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''यूँ तो वतन से दूर हूँ लेकिन इस की मिट्टी मुझे हमेशा अपनी ओर खींचे रहती है''

September 11, 2015

छाया-माया

प्रिय माया ,

बहुत दिनों से तुमने मुझे खुद से दूर रखा है पर यह तुम भी जानती हो कि छाया के बिना तुम भी अकेली हो.
छाया तुम्हारी अनुकृति ही तो है..तुम्हारी भावनाओं से अछूती नहीं है फिर भी तुम अँधेरे जा बैठी हो.

अँधेरा जो छाया को निगल जाता है ,अँधेरा जो तुम्हें भी एक दिन अपना ग्रास बना लेगा .

माया ,प्रकाश में आओ..वहीँ ये ..छाया तुमसे जुड़ पाएगी ,,
अन्यथा वह चाहकर भी तुम्हारा साथ नहीं दे पाएगी.

तुम्हारी छाया



प्रिय छाया ,
वक़्त राहों में मायाजाल फैलाता है मैं  उनमें उलझती हूँ ..गिरती हूँ  ..संभलती हूँ .
मैं इतनी कमज़ोर भी नहीं कि हर बार चोट खाती रहूँ.
हर घाव ने मुझे सबक दिया है.

अँधेरे मुझे अब भाने लगे हैं.अभ्यस्त हो रही हूँ मैं ,इसलिए अब यहाँ से बाहर नहीं आना चाहती.
वक़्त साथ न दे तो भी .

और हाँ ,रौशनी भी तेज़ हो जाए तो दृष्टि कमज़ोर कर देती है.उसका साथ सच्चा नहीं है.
अँधेरा एक सा रहता है .वह मुझे समो लेगा खुद में एक दिन इस में कोई  झूठ नहीं.
मैं सच के साथ हूँ .ऐसे ही रहने  दो मुझे.

तुम्हारी माया
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और छाया लुप्त हो गयी ...अब माया अकेली है !
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--अल्पना वर्मा