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February 28, 2009

'बासंती मौसम'


ऋतुराज बसंत के स्वागत में न जाने कितनी कवितायेँ , छंद,गीत आदि लिखे जाते रहे हैं.यह मौसम ही ऐसा है,प्रकृति जैसे इक नए परिधान में खुद को सजा संवार लेती है.नव सुगंध ,नव रंग भरा यह मादक मौसम पेड़ -पौधोँ पर ही नहीं वरन मनुष्यों पर भी अपना रंग छोड़ जाता है.'बासंती मौसम' पर प्रस्तुत है यह रचना -

'बासंती मौसम'
--------------

गाता है भ्रमर कहीं ,कोयल भी बोल रही है.
महकी पवन मदमस्त ,मचलती डोल रही है.

फूलों से सजी धरा ,रंगों में खेल रही है,
बिखरा रही पराग ,कली हंस-बोल रही है.


नेह निमंत्रण ' पी 'को,प्रियसी भेज रही है,
तन मन उठी तरंग,उमंग नव घोल रही है.


इक आस लिए बिरहन भी रस्ता देख रही है,
पुरवा से सब भेद हृदय के खोल रही है.

बासंती मौसम में,लगता है हर भोर नयी है.
'आया बसंत'नभ से किरन-किरन बोल रही है.
-[अल्पना वर्मा द्वारा लिखित]






मौसम के मिजाज़ से मिलते जुलते गीत मेरी आवाज़ में सुनिए-
1-छत्तीसगढ़ का एक लोकगीत 'फिल्म-दिल्ली ६ ' से-
[कराओके गीत ]यह मूल गीत नहीं है.
[Sasural genda phool]
Download or Play also Here


[मेरे आग्रह पर 'गेंदा फूल 'गीत के करोके ट्रैक बनाने के लिए मुम्बई के अरविन्द जी का आभार]

54 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

बासंती मौसम में,लगता है हर भोर नयी है.

'आया बसंत'नभ से किरन-किरन बोल रही है.

बहुत लाजवाब मौसम का वर्णन किया है आपने. प्रेम पर्वत फ़िल्म नही चल पाई लेकिन उस फ़िल्म के सभी गीत लाजवाब थे. बहुत सुमधर गीत का चयन किया आपने. शाम को सुनेंगे.

रामराम.

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

bahut khoob.

seema gupta said...

नेह निमंत्रण ' पी 'को,प्रियसी भेज रही है,


तन मन उठी तरंग,उमंग नव घोल रही है.
" bhut sundr shabd....dil ko umango se bhrne wali paktiyan"

Regards

नीरज गोस्वामी said...

इक आस लिए बिरहन भी रस्ता देख रही है,
पुरवा से सब भेद हृदय के खोल रही है.

वाह अल्पना जी वाह...बसंत के हर रूप को साकार कर दिया अपनी इस रचना में...लाजवाब
नीरज

डॉ .अनुराग said...

वाकई !आजकल सब ओर मौसम का असर है .......अनुपमा फिल्म का गाना "कुछ ऐसी भी बाते होती है "कभी सुन ने को मिलेगा .... फरमाइश मेरठ से नोट कर ले

अंशुमाली रस्तोगी said...

पढ़कर दिल हुआ बसंत बसंत बसंत।

रश्मि प्रभा said...

बासंती हवा और आपकी आवाज़....ससुराल गेंदा फूल
लगा,गुलमर्ग की वादियों में हूँ

Arvind Mishra said...

Vaah aur aah bhee ! excellent !
(not on my pc so in english pardon me ! )

"अर्श" said...

अल्पना जी आपने तो पूरी बसंत लिख दी बहोत ही बढ़िया और खुबसूरत लफ्जों से सजी ये कविता ... बहोत ही प्यारी कविता ढेरो बधाई कुबूल करें..

अर्श

हिमांशु । Himanshu said...

बहुत ही सुन्दर कविता. आभार आपका.

सुशील कुमार छौक्कर said...

वाह आप तक भी पहुँच गई हवा बसंत की। हमेशा की तरह सुन्दर लिखा है।
गाता है भ्रमर कहीं ,कोयल भी बोल रही है.
महकी पवन मदमस्त ,मचलती डोल रही है.

