Search This Blog

May 7, 2009

'प्रतीक्षा'

पिछली पोस्ट में एक कविता प्रकाशित की थी-'बेरोजगार'.
उसकी बहुत ही सुन्दर व्याख्याएं भी आयीं और साथ ही आया प्रकाश गोविन्द जी का एक प्रश्न भी ---'कि आप तो खुद इस स्थिति से नहीं गुजरी होंगी फिर आप ने एक बेरोजगार की स्थिति को कविता में कैसे चित्रित कर दिया ?
[मैं एक गृहिणी हूँ शायद इस लिए यह ख्याल उनके मन में आया होगा?]हो सकता है बहुतों के मन में यह प्रश्न उठता हो कि कोई कवि बिना उस स्थिति को अनुभव किये कैसे वर्णन कर सकता है? सभी के लिए मेरा यही उत्तर है कि अगर कल्पना कर के थोडी देर को स्वयं उस पात्र में जीने की कोशिश करें तो उन भावों को लिख पाना मुश्किल नहीं है.

मुझे जब भारत के स्वतंत्रता के ५० साल पूरे होने पर निकाली जाने वाली पत्रिका के लिए एक कविता भेजने को कहा गया तब इस सामाजिक समस्या को ध्यान में रख कर मैं ने 'बेरोजगार' कविता लिखी थी.

कई बार यूँ भी यकायक कुछ ख्याल आ जाते हैं और यह जरुरी भी नहीं होता कि हम उन्हीं परिस्थितियों से गुजरे हों..और बस कुछ कवितायेँ ऐसे भी बन जाती हैं.






प्रतीक्षा

--------

सुरभित दीपित हो अन्धकार,
बज उठें हिय के तार तार,
छिड़ जाएँ फिर से मधुर राग,

तुम शब्द नए बन आओ,
मैं गीत नवल बन जाऊँगी,

तपती मरुभूमि ,
सब उपवन सूखे,
व्याकुल व्यथित,
हैं कल्पनाओं के मुख रूखे,

बन मेघ बरसते आओ,
मैं जल धारा बन जाऊँगी.

जग बना गरल ,
कुछ नहीं सरल,
आशाओं के तरु जर्ज़र

संचार चेतना कर जाओ,
मैं संबल खुद बन जाऊँगी.


-अल्पना वर्मा[मई,२००९]-


आज का गीत-:

[मेरी आवाज़ में



यहाँ से भी डाउनलोड कर के गीत चला सकते हैं.

66 comments:

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

आपकी इस बात से शत प्रतिशत सहमत हैं कि
कई बार यूँ भी यकायक कुछ ख्याल आ जाते हैं और यह जरुरी भी नहीं होता कि हम उन्हीं परिस्थितियों से गुजरे हों..

और कविता बन जाती है..

आज इसी तरह मुझे भी धूम्रपान पर एक कविता लिखनी पड़ी। क्रिएटिविटी के हिसाब से कविता को सभी ने सराहा, जबकि मैंने जो लिखा था उस परिस्थिति से मैं कभी नहीं गुजरा :)

आपकी प्रतीक्षा कविता बहुत गहरी लगी.. और हर बार की तरह गीत मनभावन है..

आभार

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बात तो सही कही आपने अल्पना की खुद उन हालात से गुजर कर ही लिखना पड़े ..आस पास के माहौल से बहुत कुछ मिल जाता है और भाव कविता बन कर कागज [आर बिखर जाते हैं ...

तुम शब्द नए बन आओ,
मैं गीत नवल बन जाऊँगी,

बहुत सुन्दर मनभावन लगी यह प्रतीक्षा ...गाना अभी सुना नहीं पर बोल तो इस गाने के निश्चित रूप से पसंद है बहुत ..शुक्रिया

ताऊ रामपुरिया said...

तुम शब्द नए बन आओ,
मैं गीत नवल बन जाऊँगी,

सुंदरतम कविता, उम्मीद का एहसास पैदा करते भाव. बहुत शुभकामनाएं.

