June 25, 2009

जेठ दुपहरी

स्कूलों में गरमी की छुट्टियाँ शुरू,कल बच्चों का ओपन हाउस था...मतलब उनकी परीक्षा के परिणाम आए थे।
और इन छुट्टियों के साथ शुरू हुआ लोगों का अपने अपने देश जाने का सिलसिला.हम तो इस बार भारत नहीं जा रहे हैं।
बस अब सिलसिला शुरू होगा मिलने मिलाने का...गल्फ का जीवन ही ऐसा है..बच्चों के जन्मदिन पर मिल लेते हैं नहीं तो मिलने मिलाने के अवसर ढूढने पड़ते हैं - सब अपने में व्यस्त हैं.कोई किसी के यहाँ बिना पूर्व सूचना दिए नहीं आता जाता..इस बार तो हमारी मित्र मंडली पूरे ६ महीने बाद इकट्ठा होंगी..
यहाँ हमारे रिश्तेदार नहीं हैं सो हमारे मित्र ही रिश्तेदार से भी बढ़कर हैं।कई साल हो गए यहाँ रहते हुए और कुछ बहुत अच्छे नए-पुराने मित्र भी मिले..हम ६ परिवार हैं जो बहुत घनिष्ठ मित्र हैं.इनमें से दो परिवार तो अब ओमान में ट्रान्सफर हो गए..अब हम ४ बचे हैं.नए साल पर सब एक साथ मिल कर बैठे थे...और अब बच्चों की छुट्टियाँ शुरू हुई हैं तो आजसे मिलना मिलाना शुरू...शुरुआत है हमारे घर से..संक्षेप में--आज हमारे घर में शाम को सब आ रहे हैं..और बच्चे तो बहुत उत्साहित हैं और मैं भी!
१-२ दिन सब के साथ कैसे बीत जायेंगे पता ही नहीं चलेगा..और जब जाने का समय आता है.. तब सब से ज्यादा बच्चों को तकलीफ होती है..यही है गल्फ की सामाजिकजिंदगी का एक पहलू ...सभी अपने घरों में बहुत हद्द तक सिमित ! अब मिलवाती हूँ हमारे मित्र परिवार के सब से छोटे सदस्य -आर्यन से -





और अब एक कविता-


जेठ दुपहरी
-------------

जेठ दुपहरी जलते हैं दिन,
और झुलसती हैं रातें ,
इस दावानल में जल ,
मुरझाई मन की बातें.


अलसाया आँगन है,
और तपीं सारी भीतें,
द्वार थके धूप में तपते,
ताल सभी दिखते रीते.


वहीँ आम की अमराई,
खिलखिल के मुस्काती है,
धर अमियाँ का रूप,
विजय मौसम पर पा जाती है!


चलें धूल से भरी आंधियां,
झुलसायी धरती बोले,
बीते जल्दी जेठ महीना,
बरखा आये रस घोले!
-अल्पना वर्मा


एक युगल गीत फ़िल्म-अभिमान से -'तेरी बिंदिया रे'-
इस गीत में मेरा साथ दिया है राजा पाहवा ने -
download MP3-
Play-

65 comments:

रंजन said...

बडे़ शहर.. भारत हो या विदेश ये ही होता है.. दोस्तों से मिलना ही नहीं होता.. कभी कुछ कभी कुछ..

आर्यन बहुत क्युट है...

सुनीता शानू said...

बहुत सुन्दर कविता लिखी आपने अल्पना जी, अच्छा लगा पढ़कर... सचमुच गर्मी बहुत तेज़ पड़ रही हैं और बारिश है की आने का नाम नही ले रही

अविनाश वाचस्पति said...

जेठ दुपहरी
इस गर्मी में भी
ठंडक का अहसास
दे रही है।
कविता का कमाल है।

ओम आर्य said...

jeth ki dupahari ka achchha chitran........too good

वन्दना अवस्थी दुबे said...

हां विदेश में ही अपनों की कमी अखरती है. ये भी सच है, कि बाहर मित्र ही सगे समान होते हैं.आर्यन बहुत-बहुत प्यारा है. और कविता! ठीक आर्यन की तरह...बधाई.

मीत said...

बरखा आये रस घोले!