वाह क्या कहने।
और ससुराल गेंदा फूल का तो जादू आजकल हमारे सिर पर चढ़ कर बोल रहा है रोज कई बार सुन लेते है और आज आपकी आवाज में भी सुना तो आनंद आ गया।

अभिन्न said...

फूलों से सजी धरा ,रंगों में खेल रही है,

बिखरा रही पराग ,कली हंस-बोल रही है.
.........आपके रचना संसार की धरा भी आपके सुन्दर शब्द चित्रों से खेलती प्रतीत हो रही है प्रकृति का सुन्दर चित्रण और भावों की अभिव्यक्ति का अद्भुत संगम
नमन स्वीकार हो

दिगम्बर नासवा said...

नेह निमंत्रण ' पी 'को,प्रियसी भेज रही है,
तन मन उठी तरंग,उमंग नव घोल रही है.

बसंत के आगमन और खिले हुवे मौसम के स्वागत में अति उत्तम रचना है ...............
पूरी रचना को बहूत सुन्दर, खिलते हुवे, चाशनी में डूबे हुवे शब्दों में उतारा है आपने, लाजवाब गीत है ये.

आपका गया हुवा गीत डेल्ही ६ का और ये दिल और उनकी.......बहूत ही सुन्दर गाये है आपने, मधुर आवाज़ है आपकी. कभी अपने लिखे हुवे गीतों को भी धुन में बाँध कर गायें, अच्छा लगेगा

कुश said...

मेरठ वालो क़ी फरमाइश पर गौर किया जाए... हम पढ़ पढ़ के अभिभूत हो रहे है.. सुनने का सौभाग्य प्राप्त नही हो पा रहा.. हालाँकि गैंदा फूल गाना मुझे प्रिय है...

SWAPN said...

नेह निमंत्रण ' पी 'को,प्रियसी भेज रही है,


तन मन उठी तरंग,उमंग नव घोल रही है.

alpana ji bahut cute kavita hai, har pankti basant ki masti aur umang aur madakta ka ananf de rahi hai. anupam rachna ke liye badhai sweekaren. geeton men to aapki awaaz , aur geeton ke bolon ne jaadoo chala diya hai.

शोभा said...

नेह निमंत्रण ' पी 'को,प्रियसी भेज रही है,

तन मन उठी तरंग,उमंग नव घोल रही है.


इक आस लिए बिरहन भी रस्ता देख रही है,

पुरवा से सब भेद हृदय के खोल रही है.
अति सुन्दर

Science Bloggers Association said...

बसंती रंग से सराबोर सुन्दर कविता है। निम्न पंक्तियाँ बहुत सुन्दर बन पडी हैं
बासंती मौसम में,लगता है हर भोर नयी है.

'आया बसंत'नभ से किरन-किरन बोल रही है.

mehek said...

फूलों से सजी धरा ,रंगों में खेल रही है,


बिखरा रही पराग ,कली हंस-बोल रही है.





नेह निमंत्रण ' पी 'को,प्रियसी भेज रही है,


तन मन उठी तरंग,उमंग नव घोल रही है.





इक आस लिए बिरहन भी रस्ता देख रही है,


पुरवा से सब भेद हृदय के खोल रही है
waah ji waah khubsurat basant khila hai,manva dol raha hai,bahut sundar genda phool to gazab dha raha hai.

विनय said...

बहुत सुन्दर कविता है, बधाई और ढेरों साधुवाद!

रंजना said...

वाह ! अतिसुन्दर ! प्रकृति सजीव हो शब्दों के माध्यम से नयनाभिराम हो गयी....बहुत ही सुन्दर मनोहारी कविता...... आभार.

Manoshi said...

अल्पना, बहुत खूब गाया है आपने गेंदा फूल..क्या बात है। वाह एक बार फिर!

"अर्श" said...

main kahane hi wala tha ke bahot dino se aapko suna nahi kisi naye geet ke saath... sasural genda fooool... bahot khub gaya hai aapne caraoke ke sath ... upar se madhyam sur me kamaal kar diya apne ... pata nahi abhi tak kitni dafa sun chuka hun.....


arsh

राज भाटिय़ा said...

बहुथी सुंदर लगां बसंत का रुप आप की कविता मै ओर इस गेंदावा के गीत मै, वेसे आप का ब्लाम्ग भी बिलकुल बसंत की तरह से ही निखरा निखरा है.
धन्यवाद

राज भाटिय़ा said...