जंगली का गीत बहुत कर्ण प्रिय बन पडा है. बधाई.

रामराम.

रश्मि प्रभा... said...

bahut hi achhi rachna aur geet....kavi khud bhale na gujre un raaston se,par kavi wahi hai,jo dusre ke dard aur uthte manobhawon ko jita hai ........kalam yun hi nahin chalti

Anonymous said...

'ehsaan tera'....waaahhhhhhh....what a lovely selection of song!!! loved it...and tumne bahot acha gaaya hai

Komal,
KSA

mehek said...

जग बना गरल ,
कुछ नहीं सरल,
आशाओं के तरु जर्ज़र

संचार चेतना कर जाओ,
मैं संबल खुद का बन जाऊँगी.

waah alpana ji ,shabd aur bhawon ka gehra sangam ban gaya hai,aisi anuhuti huyi jaise ganga ki pavitrata.

geet bhi behad khubsurat,kuch ehsaan yu bhi hum pe hote hai,dil mayur ban jaaye teri vani se.

अशोक पाण्डेय said...

सही बात है। रचनाकार के लिए जरूरी नहीं कि यथार्थ उसका भोगा हुआ ही हो। शब्‍द-संपदा व लेखन-शैली के साथ-साथ कल्‍पनाशीलता भी लेखन में महत्‍वपूर्ण योगदान करती है।

पिछली कविता नहीं पढ़ पाया था, आज पढ़ी। दोनों कविताएं अच्‍छी लगीं।

Kishore choudhary said...

'प्रतीक्षा' आपका ये गीत ही सुरभित हो महक रहा है, इतने सुन्दर गीत अब भी लिखे जाते हैं ये सोच कर ही मन प्रसन्न हो उठा है. बधाई के अतिरिक्त क्या कहा जा सकता है आपकी इस गीत रचना में जाने कितने पल गवाह रहे होंगे कि उन्होंने आपको गुनगुनाते और बुनते देखा होगा. कितनी ही पंक्तियाँ कितनी ही बार नए शब्दों के साथ खिल उठी होंगी. आपको इस गीत रचना का समय भी याद रहेगा ऐसा मुझे लगता है.
[मेरी ये टिप्पणी आपके लिखे गीत प्रतीक्षा के लिए है वैसे आप गाती भी सुन्दर ही हैं. ]

दिगम्बर नासवा said...

आपकी बात सही है........महसूस भी किया जा सकता है हर बात को....बस भावनाएं होनी चाहियें.

आपकी कविता बहूत ही सारगर्भित है.......
शब्दों के साथ भाव भी पूरी तरह से रचना को सम्पूर्ण कर रहे हैं.........हर छंद कुछ कहता हुवा लगता है........प्रेरणा देता हुवा ये छंद खास है

जग बना गरल ,
कुछ नहीं सरल,
आशाओं के तरु जर्ज़र

संचार चेतना कर जाओ,
मैं संबल खुद का बन जाऊँगी

"अर्श" said...

UPAR KE KHUBSURAT PHOOL KE TARAH HI AAPNE YE KAVITA KAHI HAI AUR UTNI HI MITHAAS KE SAATH YE GEET GAAYEE HAI .. AAPNE SAHI HI KAHAA HAI KE KAVI USKI KALPAA KAR KE US KHAWB ME JEE LETA HAI JO JYADA MUSHKIL NAHI HAI .. DHERO BADHAAYEE AAPKO..

ARSH

Arvind Mishra said...

मनीषियों के लिए यह जरूरी नहीं कि प्रेक्षित दृश्य का खुद हिस्सा बने !

डॉ. मनोज मिश्र said...

आप की इस कविता में तो निराला जी की आहट है ,बधाई .

Udan Tashtari said...

स्थितियों से गुजरने की बजाय उन्हें अहसासना जरुरी है...अच्छी रचना.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

सच है जी - अनुभूति के लिये भुक्त भोगी होना न नेसेसरी कण्डीशन है और न सफीशियेण्ट!

