आप का स्वागत है!


''यूँ तो वतन से दूर हूँ लेकिन इस की मिट्टी मुझे हमेशा अपनी ओर खींचे रहती है''

December 31, 2008

'गीत गाता आ रहा हूँ '

[दुबई फेस्टिवल सिटी [दिसम्बर १० ,२००८]]

वर्ष २००८ अब विदा लेने को है,नव-वर्ष के आगमन में कुछ ही घंटे शेष हैं.
नयी सोच,नए विचार,नयी योजनायें,नए वादे,नए संकल्प लिए नए वर्ष का स्वागत करें.
बीतते हुए इस वर्ष में रह गए अधूरे कार्य नए वर्ष में पूरे हों,
हर ओर खुशियाँ हों,देश खूब प्रगति करे.
विश्व में शान्ति बहाल हो.
आप और आपके समस्त परिवार को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं.
आता हुआ नया वर्ष 2009 कुछ कह रहा है---
आईये सुनते है...
'गीत गाता आ रहा हूँ '

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गीत गाता आ रहा हूँ,
तुम नए विश्वास भरना,
गर्व से मैं सर उठाऊं ,

तुम नया इतिहास रचना

देश की गरिमा को खातिर ,
कर गए क़ुर्बान जीवन,

भूल न जाना तुम उनको,
कर नमन तुम आगे बढ़ना


देखना तुम फिर कहीं भी,

कोई भी भूखा न साये,

हर दिशा में हो उजाला,
ज्ञान दीपक बन के जलना


पाट दो अन्तर हृदय के ,
संदेस सब में बाँट दो,

विश्व में चैनो-अमन हो,
प्रार्थना ईश्वर से करना

एक क़दम जो तुम उठाओ,
और भी संग आयेंगे,

हौसला टूटे न कोई ,
तुम यही संकल्प धरना

'गीत गाता आ रहा हूँ......

-[अल्पना वर्मा ,३१ दिसम्बर २००८]

December 24, 2008

राजस्थान पत्रिका में हुई चर्चा

पढने हेतु फोटो पर क्लिक करें.

हिन्दी ब्लागिंग में महिला ब्लागरों की चर्चा हुई और हम भी छपे यहाँ - तस्वीर देखीये- .....आज के राजस्थान पत्रिका समूह के भोपाल से प्रकाशित समाचारपत्र ''पत्रिका''की साप्ताहिक पत्रिका 'परिवार'' मे श्री आशीष खंडेलवाल जी ने 'ब्लॉग वुमन ' के नाम से आलेख लिखा है ।



आशीष जी को इस सुंदर आलेख के लिए धन्यवाद.


इस लेख के प्रकाशित होते ही सुबह से मेरे पास कई ईमेल भी आ रही हैं, जिन से मुझे बहुत ही प्रोत्साहन मिल रहा है.हिन्दी ब्लॉग जगत में मेरी अब तक जो भी पहचान बन पायी है उस के लिए सभी ब्लॉगर साथियों ,पाठकों और शुभचिंतकों की आभारी हूँ.आशा है भविष्य में भी ऐसे ही अपना प्यार और सहयोग आप मुझे देते रहेंगे

December 18, 2008

विदाई


विदाई
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देख रही हूँ ,
'उस को 'सीढियां उतरते हुए,
गले में लटकते सुनहरी तमगे,
हाथों में चन्द्र -विजय पताका भी है ,
मगर ,
कदम भारी ,
नज़रें ग़मगीन हैं उस की,
बेगुनाहों की लाशों का वज़न उठाये
चला जाता नहीं उस से,
सर झुक गया इतना कि
रास्ता भी दिखता नहीं ।
हाँ ,
जा रहा है जो ,
वह साल२००८ है,
आईये ,
कर देते हैं उस को विदा- रोशनी दे कर,
घावों पर उस के मरहम रख कर।
और प्रार्थना करते हैं कि
नव वर्ष उजाले नए ले कर आए।

-अल्पना -

दिसम्बर से मार्च तक हर साल लगने वाले 'ग्लोबल-विल्लेज ,दुबई 'में भारत का पंडाल सब से बड़ा और सब से अधिक लोकप्रिय होता है.इस साल भी आयोजित इस मेले में भारत का पंडाल बहुत ही सुंदर सजाया गया है.देखिये भारत के पवेलियन की कुछ ताजा तस्वीरें-