भुल सुधार * बहुत ही*

योगेन्द्र मौदगिल said...

Waahwa...

Anil Pusadkar said...

सास गारी देवे ये लोकगीत हमारे प्रदेश का है,मुझे बहुत पसंद है।कभी मौका मिला तो इसका मूल गीत सुनाने की कोशिश करुंगा।आपकी वासंती रचना ने सचमुच वसंत का एहसास करा दिया और प्रेम पर्वत के सदाबहार गीत का क्या कहना।मेरठ की फ़रमाईश के बाद हमारी फ़रमाईश पर भी हो सके तो ध्यान दिजियेगा।पंख होती तो उड़ आती रे,रसिया ओ बालमा,ये गीत सुनने मिले तो क्या बात है।

JHAROKHA said...

Alpana ji,
basant ke mausam men lag raha hai blogs par bhee basant aa gaya hai.bahut sundar geet likha hai apne bhee.badhai.
Poonam

pallavi trivedi said...

बसंत के इस खुमार में बसंती कविता और गेंदा फूल.....क्या बात है!

अविनाश said...

सुंदर रचना और एक बेहतरीन गीत अल्पना जी


आज वातावरण में चतुर्दिक मादकता बिखर रही है। पृथ्वी के कण-कण से हास और उल्लास फूट पड़ रहा है। मंद-मंद पवन में सुगंध की सुखद हिलोरे उठ रही हैं। मंजरियों का मुकुट पहने अमराइयों में मधुरिमा अंगड़ाइयाँ ले रही है। मदिर गंध से गमकते फूलों के कहकहों और कलियों की सलज्ज मुस्कानसे वन-उपवन रंगीन हो रहे हैं। प्रकृति की रंगशाला आज दुल्हन की तरह सजी हुई है।

अनुराग की मादक छाई छटा, अलि के मन को नशीला किया।
तितली बन नाच परी-सी चली, अनुशासन धर्म-का ढीला किया।
रंग देख पिकी हो विभोर उठी, विधि ने शिखी आँचल गीला किया
ऋतुराज पिता ने बड़े सुख से, जब मेदिनी का कर पीला किया।

नायिका कवि श्री वचनेश के शब्दों में:-

कूकि-कूकि किरचै करेजे में करेगी ताते,
कोयल कसाइन की जीभ निकाराये जाव।
सौरभ समीर के दुरागम अवरोध हेतु
आँगन पटाये और दरीचिनि मुंदाये जाव।
आगम बसंत कंत जात हैं दुरंत देश,
मोपै 'बचनैश' एती दया दरसाये जाव।
लावै न बसंत, औ मनावै न बसंत कोऊ।
गावै न बसंत कोऊ, सबन सिखाये जाव।

शुक्रिया

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बंसती कविता और गीत दोनों दिल को बहुत बहुत भाये ..दिल साथ साथ गा उठा .बहुत सुन्दर

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बासंती मौसम में,लगता है हर भोर नयी है.

'आया बसंत'नभ से किरन-किरन बोल रही है.
वाह! वसन्त के आगमन पर कविता भी अपने पर खोल रही है।
बधाई।

Udan Tashtari said...

एक शानदार बासंती पोस्ट-कविता सुन्दर--आपको सुनना-आनन्द आ गया. बहुत आभार इस पोस्ट के लिए.

अजित वडनेरकर said...

बढ़िया ....वसंत अब चरम पर है...
गीत सुनवाने का शुक्रिया ...

Pratik Maheshwari said...

बसंत के आगमन पर आपको शुभकामनाएं...
गाना सुनकर बताऊंगा..कैसा लगा...

Harkirat Haqeer said...

बासंती मौसम में,लगता है हर भोर नयी है.

'आया बसंत'नभ से किरन-किरन बोल रही है....

वाह! वसन्त के आगमन पर बंसती कविता....बहुत बहुत शुभकामनाएं...!!

गर्दूं-गाफिल said...

फूलों से सजी धरा रंगों में खेल रही है
बिखरा रही पराग कली हंस बोल रही है
एक आस लिए बिरहन भी रस्ता देख रही है
पुरवा सब भेद ह्रदय के खोल रही है
बहुत सुंदर चित्रण है इन चार पंक्तियों में
बधाई

अखिलेश शुक्ल said...

