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''यूँ तो वतन से दूर हूँ लेकिन इस की मिट्टी मुझे हमेशा अपनी ओर खींचे रहती है''

January 29, 2017

रानी पद्मिनी की शौर्य गाथा

मेवाड़ की रानी पद्मिनी
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वीरों की धरती राजस्थान ....
जहाँ के इतिहास में  अपनी आन-बान  के लिए बलिदान होने वालों की अनेक गाथाएँ वर्णित हैं.

एक कवि ने राजस्थान के वीरों के लिए कहा है :
"पूत जण्या जामण इस्या मरण जठे असकेल
सूँघा सिर, मूंघा करया पण सतियाँ नारेल"
{ वहाँ ऐसे पुत्रों को माताओं ने जन्म दिया था जिनका उद्देश्य अपनी भूमि  के लिए म़र जाना खेल जैसा था ...जहाँ की सतियों अर्थात वीर बालाओं ने सिरों को सस्ता और नारियलों को महँगा कर दिया था...(यह रानी पद्मिनी के जौहर की तरफ संकेत   करता है)


१३०२ ईस्वी  में मेवाड़ के राजसिंहासन पर रावल रतन सिंह बैठे थे .
उनकी रानियों में एक थी पद्मिनी जो श्री लंका के राजवंश की राजकुँवरी थी. रानी पद्मिनी का अनुपम सौन्दर्य यायावर गायकों (चारण/भाट/कवियों) के गीतों का विषय बन गया था।



दिल्ली के तात्कालिक सुल्तान अल्ला-उ-द्दीन खिलज़ी ने पद्मिनी के अप्रतिम सौन्दर्य का वर्णन सुना और वह  उस सुंदरी को अपने हरम में शामिल करने के लिए उतावला हो गया.

 वर्ष-१३०३ 
यह घटना कोई कल्पना नहीं और बहुत पुरानी भी नहीं ..मात्र ७१४ साल पहले की बात है...

अलाउद्दीन खिलजी जिसका असली नाम अली गुर्शप था .
दिल्ली की सत्ता हथियाने के लिए उसने अपने चाचा जो उसकी पत्नी के पिता भी थे'जलाल-उद-दिन फ़िरोज़  की  हत्या कर दी थी.
सन १२९६ में दिल्ली के सिंहासन पर बैठने के बाद वह चित्तोड़गढ़ को जीतना चाहता था ,रानी पद्मिनी के सौन्दर्य के बारे में उसने बहुत सुना था ,उसकी बुरी नज़र रानी पद्मिनी पर थी और उन्हें  अपने हरम में शामिल करना  चाहता था.

अवधि भाषा में लिखे मोहम्मद जायसी के काव्य ग्रन्थ ' पद्मावत ' में इसका वर्णन भी है.
ChittorGarh fort





सन १३०३ में उसने चितौड़गढ़ पर चढ़ाई कर दी.

चितौड़गढ़ के महाराणा रतन सिंह को जब यह सूचना मिली तब उन्होंने समस्त मेवाड़ और आसपास के क्षेत्रों में खिलजी से मुकाबला करने की तैयारी की.6 महीने तक यह युद्ध चला.

अब खिलजी ने चालाकी का काम लिया और संधि का प्रस्ताव महाराणा के पास भेजा कि मैं मित्रता का इच्छुक हूँ और एक मित्र के नाते दुर्ग में आना चाहता हूँ बिना किसी को साथ लिए ,मैं केवल रानी पद्मावती के दर्शन करके वापस चला जाऊँगा .

महाराणा ने मंत्रियों के साथ सलाह मशवरा किया और खिलजी की बात मान ली.
महाराणा रतन सिंह ने महल तक खिलजी की अगवानी की। महल के उपरी मंजिल पर स्थित एक कक्ष की  पिछली दीवार पर एक दर्पण लगाया गया, जिसके ठीक सामने एक दूसरे कक्ष की खिड़की खुल रही थी...उस खिड़की के पीछे झील में स्थित एक मंडपनुमा महल था  जिसका बिम्ब खिडकियों से होकर उस दर्पण में पड़ रहा था अल्लाउद्दीन को कहा गया कि दर्पण में झांके। हक्केबक्के सुलतान ने आईने की जानिब अपनी नज़र की और उसमें रानी का अक्स उसे दिख गया ...तकनीकी तौर पर उसे रानी साहिबा को दिखा दिया गया था.

