जब दुबई fesitival सिटी[शौपिंग काम्प्लेक्स] जाना हुआ था तब वहां ली गयीं तस्वीरों में से दो यहाँ दे रही हूँ.
पहली तस्वीर में एक बहुत ही बड़ा झूमर देख सकते हैं जो इस मॉल के प्रवेश द्वार पर है.
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दूसरी तस्वीर में पहले तल पर जाने वाली सीढियों की बनावट आकर्षित कर रही है.
अब प्रस्तुत है यह कविता--:
सावन की पड़ी फुहार तो बाँवरी बिरहन का मन उस से क्या बोल उठा? इस रचना में कहने का प्रयास किया है.
June 8, 2009
'समय का भंवर'
अक्सर सभी के साथ ऐसा होता होगा जब अपनी राह चलते चलते हम ठिठक कर रुक जाते हैं,मुड कर देखते हैं ,कोई नज़र आता नहीं ...कितने लोग सफ़र में साथ चले तो थे मगर वे अपनी अपनी राह पर ऐसे गए कि फिर कभी मिले ही नहीं.
एक ग़ज़ल आनंद बक्शी साहब की लिखी हुई--'चिट्ठी न कोई संदेस जाने वो कौन सा देस-जहाँ तुम चले गए' दिल की गहराईयों में उतर जाती है. आज वही सुना रही हूँ मगर उस से पहले एक कविता कुछ इसी तरह के भाव व्यक्त करती हुई,आशा है आप को पसंद आएगी-
एक ग़ज़ल आनंद बक्शी साहब की लिखी हुई--'चिट्ठी न कोई संदेस जाने वो कौन सा देस-जहाँ तुम चले गए' दिल की गहराईयों में उतर जाती है. आज वही सुना रही हूँ मगर उस से पहले एक कविता कुछ इसी तरह के भाव व्यक्त करती हुई,आशा है आप को पसंद आएगी-
समय का भंवर ---------- ------ क्यों समय के भंवर से कोई निकल पाता नहीं, वो लोग जाते हैं कहाँ कुछ भी समझ आता नहीं! तम घना है रीते मन का,रक्त रंजित भाव हैं, कल्पनाएँ थक गयी हैं,स्वप्न भी सब सो गए! है कठिन ये वक़्त,क्यूँ जल्दी गुज़र जाता नहीं! हैं सुरक्षित स्मृति चिन्ह,कुछ भी कभी धुलता नहीं, पीर भेदे हृदय पट को , पर कभी खुलता नहीं! अतीते के चित्रों से ,मन अब क्यूँ बहल पाता नहीं! सोचती हूँ मैं बना दूँ एक सीढ़ी, इस जहाँ से उस जहाँ , लौट पायें वे सभी जिनके बिना, ज़िंदगानी का सफ़र अब और तो भाता नहीं! क्यों समय के भंवर से कोई निकल पाता नहीं, वो लोग जाते हैं कहाँ कुछ भी समझ आता नहीं! -------------------------- |
'चिट्ठी न कोई संदेस'....एक गीत[ फिल्म-दुश्मन,गीत -आनंद बक्शी,संगीत -उत्तम सिंह]
यह मूल गीत नहीं है.
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इसी गीत पर मैं ने यह विडियो बनाई है.टीवी सीरियल की क्लिप्स मिक्स करके एक कहानी की तरह दिखाने का प्रयास है.
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