रकृति... मन मयूर हो जाता है ऐसी कविताओं को पढ़कर।

प्रकाश गोविन्द said...

यहाँ तो सूरज महाशय कुछ ज्यादा ही इमानदारी से अपने काम में लगे हुए हैं ! एसी और कूलर चल-चलकर गरम हुए जा रहे हैं ... उधर कहीं गाना बज रहा है ...आज मौसम बड़ा बेईमान है ... हम सुनकर जल-भुन रहे हैं कि कमबख्त कब बेईमान होगा ?

लेकिन कुछ भी हो आपकी काव्य रचना मानसिक राहत तो दे ही रही है !

आपकी यह सुन्दर कविता को पढ़कर पता नहीं क्यों मुझे पुराने दिन याद आ रहे हैं जब मैं देखा करता था कि बरसात से पहले कुछ गाँव के लोग 'अल्ला मेघ दे ... अल्ला मेघ दे' कहते हुए आते थे तो लोग उन्हें गुड़ देते थे और उनके ऊपर पानी डालते थे (पता नहीं आपने ऐसा देखा है या नहीं )

कविता में आपने शब्दों का प्रयोग अत्यंत
खूबसूरती से किया जो प्रभावित करता है :


हौले आती बोल बाँवरी

भीजे पात हरे सगरे

छपक छपाक गूंजे सरगम सी

मुझे यकीन है कि परदेशी अगर ये रचना पढ़ ले तो पहली ट्रेन से ही वापस आ जाएगा !

आज की आवाज

रश्मि प्रभा... said...

रिमझिम फुहार और बारिश की सोंधी खुशबू-सी आपकी रचना.....

Pyaasa Sajal said...

lok geet jaisa feel aa rahaa thaa....bahut achha laga sunkar...

abhivyakti said...

भरते सूखे नदी ताल सब,
देख देख कुदरत हरषाए,
रब से तू भी मांग बाँवरी,
परदेसी घर वापस आये!

अल्पना जी ,
आपकी कविता मन को स्पर्श करती है पढ़ कर बहुत अच्छा लगा...आपकी रचनाएं ब्लॉग जगत की उच्च स्तरीय लेखन में शुमार है...मेरी बधाई स्वीकार करें..!
प्रकाश सिंह

abhivyakti said...

भरते सूखे नदी ताल सब,
देख देख कुदरत हरषाए,
रब से तू भी मांग बाँवरी,
परदेसी घर वापस आये!
अल्पना जी ,
आपकी कविता मन को स्पर्श करती है पढ़ कर बहुत अच्छा लगा...आपकी रचनाएं ब्लॉग जगत की उच्च स्तरीय लेखन में शुमार है...मेरी बधाई स्वीकार करें..!
प्रकाश सिंह

अक्षय-मन said...

tasveer bahut hi acchi hain........
aur ye shabd ye rachna bhi bahut..hi sundar hain.....
lekin abhi yahan to barish hui nahi....
aapki rachna padkar uska intzaar aur besabr kar raha hai...

अमिताभ श्रीवास्तव said...

मन देख और पढ कर तर् गया/ किंतु असल बात ये है कि बरखा रानी का बेसब्री से इंतजार है यन्हा/ बेहद गरमी और ऊमस से परेशान/
किंतु आप्की कविता हर बार की तरह लाज़वाब, और तस्वीरे जैसे खुद उस जगह हो...//
बस अब लगता है कुछ इसी तरह से बारीश हो और मन झूम उठे/

KK Yadav said...

Nice Picture...nice Geet.Barsat ke mausam ke intzar ki bekrari apki is post ne badha di.
_____________________________
अपने प्रिय "समोसा" के 1000 साल पूरे होने पर मेरी पोस्ट का भी आनंद "शब्द सृजन की ओर " पर उठायें.

creativekona said...

भीजे पात हरे सगरे,
हैं फूल मगन,कलियाँ मुस्काए,
बरखा के संग नाच बाँवरी,
काहे को यूँ ही शर्माए?
अल्पना जी ,
बहुत सुन्दर गीत ...इसमें एक अच्छे गीत के सभी तत्व मौजूद हैं .
हेमंत कुमार

शोभना चौरे said...

छपक छपाक गूंजे सरगम सी
बूँद छम्म से जो गिर जाये,
झूम पवन संग आज बाँवरी ,
काहे को यूँ ही घबराए?
बहुत सुन्दर बरखा का गीत
साथ ही हमने दुबई की सैर भी कर ली .शायद इस गीत को सुनकर ही बरखा भारत में अपनी कुछ बुँदे ही बिखेर दे |

दिलीप कवठेकर said...

क्या ही सुखद संयोग है. आज अभी अभी छत्रपती शिवाजी के रायगढ किले पर इस वर्ष की पहली बारीश में भीग कर आ रहा हूं, और आपकी कविता नें ambiance या वातावरण में और सुखद अनुभूतियां घोल दी है.

