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वो भी एक दौर था ..और ये भी....है !

पिछले बीस-तीस साल में  लगभग हर क्षेत्र में  बहुत अधिक अंतर आ गया है.  यूँ तो इस बात को बताने के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है .

January 11, 2016

सेल्फ़ी-वेल्फ़ी,सेल्फ़ाईटीस


सेल्फ़ी लेते समय तीन लडकियाँ समुद्र में डूबीं और उन्हें बचाने के लिए गया युवक  भी लापता !यह कल ही का समाचार था जिसे सुनकर मैं एक बार फिर सोच में पड़ गयी कि आखिर यह लत है या बीमारी? इससे पहले भी आये दिन सेल्फ़ी लेते हुए दुर्घटनाओं की खबरें पढ़ी हैं लेकिन पिछले कुछ दिनों से यह कुछ ज्यादा ही होने लगी हैं.यकीनन यह चिंता का विषय है.

खुद की तस्वीरें खींचने का  शौक तो  किसी को इतना बेपरवाह नहीं कर सकता कि उस अपनी जान की परवाह ही न रहे !एक समय वो भी था जब तस्वीरें खिंचवाने स्टूडियो में जाना  पड़ता था और फोटो खिंचवाना या खिंची हुई फोटो बनवाना [डेवेलप करवाना] कोई सस्ता काम भी नहीं होता था.फिर इंस्टेंट [पोलोरोइड] कैमरे आये जिनकी उम्र बहुत ज्यादा नहीं थी.खिंची हुई तस्वीर तुरंत देखना रोमांचक हुआ करता था .

बदलते वक़्त ने तकनीकी उन्नति के साथ इतनी बड़ी छलांग लगाई कि आज जिसे देखिये  वही फोटोग्राफर हो गया है ..जहाँ इस के फायदे हैं वहीँ नुकसान भी हैं.
खासकर मैं बात कर रही हूँ स्मार्ट फोन में सेल्फ़ी लेने की सुविधा की.

हिंदी में इस शब्द को क्या कहते हैं ?मैं नहीं जानती लेकिन इतना ज़रूर सुना है कि अंग्रेजी की ऑक्सफ़ोर्ड  ,मरियम वेबस्टर आदि   ने 'सेल्फ़ी' शब्द को अपने शब्दकोश में स्थान दे दिया है.ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोश ने २०१३ में इस शब्द को शामिल किया था.अब इस शब्द का  आप स्क्रेब्ल में भी प्रयोग कर सकते हैं.
टाइम्स पत्रिका के अनुसार फिलीपींस का  मकाती शहर 'दुनिया की सेल्फ़ी राजधानी ' बताया गया है.
सेल्फी लेने का दीवानापन अधिकतर युवाओं और किशोरों में ही देखा गया ,कारण ये भी हो सकता है कि स्मार्ट फोन,समय और सुविधा इनके पास तुलनात्मक रूप से अधिक है.

इसलिए सेल्फ़ी लेने की इच्छा शक्ति का अभाव तो होगा ही नहीं !
एक दिन में कितनी बार कोई सेल्फ़ी ले सकता होगा ?