विनय said...

कविता पढ़कर आनन्द आ गया

---
चाँद, बादल और शामगुलाबी कोंपलें

अविनाश वाचस्पति said...

महसूसना
प्रतीक्षा नहीं करवाता
कि भोग कर ही
जाए लिखा
जो भोगा ही जाता है
कौन सा
सारा जाता है लिखा।

raj said...

तुम शब्द नए बन आओ,
मैं गीत नवल बन जाऊँगी.....amazing...

SWAPN said...

हो सकता है बहुतों के मन में यह प्रश्न उठता हो कि कोई कवि बिना उस स्थिति को अनुभव किये कैसे वर्णन कर सकता है? सभी के लिए मेरा यही उत्तर है कि अगर कल्पना कर के थोडी देर को स्वयं उस पात्र में जीने की कोशिश करें तो उन भावों को लिख पाना मुश्किल नहीं है.

aisi comments mujhe bhi mile hain, main aapse sahmat hun , agar hum character men doob kar likhen to kuchh bhi likha ja sakta hai zaroori nahin ki humne bhoga ho.


सुरभित दीपित हो अन्धकार,
बज उठें हिय के तार तार,
छिड़ जाएँ फिर से मधुर राग,

तुम शब्द नए बन आओ,
मैं गीत नवल बन जाऊँगी,

bahut manmohak panktiyan, ek isi bhav ka geet maine bhi likha tha kai varsh pahle, yathasamay post karunga. rachna ke liye badhai. geet sunta hun. hamesh ki tarah wo bhi aapki awaz men benazeer hi hoga.

Harsh said...

yah kavita padvane ke liye shukria.............

Harsh said...
This comment has been removed by a blog administrator.
शोभना चौरे said...

bhut sundar ahsas

Alok said...

beautiful poem and

difficult song but u sung it so well !
keep it up !
god bless

Anil Pusadkar said...

सुन्दर्।

anand said...

U've Got Very Nice Voice N also good Music Sense...Starting me thodi Murkhiyan Miss Hui HaiN.Singing N Voice is Good

गौतम राजरिशी said...

कविता तो कवि की कल्पना है...तभी तो बच्चन बगैर कभी मदिरा-सेवन किये "मधुशाला" खड़ी कर सकते हैं....

और गीत सुंदर बन पड़ा है...

अहसान तेरा होगा मुझ पर...जाने कितनी यादें लिये चला आया...

गर्दूं-गाफिल said...

भव्य भाषा मधुर सम्वाद
चेतन अभिव्यक्ति का प्रसाद
रस सिक्त निर्झर काव्यधारा
सार्थक यह सृजन तुम्हारा
गीत फूटे बजे हिय के तार
कूकी कोयल दूर व्योम पार


स्वेद बिंदु सूखे नि:श्रमित हुआ तन मन
नित्य अवतरित करें शब्द गंगा ,अवाहन

गर्दूं-गाफिल said...

स्वेद बिंदु सूखे नि:श्रमित हुआ तन मन
नित्य अवतरित करें शब्द गंगा ,अवाहन

neera said...

मुस्कराहट बांटती कविता और गीत :-)

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

शत प्रतिशत सहमत!!


प्राइमरी का मास्टरफतेहपुर

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

आपकी बात सही है...
"अहसान तेरा होगा मुझ पर...
इसका कराओके कब भेज रही हैं?"

सुशील कुमार छौक्कर said...

सुबह सुबह आशा का संचार करती कविता पढ़कर आनंद आ गया। फिलहाल इतना ही।

Prem Farrukhabadi said...

अच्छी रचना.बधाई.

'उदय' said...

तुम शब्द नए बन आओ,
मैं गीत नवल बन जाऊँगी,
...sundar, atisundar rachanaa !!!

Jayant Chaudhary said...

"संचार चेतना कर जाओ,
मैं संबल खुद का बन जाऊँगी."

Waah waah..

Sundar.

~Jayant

कुश said...

