आप का स्वागत है!


''यूँ तो वतन से दूर हूँ लेकिन इस की मिट्टी मुझे हमेशा अपनी ओर खींचे रहती है''

March 24, 2009

अहसास-एक ग़ज़ल


मार्च ५,२००९ को यहाँ एक 'गंगा-जमुनी' मुशायरा हुआ था जिसमें तमाम यू.ऐ.ई से शायर आमंत्रित थे.

इस मुशायरे में पाकिस्तान और हिंदुस्तान के शायरों ने अपनी रचनाएँ पढीं.

मुझे भी इस मंच से पढने का मौका मिला.

सदर ऐ मुशैरा अजमल साहब और मुख्य अतिथि सलाहुद्दीन साहब
जो ग़ज़ल मैंने वहां पढ़ी थी..आप के समक्ष प्रस्तुत है.
इस ग़ज़ल पर मशहूर शायर अजमल नक्शबंदी साहब का आशीर्वाद है.इस ग़ज़ल का आखिरी शेर मैं उन्हीं को समर्पित करती हूँ.आप इस मुशायरे के सदर भी थे.आप की अब तक ग़ज़लों की १२ किताबें छप चुकी हैं.

अहसास
----------

जाने क्यूँ वक़्त के अहसास में ढल जाती हूँ,


जाने क्यूँ मैं अनजान डगर जाती हूँ.



टूट कर जुड़ता नहीं माना के नाज़ुक दिल है,

गिरने लगती हूँ मगर खुद ही संभल जाती हूँ.



ज़िन्दगी से नहीं शिकवा न गिला अब कोई,

वक़्त के सांचे में मैं खुद ही बदल जाती हूँ.



अपने हाथों में जो मेहंदी है रची उन के नाम,

दर्द के साए से मैं देख निकल जाती हूँ.



मैंने माना कि मेरी उम्र बड़ी है लेकिन ,

याद करती हूँ जो बचपन तो मचल जाती हूँ.



[-अल्पना वर्मा ]
-----------------------------



यह ग़ज़ल तरन्नुम में यहाँ सुनिए.[mp3]





अहसास-एक ग़ज़ल by Alpana


यहाँ से भी डाउनलोड करके सुन सकते हैं


----------------------------------------------------------------------


March 10, 2009

रंगों की फुहार

होली की शुभकामनाओं के साथ दो दिन पहले जब यह कविता प्रकाशित की थी तब तकनीकी कारणों से गीत पोस्ट नहीं कर पाई.रश्मि जी ने इस पोस्ट में एक गीत की कमी बताया इस लिए इसी पोस्ट में जोड़ कर प्रस्तुत कर रही हूँ.कल ही मुम्बई से अरविंद जी ने इस का ट्रैक बना कर भेजा है.आज रिकॉर्ड किया है.

जिन साथियों ने इस गीत का अनुरोध किया था.इस सुन्दर गीत से परिचय कराने हेतु उनका भी आभार.
आशा है यह गीत आप सभी को पसंद आयेगा.फिल्म अनुपमा[१९६६]का यह मूल गीत लता जी ने गाया है.
संगीत हेमंत दा का और लिखा है कैफी आजमी साहब ने.



कुछ दिल ने कहा [फिल्म-अनुपमा]
[यह मूल गीत नहीं है.]

Play or download mp3 Here
updated post on March 10,2009.
होली का त्यौहार नज़दीक आ रहा है.इसी अवसर पर प्रस्तुत है एक रंग बिरंगी कविता और होली की
ढेर सारी शुभकामनाएँ-:


रंगों की फुहार
-------------
बहे बसंती बयार ,आया होली का त्यौहार,
हरसू छाई बहार ,उडे रंगों की पतंग.

गौरी करके सिंगार ,मांगे प्रीतम का प्यार,
कोई करे मनुहार ,और कोई करे तंग.

पिचकारी की कतार, हुई रंगों की बोछार,
नाचे गाएं बार बार,बाजे ढोल और मृदंग.

गावे कवित्त और फाग,बस चढ़ रहा खुमार,
गले भंग लो उतार,थोड़ा कर लो हुडदंग!

भीजे रंगों में तन, मन में प्रेम की फुहार,
करो सब को शुमार, खेलो होली के रंग.

-अल्पना वर्मा