
कहीं दूर चलें
-------------
सोचती हूँ आज ,कहीं दूर चलें,
गुनगुनाती शाम के धुंधलके में,
चाँद की रोशनी के मद्धम होने तक ,
तुम करो बातें और मैं सुनती जाऊँ .
फूलों की खुशबू और झरने के मधुर स्वर,
गिरते पानी की बूंदों को हवा -
-मेरी अलकों पर मोती सा सजाती ,
माथे पर गिरी बूंदों को तुम्हारी उँगलियों की छुअन-
सोयी आरजूएं जगा जाती लेकिन..
अधरों पर आ कर हर बात ठहर जाती.
रात की तन्हाईयों में ,सुबह ओस के गिरने तक...
दिल की हर उलझन सुलझ जाए,
रुसवा न हो चाहत ये ख्याल रहे...
रूह में उनकी मेरी रूह
यूँ समा जाए...
सोचती हूँ आज कहीं दूर चलें..
[--Alpana Verma]
-------------
सोचती हूँ आज ,कहीं दूर चलें,
गुनगुनाती शाम के धुंधलके में,
चाँद की रोशनी के मद्धम होने तक ,
तुम करो बातें और मैं सुनती जाऊँ .
फूलों की खुशबू और झरने के मधुर स्वर,
गिरते पानी की बूंदों को हवा -
-मेरी अलकों पर मोती सा सजाती ,
माथे पर गिरी बूंदों को तुम्हारी उँगलियों की छुअन-
सोयी आरजूएं जगा जाती लेकिन..
अधरों पर आ कर हर बात ठहर जाती.
रात की तन्हाईयों में ,सुबह ओस के गिरने तक...
दिल की हर उलझन सुलझ जाए,
रुसवा न हो चाहत ये ख्याल रहे...
रूह में उनकी मेरी रूह
यूँ समा जाए...
सोचती हूँ आज कहीं दूर चलें..
[--Alpana Verma]
