March 8, 2014

भ्रमजाल!

भावनाएँ? भ्रमजाल है माया!

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लगता  है कुछ ठहरा हुआ सा है .
ज़िन्दगी मानो एक धुरी पर घूमते घूमते रुक गयी है .
ठिठक कर जैसे कोई पथिक आस-पास देखने लगता है .

अचानक ही जैसे जानेपहचाने माहौल में अजनबीपन के साए दिखने लगे हों.
ऐसी तमाम परिस्थितियों में इंसान के लिए अपनी मनः स्थिति को हमेशा  समझ पाना संभव नहीं होता ,समझना तो दूर उसे सही तरह से बखान कर पाना भी दुष्कर लगता है .

माया अपने आसपास कुछ ऐसा ही महसूस कर रही थी .
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आज शुक्रवार  है..अगले दो दिन छुट्टी है .पर ऑफिस से बाहर निकलते हुए मन अजीब सी उलझनों में घिरा हुआ था .ऐसा होना तो नहीं चाहिये लेकिन ऐसा कुछ है आज ! जब कभी सभी महिलायें एक साथ बैठती हैं तो सब के मन खुलने लगते हैं कुछ हँसते हुए, कुछ मुस्कराते हुए,तो कुछ  मुंह बनाते हुए भाव भंगिमाएं बदल बदल कर  अपने मन की बात  कह ही देती हैं.अच्छा ही है न मन हल्का हो जाता होगा.

महिला दिवस की बधाई!...सुबह-सुबह सुनते ही माया चौंकी ..महिला दिवस?ओह ,आज 8 मार्च है! ...चलिए अच्छा है इस एक दिन महिलाओं के  लिए  लोगों की संवेदनाएं जागती हैं.

कल की बातें मन मस्तिष्क में गूंज रही थीं ..खुद पर खीझती है कि क्यों वह दूसरों के भावों में बहने लगती है ?सब की अपनी ज़िन्दगी है जैसे चाहे जियें . फिर भी उसे हर वो स्त्री याद आने लगी जो उसे बहुत अलग सी लगते हुए भी भीड़ का अहम् हिस्सा लगी .
अपने हिस्से का आसमान चाहिये!
जैसे --

स्त्री एक ---
33 साल विवाह सूत्र में बंधी हुई .
बच्चे अपने -अपने रास्ते पर चल रहे हैं .
लगभग हर दिन कोसती है अपने हमसफ़र को ..१२ साल से दैहिक सम्बन्ध नहीं फिर भी एक छत के नीचे रहते ..अक्सर जीवन से थकी हुई...एक स्नेहभरे आलिंगन का आग्रह करती ..कभी माया के कंधे पर सर रख कर माँ जैसे  स्पर्श की चाह करती हुई .कभी भरी आँखों से वह माँ को याद करती है तो माया उसे बच्चे की तरह सीने से लगा लेती है !

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स्त्री दो-
१९ साल विवाह सूत्र में बंधी हुए..हाँ उसके लिए बंधन है जिससे मुक्त होना चाहते हुए भी वह मुक्त नहीं हो सकती ,उसका धर्म इजाज़त नहीं देता .
हर सप्ताह सप्ताहांत आते ही जब औरों को ख़ुशी होती है तो उसका चेहरा उतरा हुआ होता है,उसे सप्ताह के ये दो अवकाश अच्छे नहीं लगते .

भरे परिवार में भी वह बहुत अकेली हो जाती है ,जिसके साथ की अपेक्षा वर्षों से करती रही वह कभी वक़्त नहीं देता ..अब उसे कोई आशा भी नहीं ...जीवन लक्ष्यहीन सा लगता है ..बच्चे?हाँ बच्चे हैं ,मगर रिक्तता जो वह महसूस करती है उसे उसका जीवनसाथी महसूस नहीं करता क्योंकि वह अपना समय घर के बाहर दोस्तो में अपना समय गुजरना पसंद करता है ,उसे शोहरत की ख्वाहिश है साथ की नहीं.महीने बात नहीं भी करे तो उसे फर्क नहीं पड़ता ,जीवन तो चलता है चलेगा ही!