Respected Alpna Ji
Your poems is hart touching. If you like to published in hindi literature magazing please log on to my blog. you can read a magazine rivew & address of hindi literature magazine.
Akhilesh Shukla
editor Katha Chakra
please log on to
http://katha-chakra.blogspot.com

PN Subramanian said...

बहुत सुन्दर रचना. आप यकीन माने बगल के कालोनी के पीपल के पेड़ पर बैठा कोयल भी साथ दे रहा है. दिल्ली ६ के "सास गारी देवे" आज हमने पहली बार ही सुना, आपकी आवाज़ में. बहुत मधुर है. न जाने कैसे हमसे अनदेखी हो गयी.

मोहन वशिष्‍ठ said...

अल्‍पना जी
मैं और सभी की तरह ये तो नहीं कहूंगा कि आपकी गजल या एक एक शब्‍द बढिया है क्‍योंकि शायद ये शब्‍द काफी नहीं हो। मैं पहले से ही आपकी लेखनी का आपके शातिर दिमाग का (जो आप पहेलियों में लगाते हो) और अब आपकी आवाज का भी कायल हूं इसलिए मैंने ये दिल और उनकी डाउनलोड किया और अपने मोबाइल की रिंगटोन बना ली है बस इतनी गलती जरूर की है कि उसका आगे से थोडा सा म्‍यूजिक हटा दिया है सीधा बोल से ही शुरू होती है

देरी के लिए माफी चाहता हूं

प्रेम सागर सिंह said...

आपकी आवाज़ बहुत मधुर है

दिव्य माथुर said...

बहुत ही प्यारी लगी आप की यह कविता .गीत भी दोनो ही मधुर लगे .आभार

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

बासंती मौसम में,लगता है हर भोर नयी है.
'आया बसंत'नभ से किरन-किरन बोल रही है.
वाह्! बहुत ही सुन्दर रचना........उम्दा

अल्पना जी, आपने जो पीपल के वृ्क्ष के बारे में एक शंका जाहिर की थी,उसे मैने अपने चिट्ठे(धर्म यात्रा) पर उसी पोस्ट में एक टिप्पणी के माध्यम से दूर करने का प्रयास किया है.अगर समय निकाल पाएं तो एक बार अवश्य पढने की कृ्पा करें.
धन्यवाद........

dwij said...

इक आस लिए बिरहन भी रस्ता देख रही है,
पुरवा से सब भेद हृदय के खोल रही है.
बहुत सुन्दर रचना के लिए आभार.


और गेंदा- फूल तो मैँने सुना ही पहली बार है.

बहुत अच्छा लगा. लोकगीत तो अमर होते ही हैं,
आपकी आवाज़ में भी बरक़त है.

shyam kori 'uday' said...

'बासंती मौसम'रचना बेहद सुन्दर, मधुर, रोचक, प्रभावशाली व प्रसंशनीय है।

Bahadur Patel said...

bahut hi achchha hai.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

अब क्या कमेन्ट दूं, ऊपर सभी ने मेरी भावनायें प्रकट कर दी हैं>

दिलीप कवठेकर said...

आपकी कविता में सभी संवेदनशीलता सिमट आयी है.

इक आस लिए बिरहन भी रस्ता देख रही है,
पुरवा से सब भेद हृदय के खोल रही है.

वसंत के बौरायी हुई फ़िज़ा में दिल को आल्हादित करने वाली इन सभी छोटी छोटी बातों को आपने बखूबी चितित लिया है आपने शब्द रंगों से.साथ ही बिरहन का दुख भी जिया है, ये विशेष बात.

आपका गीत गेंदा फूल सुना, तो लगा आप हमारी फ़िरकी ले रही है. मूल गीत सुनवा रहीं है ऐसा ही प्रतीत हो रहा है. खासकर दो तीन जगह लोक गीतों का खडा़पन आवाज में सुनाई दे रहा है, तो एक दो जगह मींड ही मूल गीत के माफ़िक ही ली गयी है.

आपसे ऐसे ही गीत आगे सुनाने का आग्रह...