कृत्रिम नहर के एक तरफ़ भारत और दूसरी तरफ़ मिस्र का पवेलियन



भारत का पवेलियन और आकाश में देखें आतिशबाजी



निकासी द्वार


स्वागत द्वार-

December 15, 2008

' हरे कांच की किरचें'-कविता का मर्म


'हरे कांच की किरचें ' इस कविता का मर्म समझाने से पहले बता दूँ कि मैंने यह तय किया है कि भविष्य में कविता के साथ ही उस का प्रसंग भी प्रस्तुत किया करुँगी या फिर सरल कविता ही पोस्ट करुँगी.
ब्रिज मोहन श्रीवास्तव जी ने इस बार इस कविता की व्याख्या स्वयं इस प्रकार की है और मेरी राय मांगी है.
मन को पीड़ा से भर देने वाली रचना/मेडम आपका जो भी द्रष्टिकोण रहा हो लिखने का/पाठक को भी अपना अनुमान लगाने का अधिकार है/यह व्यथा एक सैनिक की पत्नी की भी हो सकती है और शहीद की पत्नी की भी या ऐसे ही किसी एनी की भी/क्योंकि चूडियाँ उतार फेंकना और सुर्ख चिन्ह मिटा कर आंसू भर आना लेकिन मन में'हरे कांच की चूडियों की इच्छा दवी होना मेरे मनमे आए विचार की पुष्टि करता है /जहाँ तक बुद्ध हो गई है तो इसको पत्थर हो गई है कहने में भी कोई हर्ज न था मगर वह निर्जीब होता और इस नारी में अभी जीवन शेष है/लगता है अहिल्या भी वास्तव में पत्थर की शिला न हो कर शिलावत हो गई होगी/यदि मेरा द्रष्टिकोण जरा भी सत्य है तो इतनी मार्मिक रचना मेरी नजरों से आज तक नहीं गुज़री /पुन पुन धन्यवाद और वधाई


मैं यही कहना चाहूंगी कि आप सही समझे हैं.
अच्छा लगता है जब अपनी रचना में किसी पाठक की इतनी रूची पाते हैं.
लेकिन कविता में इस बार मैं ने कोशिश की कि कम से कम सांकेतिक भाषा का प्रयोग हो जिस से ज्यादा सेज्यादा पाठक समझ सकें.विज्ञान विषय की स्नातक होने के कारण मैंने हिन्दी [बी-कोर्स ]बारहवीं तक ही पढ़ी है और हिन्दी साहित्य के नाम पर प्रेमचंद और शिवानी के अलावा ज्यादा किसी को नहीं पढ़ा.इस लिए हिन्दी के अपने सीमित ज्ञान के आधार पर जो थोड़ा लिख लेती हूँ उसे ऐसे ही समझा सकती हूँ वह यह है-कि इस कविता 'हरे कांच की किरचें 'में मैं ने एक स्त्री की उन भावनाओं को दर्शाने की कोशिश की है जो स्त्री के लिए ही ख़ास सुरक्षित हैं.
कविता में 'अगन''--
यह परिस्थिति के अनुसार अपना कारण बदलती है-




१-जैसा की आप ने समझा-एक विधवा की मनोव्यथा है--तो यह अगन प्रियतम की चिता की अग्नि हो सकती है.
२-या समझिये-एक हारी हुई स्त्री के रोष/क्रोध या उपेक्षित होने पर मन में उपजी हो.
३-या फिर यह विरह /बिछोह में तड़प से लगी हो?
४-या फिर अपने ही भावों के ज्वर से उपजी हो जिसे वह नियंत्रित न कर पा रही हो.
५-या संबंधों की परिभाषा समझ पाने में असहाय होने की कुंठा से जन्मी ज्वाला.

कोई भी कारण हो इन परिस्थितियों में मजबूर हो कर या प्रतिरोध कर न पाने की स्थिति में इस संबंधों को तोड़ देना चाहती है.-'चूडियाँ उतार फेंकना -सुर्ख चिन्हों[बिंदिया और सिन्दूर] सुहाग की निशानियों को मिटा देना--स्थाई [एक विधवा] या अस्थायी[एक विरहिणी ]करती है तो अपने अन्दर की सभी चाहतों को खतम कर देने का प्रयास करती है.निराशा -हताशा उसे पत्थर बना देती है--आप ने सही कहा -अहिल्या भी ऐसी हो गयी थी.नायिका का दुःख चरम पर है.