कवी अगर कल्पना ही न करे तो कवी क्या.. बहुत ही उम्दा बात कही है आपने.. गाना तो फिर एक बार नहीं सुन पाऊंगा :( पर आपने गया है तो अच्छा ही होगा..

मीत said...

सही कहा आपने बस गहरे से सोचने भर की देर है कवितायेँ खुद-ब-खुद निकल जाती है...
सुंदर लिखा है...

तुम शब्द नए बन आओ,
मैं गीत नवल बन जाऊँगी,
मीत

dr vishwas saxena said...

Dear Author
I am glad to percieve your urge to do evry bit to ornament this world simultaneously entering a few intense relationships.I always felt and observed that contemporary poets usually get carried over by a small emotional blow and write a very profound poem only scaning their state of mind.But I am so happy that it is not so in your style of writing.You have shown a sincere responsibility towards the world and society in which you live. Now I am releived to feel that if persons and poets of your calliber are there we can liberate this world from the prevailing value crisis.My sincere regards to your effort and best wishes for a very happy life to come forth.Regards
Dr Vishwas Saxena

नीरज गोस्वामी said...

आपने बिलकुल सच कहा...जहाँ न जाए रवि...वहां पहुंचे कवी" कवी अपनी कवितायेँ खुद के या आस पास के लोगों के अनुभव से या पढ़ कर रचता है...आप किसी घटना को किस हद तक आत्मसात करके लिखते हैं ये ही कविता के सफलता की निशानी होती है...
आपकी ये कविता अद्भुत भावः लिए हुए है.....बधाई...
नीरज

BrijmohanShrivastava said...

सुरभित ,हिय ,व्याकुल व्यथित ,जर्जर तरु ,संबल अच्छे शब्दों का चयन किया गया है

pallavi trivedi said...

दर्द का एहसास करने के लिए उसे भोगना बिलकुल ज़रूरी नहीं है....कविता सुन्दर है और आपने मेरा मन पसंद गीत गाया है...बहुत सुन्दर!

डॉ .अनुराग said...

जी हाँ एक संवेदन शील इन्सान किसी भी पीडा को महसूस कर सकता है .शायद यही किसी कलाकार का गुण है ....आपकी कविता ...पोसिटिव फ्रेम ऑफ़ माइंड में है .......
ओर हाँ ढेरो शुक्रिया.......इस ब्लॉग में डाल रहा हूँ.......

दिलीप कवठेकर said...

पहली बात तो ये कतई ज़रूरी नही है,कि कवि उन सभी हालातों से गुज़रे, जिनके बारे में उसने कविता में तसव्वूर कर रखा है. On the other hands, यही उसकी कल्पनाशक्ति की पराकाष्ठा है , और सृजन कला की परिक्षा!!

कहतें हैं कि जो ना देखे रवि, वो देखे कवि!!!

इस गाने को सुन कर इस बात की दाद दिये बगैर नही रहा जा सकता कि अब आपके गायन में निरंतरता, माधुर्य और सूकून से की गयी सुरों की अदायगी.

आपने तो कहीं कहीं सुरों की हरकतों को यूं smoothly Negotiate किया है कि मींड , मुरकीयां सभी पर नियंत्रण पूरा लग रहा है.

अब वो दिन दूर नहीं जब तीनों सप्तक के सभी सुरों पर आपकी पकड बखूबी हो जायेगी.

शुभकामनायें...

कंचन सिंह चौहान said...

संचार चेतना कर जाओ,
मैं संबल खुद का बन जाऊँगी.

bahut sundar.....! aur geet.. uske vishay me kya kahuN .....!!!!!

महामंत्री - तस्लीम said...

आपकी कविताओं की सकारात्‍मक सोच कविता को और ज्‍यादा अपीलिंग बना देती है।

वैसे चित्र भी प्‍यारा है।

-----------
SBAI TSALIIM

सुशील कुमार छौक्कर said...