दर्पण साह 'दर्शन' said...

dhanvyaad mere blog mein aane ke liye...
apka blog padhta to roz(almost roz) hoon par comment aaj kar raha hoon aaj bhi 47 cooments ke tale daba hoon but lemme appreciate you for your 'treveni' post.
since i am hard core fan of gulzaar so, nazm ki ye vidha mujhe bahut bhati hai (introduced by gulzaar):

हर दिन तलाशती हूँ जीवन -परिभाषा के शब्द ,


मेरा शब्द कोष अधूरा है या तलाशना नही आता ?




वह परिभाषा जो तुमने ही तो बतलायी थी मुझे.

(pehli baar gulzaar ke alawa kisi aur ki treveni pasand aayi main bhi kuch treveni likhne ki soch raha hoon beshq gulzaar aur apse acchi na ho. But i'll anyways give it a try... )

Science Bloggers Association said...

इस खूबसूरत गीत के लिए अल्‍पना जी को फागुनी बधाई।

Vijay Kumar Sappatti said...

alpana ji

sorry for late arrival , i was on tour.

aapne to vasant ke mausam ko jaise shabd chiton me ji liya ho.. wah ji wah ..

,maine bahut pahle aapko ek request ki thi , " kuch dil ne kaha " aapki aawaj me ga kar post kijiye ..

main bhi kuch likha hai , jarur padhiyenga pls : www.poemsofvijay.blogspot.com

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

होली का हुड़दंग मचा है,
गाँव-गली, घर-द्वारों में।
ठण्डाई और भंग घुट रही,
आंगन और चौबारों में।

प्रेम-गीत और ढोल नगाड़े,
साज सुरीले बजते हैं,
रंग-बिरंगी पिचकारी की,
चहल-पहल बाजारों में।

राधा-रानी, कृष्ण-कन्हैया,
हँसी-ठिठोली करते है,
गोरी की चोली भीगी है,
फागुन-फाग, फुहारों में।

खुशियों के सन्देशे लेकर,
पवन-बसन्ती आयी है,
दुल्हिन का मन रंगा हुआ है,
सतरंगी बौछारों में।

तेईस ने कर दिया अनुसरण,चौवीसवीं की आशा है।
उच्चारण के उर-मन्दिर में, बनी हुई जिज्ञासा है।।

दर्पण साह 'दर्शन' said...

apka mere blog main aana accha laga...
wasise to niyamait pathak hoon par ab tak himmant nahi hui kuch comment karne ki... aaj bi 51 comments ke tale daba hon...
apne likha tha ki apki treveni ka intzaar rahega...
apke is intzaar ki prerna ne mujhe naye blog ke liye prerit kiya:

http://treveni.blogspot.com/

bhootnath( भूतनाथ) said...

.............अल्पना जी...इक बात मैं कहना चाहता रहा हूँ....वो यह कि आवाज़ तो आपकी बेशक अच्छी ही है...मगर आप इसे शायद बे-वज़ह ही दबा-दबाकर गाती हो...थोडा-सा खोल भर देने आपके गीतों में माशाल्लाह और भी खूबसूरती आ जायेगी...ऊँचे स्वरों में जाते हुए और उन पर ठहरते हुए थोडा और ज्यादा ध्यान देने जरुरत है...आशा है..आप मेरी बात पर ध्यान दे पाएंगी....बाकी मेरे पास फुर्सत और लगन दोनों की कमी है...वरना मैं खुद भी ब्लॉग पर यह कर के आपको दिखाता....आशा है आप सपरिवार सानंद होंगी...अभी मैं आपका ए गीत सुन रहा हूँ मुझे घेर लेते निगाहों के साए....थोडी कमी-सी मुझे महसूस हो रही है...और यह कमी कोई वजह नहीं कि आप दूर ना कर सको....अगली फुर्सत में पहले तो आप आवाज़ खोलो....और ऊँचे स्वरों पर जाने और उनपर ठहरने का अभ्यास करो.....दो महीनों की कोशिश के बाद आप देखना कि आप आज वाली अल्पना नहीं रहीं सच....!!

Sanjeet Tripathi said...

संगीत का जानकार तो नहीं यह आवारा बंजारा लेकिन इतना जरुर कह सकता हूं कि आपकी आवाज में गेंदा फूल भा गया।
वाकई।

सारे रईपुर से अलग है आवारा बंजारा जी की शान ;)