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सुल्तान को एहसास हो गया कि उसके साथ चालबाजी की गयी है, किन्तु बोल भी नहीं पा रहा था, मेवाड़ नरेश ने रानी के दर्शन कराने का अपना वादा जो पूरा किया था......और उस पर वह नितान्त अकेला और निरस्त्र भी था।
परिस्थितियां असमान्य थी, किन्तु एक राजपूत मेजबान की गरिमा को अपनाते हुए, दुश्मन अल्लाउद्दीन को ससम्मान वापस पहुँचाने मुख्य द्वार तक स्वयं रावल रतन सिंह जी गये थे .....अल्लाउद्दीन ने तो पहले से ही धोखे की योजना बना रखी थी। उसके सिपाही दरवाज़े के बाहर छिपे हुए थे...दरवाज़ा खुला....रावल साहब को जकड लिया गया और उन्हें पकड़ कर शत्रु सेना के खेमे में कैद कर दिया गया।
Rani's palace mirror

राजपूत सैनिकों के अथक प्रयत्नों के बाद भी वे महाराणा को छुडाने में असफल रहे .
अलाउद्दीन खिलजी ने रानी पद्मावती को सन्देश भिजवाया कि अगर वह उनसे मिलने आएँगी तो वह महाराणा को छोड़ देगा.

रानी बहुत बहादुर थी ,उसने इस शर्त पर वहाँ आने की बात स्वीकार की कि वह सबसे पहले महाराणा से मिलना चाहती है और उसके साथ उसकी सात सौ दासियों  का काफिला भी आएगा.रानी के इस प्रस्ताव को खिलजी ने मान लिया.खिलज़ी ने सोचा था कि ज्योंही पद्मिनी उसकी गिरफ्त में आ जाएगी, रावल रतन सिंह का वध कर दिया जायेगा...और चित्तौड़ पर हमला कर उस पर कब्ज़ा कर लिया जायेगा
उधर ने भी एक योजना बनाई,अपनी पालकी में अपने स्थान पर ख़ास काका गोरा को बिठा दिया और दासियों की पालकी में सैनिकों को.


पालकियों को उठाने वाले कहार भी राजपूत योद्धा थे. गोरा और १२ वर्षीय बादल भी इन में सम्मिलित थे
पालकियाँ बिना रोकटोक महाराणा रतन सिंह के तम्बू में पहुँची,जहाँ उन्हें बंदी बनाया हुआ था. इसी बीच राणा को घोड़े पर बिठा कर चुपचाप किले की और भेज दिया गया.
कहार के भेष में योद्धा और पालकियों में सवार योद्धा खिलजी की सेना पर टूट पड़े.
अचानक हुए हमले से उस सेना में भगदड़ मच गयी .
 मैदान इंसानी लाल खून से सुर्ख हो गया था। शहीदों में गोरा और बादल भी थे, जिन्होंने मेवाड़ के भगवा ध्वज की रक्षा के लिए अपनी आहुति दे दी थी.
6 महीने से चल रहे युद्ध के कारण किले में भोजन की कमी हो गयी थी.
इस कारण सेना की हिम्मत भी टूट रही थी.
अब एक ही चारा बचा था, "करो या मरो" या "घुटने टेको" आत्मसमर्पण या शत्रु के सामने घुटने टेक देना बहादुर राजपूतों के गौरव लिए अभिशाप तुल्य था, ऐसे में बस एक ही विकल्प बचा था झूझना...युद्ध करना...शत्रु का यथासंभव संहार करते हुए वीरगति को पाना।

जिन्हें  नहीं मालूम  कि जौहर और साका क्या होते हैं और ये कब -कब हुए----Click here to know

इसलिए जौहर और शाका करने का फैसला लिया गया.

गोमुख के उत्तर में स्थित मैदान में एक विशाल चिता का निर्माण किया.
Maidan--Jahan Jauhar kiya gya


अब रानी पद्मावती के नेतृत्व में सोलह हज़ार राजपूत स्त्रियों ने गोमुख में स्नान करके अपने कुल देवी देवताओं और निकट सम्बन्धियों को अंतिम प्रणाम किया और चिता में प्रवेश कर गयीं .

इस तरह अपने सम्मान की रक्षा के लिए हमारे देश की इन वीरांगनाओं ने अपने प्राणों की आहुति दे दी.

