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June 24, 2008

ब्लॉग्गिंग में मेरा नया प्रयोग



video

[yah clip--AVI. mode[blogger] में है-जो जल्दी देखी जा सकेगी]

प्रस्तुत है-मेरा एक नया प्रयोग.......मैंने सभी तकनीकी बारीकियाँ 'गूगल सर्च इंजन 'से और विण्डो XP की हेल्प से सीखी हैं.- इस वीडियो को बनाने में मुझे ७ घंटे लगे-दो बार पूरा बनाने करने के बाद भी ठीक नहीं लगी और अब जा कर यह तैयार हुई है--मेरी कविता 'भूल जायेंगे'को इस विडियो द्वारा प्रर्दशित करने का प्रयास किया है.कृपया बताएं कैसी लगी?

भूल जाएंगे

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जब कभी यादों के दर्पण टूट जाएंगे,

भूल जाएंगे तुम्हें हम भूल जाएंगे,

जब कभी सपने भी हम से रूठ जाएंगे,

भूल जायेंगे तुम्हें हम भूल जायेंगे .

1-हमने अपनी उम्र का सौदा किया जिससे,

वो मिलेगा फ़िर कभी तो पूछूंगी उस से,

बिन तुम्हारे अपना क्या हम मोल पाएंगे,भूल जायेंगे तुम्हें हम भूल जायेंगे......

2-तुमने माना था हमी को प्यार के क़ाबिल,

फ़िर बने क्यों मेरे अरमानों के तुम क़ातिल,

जब कभी आँखों से आंसू सूख जाएंगे,भूल जायेंगे तुम्हें हम भूल जायेंगे......

3-संग तुम्हारे कटते थे जो मेरे रात और दिन,

अब कटेगी कैसे कह दो ज़िंदगी तुम बिन,

जब कभी साँसों के बन्धन छूट जाएंगे,भूल जाएंगे तुम्हें हम भूल जाएंगे.

4-डूबती कश्ती ने तुमको समझा था साहिल,

लेकिन तुम ने दे दिया गैरों को अपना दिल,

जब कभी धड़कन से रिश्ते छूट जाएंगे,भूल जाएंगे तुम्हें हम भूल जाएंगे.

5-एक मुठ्ठी आसमां की चाह थी हमको ,

लेकिन तुमसे नाउम्मीदी ही मिली हमको,

जब फरिश्ते मौत के हम को सुलायेंगे,भूल जाएंगे तुम्हें हम भूल जाएंगे.

जब कभी यादों के दर्पण टूट जाएंगे,भूल जाएंगे तुम्हें हम भूल जाएंगे---

-written by Alpana Verma [in 2003]

[आज[26th june] एक बहुत ही अच्छी बात हुई.....मेरी कविता 'भूल जाएंगे' को यहाँ ब्लॉग पर सुन कर मुम्बई से एक सज्जन Mr.अरविन्द शर्मन जी [जिनका अपना संगीत स्टूडियो है-इस से ज्यादा उन के बारे में मैं नहीं जानती ] ने कविता'भूल जाएंगे' के लिए संगीत बना कर भेजा है, जिस से मेरा यह प्रिय गीत संगीत पा कर और निखर सकेगा.
मैं अरविन्द जी को अपने ब्लॉग के माध्यम से धन्यवाद कहना चाहती हूँ.[posting this message on june 26th,2008]

June 22, 2008

'खामोशी'

खामोशी
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'अंजलि भर


खामोशी समेटती हूँ,


बिखरा देती हूँ चारों और ,


क्यूँ कि -


इस भीड़ में,


जी नहीं लगता


तुम बिन...


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June 16, 2008

'ज़िंदगी'

पिछली कविता के कमेंट्स में किसी अनाम व्यक्ति ने रोमांटिक कविता लिखने का आग्रह किया मगर करूँ क्या? मेरी कलम ऐसी ही कवितायें लिखती है जो उस श्रेणी में आती नहीं.
यह कविता भी कई साल पहले की लिखी हुई है--अभी कुछ नया नहीं लिखा है सो पुरानी डायरी से यह कविता आप की नजर करती हूँ-

ज़िंदगी
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क़तरा क़तरा छंटती जाती है ज़िंदगी

मायूसी के धागों में बटती जाती हैज़िंदगी

जब कभी आँख से मोती टपके
दरया बनके बहती जाती है ज़िंदगी

तनहाइयों के देश में अकेली ही
खुद में सिमटती जाती है ज़िंदगी

यूँ तो पहले ना थी उदास इतनी
जाने क्यों गुमसुम रहती है ज़िंदगी

गीत उनका गाती हूँ अगर
पायलें छनकाती है ज़िंदगी

साथ बिते पल जो याद आते हैं
हँसती है खिलखिलाती है ज़िंदगी

और क्या कहूँ....

यूँ ही लम्हा लम्हा कटती जाती है जिंदगी

हाँ ,कटती जाती है जिंदगी।

-अल्पना वर्मा

June 8, 2008

'यूं हुई समन्दर मैं '


यूं हुई समन्दर मैं

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सोचा था मुट्ठी में संभाल रखा है



जतन से उस को,


पर न जाने कब..


फिसल गया वो...

सूखी रेत की तरह,



और रह गयी किरकिरी हाथों में,


जो आंखों में चुभती है तो.....



बना जाती है समन्दर मुझ को !



-Alpana Verma