एक दिन मैं जब एक कॉलेज के फ़ूड कोर्ट में बैठी थी तो अचानक मैंने कुछ सुना और चौंक कर उस तीनो छात्रों को देखा ...जिनमें से एक औरों को बता रहा था कि बीते दिन उस ने एक हज़ार सेल्फी लीं! एक हज़ार!!!!!!!!! मैंने सोचा शायद  ऐसे ही शेखी बघार रहा होगा लेकिन जब इस बारे में अपने अन्य मित्रों के साथचर्चा की तो सभी ने एक स्वर में कह दिया ..क्यों नहीं ..एक दिन में एक फोन में एक हज़ार  सेल्फ़ी लेने में क्या दिक्कत है?बिलकुल ली  जा सकती हैं ...मुझे आश्चर्य हुआ कि आखिर कितना समय सेल्फ़ी लेने में और कितना समय उसे देखने में ...बर्बाद किया होगा !!
आखिर सेल्फ़ी से हासिल क्या होगा ?
कोई ख़ास क्षण हों जिन्हें आज सुरक्षित रखना चाहते हैं तो बात अलग है ..आप अपनी फोटो लीजिए  लेकिन महज समय गुज़ारने को या खुद से अत्यधिक प्रेम के चलते ऐसा करने वाला सामान्य नहीं हो सकता ...
आजकल इस विषय पर  शोध भी हो रहे हैं..आगे चलकर शायद सेल्फ़ी की कला पर भी कोई किताब आ जाये ...या इस का  भी कोई  कोर्स शुरू  हो जाए...सेल्फ़ी लेने के बाद उसे एडिट करने के ढ़ेरों सॉफ्टवेर तो पहले से ही मौजूद हैं .खैर जो होगा वो देखेंगे फिलहाल तो अमरीकन सायीकोलोजीकल एसोसिएशन [APA] ने सेल्फ़ी  लेने के इस फितूर को एक मानसिक रोग घोषित किया है !
इस रोग को नाम दिया गया है 'सेल्फाईटिस'...यह एक ऐसी इच्छा है जो बार -बार व्यक्ति को मजबूर करती है कि वह अपनी तस्वीरें ले.इसका एक कारण स्वयं में आत्मविश्वास या आत्मसम्मान की कमी होना है.वह अपनी तस्वीरों के ज़रिये लोगों से दोस्ती बढ़ाना चाहते हैं उनसे सम्बन्ध मजबूत करना चाहते हैं.आखिर आपका चेहरा ही तो पहला  प्रभाव सामने वाले पर छोड़ता है और फिर यह तो है भी आभासी दुनिया ..जहाँ इन सेल्फियों का चलन सबसे अधिक है.
मज़े की बात यह है इस एसोसिएशन के अनुसार जो व्यक्ति एक दिन में कम से कम  तीन बार अपनी तस्वीर खींचता और खुद ही देखकर प्रसन्ना हो लेता है ,किसी के साथ बाँटता नहीं है वह भी इस रोग का शिकार है परन्तु वह  'borderline केस है !
अब इस रोग का दूसरा लेवल है 'एक्यूट सेल्फ़ाईटीस ' जिसमें एक व्यक्ति अपनी तस्वीरें एक दिन में कम से कम तीन तो लेता ही है ,खुद भी देखता है औरों को भी दिखाता है...फेसबुक आदि सोशल मीडिया के ज़रिये अपनी तस्वीरें औरों को दिखा कर लाइक्स या तारीफ़ भरे कमेंट्स  को  लालायित रहता है.इसी एसोसिएशन ने तीसरा  भेद इस रोग का 'क्रोनिक सेल्फ़ाईटीस ' बताया है जिसका शिकार व्यक्ति दिनभर सेल्फ़ी लेता रहता है और कम से 6 बार सोशल मीडिया के ज़रिये औरों को भी दिखाता है.
अब इसका इलाज क्या है ?इसका इलाज सिर्फ व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन करके ही किया जा सकता है ..शायद उसके लिए भी देर-सबेर हस्पतालों में  क्लिनिक खुलने लगेंगे तो आश्चर्य नहीं कीजिएगा.क्योंकि यह शौक जब जान  पर बन आने लगे तो इस रोग का इलाज भी ज़रूरी करवाना पड़ेगा.
अगर आपके आसपास  कोई इस रोग से ग्रसित होने के लक्षण  दिखा रहा है तो समय रहते सावधान कर दीजिए मगर प्यार और तरीके से ..वर्ना समझाने वाले को कुछ अनापेक्षित सुनना भी पड़ सकता है आखिर  है तो यह व्यक्तिगत मामला...
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वैसे  ,आपने आज कितनी सेल्फ़ी लीं?
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 [तस्वीर -गूगल इमेज से साभार ]

December 31, 2015

'जाते हुए ये पल-छिन'

[Pic by me In Green Mubazarrah Al Ain- morning  at7 Am]

समय अपनी गति से चलता रहता है .यह किसी का गुलाम नहीं है ,शुक्र है समय की गति को नियंत्रित करने का या अपने मन मुताबिक़ चला सकने का कोई यंत्र इंसान ने इजाद नहीं किया और न ही शायद कभी कर सकेगा.