बस हमें भी इन अंतिम पंक्तियों का ही इंतज़ार है...
उम्मीद है आपकी कविता पूरी हो...
मीत

काजल कुमार Kajal Kumar said...

मित्रों से मिलना रिश्तेदारों के मिलने से कहीं अधिक सुखद होता है.

महामंत्री - तस्लीम said...

वाकई, बहुत दुखदायी है ये बच्‍चों के लिए। जेठ की तपन आपकी कविता में बखूबी महसूस हो रही है।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

नीरज गोस्वामी said...

अल्पना जी देश के बाहर अपने देश के लोगों से मिलने का आनंद मैं समझ सकता हूँ...बच्चे एक दुसरे को बहुत मिस करते हैं...आप इस बार भारत नहीं आ रहीं ये तो ठीक बात नहीं...मानसून रूठ गया टी क्या आपभी देश से रूठ बैठीं हैं? गर्मी का शिद्दत से एहसास कराती आपकी कविता बेजोड़ है...
नीरज

नीरज गोस्वामी said...

आर्यन बहुत प्यारा है उसे काला टीका लगा कर रखिये...इश्वर से प्रार्थना है की उसे लम्बी और स्वस्थ उम्र दे.
नीरज

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर कविता .. आपने तो जेठ की तपन का वर्णन किया है .. पर इस बार का आषाढ भी काफी तपन दे रहा है।

M Verma said...

अलसाया आँगन है,
और तपीं सारी भीतें,
द्वार थके धूप में तपते,
ताल सभी दिखते रीते.
bahut sunder chitran hai.

सुशील कुमार छौक्कर said...

वाह वाह वाह। इस जालती गर्मी पर बहुत बेहतरीन लिख दिया। सच बस बरखा का इंतजार है पता नही कब आएगी। सुन्दर आर्यन की सुन्दर मुस्कराहट दिल को जीत रही है। वैसे हम भी आ रहे आपके यहाँ इंतजाम करके रखिएगा।

ताऊ रामपुरिया said...

चलें धूल से भरी आंधियां,
झुलसायी धरती बोले,
बीते जल्दी जेठ महीना,
बरखा आये रस घोले!

अब तो यहां भी सख्त जरुरत है वर्षा की.

आपका सप्ताहांत मित्रों के सानिंध्य मे आनंद पुर्वक बीते. और आर्यन जैसे क्युट मेहमान साथ होंगे तो बहुत ही सुंदर समय व्यतीत होने वाला है. बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

Arvind Mishra said...

ओह वतन नहीं आना हो पा रहा है -कविता ने तो गर्मी के अहसास को और बढा दिया उफ़ !

"अर्श" said...

अल्पना जी नमस्कार,
लोग,सिमावों में और हदों में बांध के रह गए है ... ये बहोत ही सच बात कही है आपने...आर्यन को शुभाशीष और कविता बहोत ही प्यारी है
आखिरी लाइन बरखा आये रस घोले का यहाँ भी इंतज़ार रहेगा ..दिल्ली में भी बहोत गर्मी है ...
पोस्ट के सबसे निचे आपकी आवाज़ धुन्धता हूँ खली हाथ लौटा ऐसा क्यूँ....?

बधाई
अर्श

राज भाटिय़ा said...

अल्पना जी आप ने सही कहा कि यहां मित्र रिश्तेदारो से बढ कर होते है, फ़िर मिलना अच्छा लगता है, बच्चे भी ओर हम सब भी रात को बहुत देर तक बेठ कर गप्पे मारते है... फ़िर बिछुडना बहुत चुभता है.
आर्यन बहुत प्यारा लगा, बहुत प्यार दे हमरी रतफ़ से .रे कविता भी बहुत सुंदर लगी.
धन्यवाद

SWAPN said...

alpana ji, dilli men bahut buri halat hai garmi ke karan.

aisi garmi men aapko manmohak kavita ne sheetalta pradaan ki hai. dhanyawaad, badhaai.

Kishore Choudhary said...