मनोविज्ञान में दुःख[grief]की पाँच अवस्थाएं होती हैं-denial, anger, bargaining,depression, acceptance; death -डिप्रेशन के बाद acceptance है-और यही अवस्था यहाँ इस नायिका की भी है-

- जिस को देख कर लोग कहने लगते हैं वो बुद्ध हो गयी है!

इस के बाद मृत्यु[मुक्ति] की स्टेज है .

अब बुद्ध क्या है???यह आप सभी जानते हैं.संक्षेप में 'बुद्ध' संसार से निर्मोह की एक स्थिति है.

-मगर नहीं...वो जानती है वो बुद्ध नहीं हुई!....

डॉ.अनुराग जी सही कहते हैं-'बुद्ध हो जाना इतना आसान भी नही है ओर इसे स्वीकार करना भी !'

राज भाटिया जी के इस कथन से कविता के भाव और साफ़ हो जाते हैं ' बहुत दर्द लिये है यह हरे कांच की
किरचे ! मन चाहता है इन्हे निकालन फ़ेकना.... लेकिन यादे भी तो साथ मे लगी है इन किर्चो के.. बहुत
कुछ बंधा है इन किर्चो से... बहुत वेदना छुपी है.

ज्ञान दत्त जी ने ने भी सही जाना -यह तो आपने आत्मपरीक्षण का तरीका बता दिया, कि बुद्ध हुये या नहीं,

कैसे जाना जाये।
सुशील कुमार छोक्कर जी -कांच की किरचें कांच के महीन टुकड़ों को कहते हैं .हर कांच की चूडियाँ सुहाग का
प्रतीक हैं -

और आगे कविता का भाव आप समझ ही गए हैं.


[P.S.व्याख्या करते हुए ऐसा लगता है जैसे किसी परीक्षा में बैठी लिख रही हूँ]

December 14, 2008

'हरे कांच की किरचें'

[chitr google se sabhaar]
विरहिणी की अन्तर वेदना को बताती हुई यह कविता प्रस्तुत है-
हरे कांच की किरचें
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अगन -
तपा जाती है तन उसका,
मन भी सुलगने लगता है,

गर्म होती कांच की चूडियाँ
उतार फेंकती है वो.
पोंछ देती है सुर्ख चिन्हों को.
भिगोती रहती है आंसुओं में ख़ुद को
और बन जाती है एक बुत !

लोग कहते हैं कि 'वो 'बुद्ध 'हो गयी है!!

मगर नहीं...वो जानती है वो बुद्ध नहीं हुई!
क्योंकि अब भी ,
उस के मन में पीर देती हैं
व्याकुल करती हैं उस को ,
मन में दबी -
हरे कांच की किरचें!

- अल्पना वर्मा द्वारा लिखित[२००८]

Kavita Ka marm jaaniye -yahan :-
http://alpana-verma.blogspot.com/2008/12/blog-post_15.html

December 1, 2008

'नया संग्राम'


'नया संग्राम'[एक आह्वान]
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आज एक नया संग्राम लाना चाहिए,हो गया पुराना संसार नया चाहिए,

आईनों के धुंधले अक्स नहीं चाहिए,लेबलों से लदे इंसान नहीं चाहिए,
आज एक नया संग्राम लाना चाहिए,हो गया पुराना संसार नया चाहिए.

झूटे करें वादे और लूटे भोलेपन को,सत्ता के ऐसे गुलाम नहीं चाहिए,
बहता हो जिससे लहू मासूमों का, ऐसे खूनी फरमान नहीं चाहिए,

पैसों के कांटे छीले प्यार की कली को,आज हमें ऐसे धनवान नहीं चाहिए,
रिश्तों में बहता हो सिर्फ़ खारा पानी, ऐसे रिश्तों की पहचान नहीं चाहिए,

आज एक नया संग्राम लाना चाहिये,हो गया पुराना संसार नया चाहिए.

इंसानियत के खूनी इंसान आज हमें ऐसे हैवान नहीं चाहिए,
जो न मिलने दे इन्साफ के खुदा से हमें,आज हमें ऐसे दरबान नहीं चाहिए,

जिस से बरसता हो सिर्फ़ काला पानी,आज हमें ऐसा आसमान नहीं चाहिए,
जिस घर में सन्नाटे और चीखें हों, आज हमें ऐसे मकान नहीं चाहिए,

आज हमें नया संग्राम लाना चाहिये,हो गया पुराना संसार नया चाहिए.

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कविता सुनिये
Play Or Download Here[mp3]
-written[2002] and recited by Alpana Verma