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''यूँ तो वतन से दूर हूँ लेकिन इस की मिट्टी मुझे हमेशा अपनी ओर खींचे रहती है''

March 31, 2015

आस का दीप!


आजकल के जो सामाजिक हालात हैं ऐसे में खुल कर, खिलकर खुलकर जी पाना /उत्सव  मनाना शायद हर किसी के बस में  नहीं या हर किसी के दिल में अब वो उत्साह भी नहीं है !कुछ लिखने का प्रयास किया है ,
कविता जैसा बन पड़ा है..संशोधन हेतु सुझाव आमंत्रित हैं.

आस का दीप 

छा रहा आतंक का साया ज़मी  पर
घुल रही  हवा में बारूदी  गंध है .

मन भरे आक्रोश में मगर खुलते नहीं हैं
मुट्ठियाँ भींचने लगी हैं पर  आवाज़ गुम है.

हर किसी को जाने -अनजाने  घेरे हुए है
न जाने कैसी  है ये डर की छाया

कोई गौतम ,कोई गांधी या पैगम्बर
कोई कृष्णा या  कोई मसीहा
अब कहीं  भी क्यूँ नज़र आता नहीं है?

धरती की बढ़ने लगी पिपासा प्रेम की
कौन जाने  कब कोई नानक यहाँ अवतार लेगा?

जल रहे हैं फूल ,रक्त रंजित होते उपवन
 मंडराने लगे हैं  चहुँ  ओर गिद्ध अनगिन

धूप की उधारी अभी चुकता नहीं है
शाम मांगे और उष्णता गगन से!

है कहाँ सौहार्द की बातें ,
है कहाँ सद्भाव के गाने
है कहाँ एक   हम  हैं कि वो कसमें?

हर एक   दहलीज पर आज एक  दुश्मन खड़ा है
क्यों नहीं कोई चिन्ह पाता उसे है?

लुट रहा है वो जिसे लूट सकता समय है
छीनता है उससे जो कि नासमझ है

कैसे -कैसे आरोपों में घिरने लगा है 'ईश्वर '
आज का इंसान बख्शता  उसे भी तो नहीं है.

कब ख़तम होगी ये अनिश्चितता की आंधी
कब रुकेगा इन तूफानों का कहर?

बह रही अश्रु धारा धरा के नयन से
कि लौटे  नहीं घर ,जो सुबह घर से गए थे

खेलूं मैं होली या  मनाऊँ  ईद कैसे
घर के आँगन -द्वार सब  सूने  पड़े  हैं .

कर के जतन कोई ,लौटा लाओ  रंग फिर चमन के
कर के जतन कोई, ख़ुशी की तरंग फिर से बहाओ
कुछ उम्मीदें यूँ तो अब भी शेष हैं मन में
उन पर अमन के महल  फिर से बनाओ.

 ====अल्पना वर्मा ======
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====३१/३/१२०१५ ====