सच है इंतजार के कई रंग होते हैं.
आर्यन बहुत क्यूट है
आपकी कविता ही अब मरहम का काम करती है इन तपते और बिन बरसात वाले दिनों में, अभी सुना है हमारे रेगिस्तान में कोई बारिश से भरा तूफ़ान आने वाला है, उसकी उम्मीद कम ही है बस व्योम के पार को देख कर ही कुदरत के कुछ रंगों को अपना मान लेते हैं सुन्दर कविता बधाई

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

इस बार तो जेठ के साथ साथ आषाढ भी सूखा निकल रहा है, लेकिन 5 जुलाई के आसपास मौसम में परिवर्तन होगा और तभी इस चिलचिलाती गर्मी से थोडी निजात मिलेगी......

आपकी कविता बहुत बढिया लगी, पूरी तरह से गर्मी का अहसास कराती हुई.....ओर ये बच्चा आर्यन बहुत ही प्यारा लगा, बिल्कुल मेरे छोटे बेटे मालव जैसा।

डॉ. मनोज मिश्र said...

बीते जल्दी जेठ महीना....
आपने तो मन की कह दी .

दिलीप कवठेकर said...

कविता के शब्दों से वातावरण निर्मिती करने में आप सक्षम हैं. ऐसा लगा कि जेठ की दोपहर में अमराई में बैठ धूप की आंच का एहसास हो रहा है.

आपके गायेन गीतों में अब नाद आ गया है, जो गाने को श्रवणीय बना रहा है. बहुत खूब!!

Udan Tashtari said...

सुन्दर रचना.. आर्यन तो बड़ा प्यारा है.


गीत सुनकर आनन्द आ गया.

शोभना चौरे said...

प्यारिसी कविता और प्यारा सा आर्यन |
आक्को और आपकी मित्र मंडली छुट्टियों की शुभकामनाये |

●๋• सैयद | Syed ●๋• said...

अल्पना दी, बहुत सुन्दर चित्रण किया आपने..

चलें धूल से भरी आंधियां,
झुलसायी धरती बोले,
बीते जल्दी जेठ महीना,
बरखा आये रस घोले

हमारे यहाँ तो बस बरखा आने ही वाली है.....

आर्यन को प्यार...

AlbelaKhatri.com said...

geet padh kar anand a gaya ..man abhibhoot ho gaya________
badhaai !

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

कविता और आर्यन बाबू दोनों ही खूबसूरत लगे अल्पना जी

- लावण्या

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

अल्पना वर्माजी

चलें धूल से भरी आंधियां,
झुलसायी धरती बोले,
बीते जल्दी जेठ महीना,
बरखा आये रस घोले!
वैसे इस कविता से मुम्बई मे इस वर्ष बारिस कि कमी याद आगई.....
बहुत सुन्दर कविता.. वैसे मे आपकी कविताओ का फैन हू।

आपकी छुटिया अच्छे से बिते यह कामना

आभार/मगलकामना
महावीर बी सेमलानी "भारती"
मुम्बई टाईगर
हे प्रभु यह तेरापन्थ

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

अरे आर्यन से तो मैने बात ही नही की। बडा ही क्यूट लग रहा है।
आभार/मगलकामना

महावीर बी सेमलानी "भारती"
मुम्बई टाईगर
हे प्रभु यह तेरापन्थ

JHAROKHA said...

चलें धूल से भरी आंधियां,
झुलसायी धरती बोले,
बीते जल्दी जेठ महीना,
बरखा आये रस घोले!

अल्पना जी ,
इस रचना में अIपने जो कामना की है काश वो जल्द पूरी हो जाये .भारत में तो गर्मी के मारे बुरा हाल है ...जेठ के महीने का सरल शब्दों में अच्छा वर्णन .शुभकामनाएं
पूनम

विवेक सिंह said...

आर्यन से मिलकर अच्छा लगा !

प्रकाश गोविन्द said...

जेठ दुपहरी जलते हैं दिन,
और झुलसती हैं रातें ,

यह कविता या गीत नहीं ...
यह तो लखनऊ के मौसम का सजीव चित्रण है !


वहीँ आम की अमराई,
खिलखिल के मुस्काती है,
ये पंक्तियाँ पढ़कर अपने फार्म की याद आ गयी !

बच्चा सामने यूँ ही हँसता रहे ......
सारे मौसम सुहाने हो जाते हैं !

(आर्यन को मेरी तरफ से एक चाकलेट जरूर दीजियेगा !)