एक बेहतरीन गाना, एक बेहतरीन आवाज में सुनकर आनंद आ गया। और कविता पढकर सुबह ही ऊर्जा आ गई थी।
जग बना गरल ,
कुछ नहीं सरल,
आशाओं के तरु जर्ज़र

संचार चेतना कर जाओ,
मैं संबल खुद का बन जाऊँगी.

बहुत ही उम्दा। और ऊपर के सवाल के जवाब में मेरे सर जी ने एक सटीक बात कहीं लिखी थी। ढूढी तो मिली नही। मिलेगी तो शेयर करुँगा।

mukti said...

छंद-मुक्त कविता के इस युग में जब कवि छंदोमयी ,प्रवाहमयी,कोमल सरस शब्दयुक्त कविता लिखता है, तो मन मंत्रमुग्ध हो जाता है .

JHAROKHA said...

जग बना गरल ,
कुछ नहीं सरल,
आशाओं के तरु जर्ज़र

संचार चेतना कर जाओ,
मैं संबल खुद का बन जाऊँगी.

अल्पना जी ,
बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ लिखी हैं आपने.भावनाओं का अच्छा संयोजन .
पूनम

monica said...

BEAUTIFUL POEM I LIKE IT.

creativekona said...

सुरभित दीपित हो अन्धकार,
बज उठें हिय के तार तार,
छिड़ जाएँ फिर से मधुर राग,
तुम शब्द नए बन आओ,
मैं गीत नवल बन जाऊँगी,

अल्पना जी ,
अपनी भावनाओं और शब्दों को आसान तरीके से संयोजित करना ही रचनाकार की खासियत होती है ...और ये हुनर आपकी कविताओं में साफ झलकता है ...बहुत सुन्दर पंक्तियाँ ....
हेमंत कुमार

hempandey said...

भोगे यथार्थ को लिखना ही साहित्य नहीं है. प्रेरणा के अनेकों स्रोत हो सकते हैं,
प्रस्तुत कविता में सहकार और समर्पण दोनों की ही झलक है,
आपके गाये गीतों का नियमित श्रोता बन गया हूँ,

P.N. Subramanian said...

हम आपसे पूर्णतः सहमत हैं. व्यक्ति संवेदनशील हो तो हर स्थितियों में कुछ पल गुजार सकता है. और यही गुजारे हुए क्षणों की अभिव्यक्ति कविता के माध्यम से भी की जा सकती है. पर उसकी हुनर आवश्यक है जो हरेक में नहीं होता. "प्रतीक्षा" बहुत ही सुन्दर लगी. "अहसान तेरा होगा मुझ पर" को डाउनलोड कर सुना जिससे buffering की परेशानी न हो. प्रारंभ बहुत ही अच्छा था. "तुमने मुझको हँसना सिखाया" में जाकर हम अटक गए. यह भी हमारे प्रिय गीतों में से एक है और इसमें थोडी सी भी गडबडी समझ में आ जाती है. आप दुबारा मूल गीत को सुनकर compare कर देखिये.एक दो retake के बाद ठीक हो जायेगी.

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

प्रतीक्षा कविता दिल को छू गई . आभार.

kavita said...

wah! alpana ji,bahut hi sundar kavita aur geet bhi madhur.

ड़ा.योगेन्द्र मणि कौशिक said...

तुम शब्द नऐ बन जाओ
मैं गीत नवल बन जाऊँगी
अच्छा लिखा है बधाई

मोहन वशिष्‍ठ said...

तुम शब्द नए बन आओ,
मैं गीत नवल बन जाऊँगी,

गीत बहुत ही मनमोहक लगा आपका आभार अल्‍पना जी

MUFLIS said...

और यह जरुरी भी नहीं होता कि हम उन्हीं परिस्थितियों से गुजरे हों..और बस कुछ कवितायेँ ऐसे भी बन जाती हैं.

aur ye sach bhi hai ....
kuchh nij-anubhav se aur
kuchh adhyayan se ....
bs aise hi hota jata hai..
kabhi-kabhaar to !!

