February 13, 2015

प्रेम /प्यार /मोहब्बत ! आह !

प्रेम /प्यार /मोहब्बत !आह!
इस भाव के न जाने कितने नाम हैं ..
कहते हैं ,कभी बेनाम भी रह जाया करती हैं कहानियाँ जिन में ये भाव प्रमुख होते हैं ..
मगर क्या आज इस शब्द का कोई अर्थ बचा है ?क्या आज भी सच्चा प्रेम जैसा कुछ होता है?
यहाँ उस अहसास के लिए इस्तमाल किये जाने वाले शब्द की  बात हो रही है जिसे हम रूह से देह तक महसूस किये जाने का अहसास कहते हैं ..मन से तन तक का सफ़र तय कराने वाला अहसास जिसे लोग मोहब्बत भी कहते हैं 'लव या प्रेम !

ये प्रेम दिवस वाला ' प्रेम ' सिर्फ विपरीत लिंग वाले दो प्रेमियों के बीच का ही प्रेम है ..कुछ ऐसा ही आभास होता है इस प्रेम दिवस के आने भर की आहट से !

'इश्क ' वो जज्बा है जो छुपाने से भी छुपा नहीं करता'' ऐसा कहा जाता है लेकिन अब तो लोग छुपाने के लिए नहीं दिखाने  के लिए इश्क्बाज़ियाँ करते हैं !

'प्यार'' क्या आप को यकीन है इस शब्द पर ?

कम से कम मुझे तो नहीं होता ....कोई जाना पहचाना कहे तो मैं पहले कारण पूछती हूँ कि बताईये किस बात ने प्रभावित किया और आप का उद्देश्य क्या है ?और कोई  अजनबी मुझ से कभी कहे कि उसे मुझ से प्यार है तो मेरी ओर से गहरी शक की छाया  उस व्यक्ति को घेर लेती है क्योंकि मेरे विचार में बिना किसी की किसी बात से प्रभावित हुए कोई भाव आप के दिल में कैसे आ सकते हैं ?
और जो ऐसा कहता है कि बिना देखे प्यार हो गया ..बिना जाने ,,,वो महज बकवासबाजी ही मानी जायेगी .

''प्यार '' वास्तव में एक किताबी शब्द है जिसका उपयोग कम ,दुरूपयोग अधिक हुआ है .
'lost love' Collage created by Alpana Verma
''यह एक ऐसा शब्द है जिसे सबसे अधिक प्रताड़ित किया गया है ''अगर मैं ऐसा कहूँ तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.
लोग इस शब्द का वज़न जाने बिना इस का प्रयोग स्वार्थपूर्ति हेतु करते हैं और सदियों से  करते आये हैं .
किसी प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष लाभ के लिए इस एक शब्द का उपयोग करना आजकल बहुत ही साधारण बात हो गयी है ,'प्यार ' के नाम की आड़ में  कृत्रिम  सुखों को भोगना भी आज के आधुनिक युग में फैशन हो गया है .

इस बेचारे एक शब्द का इतना शोषण शायद किसी और युग में नहीं हुआ होगा जितना आज होने लगा है !
इस प्यार शब्द से प्यार करने वाले बिरले ही हैं.

सोशल मिडिया की बात  अगर कहें तो 'आयी लव यू '' मैं प्यार करता हूँ..या प्यार हो गया है जैसे कितने ही जुमले  बड़ी आसानी से कहीं भी किसी के इनबॉक्स में फेंक दिए  जाते हैं ! निशाना लग गया तो सही वर्ना और आगे बढ़ा जाए !

 फेसबुक के किसी के  पन्ने पर लिखा पढ़ा था कि 'प्रेम नुक्कड़ पर बिकने वाले घड़ी डिटर्जेंट जितना सस्ता हो गया है ''..अगर ऐसा आज का युवा वर्ग सोचता है तो उसके पीछे कारण होंगे और येही वजह  है कि इस दिवस को मनाने की ज़रूरत आन पड़ी ?