6 महीने और सात दिनों के खूनी खेल के बाद जब खिलजी किले में घुसा तब उसे कोई दुर्ग में कोई भी जीवित नहीं मिला.
चारों और लाशें,दुर्गन्ध और मंडराते गिद्ध -कौवे.




अब निर्णय आप पर है कि आप बताएँ जीत किसकी हुई ?
किसने बलिदान किया और कौन पूजा और सम्मान का उत्तराधिकारी है?











वास्तव में ,अल्लाउद्दीन खिलज़ी की जीत उसकी हार थी, क्योंकि उसे रानी पद्मिनी का शरीर हासिल नहीं हुआ, न मेवाड़ की  पगड़ी उसके कदमों में गिरी।


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9 comments:

Digamber Naswa said...

इतिहास में ये गाथा समाज के शौर्य और सम्मान की गाथा है ... यदि इसपे फ़िल्म बनती है जैसा की भंसाली बना रहे हैं ... इस तथ्य से छेड़ छाड़ नहीं होनी चाहिए ...

arvind mishra said...

आश्चर्य है कि इतिहासकार इरफान हबीब इसे कपोल कल्पना मानते हैं। जबकि लोककथायें आज भी इस करुण गाथा से स्पन्दित हैं।गिरिजेश जी ने आज ही वीर रस के अप्रतिम कवि श्याम नारायण पाण्डेय जी की अमर कृति जौहर की ओर ध्यान दिलाया जिसमें यही कथा रौद्र और करुण रस के अद्भुत संयोजन के साथ वर्णित है। फेसबुक पर मैंने लिंक दिया है। देखें।

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’बीटिंग रिट्रीट 2017 - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

Ravindra Singh Yadav said...

रानी पद्मावती और महाराणा रतन सिंह की कथा आन-बान-शान के लिये सर्वोच्च कुर्बानी की भावुकतापूर्ण धरोहर है. इतिहासकारों और साहित्यकारों के अपने-अपने नज़रिये हैं किन्तु यह अमर गाथा सदैव लोगों को आंदोलित और प्रेरित करती रहेगी.

Alpana Verma अल्पना वर्मा said...

@दिगंबर जी यही बात भंसाली टीम को सितम्बर में दिए नोटिस में समझाई गयी थी जिसे उनलोगों ने अनदेखा कर दिया.बहुत ही दुखद प्रकरण है.
@अरविन्द जी , वह काव्य-रचना हमने स्कूली दिनों में पढ़ी थी,हमारे घर में यह किताब आज भी रखी है.
अफ़सोस है कि इन कृतियों का प्रसार नहीं होता ,सामान्यजन प्रेम प्रसंग ही पढना चाहते हैं ,वीर रस नहीं.
@राजा कुमारेन्द्र जी ,आपका बहुत-बहुत आभार जो आपने अपने ब्लॉग बुलेटिन में इस पोस्ट को स्थान दिया.आज की युवा पीढ़ी भारत के इतिहास से रूबरू हो यह बहुत आवश्यक है.
@रविन्द्र जी आपके कथन से पूरी तरह सहमत लेकिन जब इन गौरव गाथाओं को दोहराया जाता है तब इनमें मनमाने ढ़ंग से छेड़खानी नहीं की जानी चाहिए.

सागर नाहर said...

भंसालियो को रोका नहीं गया तो कल वह रानी लक्ष्मी बाई पर फिल्म बनाएंगे यह कह कर कि यह तो सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता का एक काल्पनिक पात्र है।

Kaushal Lal said...

इतिहास के गर्भ में सत्य क्या है बेशक छिपा हुआ हो किन्तु जनश्रुति और भावनाओं के साथ खिलवाड़ रचनात्मकता को स्वच्छंद पूर्वक तो नहीं होना चाहिए ।।।सुन्दर आलेख

Kaushal Lal said...

इतिहास के गर्भ में सत्य क्या है बेशक छिपा हुआ हो किन्तु जनश्रुति और भावनाओं के साथ खिलवाड़ रचनात्मकता को स्वच्छंद पूर्वक तो नहीं होना चाहिए ।।।सुन्दर आलेख

प्रतिभा सक्सेना said...

ऐतिहासिक तथ्य हो या लोक-गाथाओं का कथ्य ,जातीय आदर्शो और चरित्र की दृढ़ता के प्रतिमानों को मनमाने ढंग तोड़-मोड़ करआघात पहुँचाना उस संस्कृति के मूल्यों का हनन ही होता है.