---MUFLIS---

Pyaasa Sajal said...

kavi hriday aur kavi ke hriday me fark bhi to hota hai..isliye aisi soch ki jo humpe guzri hai hum usi pe likh sakte hai ye to thik nahi..kuch log kehte hai ki agar kavi bina mahsoos kiye likhe to ye kavita ka apmaan hai..mujhe to lagta hai ki ek mukammal kavi ko agar kisi baat pe likhn ke liye use mahsoos kar lena zaroori lage to wo kavita ka apmaan aur uski kamee hai :)

www.pyasasajal.blogspot.com

योगेन्द्र मौदगिल said...

कविता और गीत दोनो ही लाजवाब...Wah..

RAJNISH PARIHAR said...

very very nice voice...

Mumukshh Ki Rachanain said...

परिस्थितियों से गुजरना और हुई अनुभूतियों का अहसास
किरदार को जीना
दोनों ही दौर से एक लेखक, कवि को कुछ न कुछ निकलना ही होता है,
यही नहीं उसे तो वह सब भी सोचना और लिखना होता है जो दूसरे सोच भी नहीं सकते

इसीलिये तो कहा गया है कि

जहाँ न पहुचे रवि , वहां पहुचे कवि

अल्पना जी, आपके प्रत्युत्तर से मै पूर्ण सहमत हूँ.

चन्द्र मोहन गुप्त

manu said...

aur to kisi kaa maaloom nahi ,,
par hame ye pataa hai ke khud us mukaam se gujre binaa ya apne kisi khas ko wahaan par dekh kar mahsoos kiye bina nahi likhaa jaataa,,
par yadee koi mudda ekdam saamaajik ho to aur baat hai,,,,

seema gupta said...

संचार चेतना कर जाओ,
मैं संबल खुद बन जाऊँगी.
" सच ही तो है कुछ ख़यालात अन्यास यूँही ही कविता बन जाया करते हैं........एक उर्जावान कविता मै खुद ही संबल बन जाउंगी ये पंक्ति अपने अन्दर छुपी एक उर्जा या शक्ति को उजागर कर रही है ...मन को भा गयी...."

regards

Vijay Kumar Sappatti said...

alpana ji

itni shaandar kavita ke liye dil se bahdai sweekar karen ... aapne bahut sundar shabdo me bhaav vyakt kiye hai

bahut hi shaandar abhivyakti

Anonymous said...

Dear Alpana ji
Bahut sundar kavita likhi apne..har baar hi utkrisht hoti hai..tareef ke shabd nahin milte...aapki kavitaon mein ek kashish hoti hai jiska varnan mushkil hai...mehsoos hi kiya jaa sakta hai..Saadhuvaad
Geet hamesha ki tarah mera fav hai...mujhe bahut khushi hai ki aapne itna mushkil geet bahut achhi tarah se gaaya aur nibhaya hai..(itna high scale tha lekin aapne apne andaaz mein usay aasaan bana diya...Badhayee ki paatra hai aap....
Mera tour achha raha....aapki shubhkaamnaon ke liye dhanyavaad...

best regards

Dr Sridhar Saxena

"लोकेन्द्र" said...

अपनी सवेदनाओ के माध्यम से व्यक्ति किसी भी किरदार के जीवन में ठहर सकता हैं..... और कलम की अभिव्यक्ति से उसे चित्रित भी कर सकता है.............
आपकी "प्रतीक्षा" अच्छी लगी.....

RAJ SINH said...

प्रान्जल हिन्दी मे सरल्तम शब्दोन मे बहुत ही सुन्दर भाव . और जन्गली का गाना बहुत ही बढ्यिया बन पदा है . आप्की मेह्नत झलक्ती है . सभी ने तो कहा ही है ,लेकिन डा. सक्सेना की बात दोहराउन्गा .इत्ने हायी स्केल के गीत गाना आप्की मेहनत के सबूत हैन .

अपना गायन आनन्द और कवितावों मे मन ,सब से बान्तने का धन्यवाद !