पता नहीं लेकिन ढाई आखर के इस शब्द से कितने बड़े -बड़े खेल लोग खेल जाते हैं ,कितने लोग बर्बाद भी हो जाते हैं ,..
मेरी नज़र में यह शब्द मात्र एक खाली अभिव्यक्ति रह गया है .
बस जीवन को अपनी जिम्मेदारियां पूरी करते हुए जिए जाओ ....इस शब्द के छलावे से दूर क्योंकि इस शब्द  के भाव शून्य हो चले हैं .

सही अर्थ वाले 'प्यार ' को न शब्दों की ज़रूरत होती है न दिखावे की ...आप के हाव -भाव आप का व्यवहार ही बता देगा कि आप के अगले के प्रति कैसे भाव हैं !

सच्चा प्यार करनेवाले को इतना शोर मचाने की ज़रूरत ही नहीं होती न बार-बार जताने की .अगर भावनाएँ सच्ची हैं तो दिल से दिल को राह मिल ही जायेगी ..काहे बेचारे 'प्यार /प्रेम /मोहब्बत ' शब्द को  पीट -पीट कर अहसास जगाने  का प्रयास करते रहेते हैं !

खैर...प्रेम दिवस मुबारक हो! चलन है तो मैंने भी सभी शोर मचाकर प्यार करने वालों को मुबारकबाद दे दी है .
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[प्रिय पाठक,आप मेरे विचारों से इत्तेफाक रखें यह ज़रूरी नहीं :)..आप अपनी  बात खुलकर कह सकते हैं !]

February 2, 2015

स्वागतम शुभ स्वागतम

स्वागत गीत 


अथ स्वागतम , शुभ स्वागतम आनंद मंगल मंगलम |
नित प्रियम भारत भारतम ||

नित्य निरंतारता, नवता , मानवता, समता , ममता |
सारथी साथ मनोरथ का, जो अनिवार नहीं थमता ||

संकल्प अविजित अभिमतं | आनंद मंगल मंगलम ||

कुसुमित नई कामनायें, सुरभित नई साधनाएँ |
मैत्रिमत क्रीडांगन में , प्रमुदित बंधू  भावनाएं ||

शाश्वत सुविक्षित अति शुभम | आनंद मंगल मंगलम ||
स्वागतम , शुभ स्वागतम आनंद मंगल मंगलम |

संस्कृत भाषा में इस गीत को लिखने वाले सुप्रसिद्ध कवि पंडित नरेन्द्र शर्मा जी हैं .
इस गीत की धुन पंडित रवि शंकर जी ने बनायी थी .

इस गीत  की धुन बनाने वाले 'सितार' का पर्याय पण्डित रविशंकर जी का परिचय [विकिपीडिया से साभार ] :

एक सितार वादक और संगीतज्ञ थे। उन्होंने विश्व के कई मह्त्वपूर्ण संगीत उत्सवों में हिस्सा लिया है। उनके युवा वर्ष यूरोप और भारत में अपने भाई उदय शंकर के नृत्य समूह के साथ दौरा करते हुए बीते।

रविशंकर ने भारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा उस्ताद अल्लाऊद्दीन खाँ से प्राप्त की। अपने भाई उदय शंकर के नृत्य दल के साथ भारत और भारत से बाहर समय गुजारने वाले रविशंकर ने 1938 से 1944 तक सितार का अध्ययन किया और फिर स्वतंत्र तौर से काम करने लगे।उन्हें १९९९ में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। रवि शंकर को कला के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन् १९६७ में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

भारतीय संगीत को दुनिया भर में सम्मान दिलाने वाले भारत रत्न और पद्मविभूषण से नवाजे गये पंडित रविशंकर को तीन बार ग्रैमी पुरस्कार से भी नवाजा गया था। उन्होंने भारतीय और पाश्चात्य संगीत के संलयन में भी बड़ी भूमिका निभाई।
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इस गीत के गीतकार सुप्रसिद्ध कवि पण्डित नरेंद्र शर्मा जी के बारे में उनकी सुपुत्री लावण्या जी से ही जानिये-

 संत हृदय कवि पंडित नरेन्द्र शर्मा जी जन्म १९१३ में खुर्जा के जहाँगीरपुर नामक स्थान पर हुआ। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षाशास्त्र और अंग्रेज़ी मे एम.ए. किया।

