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''यूँ तो वतन से दूर हूँ लेकिन इस की मिट्टी मुझे हमेशा अपनी ओर खींचे रहती है''

December 31, 2015

'जाते हुए ये पल-छिन'

[Pic by me In Green Mubazarrah Al Ain- morning  at7 Am]

समय अपनी गति से चलता रहता है .यह किसी का गुलाम नहीं है ,शुक्र है समय की गति को नियंत्रित करने का या अपने मन मुताबिक़ चला सकने का कोई यंत्र इंसान ने इजाद नहीं किया और न ही शायद कभी कर सकेगा.

अंग्रेजी नए साल २०१६ आज रात्रि बारह बजे के बाद शुरू हो जाएगा और इसका स्वागत भव्य तरीके से करने के लिए सभी ने अपने स्तर पर तैयारियाँ भी कर ही ली होंगी.

२०१५ का उत्तरार्ध मेरे लिए काफी पेचीदा रहा..इतनी भाग दौड़ पिछले कई वर्षों में कभी नहीं की होगी.जुलाई में शुरू की गयी यात्रा ने मुझे पहियों पर बैठाए रखा ..यह वर्ष कई मायनों में मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण रहा .
जुलाई  माह में विपासना शिविर से जुड़ने का सपना पूरा हुआ ,जब से विपसना ध्यान पद्धति के विषय में अंतर्जाल पर पढ़ा था तब से उत्सुकता थी और साथ ही कुछ था भीतर जो मुझे इस शिविर में जाने को प्रेरित कर रहा था.१० दिन का अनुभव मन  में स्थिरता लाने में सहायक हुआ साथ ही जीवन की एक बड़ी सच्चाई से रूबरू करवा गया कि सब कुछ परिवर्तनशील है..इस कथन को महसूस किया.

उसके बाद अक्टूबर और नवम्बर माह में पापा की तबियत खराब होने पर फिर से भारत की भूमि पर कदम पड़े और अस्पताल में ४० दिन आई सी यू के मरीजों के करीबी लोगों के साथ प्रतीक्षालय में घंटों गुज़ारने के साथ रोज़मर्रा के जीवन के कुछ नए कडवे -मीठे सच उजागर हुए ...निजी हस्पतालों के हाल,मरीजों की बेबसी और साथ ही पैसा की अहमियत का अहसास हुआ....और एक सच समझ आया कि आज की दुनिया में मरना आसान है परन्तु जीना मुश्किल..पापा की तबियत सुधरनी शुरू हुई तब वहाँ से लौटने के बाद एकांत में  चिंतन किया तब अपनों और परायों में भेद भी समझ आया और उनका वर्गीकरण करना आसान हो गया.
जिन्हें साथी  -दोस्त समझी बैठी थी उनके सही रूप की पहचान हुई.
मेरे विचार में आप जिसे दोस्त कहते हैं वह आपके दुःख में आपका हमदर्द न बन सके तो वह दोस्त नहीं ,उस से दूरी रखकर ही सम्बन्ध रखने चाहिये.

संक्षिप्त में कहूँ तो इतने सारे अनुभव २०१५ ने दिए और उन अनुभवों ने कहीं न कहीं स्वभाव में कठोरता और उदासीनता भी ला दी..जो पहले मेरे स्वभाव में नहीं थी.
विपासना ध्यान शिविर का एक और जो फायदा मुझे हुआ वह बिलकुल भी अपेक्षित नहीं था ..वह यह हुआ कि दो -तीन साल पुराना मेरे घुटनों का दर्द आश्चर्यजनक रूप से गायब हो गया.
और  दिमाग से बहुत ही पुरानी  बातें /स्मृतियाँ मानों धुल गयीं.एक साफ़ स्लेट की तरह मन हो गया था.

भविष्य में देखने की इच्छा अब नहीं रही ...'जो है ,यही वर्तमान के क्षण हैं .'.इस बात को काफी हद तक अपना लिया है...फिर भी अंदेशा है कि आने वाला साल भी काफी उतार-चढ़ाव वाला ही रहने वाला है.
नए साल के आगमन से पूर्व लोग नए -नए प्रण लेते हैं कि ऐसा करेंगे, वैसा करेंगे ..मैं ऐसा कोई प्रण नहीं ले पाती, न ही लेने का सोच रही हूँ..नियति जो कार्य सौंपेगी उसे पूरा करते चलेंगे बस...

अपनी इसी बात के साथ आप सभी को नव वर्ष की ढ़ेरों शुभकामनाएँ!
आने वाले वर्ष का हर दिन मंगलमय हो!
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इस क्लिप में मैंने अपने स्वर में इसी अवसर पर एक कविता प्रस्तुत की है -सुनियेगा :) 
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