"अपनी बातें - अपने लोग" का अहसास बाहर जाने पर ही हो पाता है !

अगली पोस्ट में आत्मीयता से भरी 'गेट टू गेदरिंग' की तस्वीरों को अवश्य लगाईये .... इस बहाने हम भी शरीक हों सकेंगे !!

आज की आवाज

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बीते जल्दी जेठ महीना,
बरखा आये रस घोले!

वाकई इस बरखा के मौसम का बेसब्री से इन्तजार है ..दूर देश क्या अब अपने ही देश में सबसे मिलना मुश्किल हो जाता है ..सब बहुत व्यस्त हो चुके हैं ..न जाने कैसे हो चुके हैं अब नजदीक के भी रिश्ते ..आप सब लोग मिल तो लेते हैं वही अच्छा है .:) आर्यन बहुत प्यारा लगा और तेरी बिदियाँ रे ..गाना बहुत पसंद है .शुक्रिया

कंचन सिंह चौहान said...

समझ नही आ रहा किसकी तारीफ करूँ...नटखट से दिखते आर्यन की...सुंदर सी कविता की या मीठी आवाज़ की...???? सब एक से बढ़के एक..!

seema gupta said...

आर्यन बहुत ही प्यारा और मनमोहक है....

चलें धूल से भरी आंधियां,
झुलसायी धरती बोले,
बीते जल्दी जेठ महीना,
बरखा आये रस घोले!
" उम्मीद से भरी ये पंक्तियाँ मन को खुब भाई.."
regards

डॉ .अनुराग said...

यहाँ की दोपहरों पे बहुत कुछ लिख चूका हूँ....बिजली का आलम ये है की अभी इनवर्टर पे टिपण्णी कर रहा हूँ.....आर्यन मेरे बेटे का भी नाम है...ये भी प्यारा है...

दिगम्बर नासवा said...

जेठ दुपहरी जलते हैं दिन,
और झुलसती हैं रातें ,
इस दावानल में जल ,
मुरझाई मन की बातें

तपती रेट और गल्फ का तपता मोसम ....... साकार हो रहा है आपकी कविता में........... मेघ का इन्तेअर सबको है.......... पर गल्फ में ऐसा होता नहीं ............ लोग इंतज़ार न कर के............ महग को ढूँढने विदेश चले जाते हैं..........

आपकी रचना बहूत ही लाजवाब है ...... सामयिक है

कंचनलता चतुर्वेदी said...

रचना बहुत अच्छी लगी....बहुत बहुत बधाई....

cartoonist anurag said...

achhi kavita hai....badhai...
aapka mere blog par swagat hai...

KK Yadav said...

आपका ब्लॉग नित नई पोस्ट/ रचनाओं से सुवासित हो रहा है ..बधाई !!
__________________________________
आयें मेरे "शब्द सृजन की ओर" भी और कुछ कहें भी....

mark rai said...

haan wahan par watan ki yaad to aati hi hogi...par yahan par ham apne watan me rah kar bhi aam logon ke liye kuchh nahi kar pate hai..tab badi nirashaa hoti hai....

Suman said...

nice

योगेन्द्र मौदगिल said...

अच्छी कविता... आर्यन से मिल कर प्रसन्नता हुई..

Pyaasa Sajal said...

prakriti ke kareeb laati hai ye rachna

अमिताभ श्रीवास्तव said...

बरखा आ गई हमारी मुम्बई मे.
भले ही जेठ माह की कविता हो किंतु इस्ने सावन सा रस घोल दिया.
आपकी कविताओ मे अलग आनंद प्राप्त होता है. यहां नैसर्गिक अनुभूति है.
इन दिनो मिलने-मिलाने मे व्यस्त होंगी आप. मित्र सबसे बेहतर रिश्ता होता है, शेष रिश्तेदारी नाम की होती जान पडती है इस काल मे.../ सो भले रिश्तेदार न हो मित्र है, काफी है.

महफूज़ अली said...

Diary vidha mein bahut shaandaar likha hai aapne.......... waaqai mein baat sahi hai....... pardes mein dost hi apne rishtedaar hote hain.........

Aur haan.......!!!!!!!!!! ARYAN se milke bahut khushi huyi........ lots of love to him.......


