स्वदेश वापसी /दुबई से दिल्ली-'वन्दे भारत मिशन' Repatriation Flight from UAE to India

'वन्दे भारत मिशन' के तहत  स्वदेश  वापसी   Covid 19 के कारण असामान्य परिस्थितियाँ/दुबई से दिल्ली-Evacuation Flight Air India मई ,...

April 14, 2009

पाती नेह की



यह चित्र मुझे कल एक मित्र द्वारा भेजी ईमेल में मिला.इस ईमेल के अनुसार ,इस में उत्तरी ध्रुव पर सूर्य अस्त होते दिखाई दे रहा है.चंद्रमा धरती के सब से नज़दीक है.चंद्रमा के नीचे छोटी सी गोल आकृति सूर्य की है.यह सच में एक अद्भुत नज़ारा है.मगर यह सच नहीं है.वास्तव में धरती से चंद्रमा को सूर्य की तुलना में नग्न आँखों से इतना बड़ा आप देख ही नहीं सकते.और दोनों की धरती से दूरी भी यही कहती है.इस लिए यह तस्वीर एक छलावा मात्र है. सच नहीं!






पाती नेह की
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सावन के काले बादल संग,
पवन बसंती लाना,
प्रेम संदेसा भेज रही हूँ ,
प्रियतम तुम आ जाना.

कूक रही कोकिल का ,
भाये गीत सुहाना .
क्रीडा मग्न भ्रमर पुष्प संग ,
कलियों का इठलाना .

लहरों का उठ गिरना,
तट के पार कभी बह जाना.
अध मूंदी पलकों में ,
अनगिन स्वप्नों का बुन जाना.

तप्त भया शीतल मन,
घन बन मेह सरस बरसाना .
रीती नेह गगरिया ,
प्रियतम प्रेम सुधा भर जाना.

प्रेम संदेसा भेज रही हूँ ,
प्रियतम तुम आ जाना.
सावन के काले बादल संग,
पवन बसंती लाना..प्रियतम तुम आ जाना।

-अल्पना वर्मा


'हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबू,
हाथ से छू के इसे रिश्तों का इल्ज़ाम न दो.'

-फिल्म-खामोशी का यह सदाबहार गीत प्रस्तुत है...मेरी आवाज़ में..
[यह मूल गीत नहीं है.]


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April 2, 2009

'आत्मदाह'

मदन मोहन जी एक महान संगीतकार थे.उनके संगीतबद्ध गीत मुझे बहुत अच्छे लगते हैं.आज उन्हीं का एक गीत ले कर आई हूँ.लेकिन उस से पहले प्रस्तुत है यह कविता..जिस में है कुछ विवशता,कुछ बेचैनी -यह कविता आहत मन की वेदना को व्यक्त करते हुए है..-


'आत्मदाह'
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वक़्त की एक चाल

और -

बंध गया ,

हाथों की उन लकीरों में ,

जिन से कभी खेलता था

'वो' !

अधरों पर -
संबोधनहीन संवाद

और -

संज्ञा रहित पहचान लिए-

मृत कल्पना की सूचना से
'आहत '-

सूखे पत्ते सा,

शाख से टूट जब गिरता है

तब -

चला आता है,

देह की अटारी पर ,

'मन'

आत्मदाह के लिए!
----अल्पना वर्मा -----

'सुनिए फिल्म-'वो कौन थी' का यह गीत.[Cover version by Alpana]
शायद फिर इस जनम में मुलाक़ात हो न हो'