##माया उसके उतरे चेहरे को भूल नहीं पा रही है !सोचती है बाहर से दिखने वाली चीज़ से सुन्दर दिखे मगर ज़रूरी नहीं कि वह सुन्दर ही हो उसी तरह शायद सम्बन्ध भी होते हैं .
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स्त्री तीन -
विवाह के १० वर्ष बीत चुके हैं !
उसे घर और घर के काम पसंद नहीं क्योंकि यहाँ वहां अकेले सब करना होता है , कामवाली रखने की उसकी हैसीयत नहीं तन्खावाह कम होने का ताना उसे मिलता है जिसका मलाल उसे हमेशा रहता है और रहेगा ही .
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स्त्री चार -
स्त्री होने का अहसास उसे बराबर कराया जाता है या कहिये वह पुरुष की छत्रछाया में है और पुरुष ही सर्वश्रेष्ठ कृति है विधाता की यह जताया जाता है .घर में हर उस आधुनिक सुविधा से वह हीन है जिसे हम आज के समय में आवश्यक मानते हैं .न कंप्यूटर उसके घर में रखने की अनुमति है न ही इन्टरनेट जैसी सुविधा ..मोबाइल भी बहुत ही मूलभूत ज़रूरतों हेतु उपलब्ध है.

विवाह के १३ साल बाद भी उसे यह सम्बन्ध अपने साथ  'एक देह' की उपस्थिति मात्र लगती है वह मुस्कुराती कम है ..
खुल के हँसते हुए माया ने उसे अपने साथ ही देखा था ,एक दिन जब बच्चों के साथ हम खुद बच्चे बन गए थे !उसने स्वीकार किया था कि अपने कोलेज समय के बाद वह उसी दिन खुल कर इतना हंसी और एक सवाल का जवाब देते हुए उसने अपने मन की सारी परतें ही खोल दी थीं ....मन द्रवित हो उठा था !

माया कई दिनों तक वही सोच -सोच कर अपनी नींदें खराब करती रही कि अक्सर हम देखते कुछ हैं लेकिन असलियत इतनी अलग होती है क्यों?
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स..अब इतना नहीं सोचना मुझे....माया ने रेडिओ का बटन दबाया तो लता की आवाज़ में एक गीत गूँज उठा ..'मेरे ए दिल बता ...प्यार तूने  किया ..पाई मैं ने सज़ा क्या करूँ'.....
'ओह ! यहाँ भी एक कहानी ......'प्यार ''जिस शब्द से उसे कभी मोहब्बत नहीं, वही याद आ गया ...एक कहानी किसकी कहानी थी...स्त्री पाँच या छह?...

वह फिर कभी...सोचते हुए माया ने अपनी खिड़की के परदे हटा दिए धूप खिली हुई थी मानो कहती हो कि स्त्री जैसी सहनशील  ईश्वर की बनाई कोई और कृति धरती पर नहीं है.
'अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएँ!'
हर चेहरा आधा ही दिखता है !

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February 16, 2014

बनूँगी मौन की भाषा ..

माघ में ऋतु परिवर्तन होते ही मानो प्रकृति मदनोत्सव मनाने लगती है.
यहाँ भी मौसम अंगडाई ले रहा है ,
जाती हुई सर्दी पलट कर वापस ऐसे  आई है जैसे कुछ भूला हुआ वापस लेने आई हो.


भावों की सुगबुगाहट और अहसासों का  कोमल स्पर्श लिए मन ओस की बूंदों में खुद को भिगो देना चाहता है ताज़े खिले फूलों की सुगंध में रचने बसने को आतुर हो उठता है.

मरू भूमि में गिरती बरखा की बूंदों को देख जैसी प्रसन्नता होती है वैसी ही अनुभूति अपलक ताकती चाहना के मौन स्वर दे जाते हैं और एक प्रेम गीत का जन्म हो जाता है !


 गीत 

मैं  बनूँगी मौन  की भाषा नयी 
बन के धुन  स्वर मेरे छू जाना तुम


मैं भरूँगी स्नेह से आँचल मेरा 
बन के झोंका नेह का  छू जाना तुम 

मैं लिखूंगी प्रेम का इतिहास नव 
बन भ्रमर बस पंखुरी छू जाना तुम 

भीत मन की प्रीत के रंग में रंगे
बन के ओस अधरों को छू जाना तुम 

बावरी हर चाह अठखेली करे  
यूँ हृदय   के तारों  को  छू जाना तुम 

मैं गुनुंगी गीत भावों से भरा 
बन किरण बस  देह को छू जाना तुम


-अल्पना वर्मा-