अपनी जड़ों से कट कर पौधा भी समय लेता है नयी ज़मीं पकड़ने में .
इंसान में अपनी मिटटी से दूर हो कर भविष्य के प्रति जो अनिश्चितता पैदा हो जाती है उसका निदान हर किसी को आसानी से नहीं मिलता.
खाड़ी देशों में आये प्रवासी जानते हैं कि आज हम यहाँ हैं तो कल मालूम नहीं यहाँ हैं भी या नहीं..किसी से पूछेंगे तो कोई भी इस भय को स्वीकारेगा नहीं लेकिन अधिकांश के लिए सच यही है.कि वे भविष्य को लेकर कहीं न कहीं आशंकित हैं ..इसी अनिश्चितता का परिणाम है कि ज्योतिषों और पंडितों की शरण में अब हम ज्यादा जाने लगे हैं.
हमने भी इस का अनुभव लिया ..अपने मरण तक भविष्य सुनकर ख़ुशी भी हुई /परेशान भी हुए ,उपाय भी लगे हाथ उनसे करवा लिए .क्योंकि उनका प्रभाव ही सभी पर इतना पड़ गया था.
तीन साल बाद उन का दोबारा'विसिट पर आना हुआ..मगर इस बार सब उनसे नाराज़..
अधिकाँश मामलों में अभी तक कुछ भी तो सही नहीं निकला था!
हम भी इस अनिश्चितता सेअछूते नहीं हैं .हमने भी कनाडा के लिए वीसा apply किया था ..[अब खुशकिस्मती या बुरीकिस्मत ] वीसा मिल गया, २००८ में वहाँ गए ..कोई दोस्त नहीं ,रिश्तेदार नहीं ...अनजाने मुल्कमें .अंतर्जाल ने बहुत सहारा दिया .
लेपटोप साथ रहा .नेट पर सभी जानकारी मिलती रही .ऑनलाइन बुकिंग घर की ,टूर की ..सबकुछ ...जाकर घूमकर आगए .....और परिवार को वहाँ की Permanent Residency भी मिल गयी है.........अब इसे बनाये रखने के लिए वहाँ के रहिवासी कानून के अनुसार पांचसाल में 730 दिनरहनाज़रूरीहै!
२ सालगुज़रगए ..पेंडुलम की तरह अब फिर झूलने लगेहैं कि जाएँ या न जाएँ? कभी -कभी जीवन में निर्णय लेने कितने कठीन हो जाते हैं अब समझ आ रहा है. कनाडा जाने का अर्थहै सबकुछ फिर से शुरू करना......वहाँ के हालात यहाँ से बहुत अलग हैं. मौसम की बात करें या फिर सुख -सुविधाओं की ...वहाँ गए थे जो भी अपनी भाषा या कहिये कि एशिया का मिला उससे पूछताछ करते रहे. मिली जुली प्रतिक्रियाएं मिलीं मगर अधिकतर वहाँ के निवासी यही कहते कि बच्चों के लिए केनाडा आ रहे हो तो मत आओ. अब अगर जाते नहीं तो ''पी आर '' कैंसल हो जायेगा..जिन मित्रों को वीसा नहीं मिल पाया वो जाने के पक्ष में कहते हैं और हमारे वहाँ शिफ्ट न होने को बहुत बड़ा ग़लत निर्णय बता रहे हैं.
जिन्हें हमारी तरह residency मिलचुकी है और हमारी तरह यहीं हैं ,वे गोलमोल जवाब देतेहैं.कहते हैं भारत तो अपना ही है कभी भी वापस चले जाना .अब चले ही जाओ !
भारत जाते हैं तो सब को देख कर ऐसा लगता है ...किसी के पास समय नहीं है,सब की अपनी दुनिया बस चुकी है, बहुत आगे निकल गए हैं परन्तु हम आज भी वक़्त के पुराने काँटों में रुके हुए हैं!
'देश' छुट्टियों में जाते हैं तो पहले कुछ दिन तक अडोस पड़ोस के लोग पूछते हैं 'कब आये?'कितने दिन हो?इंडिया वापस नहीं आना क्या?
-------१०-१५ दिन गुज़रते ही उन्हीं लोगों का सवाल होता है ' कब की वापसी है? कनाडा कब जा रहे हो?इंडिया आकर जाओगे या वहीँ दुबई से चले जाओगे ?
जिस का दिल न हो ..उसे भी लगेगा जैसे अब तो जाना ही पड़ेगा...क्योंकि अब सच में ही लगने लगा है कि 'एन आर आई' का अर्थ है--Not Required Indians !
बड़ी उलझन है......जाएँ तो कहाँ जाएँ और भागें भी तो कब तक और कहाँ तक?
इन सब बातों को भूल कर सुनाती हूँ एक गीत जो हर बेटी के लिए उनकी माँ गाती होंगी.
'मेरे घर आई एक नन्हीं परी,चांदनी के हसीन रथ पे सवार '
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