1)अपने भीतर के जानवर को
छुपाने की कोशिश करते है,
कई लोग,
अक्सर ..... दूसरो के खोल में!
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2)वो शमा हूँ ,जो जलती रही मगर रोशनी कहीं न हुई!
वो लहर हूँ उफनती रही मगर न दामन किसी का गीला किया!
वो आंसू हूँ जो ढलका नहीं अब तक किसी के गालों पर!
हाँ ,
वो सांस हूँ जो ढली आह में मगर ,घुटती है अब तक सीने में!
[written when i was a college student]
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3)अपनी रफ्तार से जा रही है ज़िंदगी यूं तो!
मगर न जाने क्यों लगता है....
अनगिनत विराम चिन्ह
हरदम साथ चलते हैं!
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-अल्पना वर्मा
स्वदेश वापसी /दुबई से दिल्ली-'वन्दे भारत मिशन' Repatriation Flight from UAE to India
'वन्दे भारत मिशन' के तहत स्वदेश वापसी Covid 19 के कारण असामान्य परिस्थितियाँ/दुबई से दिल्ली-Evacuation Flight Air India मई ,...
May 25, 2008
April 18, 2008
सुबह
सुबह जब मेरे दरवाज़े पर दस्तक देने,
आगे बढ़ती है,
कोहरे को छांटती हुई
तो,
उसके कदमों को, दरवाजे़ से
कुछ फासले पर लगा
एक बड़ा पेड़ रोक लेता है!
सुबह कोशिश करती है
बढ़ती है
अपने अंगरक्षकों को भेजती है
उनमें से कुछ ही जीतकर
मेरे पास पहुंचते हैं,
उससे पूर्ण अहसास नहीं हो पाता
कि,
सुबह हो गई है।
और मैं,
दरवाजे पर हल्की दस्तक को¸
हवा का झोंका समझ बंद रहने देती हूं
अंधेरे में घुटती हुई
करती रहती हूं
अपने जीवन की सुबह की प्रतीक्षा
और टटोलती रहती हूं
अंधकार में,
सुबह का जीवन में अर्थ –
[written at the age of 18]--Alpana Verma
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