स्वदेश वापसी /दुबई से दिल्ली-'वन्दे भारत मिशन' Repatriation Flight from UAE to India

'वन्दे भारत मिशन' के तहत  स्वदेश  वापसी   Covid 19 के कारण असामान्य परिस्थितियाँ/दुबई से दिल्ली-Evacuation Flight Air India मई ,...

March 13, 2010

तीन पन्ने

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[चित्र साभार - गूगल ]

वक़्त को कई बार रूप बदलते देखा है.
आज कल कुछ ज्यादा ही साफ़ और करीब दिखाई देता है.
क्योंकि अब हम बच्चे नहीं हैं इसलिए उसका रूप पहले की तरह नर्म और स्नेहमयी नहीं है,
एक हाथ में नियम /काएदे की लिस्ट और दूसरे हाथ में एक मीज़ान लिए रहता है.
ये शायद मेरा मन ही है जो वक़्त की श़क्ल धर लेता है.
हम खुद भीतर से बच्चे बने रहना चाहते हैं मगर अपने बच्चों को कायदे सिखाते हैं ऐसा करो वैसा न करो .तुम अब बड़े हो गए हो!
यह हमारा दोहरा व्यवहार है या विरासत में मिले ये शब्द जिन्हें चाहे अनचाहे दोहराते रहते हैं हम पीढ़ी दर पीढ़ी ,हर पीढ़ी ?

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[चित्र साभार-प्रकाश गोविन्द]

कैमरे जब तक डिजिटल नहीं थे ठीक था ,कम से कम तस्वीरें हार्ड पेपर पर बन कर अल्बम में लग जाती थीं.
अब वो पी सी में रहती हैं य यू एस बी में !
पेपर में उन्हें बदलवाने के लिए समय टलता रहता है आज नहीं कल पर..
कैद कर लेना उन लम्हों को और फिर टुकड़ों टुकड़ों में उन्हें सालों साल फिर से जीना कितना सुखद लगता है!
एक तस्वीर कितना कुछ याद दिला जाती है.उस समय की उस के आगे पीछे की घटनाओं की.
दिमाग में इतना सब कहाँ स्टोर रहता है?
बहुत सी बातों के बारे में हम सोचते हैं कि हम भूल गए हैं मगर कोई एक शब्द/ कोई वाक्य/ कोई तस्वीर किसी का चेहरा /किसी की आवाज़ याद दिला जाती है सब कुछ ...नहीं तो बहुत कुछ !
यादें चीर जाती हैं कहीं भीतर तक दिल को ...दिल में दर्द का दरिया जो जमी बरफ सा था अब तक .....अहसासों की गरमाहट से पिघलने लगता है.
कैसे समाये हुए हैं इतना सब कुछ हम अपने भीतर ?
आँखों में पलकों के पीछे छुपा धुंआ न जाने कैसे बादल बन बरसने लगता है!
ऐसे में यकायक शायर बशीर बद्र का एक शेर याद आया है -
'जी बहुत चाहता है सच बोलें,
क्या करें हौसला नहीं होता !'

चलते चलते एक त्रिवेणी लिखने की कोशिश -:

वो चाँद ही था जो ले जाता था पैग़ाम मेरे ,
अब तो वो भी ,सुनता नहीं सदायें मेरी,

सुना है रुसवा बहुत चांदनी ने किया है उसे!

February 28, 2010

छलक छलक जाएँ बदरा से रंग


कई
दिनों से धूल भरी आंधियां चल रही थीं.
एक दम से गरमी बढ़ गयी थी लेकिन कल रात हुई बरखा रानी ने मौसम ही बदल दिया.
सुबह भी बादल जैसे थे.

भारत में होली का मौसम है ,माहोल है.मुझ से कल ही एक टिप्पणी में यह पूछा गया था
कि हम यहाँ कैसे होली मनाते हैं?
तो.... यहाँ होली अपने घर में गुलाल लगा कर मना लेते हैं .अगर social सेंटर में सरकारी अनुमति मिल गयी तो वहाँ - घंटा खेल सकते हैं [निर्धारित समय और दिन पर] लेकिन
ऐसा कोई उत्साह या रौनक इस बार नहीं है.
कभी कभी अपने घरों में छोटा सा आयोजन रख लिया तो रख लिया लेकिन इन दिनों बच्चों के एक्साम चल रहे हैं तो इस बार सब शांत हैं!

दुबई में मारवाड़ी /गुजराती समाज के लोग बहुत हैं इसलिए वहाँ फिर भी आप रौनक देख सकते हैं लेकिन अबूधाबी क्षेत्र में स्थिति थोड़ा अलग है .
दुबई में एक पार्क है जहाँ हर साल इस का आयोजन किया जाता है एक साथ मिल कर सामूहिक होली खेली जाती है.दुबई तो दुबई है!:)

****आप सभी को रंगोत्सव की हार्दिक शुभकामनायें ****



छलक छलक जाएँ बदरा से रंग

इसी अवसर पर हलकी फुलकी सी एक कविता प्रस्तुत है-



बरस बाद देखो, फिर होली आई,
सतरंगी घटा, घिर घिर के छाई।
छलक-छलक जाएं बदरा से रंग,
संवर संवर गए देखो फागुन के ढंग !

रंग उड़ें चहुँ दिशा, सूखे और गीले,
लाल ,गुलाबी,हरे ,नीले और पीले।
घूमें डगर डगर , मिलकर सब संग,
नाचे और गायें , बाजे ढोल और मृदंग।

धरती ने ओढ़ ली है रंगों की चुनरिया,
बासंती पवन घूमे इस उस डगरिया!
मस्ताने डोल रहे करते हुडदंग,
सखियाँ भी छोडे़ नहीं, करती हैं तंग।

मीठी प्यार भरी,गुझिया तो खाओ,
याद रहे बरसों ,ऐसी होली मनाओ!
खिलते रहें मधुबन, हो कई जंग
दुःख रहें दूर , छायें खुशियों के रंग.



-अल्पना वर्मा