कभी -कभी कुछ चित्रों को देखकर अभिव्यक्ति शब्द बुनने लगती है,ऐसे ही कुछ शब्द त्रिवेणी बनकर इन चित्रों के लिए उभर आए हैं।
ये चित्र श्री सुब्रमनियम जी के बाग़ के हैं उन्हीं के द्वारा खींचे हुए हैं, मैंने इनके पिक्सल कम करके यहाँ लगाए हैं। इनके मूल आकार उनके फेसबुक अल्बम में देख सकते हैं।
स्वदेश वापसी /दुबई से दिल्ली-'वन्दे भारत मिशन' Repatriation Flight from UAE to India
'वन्दे भारत मिशन' के तहत स्वदेश वापसी Covid 19 के कारण असामान्य परिस्थितियाँ/दुबई से दिल्ली-Evacuation Flight Air India मई ,...
July 7, 2013
June 7, 2013
खुद को छलते रहना..
--१--
धूप में चलते हुए,
इस ख़ुश्क ज़मीन पर
क़दम ठिठके
ज़रा छाँव मिली
लगा किसी दरख्त के नीचे आ पहुंची हूँ.
मगर नहीं ,
यह तो बादल का एक टुकड़ा है जो
ज़रा बरसा और पानी बन कर बह गया,
धूप अब और तेज़ लगने लगी है मुझको !
----अल्पना -----
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