छपक छपाक गूंजे सरगम सी
बूँद छम्म से जो गिर जाये,
झूम पवन संग आज बाँवरी ,
काहे को यूँ ही घबराए?

आपके सुरों की फ़ुहार मिसींग है.

Harkirat Haqeer said...

छपक छपाक गूंजे सरगम सी
बूँद छम्म से जो गिर जाये,
झूम पवन संग आज बाँवरी ,
काहे को यूँ ही घबराए?

बरखा और बावरी को पढ कर मन इतनी गर्मी में भी सावन सावन हो गया .....!!

cartoonist anurag said...

dil khush ho gaya kavita padakar....

cartoonist anurag said...

dil khush ho gaya......

राजकुमारी said...

बहुत सुन्दर चित्र है
गीत बहुत पसंद आया है, आप तो वैसे भी हमेशा मन लगा कर ही लिखती हैं

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

भरते सूखे नदी ताल सब,
देख देख कुदरत हरषाए,
रब से तू भी मांग बाँवरी,
परदेसी घर वापस आये!
परदेसी घर वापस आये!


अति सुन्दर....आपकी कविताओं में तो लोकगीतों की झलक दिखलाई पडती है।

Mumukshh Ki Rachanain said...

भरते सूखे नदी ताल सब,
देख देख कुदरत हरषाए,
रब से तू भी मांग बाँवरी,
परदेसी घर वापस आये!

बेहतरीन गीत.
बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त

satish kundan said...

सबसे पहले आपका शुक्रिया की आप मेरे ब्लॉग पे आईं...आपकी कविता को पढ़कर मन मयूर सा नाचने लगा...बहुत खुबसूरत रचना!!!!!!!!! बधाई..

दर्पण साह "दर्शन" said...

sawan ka shiddat se intazar hai....


छपक छपाक गूंजे सरगम सी
बूँद छम्म से जो गिर जाये,
झूम पवन संग आज बाँवरी ,
काहे को यूँ ही घबराए?

...is poem ne is tapti loo main halki baucharoon ka to anubhav to kara hi diya !!

कंचन सिंह चौहान said...

रब से तू भी मांग बाँवरी,
परदेसी घर वापस आये!

sundar bhav...!

magar ab aaye bhi ye bairee badal... had ho gai ab to

श्याम कोरी 'उदय' said...

रब से तू भी मांग बाँवरी,
परदेसी घर वापस आये!
... behad prabhavashaalee abhivyakti !!!!!

sarwat m said...

बारिश का इतने सरल शब्दों में कविता बन जाना, सराहना के लिए शब्द नहीं हैं. मानसून कोसों दूर हैं मगर आपकी रचना ने पसीने से भीगे बदन को शीतल तरावट का एहसास करा दिया. इस वर्षा में आपने जिन मनोभावों का चित्रण किया है, वो सब के सब केवल हमारे ग्रामीण परिवेश की धरोहर है. शहरों में तो बारिश को लेकर कोई एहसास ही नहीं बचा. मेरे ब्लॉग पर आने, अपनी सम्वेदना के जिंदा रहने और वास्तविक रचनाधर्मी के कर्तव्य निर्वहन का प्रमाण अंकित करने हेतु मैं आपको बधाई नहीं दूंगा , प्रार्थना करूंगा कि सम्वेदनाएँ जीवित रखें और दूसरों को भी प्रेरित करें. और हाँ, तस्वीरें अच्छी हैं, आप की फोटोग्राफी भी काबिले तारीफ है.

Vijay Kumar Sappatti said...

aha alpana ji ........... baarish ki puhaare yahan tak aa rahi hai.........

padhkar aanand ho gaya .....

badhai ho badhai..

गौतम राजरिशी said...

सोचता हूँ इन पचपन टिप्पणियों तले दबी हमारी बात आप तक पहुँचेगी भी कि नहीं?
बरखा और बावरी ने मन मोह लिया है....और मेल का अलग से शुक्रिया...

seema gupta said...

भरते सूखे नदी ताल सब,
देख देख कुदरत हरषाए,
रब से तू भी मांग बाँवरी,
परदेसी घर वापस आये!
परदेसी घर वापस आये
"ये पंक्तियाँ मन को छु गयी.....खुबसूरत भावनाओ का चित्रण खूबसूरती के साथ.."

regards

Abhishek Prasad said...

is baar mansoon aane mein lagbhag ek mahine ki deri ho rahi hai, par aapki kavita ne to antar-mann ko pura bhigo diya...
achhi rachna hai...

प्रदीप मानोरिया said...

बहुत सुन्दर प्रकृति को परिभाषित करती शानदार रचना
बधाई

mehek said...

भरते सूखे नदी ताल सब,
देख देख कुदरत हरषाए,
रब से तू भी मांग बाँवरी,
परदेसी घर वापस आये!
परदेसी घर वापस आये!
beinteha sunder,jaise barsat ki pehli fuhar ka harsh.