वहीँ आम की अमराई,
खिलखिल के मुस्काती है,
धर अमियाँ का रूप,
विजय मौसम पर पा जाती है!

aur kavita in lines ne kuch yaad dila diya......... bahut achchi ban padi hai kavita........

Thanx....... n

Regards

MAHFOOZ

अक्षय-मन said...

aapne poori prkrti ko apne shabdon ke rang se ek naya hi roop de diya....
is baar bhi pichli baar ki tarhaan....

मोहन वशिष्‍ठ said...

बहुत सुन्दर कविता लिखी आपने अल्पना जी,

Murari Pareek said...

watan se dur rahne par bhi watan ke prati prem kam nahi hota!!

kavita said...

'जेठ दुपहरी -सरल शब्दों में लिखी सुन्दर कविता.
आर्यन को स्नेह.
गीत भी श्रवणीय है.

आशुतोष दुबे "सादिक" said...

कविता का कमाल है। कविता भी बहुत सुंदर लगी.
धन्यवाद.

हिन्दीकुंज

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

जेठ दुपहरी की प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी.. आपके मेहमानों के साथ ये खास एक-दो दिन कैसे बीते.. एक पोस्ट इस पर भी हो जाए.. :) देर से टिप्पणी करने के लिए क्षमाप्रार्थी हूं.. आभार

Harkirat Haqeer said...

आपके निजी जीवन की थोडी सी झलकी मिली ....मिलनसार लोगों के ही मित्र बनते हैं .....कविता मौसम के अनुकूल है .....

चलें धूल से भरी आंधियां,
झुलसायी धरती बोले,
बीते जल्दी जेठ महीना,
बरखा आये रस घोले!

अब तो सावन का इंतजार है ...!!

RAJ SINH said...

कविता ........आपने शब्दों में मौसम उतार दिया .
आर्यन क्यूट है .........चस्मेबद्दूर .

मानसी said...

सुंदर कविता।

अशोक पाण्डेय said...

बहुत सुंदर कविता है, अल्‍पना जी। प्रकृति को बिम्बित करनेवाली रचनाएं मुझे वैसे भी बहुत भाती हैं।

अशोक पाण्डेय said...
This comment has been removed by a blog administrator.
woyaadein said...

आखिरकार यहाँ पर बारिश ने दस्तक दे ही डाली....कल रात को क्या झमाझम बारिश हुई कि बस पूछिए ही मत, सचमुच मज़ा आ गया......उम्मीद करते हैं आपके अबू धाबी को भी जल्द ही बारिश का तोहफ़ा मिले....

साभार
हमसफ़र यादों का.......

अमिताभ श्रीवास्तव said...

aapke kavya prem ka udaharan mujhe mila,
meri yaado vaali kavita par aapki tippani..jabki mene payaa he ki jo likhi jaa chuki rachnaye hoti he vo amooman koi nahi padhhta aour sab bs haaliya padhh kar gujar jaate he//
aapko koti koti dhnyavaad//

creativekona said...

अल्पना जी ,
कुछ व्यस्तताओं की वजह से कमेन्ट देर से लिख पा रहा हूँ .गर्मियों का आपने बहुत अच्छा वर्णन किया है
अलसाया आँगन है,
और तपीं सारी भीतें,
द्वार थके धूप में तपते,
ताल सभी दिखते रीते.
सुन्दर रचना ....
हेमंत कुमार

गौतम राजरिशी said...

सुंदर कविता मैम!

छुट्टियों का, मिलने-मिलाने का सिलसिला खूब जमेगा! इधर मेरा भी जम रहा है...
नन्हे आर्यन को खूब-खूब सारा स्नेह !

Rajeev R said...

aah...apne mati, apne desh, apne boli se dur rehke bhi kaafi bakhubi samoya hua aapne bharat ko apni duniya me....

http://bharatmelange.blogspot.com

cartoonist anurag said...

kavita bhee sunder aaryan bhee sunder......

sandhyagupta said...

Kai rang hote hain aapki har post par,aur har rang anutha.

mehek said...

वहीँ आम की अमराई,
खिलखिल के मुस्काती है,
धर अमियाँ का रूप,
विजय मौसम पर पा जाती है!
waah sunder,aur haa wo nanhe se aryan ki pic bahut cute hai.