१९३४ में प्रयाग में अभ्युदय पत्रिका का संपादन किया। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी स्वराज्य भवन में हिंदी अधिकारी रहे और फिर बॉम्बे टाकीज़ बम्बई में गीत लिखे। उन्होंने फिल्मों में गीत लिखे, आकाशवाणी से भी संबंधित रहे और स्वतंत्र लेखन भी किया।

उनके १७ कविता संग्रह एक कहानी संग्रह, एक जीवनी और अनेक रचनाएँ पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।


इस गीत के बारे में उनकी सुपुत्री लावण्या जी अपने ब्लॉग पर यह बताती हैं -उन्होंने ये गीत लिखा था और दिल्ली भिजवाया था उस समय मँद स्मित से सजी पापा जी की मुखमुद्रा का, आज भी, स्मरण हो आता है ।

उन्होंने ये भी कहा था, " सँस्क़ृत के शब्दोँ से सजा ये गीत, भारत के हरेक प्राँत के विभिन्न भाषा बोलनेवालोँ को एक सूत्र मेँ पिरो पायेगा -- इसका मुझे विश्वास है । दक्षिण की भाषाएँ और उत्तर की , पूर्व की होँ या पश्चिम की, भारत के हर प्राँत की भाषा , मेरी सँस्कृत भाषा को ' माता ' कहती है ।
हमारे भारतवर्ष की यह आदी भाषा है और हर प्राँतिय भाषा मेँ , कई सारे सँस्कृत निष्ठ शब्द हैँ जिन्हेँ हर प्राँत मेँ समझा जाता है और उनका प्रयोग भी किया जाता है " --
ये पापा के उस समय कहे शब्द , आज याद कर रही हूँ ।''

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लावण्या दी, आप की बात बिलकुल सही हुई.३० जनवरी को  हमारे स्कूल के उत्सव के आरम्भ हेतु हमने इसे प्रस्तुत किया और इस समूह गीत को बेहद सराहा गया.भारत के अलग-अलग प्रान्त के रहने वाले बच्चे जिनकी उम्र 12 से 15 की थी ,जो अब इस खाड़ी  देश में पढ़ रहे हैं उन्होंने इस गीत को बड़ी खूबी से सीखा और प्रस्तुत किया .यह ध्यान देने वाली बात है कि इन में कोई भी संगीत सीखा हुआ नहीं है और न ही संस्कृत कभी सीखी सुनी..
लेकिन संस्कृत तो भारतीय भाषाओँ की माता है उसे सीखने में किसी को कष्ट कैसे होता बल्कि बहुत ही आनंद से सीखा और सुरीला प्रस्तुत किया.
मुझे यह बात भी बाँटते हुए बेहद हर्ष हो रहा है कि २७ बच्चों में केवल दो ही बच्चे ऐसे थे जिन्होंने पहले किसी स्टेज पर प्रोग्राम में भाग लिया था बाकि सभी स्टेज पर खासकर किसी  वार्षिक समारोह में पहली बार भाग ले रहे थे .इनमें तमिल,हिंदी ,उर्दू,गुजराती,पंजाबी,तेलुगु,कोंकणी,मलयालम आदि भाषाओँ के बोलने वाले छात्र शामिल थे.


अंत में --इस गीत का कराओके जिन्होंने बनाया है वे भी अमेरिका में रहने वाले एक भारतीय श्री श्रीनिवास किशोर भरद्वाज जी  हैं और बेशक उन्हीं के बनाये ट्रेक के कारण ही हम इतनी सुरीली प्रस्तुति कर पाए.उनके इस सहयोग के लिए दिल से उन्हें धन्यवाद.

मुझे बहुत प्रसन्नता है कि इस मधुर गीत को एक बार फिर से हम  लोगों के बीच  सुना सके,क्योंकि बहुत से ऐसे लोग थे [नयी पीढ़ी के ..जिन्होंने मुझ से इस गीत के बारे में और जानकारी माँगी थी .]

इस गीत की विडियो यहाँ दे रही हूँ जल्द ही इसी स्वागत गान की  ऑडियो क्लिप भी पोस्ट करूंगी.
----------------विडियो मोबाइल से रिकॉर्ड की हुई है ,गीत प्रस्तुति में हुई किसी भी त्रुटि के लिए मैं क्षमा माँगती हूँ.----