आप का स्वागत है!


''यूँ तो वतन से दूर हूँ लेकिन इस की मिट्टी मुझे हमेशा अपनी ओर खींचे रहती है''

December 27, 2014

यूँ सजे हैं...

हर वर्ष की भांति २०१४ भी अपने बीतने की प्रतीक्षा कर रहा है और २०१५ आने की !

आशा है यह वर्ष ब्लॉग जगत में नए उत्साह और जोश का संचार करे और वह पुराने रूप में वापस लौटे!
जो जाने -माने ब्लोग्स अब शांत हैं वहाँ फिर से चहल-पहल शुरू हो.
नव वर्ष की अग्रिम शुभकामनाएँ!
 कुछ चित्र आप के लिए --
WP_20141225_003 Mall of Emirates
Christmas tree -Dubai Outlet Mall Christmas tree -Lamcy Plazal,dubai
Christmas tree -wafi Mall,dubai Christmas tree Ferrari world
XMAS tree ,20 dec 2014,Al Ain Mall WP_20141212_233
यूँ सजे है एमिरात के कुछ मॉल ..      नए साल के स्वागत में !
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December 23, 2014

माही

चित्र गूगल से साभार  

सब कहते हैं कि यह भागती -दौड़ती दुनिया है । दुनिया भी तो हमीं से बनी है ,क्या हम सभी भाग नहीं रहे ?इस दौड़ में कौन आगे कौन पीछे रह गया यह तब  मालूम चलता है जब कहीं रुक जाएँ ,ठहर जाएँ।

माही को भी आज अचानक रुकना पड़ा क्योंकि सीधी ,ऊँची-नीची तो कभी टेढ़ी या लहरदार ही सही मगर हर राह से वह बहुत तेज़ी दौड़ती हुई सी गुज़री है।
 आज उसे ठहरना पड़ा है क्योंकि जिस बिंदु पर वह रुक गयी है वहाँ से आगे कई रास्ते फैले हुए हैं ।
वह असमंजस में है रुकने पर ही उसे अहसास हुआ कि वह कितनी अकेली है।
उसके हर और धुंध सी छायी है, कोई कहीं दिखाई भी नहीं देता है।

भागते -दौड़ते हुए उसे न कभी किसी के साथ की ज़रूरत पड़ी न ही रौशनी या अँधेरे में फर्क महसूस हुआ।
कैसी अंधी दौड़ थी ?माही इस मोड़ पर आ कर हताशा के घेरों में घिरी है।

अचानक उसे याद आया कुछ उसके पास हमेशा रहता है ,उसकी जमा पूंजी ..हाँ ,कमर में बंधी पोटली निकाल कर उसके मुंह की डोरी ढीली की और हाथ भीतर डाला तो कुछ चुभा !उसने देखा उसकी उँगलियों से खून बह रहा था। सारी पोटली ज़मीन पर पलट दी, अब वहाँ कुछ पत्थर और कुछ कांच के टुकड़े थे !
पत्थर? शायद वक़्त के साथ-साथ कब मोम के टुकड़े पत्थर हो गए मालूम ही नहीं चला और काँच?

ओह.....! माही जैसे नींद से जागी ,याद आया कि किसी ने कभी कहा था 'रिश्ते कांच के समान होते हैं 'हैंडल विथ केयर !

माही सोच रही  है क्या अब उसे  टूटे काँच से लगे इस रिसते घाव के साथ ही उम्र भर जीना होगा?
वह तो उस मुकाम पर है जहाँ पीछे कोई रास्ता नहीं और आगे राहों का जाल बिछा है.

माही को इलेक्ट्रिक शोक दिया जाना है।
माही के माथे पर इलेक्ट्रोड लगाते हुए मैं असहनीय वेदना से गुजर रही हूँ ,सोचती हूँ न जाने हम में से कितने अब भी भाग ही रहे हैं 'एक अंधी दौड़' जिसका अंजाम हमेशा सुखकर नहीं होता।

=========================अल्पना वर्मा ==========================

December 5, 2014

अभिशप्त माया

ग़लती से क्लिक हुई छाया एक साए की 

आज सागर का किनारा ,गीली रेत,बहती हवा कुछ भी तो रूमानी नहीं था.
बल्कि उमस ही अधिक उलझा रही थी

माया और लक्ष्य !

तुम मुक्त हो माया! लक्ष्य ने कहा

मुक्त?

हाँ ,मुक्त !

ऐसा क्यों कहा लक्ष्य?

माया ,मैं हार गया हूँ ! तुम खुदगर्ज़ हो  ,तुम किसी को प्यार नहीं कर सकती!

लक्ष्य ,यह निर्णय अकेले ही ले लिया ?

हाँ!

लक्ष्य ,क्या इतना आसान है मुक्त कर देना ?माना कि ये बंधन के धागे तुमने बाँधे थे ,सीमाएँ भी तुमने तय की थी.लेकिन ....

लक्ष्य मौन है 

माया खुद को संभालते हुए बोलती रही,"बंधन ?संबंधों  की उम्र से उसकी मजबूती या परिपक्वता का कोई सम्बन्ध नहीं रहा ?
मुट्ठी में क़ैद की थी न तुमने तितली ! रंगबिरंगे पंखों वाली एक तितली !तितली से पूछा उसे क्या चाहिए मुक्ति या बंधन या बस थोड़ी सी रौशनी?

"मैं इसकी ज़रूरत नहीं समझता "- लक्ष्य ने कहा

हाँ ,अपने निर्णय तुम खुद ही लेना और देना जानते हो,आखिर हो तो पुरुष ही ! पुरुष जिसके हृदय के स्थान पर उसका अहम् धडकता है !वह उसे ही जीता है ,वह स्त्री के मन को कभी समझ नहीं सकता 

माया ,क्या तुमने मुझे समझा ?हर समय संदेह ,सवाल और शिकायतें !तुम कभी प्यार कर ही नहीं सकती ,न प्रेम जैसे शब्द को समझने की क्षमता !

माया जड़ हो गयी !'मेरी चाहत को बस इतना आँका तुमने ? उसे लगा जैसे उसको किसी ने ऊँचाई से गिरा दिया हो !

लक्ष्य जा रहा है 
उसकी हथेलियों में  अब भी तितली के पंखों के रंग लगे हुए हैं और तितली उसकी हथेली से चिड़िया बन उड़ गयी है !चिड़िया जो अब एक नीड़ की तलाश में आसमान में पर तौलेगी!

माया ठहर गयी है ,उसे न बंधन की चाह रही न मुक्ति की !
जानती है वह अधूरे प्रेम के लिए शापित है !
उसे चाह है बस एक टुकड़ा बादल ,एक मुट्ठी धूप और थोड़ी-सी हवा संग धरती के उस टुकड़े की जहाँ से वह अंकुर बनकर फूटे !
==========अल्पना ==============
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