अंग्रेजी नए साल २०१६ आज रात्रि बारह बजे के बाद शुरू हो जाएगा और इसका स्वागत भव्य तरीके से करने के लिए सभी ने अपने स्तर पर तैयारियाँ भी कर ही ली होंगी.

२०१५ का उत्तरार्ध मेरे लिए काफी पेचीदा रहा..इतनी भाग दौड़ पिछले कई वर्षों में कभी नहीं की होगी.जुलाई में शुरू की गयी यात्रा ने मुझे पहियों पर बैठाए रखा ..यह वर्ष कई मायनों में मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण रहा .
जुलाई  माह में विपासना शिविर से जुड़ने का सपना पूरा हुआ ,जब से विपसना ध्यान पद्धति के विषय में अंतर्जाल पर पढ़ा था तब से उत्सुकता थी और साथ ही कुछ था भीतर जो मुझे इस शिविर में जाने को प्रेरित कर रहा था.१० दिन का अनुभव मन  में स्थिरता लाने में सहायक हुआ साथ ही जीवन की एक बड़ी सच्चाई से रूबरू करवा गया कि सब कुछ परिवर्तनशील है..इस कथन को महसूस किया.

उसके बाद अक्टूबर और नवम्बर माह में पापा की तबियत खराब होने पर फिर से भारत की भूमि पर कदम पड़े और अस्पताल में ४० दिन आई सी यू के मरीजों के करीबी लोगों के साथ प्रतीक्षालय में घंटों गुज़ारने के साथ रोज़मर्रा के जीवन के कुछ नए कडवे -मीठे सच उजागर हुए ...निजी हस्पतालों के हाल,मरीजों की बेबसी और साथ ही पैसा की अहमियत का अहसास हुआ....और एक सच समझ आया कि आज की दुनिया में मरना आसान है परन्तु जीना मुश्किल..पापा की तबियत सुधरनी शुरू हुई तब वहाँ से लौटने के बाद एकांत में  चिंतन किया तब अपनों और परायों में भेद भी समझ आया और उनका वर्गीकरण करना आसान हो गया.
जिन्हें साथी  -दोस्त समझी बैठी थी उनके सही रूप की पहचान हुई.
मेरे विचार में आप जिसे दोस्त कहते हैं वह आपके दुःख में आपका हमदर्द न बन सके तो वह दोस्त नहीं ,उस से दूरी रखकर ही सम्बन्ध रखने चाहिये.

संक्षिप्त में कहूँ तो इतने सारे अनुभव २०१५ ने दिए और उन अनुभवों ने कहीं न कहीं स्वभाव में कठोरता और उदासीनता भी ला दी..जो पहले मेरे स्वभाव में नहीं थी.
विपासना ध्यान शिविर का एक और जो फायदा मुझे हुआ वह बिलकुल भी अपेक्षित नहीं था ..वह यह हुआ कि दो -तीन साल पुराना मेरे घुटनों का दर्द आश्चर्यजनक रूप से गायब हो गया.
और  दिमाग से बहुत ही पुरानी  बातें /स्मृतियाँ मानों धुल गयीं.एक साफ़ स्लेट की तरह मन हो गया था.

भविष्य में देखने की इच्छा अब नहीं रही ...'जो है ,यही वर्तमान के क्षण हैं .'.इस बात को काफी हद तक अपना लिया है...फिर भी अंदेशा है कि आने वाला साल भी काफी उतार-चढ़ाव वाला ही रहने वाला है.
नए साल के आगमन से पूर्व लोग नए -नए प्रण लेते हैं कि ऐसा करेंगे, वैसा करेंगे ..मैं ऐसा कोई प्रण नहीं ले पाती, न ही लेने का सोच रही हूँ..नियति जो कार्य सौंपेगी उसे पूरा करते चलेंगे बस...

अपनी इसी बात के साथ आप सभी को नव वर्ष की ढ़ेरों शुभकामनाएँ!
आने वाले वर्ष का हर दिन मंगलमय हो!
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इस क्लिप में मैंने अपने स्वर में इसी अवसर पर एक कविता प्रस्तुत की है -सुनियेगा :) 
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